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बड़ा संसार, उससे बड़ा परमेश्वर

जब हम अपनी गाड़ी से उत्तरी मिशिगन से होकर जा रहे थे, मारलीन आश्चर्य से बोली, “विश्वास नहीं होता कि संसार इतना बड़ा है!” उसने यह बात तब कही जब हम उस संकेत को पार किये जो भूमध्य रेखा और उत्तरी ध्रुव के बीच है l  हम आपस में बातचीत किये कि हम कितने छोटे हैं और हमारा संसार कितना विशाल है l फिर भी, विश्व के आकर से तुलना करने पर, हमारा छोटा गृह धूल का एक कण है l

यदि हमारा संसार बड़ा है, और विश्व उससे भी कहीं बड़ा, इसका बनानेवाला कितना बड़ा होगा जिसने इसे अपनी शक्ति से बनाया? बाइबल हमसे कहती है, “क्योंकि [यीशु में] सारी वस्तुओं की सृष्टि हुई, स्वर्ग की हों अथबा पृथ्वी की, देखी या अनदेखी, क्या सिंहासन, क्या प्रभुताएं, क्या प्रधानताएं, क्या अधिकार, सारी वस्तुएँ उसी के द्वारा और उसी के लिए सृजी गयी हैं” (कुलुस्सियों 1:16)

सुसमाचार यह है कि यही यीशु जो इस विश्व का सृष्टिकर्ता है हमें हमारे पापों से प्रतिदिन और हमेशा के लिए बचाने आया l जिस दिन यीशु मरा उसके पहले वाली रात, यीशु ने कहा, “मैं ने ये बातें तुम से इसलिए कहीं हैं कि तुम्हें मुझ में शांति मिले l संसार में तुम्हें क्लेश होता है, परन्तु ढाढ़स बांधो, मैं ने संसार को जीत लिया है” (यूहन्ना 16:33) l

जीवन की बड़ी और छोटी चुनौतियों का सामना करते हुए, हम संसार के सृष्टिकर्ता को पुकारते हैं जिसने मृत्यु सही और मुर्दों में से जी उठा, और संसार के टूटेपन पर विजयी हुआ l हमारे संघर्ष के समय, वह सामर्थ्य के साथ हमें अपनी शांति देता है l

नायक से बढ़कर

जब स्टार वार्स  (star Wars) फिल्म के प्रशंसक उत्सुकता से 8 वीं कड़ी, “द लास्ट जेडी,” के जारी होने का इंतज़ार कर रहे हैं, लोग 1977 से लेकर अभी तक इन फिल्मों की अद्भुत सफलता की लगातार जांच कर रहे हैं l सी.एन.एन. मनी(CNNMoney) के लिए काम करनेवाले मीडिया रिपोर्टर, फ्रैंक पालोटा कहते हैं कि स्टार वार्स  अनेक के साथ संपर्क साधते हैं जो “ऐसे समय में जब संसार को नायक/हीरो चाहिए एक नयी आशा और हित के प्रभाव” की चाहत रखते हैं l

यीशु के जन्म के समय, इस्राएली शोषित थे और मुक्तिदाता का इंतज़ार कर रहे थे जिसकी प्रतिज्ञा परमेश्वर ने वर्षों पहले की थी l अनेक लोग रोमी अत्याचार से मुक्त करनेवाले एक नायक/हीरो की राह देख रहे थे, किन्तु यीशु एक राजनीतिक नायक/हीरो की तरह नहीं आया l इसके बदले, वह बैतलहम नगर में एक बालक के रूप में जन्म लिया l परिणामस्वरूप, अनेक उसे पहचान न सके l प्रेरित यूहन्ना ने लिखा, “वह अपने घर आया और उसके अपनों ने उसे ग्रहण नहीं किया” (यूहन्ना 1:11) l

नायक/हीरो से बढ़कर, यीशु हमारा मुक्तिदाता बनकर आया l वह अन्धकार में परमेश्वर की ज्योति लेकर आया और अपना प्राण देने आया ताकि जो कोई उसे ग्रहण करता है क्षमा प्राप्त करके पाप के ताकत से छुटकारा पाएगा l यूहन्ना ने कहा “[वह] अनुग्रह और सच्चाई से परिपूर्ण होकर हमारे बीच में डेरा किया, और हम ने उसकी ऐसी महिमा देखी, जैसी पिता के एकलौते की महिमा” (पद.14) l

