
पार्किंग स्थल झगड़ा
पार्किंग स्थल का दृश्य देखने में हास्यास्पद होता यदि वह उतना त्रासदीपूर्ण नहीं होता l दो वाहन चालक एक कार के रास्ता रोकने के कारण ऊंची आवाज में झगड़ा कर रहे थे, जिसमें वह एक दूसरे को बुरा भला कह रहे थे।
इसे इस बात ने और भी ख़ास दर्दनाक बना दिया कि यह झगड़ा चर्च के पार्किंग स्थल में हो रहा था l शायद अभी-अभी इन दो आदमियों ने प्रेम, धीरज, या क्षमा के विषय उपदेश सुना था, लेकिन उस क्रोध के क्षण में वे सब कुछ भूल गए थे l
गुज़रते हुए, मैंने अपना सिर हिलाया─फिर तुरंत अनुभव किया कि मैं भी बेहतर नहीं था l मैंने भी बाइबल को बहुत बार पढ़ा था, कुछ क्षण बाद केवल एक निर्दय विचार के साथ पाप में गिरने के लिए? कितनी बार मैंने उस व्यक्ति की तरह व्यवहार किया था जो “उस मनुष्य के समान है जो अपना स्वाभाविक मुंह दर्पण में देखता है l इसलिए कि वह अपने आप को देखकर चला जाता और तुरंत भूल जाता है कि मैं कैसा था”(याकूब 1:23-24)?
याकूब अपने पढ़ने वालों से अपील कर रहा था कि न केवल पढ़ें और परमेश्वर के निर्देशों पर विचार करें, बल्कि उसके कहे अनुसार करें भी (पद.22) l उसने ध्यान दिया कि एक संपूर्ण विश्वास का अर्थ वचन को जानना और उसे कार्य रूप देना है l
जो वचन में लिखा है उसे जीवन की परिस्थितियां लागू करने में कठिन बना सकती हैं। परंतु यदि हम पिता से सहायता मांगते हैं तो वह अवश्य ही अपने वचन को मानने में एवं अपने कार्य द्वारा उसे प्रसन्न करने में मदद करेगा l

एक अच्छा काम
किशोर के रूप में, स्पर्जन ने परमेश्वर के साथ कुश्ती की l वह चर्च जाते हुए बड़े हुए थे परंतु वहां जो उपदेश होते थे वे उनको अरोचक और अर्थहीन लगते थे l उनके लिए परमेश्वर पर विश्वास करना एक संघर्ष था, उनके अपने शब्दों में, “चार्ल्स, ने विरोध और विद्रोह किया l” एक रात एक भयंकर बर्फानी तूफ़ान ने उन्हें एक छोटे मैथोडिस्ट चर्च में आश्रय लेने को विवश किया l चर्च के पासवान का उपदेश व्यक्तिगत रूप से उनकी ओर निर्देशित महसूस हुआ l उसी क्षण, परमेश्वर कुश्ती मैच जीत गया, और चार्ल्स ने अपना हृदय यीशु को दे दिया
स्पर्जन ने बाद में लिखा, “मेरा मसीह के साथ आरम्भ करने से बहुत पहले, उसने मेरे साथ आरम्भ किया l” वास्तव में, परमेश्वर के साथ हमारा जीवन उद्धार पाने के क्षण से आरंभ नहीं होता है। भजनकार इस प्रकार लिखता है कि परमेश्वर ने हमारे भीतरी अंगों को बनाते हुए “[हमें] माता के गर्भ में रचा” (भजन 139:13) l पौलुस प्रेरित लिखते हैं, “परन्तु परमेश्वर की, जिसने मेरी माता के गर्भ ही से मुझे ठहराया और अपने अनुग्रह से बुला लिया” (गलातियों 1:15) l जब हमारा उद्धार होता है तब परमेश्वर हममें काम करना बंद नहीं करता: “जिस ने तुम में अच्छा काम आरम्भ किया है, वही उसे यीशु मसीह के दिन तक पूरा करेगा” (फिलिप्पियों 1:6)।
हम सब वे कार्य हैं जो एक प्रेमी परमेश्वर के हाथ में प्रगति पर हैं l वह हमें हमारे विद्रोही द्वंद से निकाल कर अपने स्नेही गोद में ले लेता है। परंतु उस समय हमारे साथ उसका उद्देश्य केवल एक आरम्भ है l “क्योंकि परमेश्वर ही है, जिस नें अपनी सुइच्छा निमित्त तुम्हारे मन में इच्छा और काम, दोनों बातों के करने का प्रभाव डाला है”(फिलिप्पियों 2:13)। विश्राम निश्चित है, हम उसके अच्छे कार्य हैं बावजूद इसके कि हमारी उम्र कितनी है या हम जीवन के किस पड़ाव पर हैं l

