श्रेणी  |  odb

उसका शब्द अंतिम शब्द

मध्य-बीसवीं शताब्दी के सक्रिय मसीही अगुआ, और द नेविगेटर्स (The Navigators)  के संस्थापक, डॉसन  ट्रोटमैंन ने प्रत्येक मसीही के जीवन में बाइबिल के महत्व पर बल दिया l ट्रोटमैंन अपने हर दिन का अंत एक अभ्यास से करता था जिसे वह कहता था “उसका शब्द अंतिम शब्द l” सोने से पहले वह बाइबिल के एक कंठस्थ पद या परिच्छेद पर चिंतन करके, अपने जीवन में उसके स्थान और प्रभाव के विषय प्रार्थना करता था l उसकी इच्छा थी कि हर दिन उसके विचार में अंतिम शब्द परमेश्वर के शब्द होने चाहिए l

भजनकार दाऊद ने लिखा, “मैं बिछौने पर पड़ा तेरा स्मरण करूँगा, तब रात के एक एक पहर में तुझ पर ध्यान करूँगा; क्योंकि तू मेरा सहायक बना है, इसलिए मैं तेरे पंखों की छाया में जयजयकार करूँगा” (भजन 63:6-7) l अति कठिनाई अथवा शांति के समय रात में हमारे मन को विश्राम और सुख देनेवाले अंतिम शब्द परमेश्वर के हों l ये अगली सुबह का सुर भी होगा l

एक मित्र हर दिन का समापन अपने चार बच्चों के साथ ऊँची आवाज में बाइबिल का एक पद और दैनिक मनन पढ़कर ही समाप्त करते हैं l वे हर बच्चे से प्रश्न और विचार आमन्त्रित करके विचारते हैं कि घर और स्कूल में यीशु के अनुसरण का क्या अर्थ है l वे इसको हर दिन के लिए “उसका शब्द अंतिम शब्द” कहते हैं l

दिन के समापन का कितना बेहतर तरीका!

सहानुभूतिपूर्ण हृदय

एक आमोद-प्रमोद उद्यान में हम सात जन एक संगीत प्रदर्शन देखने गए l एक ही पंक्ति में बैठने की इच्छा से हम एक दूसरे के साथ बैठना चाहे l किन्तु एक महिला हमारे बीच आ गई l मेरी पत्नी के टोकने पर, उसने जल्दी से उत्तर दिया, “अति दुर्भाग्य,” और वह अपने दो साथियों के साथ उस पंक्ति में बैठ गई l

हमारे चार जन से एक पंक्ति पीछे हम तीन बैठे थे l मेरी पत्नी, सु ने देखा कि उस महिला के साथ एक असमर्थ व्यस्क था और इसलिए वह उसकी ज़रूरत का ख्याल रखते हुए  साथ बैठना चाहती थी l अचानक, हम शांत हो गए l सु बोली, “कल्पना करें कि ऐसी भीड़भाड़ में उसके लिए कितनी कठिनाई होगी l” हाँ, शायद वह महिला कठोर थी l किन्तु हम तो सहानुभूतिपूर्ण उत्तर दे सकते थे l  

हर जगह, हमारा सामना लोगों से होता है जिन्हें करुणा चाहिए l शायद प्रेरित पौलुस के ये शब्द हमें अपने चारों ओर के लोगों को एक भिन्न दृष्टि से देखने में सहायता करेंगे-लोग जिनको अनुग्रह का कोमल स्पर्श चाहिए l “इसलिए परमेश्वर के चुने हुओं के समान जो पवित्र और प्रिय हैं, बड़ी करुणा, और भलाई, और दीनता, और नम्रता, और सहनशीलता धारण करो” (कुलु. 3:12) l और हम “एक दूसरे की सह [लें]” (पद.13) l

करुणा दिखाते हुए, हम उसकी ओर इशारा करेंगे जिसने हम पर अपने अनुग्रह और करुणा भरा हृदय उड़ेल दिया l

दृश्य के पीछे

मेरी बेटी ने शीघ्र उत्तर की आशा से एक सहेली को एक सन्देश भेजा l उसके फोन मेसेज सिस्टम ने उसको बताया कि प्राप्तकर्ता ने उसका सन्देश पढ़ लिया है, इसलिए वह व्याकुलता से उत्तर का इंतज़ार करती रही l महज़ क्षण गुज़र गए, फिर भी वह निराश होकर देरी के लिए अपनी चिढ़ पर शोक करती रही l चिढ़चिढ़ाहट चिंता बन गई; उसने सोचा कि उनके बीच में कोई समस्या होगी l आखिरकार उत्तर से मेरी बेटी निश्चिन्त हुई कि उनके सम्बन्ध ठीक हैं l उसकी सहेली प्रश्न का उत्तर खोज रही थी l