“परन्तु जितनों ने उसे ग्रहण किया, उसने उन्हें परमेश्वर की संतान होने का अधिकार दिया, अर्थात् उन्हें जो उसके नाम पर विश्वास रखते हैं” (पद.12) l वास्तव में, यीशु ही वह एकमात्र आशा है जो संसार को चाहिए l

परमेश्वर की सहायता से

मैं जैसे-जैसे बूढ़ी हो रही हूँ, मैं विशेषकर सर्दियों के मौसम में जोड़ों का दर्द महसूस करती हूँ l मैं खुद को विजेता कम और एक वरिष्ठ नागरिक की चुनौतियों से अधिक पराजित महसूस करती हूँ l

इसलिए मेरा हीरो एक बूढ़ा व्यक्ति कालेब है अर्थात् वह भेदिया जिसे मूसा ने कनान यानि प्रतिज्ञात देश का भेद लेने भेजा था (गिनती 13:-14) l जब दूसरे भेदियों ने बुरा रिपोर्ट दिया, कालेब और यहोशू बारहों में से ऐसे दो भेदिये थे जिनके रिपोर्ट के आधार पर परमेश्वर ने उनको प्रतिज्ञात देश में जाने को कहा l अब, यहोशू 14 में, वह समय आ गया जब देश में कालेब को उसका भाग मिलना है l  किन्तु अभी भी शत्रु हैं जिन्हें देश से बाहर करना है l कालेब ने न  खुद सेवा छोड़ना चाहता था और न ही युद्ध को अपनी युवा पीढ़ी के हाथों में छोड़ना चाहता था l इसलिए उसने कहा, “तू ने तो उस दिन सुना होगा कि उसमें अनाक्वंशी रहते हैं, और बड़े बड़े गढ़वाले नगर भी हैं; परन्तु क्या जाने संभव है कि यहोवा मेरे संग रहे, और उसके कहने के अनुसार मैं उन्हें उनके देश से निकाल दूँ” (यहोशू 14:12) l

“कि यहोवा मेरे संग रहे l” इसी तरह का मनोभाव कालेब को युद्ध के लिए तैयार रखा l वह अपनी सामर्थ्य और अपने बुढ़ापे की बजाए परमेश्वर पर केन्द्रित था l परमेश्वर उसे ज़रूरी काम करने में मदद करनेवाला था l

हममें से अनेक लोग एक ख़ास उम्र के बाद कोई बड़ा काम नहीं करना चाहते हैं l किन्तु चाहे हम कितने भी बूढ़े हो जाएं हम परमेश्वर के लिए महान कार्य कर सकते हैं l जब कालेब की तरह अवसर हमारे सामने आते हैं, हमें उनसे दूर नहीं भागना है l परमेश्वर की सहायता से हम जीत सकते हैं!

वह मैं नहीं हूँ

बीसवीं शताब्दी के एक सबसे मशहूर ऑर्केस्ट्रा संचालक के रूप में, आरटूरो टॉसकनिनी को इसलिए याद किया जाता है क्योंकि वह उस  व्यक्ति को महत्त्व देते थे जो उसके लायक है l डेविड इवन की पुस्तक डिक्टेटर्स  ऑफ़ द बैटन,  में लेखक वर्णन करता है कि किस तरह न्यू यॉर्क फिलहारमोनिक ऑर्केस्ट्रा के सदस्य बीथहोवेन के  नाइन्थ सिम्फनी (एक प्रकार की संगीत रचना) के अभ्यास के अंत में खड़े होकर टॉसकनिनी की प्रशंसा करने लगे l जब सब शांत हो गए, आरटूरो निराश होकर दुःख से बोला : “वो मैं नहीं हूँ ... वह बीथहोवेन है! . . . टॉसकनिनी कुछ नहीं है l”