बुद्धिमान सलाहकार
जब मैं सैमनरी में पढ़ रहा था, तब मैं पूर्णकालिक काम करता था l उसके साथ पुरोहिताई आवर्तन और एक चर्च में प्रशिक्षण(internship) l मैं व्यस्त था। जब मेरे पिता मुझसे मिलने आए, तो उन्होंने मुझसे कहा, “तुम वास्तव में विफल हो जाओगे l” मैंने उनकी सलाह को यह माँनते हुए हल्के में लिया कि वह पुरानी पीढ़ी के व्यक्ति हैं और परिणाम प्राप्त करने में मेरे मेहनत को नहीं समझ पा रहे हैं ।
मैं विफल तो नहीं हुआ l परंतु मैंने बहुत कठोर सूखेपन का अनुभव किया जिसमें मैं निराशा में चला गया l उस समय से, मैंने चेतावनियों को सुनना सीख लिया है─विशेषकर अपने प्रियों से ─बहुत सावधानी के साथ l
इससे मुझे मूसा की कहानी याद आ गई l वह भी इस्राएल का न्यायी होकर बड़े परिश्रम से कार्य कर रहा था (निर्गमन 18:13)। फिर भी उसने अपने ससुर की चेतावनी को मानना उचित समझा (पद 17-18)। यित्रो बहुत व्यस्त नहीं था, परंतु वह मूसा और उसके परिवार से प्रेम करता था और आनेवाली परेशानियों को जानता था l शायद इसीलिए मूसा यित्रो की बात सुन सका और उसकी सलाह को माना l मूसा ने छोटे विवादों को सुलझाने के लिए “ऐसे पुरुषों को छांट [लिया] जो गुणी” थे, और उसने कठिन मामलों को स्वयं हल किया (पद. 21-22)। क्योंकि उसने यित्रो की बात सुनी, उसने अपने काम को पुनःव्यवस्थित किया, और अपना बोझ साझा करने के लिए दूसरों को सुपुर्द किया, इसलिए वह जीवन के उस काल में विफल नहीं हुआ l
हममें से बहुत से लोग परमेश्वर का कार्य, अपना परिवार, और अन्यों को बहुत गंभीरता से─और भी भावप्रवणता से लेते हैं l परंतु फिर भी हमें अपने भरोसेमंद प्रिय लोगों की सलाह मानना चाहिए और अपने समस्त कार्यों में परमेश्वर की बुद्धि और सामर्थ पर भरोसा करना चाहिए।

परमेश्वर का महान प्रेम
जब मेरे एक मित्र ने मुझसे पवित्रता को प्रोत्साहित करने वाले एक कार्यशाला में किशोरावस्था की लड़कियों को संबोधित करने को कहा, तो मैंने मना कर दिया। एक भाग खड़े हुए किशोर के रूप में, मैंने संघर्ष किया था और मेरी अनैतिकता के कारण दशकों तक के घाव के निशान थे l शादी के बाद अपने पहले बच्चे को गर्भपात के कारण खो देने के कारण मैंने सोचा कि परमेश्वर मेरे बीते हुए पापों के कारण मुझे दंड दे रहा है। अनन्तः जब मैंने 30 वर्ष की आयु में अपना जीवन मसीह को समर्पित कर दिया, मैंने अपने पापों का अंगीकार किया और पश्चाताप किया . . . बार-बार l अभी भी, दोष भावना और शर्मिंदगी मुझे खाए जा रही थी। मैं परमेश्वर के अनुग्रह के विषय कैसे बता सकता था जब कि मैंने उसके उस महान अनुग्रह के दान को पूरी तरह अपने जीवन में अनुभव नहीं किया था? धन्यवाद हो, समय के साथ, अपने पापों से मन फिराने से पूर्व जो मैं था परमेश्वर ने उन झूठों को समाप्त कर दिया जो मुझे जकड़े हुए थे l उसके अनुग्रह से, अंततः मैंने परमेश्वर के क्षमा को प्राप्त किया जो वह मुझे प्रारंभ से देना चाहता था।
परमेश्वर हमारी परेशानियों से उत्पन्न विलापों और हमारे बीते पापों के परिणाम को समझता है। हालाँकि, वह अपने लोगों को निराशा पर विजय पाने, अपने पापों से मन फिराने, और उसके महान “प्रेम,” “तरस,” और “विश्वासयोग्यता” (विलापगीत 3:19-23) की आशा में ऊपर उठने की शक्ति देता है l परमेश्वर का वचन कहता है कि परमेश्वर स्वयं हमारा “भाग है”─हमारी आशा और उद्धार है─और हम उसकी अच्छाइयों पर भरोसा रखना सीख सकते हैं (पद 24-26)।
हमारा करुणामय पिता उसकी प्रतिज्ञाओं पर भरोसा करने में हमारी सहायता करता है l जब हम उसके महान प्रेम को अपने लिए भरपुरी के साथ स्वीकारते हैं तब हम उसके अनुग्रह का सुसमाचार फैला सकते हैं l