पुराने नियम का दानिय्येल नबी भी उत्तर के लिए व्याकुल था l महायुद्ध के डरावने  दर्शन के बाद दानिय्येल उपवास और दीन प्रार्थना के साथ परमेश्वर को खोजा (10:3,12) l  तीन सप्ताह तक उत्तर नहीं आया (पद.2,13) l अंत में, एक स्वर्गदूत ने उसे निश्चित किया कि “उसी दिन तेरे वचन सुने गए l” उसके बीच, स्वर्गदूत उसकी प्रार्थनाओं के पक्ष में लड़ता रहा l यद्यपि पहले दानिय्येल अनिभिज्ञ था, उसकी प्रथम प्रार्थना और स्वर्गदूत के आने के बीच परमेश्वर उन इक्कीस दिनों तक कार्यरत था l

यह भरोसा कि परमेश्वर प्रार्थना सुनता है (भजन 40:1), हमारे समयानुसार उत्तर नहीं मिलने पर हम व्याकुल होते हैं l हम उसकी देखभाल पर शक करने लगते हैं l फिर भी दानिय्येल का अनुभव हमें याद दिलाता है कि जाहिर नहीं होने पर भी परमेश्वर अपने प्रेमियों के लिए कार्य करता है l

जब हाँ का अर्थ नहीं हो

मैं कैंसर(leukemia) पीड़ित माँ की सेवा कर सकी, परमेश्वर को धन्यवाद l दवाइयों के दुष्प्रभाव से उन्होंने इलाज बंद कर दी l “मैं और कष्ट नहीं झेल सकती,” वह बोली l “मैं अंतिम दिनों में अपने परिवार के साथ आनंदित रहना चाहती हूँ l परमेश्वर जानता है कि मैं घर जाने को तैयार हूँ l”

मुझे अपने स्वर्गिक पिता, महावैध के आश्चर्यकर्म पर भरोसा था l किन्तु मेरी माँ की प्रार्थना का उत्तर हाँ में देने के लिए उसे मुझसे नहीं कहना होता l रोते हुए मैंने हार मान ली, “प्रभु, आपकी इच्छा पूरी हो l”

जल्द ही, यीशु ने मेरी माँ को अकष्टकर अनंत में बुला लिया l

हम पतित संसार में यीशु की वापसी तक दुःख सहेंगे (रोमि.8:22-25) l हमारा पापी स्वभाव, सीमित दृष्टि, और दुःख का भय प्रार्थना करने को कुरूप कर सकता है l धन्यवाद हो, “मनों का जांचनेवाला जानता है कि आत्मा की मनसा क्या है? (पद.27) l वह हमें याद दिलाता है कि परमेश्वर से प्रेम रखनेवालों के लिए सब बातें मिलकर भलाई उत्पन्न करती हैं (पद.28), उस समय भी जब किसी के लिए उसकी हाँ हमारे लिए दुःख भरा नहीं हो l

हम उसके महान उद्देश्य हेतु अपना छोटा भाग स्वीकार करके, मेरी माँ का नारा दोहरा सकते हैं : “परमेश्वर भला है, बस l उसकी इच्छा में मुझे शांति है l” प्रभु की भलाईयों में भरोसा रखकर, हम प्रार्थना के उत्तर में उसकी इच्छा और महिमा देखते हैं l

महानतम निमंत्रण

हाल ही के एक सप्ताह में, मुझे इ-मेल में अनेक निमंत्रण मिले l उनमें सेवा निवृति पर  “मुफ्त” सेमिनार, रियल एस्टेट, और जीवन बीमा को मैंने तुरंत अलग कर दिया l किन्तु एक लम्बे समय के मित्र के सम्मान में सभा के निमंत्रण ने मुझे तुरंत उत्तर देने को प्रेरित किया, “हाँ! मैं स्वीकार करता हूँ,” निमंत्रण + इच्छा = स्वीकृति l