नए नियम में प्रेरित पौलुस अपनी पत्रियों में अपनी आत्मिक अंतर्दृष्टि और प्रभाव के लिए श्रेय लेने से इनकार किया l वह जानता था कि मसीह में विश्वास लानेवाले अनेक लोगों का वह आत्मिक आभिभावक था l उसने स्वीकार किया कि उसने अनेक लोगों के विश्वास, आशा और प्रेम को बढ़ाने के लिए अत्यधिक मेहनत किया था और दुःख उठाया था (1 कुरिं. 15:10) l किन्तु अच्छे विवेक के कारण वह उनकी प्रशंसा अस्वीकार कर रहा था जो उसके विश्वास, प्रेम और अंतर्दृष्टि से प्रभावित थे l  

इसलिए अपने पाठकों के लिए और हमारे लिए, पौलुस कहता है, वास्तव में, “भाइयों और बहनों, वह मैं नहीं हूँ, l वह मसीह है . . . पौलुस कुछ भी नहीं है l” हम केवल उसके संदेशवाहक हैं जो हमारी प्रशंसा के योग्य है l

चिंता का इलाज

हम उत्साहित हैं क्योंकि मेरे पति की नौकरी के कारण हमें दूसरी जगह स्थानांतरित होना है l किन्तु मैं अनजान लोग और स्थान की चुनौतियों के कारण चिंतित हूँ l घर के सामान को अलग-अलग करके पैक करना l नए स्थान में रहने के लिए नया घर और अपने लिए एक नौकरी खोजना l नए शहर को जानना और उसमें रहने का प्रयास करना l ये सब विचार . . . बेचैन करनेवाले थे l जब मैंने उन कामों की सूची बनायी जो मुझे करना था, प्रेरित पौलुस के शब्द मुझे याद आए : चिंता न करो, किन्तु प्रार्थना करो (फ़िलि. 4:6-7) l

अनजान बातों और चुनौतियों के विषय पौलुस का चिंतित होना स्वाभाविक था l उसका जहाज़ टूट गया l उसे पीटा गया l वह कैद हुआ l फिलिप्पी की कलीसिया को लिखी अपनी पत्री में, उसने उन मित्रों को उत्साहित किया जो अनजान बातों का सामना कर रहे थे, “किसी भी बात की चिंता मत करो; परन्तु हर एक बात में तुम्हारे निवेदन, प्रार्थना और विनती के द्वारा धन्यवाद के साथ परमेश्वर के सम्मुख उपस्थित किए जाएं” (पद.6) l

पौलुस के शब्द मुझे साहस देते हैं l अनिश्चित बातों के बिना जीवन है ही नहीं, चाहे जीवन में एक बड़ा परिवर्तन हो, पारिवारिक समस्या हो, स्वास्थ्य का अकारण भय हो, अथवा आर्थिक समस्या हो l मैं निरंतर सीख रही हूँ कि परमेश्वर चिंता करता है l वह चाहता है कि हम अपनी चिंताओं को उसे दे दें l हमारे ऐसा करने से वह सब कुछ जाननेवाला परमेश्वर प्रतिज्ञा करता है कि उसकी शांति जो “सारी समझ से परे है” हमारे हृदय और हमारे विचारों को मसीह यीशु में सुरक्षित रखेगी” (पद.7) l

उपहार

लन्दन के रेंदेज्वास कॉफ़ी हाउस में खुबसूरत बत्तियाँ, आरामदायक सोफे हैं और अन्दर कॉफ़ी की खुशबू आती है l यहाँ सब कुछ मुफ्त है l एक स्थानीय कलीसिया ने इस दूकान को व्यवसाय के रूप में शुरू किया था, और एक वर्ष के बाद इस कॉफ़ी हाउस को बदल दिया गया l वहां के प्रबंधकों ने महसूस किया कि परमेश्वर उन्हें कुछ बिलकुल नया करने को बुला रहा है अर्थात् व्यंजन सूची में सब कुछ मुफ्त l वर्तमान में आप बिना कोई कीमत चुकाए कॉफ़ी, केक, अथवा सैंडविच मंगवा सकते हैं l किसी तरह का दान भी नहीं है l सब उपहार है l

मैंने प्रबंधक से पुछा कि वे इतना उदार क्यों हैं l उनका जवाब था, “जिस तरह परमेश्वर ने हमारे साथ व्यवहार किया उसी तरह हम भी लोगों के साथ व्यवहार करते हैं l वह हमारे साथ कल्पना से परे उदार है l”

यीशु हमें हमारे पापों से बचाने के लिए और परमेश्वर के साथ मेल करने के लिए मरा l वह कब्र से जी उठा और अब जीवित है l इस कारण, हमारे द्वारा किये गए गलत कार्य भी क्षमा किये जा सकते हैं, और आज हम नया जीवन पा सकते हैं (इफिसियों 2:1-5) l और इन सब के विषय सबसे आश्चर्जनक बात यह है कि ये सब मुफ्त है l हम कीमत देकर यीशु द्वारा दिया जानेवाला नया जीवन खरीद नहीं सकते l हम उसकी कीमत चुकाने के लिए कुछ दान भी नहीं दे सकते हैं (पद.8-9) l सब मुफ्त है l

रेंदेज्वास कॉफ़ी हाउस के लोग कॉफ़ी और केक परोस कर परमेश्वर की उदारता की एक झलक प्रस्तुत करते हैं l आप और मैंने भी बिना कीमत चुकाए अनंत जीवन प्राप्त किया है क्योंकि यीशु ने पूरी कीमत चुका दी है l

जीत में बदली हुई हार

हमारे चर्च में अतिथि बैंड स्तुति और आराधना में अगुआई कर रहा था, और प्रभु के लिए उनका उत्साह हृदय स्पर्शी था l हम उनके जोश को देख रहे थे और अनुभव कर रहे थे l

तब उन संगीतज्ञों ने बताया कि वे सब पूर्व कैदी रह चुके हैं l अचानक उनके गीतों में एक नया अर्थ दिखाई दिया, और मैंने महसूस किया कि क्यों उनकी प्रशंसा उनके लिए इतना महत्वपूर्ण थी l उनकी प्रशंसा ऐसे टूटे हुए जीवनों की गवाही थी जो अब नए बन चुके थे l

संसार सफलता को गले लगा सकता है l  किन्तु बीती हार की कहानियाँ लोगों को आशा भी देती हैं l ये कहानियाँ हमें भरोसा देती हैं कि हमारे समस्त हार के बाद भी परमेश्वर हमसे प्रेम करता है l पासवान गैरी इनरिंग कहते हैं कि इब्रानियों 11 में जिसे हम विश्वास का भवन पुकारते हैं, परमेश्वर का ऐसा भवन भी हो सकता है जहाँ हार जीत में बदल गयी हो l उनका मानना है, “शायद ही उस अध्याय में ऐसा कोई व्यक्ति है जिसके जीवन में गंभीर दोष न रहा हो l किन्तु परमेश्वर हारे हुए जीवनों को नया बनाने के कार्य में लगा हुआ है . . . यह परमेश्वर के अनुग्रह का महान सिद्धांत है l”

मैं भजन 145 का सुख पसंद करता हूँ, जो परमेश्वर के “आश्चर्यकर्मों”(पद.5-6)  की और महिमामय राज्य(पद.11) की चर्चा करता है l वह उसकी करुणा (पद.8-9) और विश्वासयोग्यता (पद.13) का वर्णन करता है, उसके तुरंत बाद वह भजन हमें बताता है कि परमेश्वर गिरते हुओं को संभालता है (पद.14) l जब वह हमें उठाता है उसके सारे गुण दिखाई देते हैं l वह नया बनाने के कार्य में ही लगा हुआ है l

क्या आप पहले हार का सामना कर चके हैं? क्या आप नये बनाए गए हैं? सभी छुटकारा पाए हुए लोग परमेश्वर के अनुग्रह की कहानियाँ हैं l

जीत में बदली हुई हार

हमारे चर्च में अतिथि बैंड स्तुति और आराधना में अगुआई कर रहा था, और प्रभु के लिए उनका उत्साह हृदय स्पर्शी था l हम उनके जोश को देख रहे थे और अनुभव कर रहे थे l

तब उन संगीतज्ञों ने बताया कि वे सब पूर्व कैदी रह चुके हैं l अचानक उनके गीतों में एक नया अर्थ दिखाई दिया, और मैंने महसूस किया कि क्यों उनकी प्रशंसा उनके लिए इतना महत्वपूर्ण थी l उनकी प्रशंसा ऐसे टूटे हुए जीवनों की गवाही थी जो अब नए बन चुके थे l