यशायाह 55:1 बाइबिल में एक महानतम निमंत्रण है l परमेश्वर ने कठिन परिस्थितियों में पड़े अपने लोगों से कहा, “अहो सब प्यासे लोगों, पानी के पास आओ; और जिनके पास रुपया न हो, तुम भी आकर मोल लो और खाओ! दाखमधु और दूध बिन रुपये और बिना दाम ही आकर ले लो l” यह परमेश्वर के आंतरिक पोषण, गहरी आत्मिक सनतुष्टि, और जीवन का  अद्भुत पेशकश है (पद.2-3) l

यीशु का निमंत्रण बाइबिल के अंतिम अध्याय में दोहराया गया है : आत्मा और दुल्हिन दोनों कहती हैं, ‘आ!’ और सुननेवाला भी कहे, ‘आ!’ जो प्यासा हो वह आए, और जो कोई चाहे वह जीवन का जल सेंतमेंत ले” (प्रका. 22:17) l

 अक्सर हमारी सोच में अनंत जीवन का आरंभ हमारे मरने के बाद होता है l वास्तव में, हमारे द्वारा यीशु मसीह को अपना प्रभु और उद्धारकर्ता ग्रहण करने पर होता है l

परमेश्वर का उसमें अनंत जीवन खोजने का निमंत्रण सभी निमंत्रणों में सबसे महान है! निमंत्रण + इच्छा = स्वीकृति l

जीवन और मृत्यु

मैं अपनी सहेली के भाई की मृत्यु के समय उसके खाट के निकट बैठना नहीं भूल सकती; साधारण से असाधारण की मुलाकात का दृश्य l हम तीनों बैठे थे जब हमने रिचर्ड को कठिनाई से श्वास लेते देखा l हम उसके चारों ओर खड़े होकर, देखते और इंतज़ार करते हुए प्रार्थना करते रहे l जब उसने अंतिम श्वास ली, पवित्र क्षण सा महसूस हुआ; एक चालीस वर्ष के एक अद्भुत व्यक्ति की मृत्यु के समय परमेश्वर की उपस्थिति ने हमें हमारे दुःख में घेर लिया l

हमारे विश्वास के अनेक नायकों ने अपनी मृत्यु के समय परमेश्वर की विश्वासयोग्यता का अनुभव किया l जैसे, याकूब ने कहा कि वह जल्द ही “अपने लोगों के साथ मिलने पर” है (उत्प. 49:29-33) l याकूब का पुत्र युसूफ भी अपने भाइयों को अपनी निकट मृत्यु बताया : “मैं तो मरने पर हूँ,” और उनसे अपने विश्वास में दृढ़ रहने को कहा l उसने शांति का अनुभय किया, फिर भी अपने भाइयों से प्रभु पर भरोसा रखने को कहा (50:24) l

हममें से कोई भी अपनी मृत्यु का समय अथवा कारण नहीं जानते हैं, किन्तु उसके हमारे साथ रहने के लिए मदद और भरोसा रखें l हम यीशु की प्रतिज्ञा पर विश्वास करें कि वह पिता के घर में हमारे लिए रहने का एक स्थान तैयार करेगा (यूहन्ना 14:2-3) l

अग्नि परीक्षा

पिछली सर्दियों में कोलोराडो में एक प्राकृतिक अजायबघर घूमते समय, मैंने सफ़ेद पीपल[Aspen] वृक्ष की कुछ अनूठी बातें सीखीं l छरहरे, सफ़ेद धड़ वाले सफ़ेद पीपल का एक उपवन एक बीज से उग सकता है और सबकी जड़ प्रणाली एक ही हो सकती है l इनसे वृक्ष उगे अथवा नहीं, ये हज़ारों वर्षों तक छायादार जंगल में भूमि के नीचे शांत रहकर अग्नि, बाढ़, अथवा हिमस्खलन द्वारा अपने लिए जगह साफ़ होने का इंतज़ार करते हैं l प्राकृतिक आपदा से भूमि साफ़ होने के बाद, आखिरकार सूर्य की रोशनी से सफ़ेद पीपल की जड़ों से अंकुर निकलकर वृक्ष बनते हैं l

प्राकृतिक आपदा का विनाश ही सफ़ेद पीपल के लिए नया जन्म संभव करता है l याकूब लिखता है कि कठिनाई ही हमारे विश्वास की उन्नत्ति करता है l “जब तुम नाना प्रकार की परीक्षाओं में पड़ो, तो इसको पुरे आनंद की बात समझो, यह जानकार कि तुम्हारे विश्वास के परखे जाने से धीरज उत्पन्न होता है l पर धीरज को अपना पूरा काम करने दो कि तुम पूरे और सिद्ध हो जाओ, और तुम में किसी बात की घटी न रहे” (याकूब 1:2-4) l