संसार सफलता को गले लगा सकता है l  किन्तु बीती हार की कहानियाँ लोगों को आशा भी देती हैं l ये कहानियाँ हमें भरोसा देती हैं कि हमारे समस्त हार के बाद भी परमेश्वर हमसे प्रेम करता है l पासवान गैरी इनरिंग कहते हैं कि इब्रानियों 11 में जिसे हम विश्वास का भवन पुकारते हैं, परमेश्वर का ऐसा भवन भी हो सकता है जहाँ हार जीत में बदल गयी हो l उनका मानना है, “शायद ही उस अध्याय में ऐसा कोई व्यक्ति है जिसके जीवन में गंभीर दोष न रहा हो l किन्तु परमेश्वर हारे हुए जीवनों को नया बनाने के कार्य में लगा हुआ है . . . यह परमेश्वर के अनुग्रह का महान सिद्धांत है l”

मैं भजन 145 का सुख पसंद करता हूँ, जो परमेश्वर के “आश्चर्यकर्मों”(पद.5-6)  की और महिमामय राज्य(पद.11) की चर्चा करता है l वह उसकी करुणा (पद.8-9) और विश्वासयोग्यता (पद.13) का वर्णन करता है, उसके तुरंत बाद वह भजन हमें बताता है कि परमेश्वर गिरते हुओं को संभालता है (पद.14) l जब वह हमें उठाता है उसके सारे गुण दिखाई देते हैं l वह नया बनाने के कार्य में ही लगा हुआ है l

क्या आप पहले हार का सामना कर चके हैं? क्या आप नये बनाए गए हैं? सभी छुटकारा पाए हुए लोग परमेश्वर के अनुग्रह की कहानियाँ हैं l

बाहर का भाग अन्दर?

“परिवर्तन : अन्दर का भाग बाहर अथवा बाहर का भाग अन्दर?” मुख्य समाचार में यही लिखा था और वर्तमान का प्रचलित चलन दर्शा रहा था कि बाहरी बदलाव जैसे सौन्दर्य प्रसाधन द्वारा बदलाव अथवा बेहतर ढंग अन्दर की भावनाओं को जानने का और जीवन बदलने का भी एक सरल तरीका हो सकता है l

एक आकर्षक विचार कहता है कि कौन नहीं चाहता कि हमारे जीवन नए रूप की तरह अत्यंत सरल हो जाएँ? हममें से अनेक लोगों ने कठिन तरीके से सीखा है कि पुरानी आदतों को  छोड़ना लगभग असम्भव होता है l सरल बाहरी बदलाव पर ध्यान लगाने से आशा दिखाई देती है कि हमारे जीवनों में सुधार लाने का एक तेज़ तरीका है l

किन्तु यद्यपि ये बदलाव हमारे जीवनों में सुधार ला सकते हैं, बाइबिल चाहती है कि हम एक गंभीर बदलाव का प्रयास करें जो खुद पर भरोसा करने से संभव नहीं है l वास्तव में, गलातियों 3 में भी पौलुस का तर्क है कि परमेश्वर की व्यवस्था अर्थात् अनमोल उपहार जिसके द्वारा उसकी इच्छा प्रगट हुई, भी परमेश्वर के लोगों के टूटेपन को चंगा नहीं कर सका (पद.19-22) l वास्तविक चंगाई और छुटकारे के लिए ज़रूरी था कि वे विश्वास और पवित्र आत्मा के द्वारा ((5:5) मसीह को “पहिन” लें (पद.27) l उसके द्वारा चुने जाकर और रूप पाकर, उनकी पहचान मूल्यवान हो जाएगी अर्थात् हर एक विश्वासी परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं का बराबर से हक़दार होगा (3:28-29) l

हम आसानी से आत्म-सुधार तकनीक में अत्यधिक ऊर्जा खर्च कर सकते हैं l किन्तु उस प्रेम को जो ज्ञान से परे है और जो सब कुछ बदल सकता है, को जानने से ही हम अपने हृदयों में गहरा और अत्यधिक संतोषजनक बदलाव अनुभव कर सकते हैं (इफि. 3:17-19) l