परीक्षाओं में आनंद कठिन है, किन्तु हम इस वास्तविकता से आशा प्राप्त करते हैं कि परमेश्वर हमें कठिन स्थितियों द्वारा सिद्ध बनाएगा l सफ़ेद पीपल की तरह, विश्वास परीक्षाओं में उन्नत्ति करता है जब परमेश्वर की ज्योति के स्पर्श हेतु कठिनाई हमारे हृदयों में जगह तैयार करती है l

अच्छा फल लाना

मेरे विमान की खिड़की से दृश्य आश्चर्यजनक था : गेहूँ के पकते खेत, और दो बंजर पहाड़ों के बीच फल का बगीचा l घाटी के बीच जीवनदायक नदी से फल संभव था l  

जिस तरह भरपूर फसल साफ़ जल के सोते पर निर्भर है, मेरे जीवन में “फल” की गुणवत्ता-मेरे शब्द, कार्य, और आचरण-मेरे आत्मिक पोषण पर आधारित है l भजनकार भजन 1 में कहता है : जो “यहोवा की व्यवस्था से प्रसन्न रहता ... उस वृक्ष के समान है, जो बहती नालियों के किनारे लगाया गया है, और अपनी ऋतु में फलता है” (पद. 1-3) l और पौलुस गलातियों 5 में लिखता है कि आत्मा की अगुवाई में चलनेवाले “प्रेम, आनंद, शांति, धीरज, कृपा, भलाई, विश्वास, नम्रता, और संयम” से जाने जाते हैं (पद.22-23) l

कभी-कभी मेरी स्थितियों में मेरा दृष्टिकोण अप्रिय, अथवा मेरे कार्य और शब्द लगातार कठोर होते हैं l फल अच्छे नहीं होते, क्योंकि मैंने परमेश्वर के वचन में शांति से समय नहीं बिताया है l किन्तु उसके भरोसा में मेरे दिन जड़वत होने से, मैं अच्छा फल लाता हूँ l दूसरों के साथ हमारी बातचीत और क्रियाओं में धीरज और नम्रता होती है; शिकायत की जगह कृतज्ञता चुनना सरल है l

हम पर खुद को प्रगट करनेवाला परमेश्वर हमारी सामर्थ्य, बुद्धि, आनंद, समझ, और शांति का श्रोत है (भजन 119:28,98,111,144,165) l उसकी ओर इशारा करनेवाले शब्दों में हमारी डूबी आत्मा से, हमारे जीवनों में परमेश्वर की आत्मा का कार्य दिखेगा l

तस्वीर प्रबंधन

विंस्टन चर्चिल के 80 वें जन्मदिन पर, ब्रिटिश सरकार ने कलाकार ग्रैहम सदरलैंड से सुप्रसिद्ध राजनेता का तस्वीर बनवाया l आप मेरी तस्वीर कैसे बनाओगे? चुर्चिल ने पूछा : “स्वर्गदूत अथवा बुल डॉग?” चुर्चिल ये दो लोकप्रिय अनुभूतियाँ पसंद करता था l हालाँकि, सदरलैंड, ने जो देखा वही बनाया l  

चुर्चिल परिणाम से नाखुश था l सदरलैंड की तस्वीर में चुर्चिल कुर्सी पर अपनी ट्रेडमार्क त्यौरियाँ चढ़ाए हुए बैठा दिखा-जो सच था l आधिकारिक अनावरण पश्चात, चुर्चिल ने तस्वीर को अपने तहखाने में छिपा दिया जो बाद में गुप्त रूप से नष्ट कर दिया गया l

चर्चिल की तरह, हममें से अनेक दूसरों के समक्ष अपनी सफलता, भक्ति, सुन्दरता, अथवा शक्ति की अच्छी छवि दिखाना चाहते हैं l शायद डर से हम अपने “कुरूप” हिस्से छिपाना चाहते हैं कि वास्तविकता प्रगट होने पर हम प्रेम नहीं किये जाएंगे l

इस्राएलियों के साथ बेबीलोन के दासत्व में, सर्वाधिक बुरा हुआ l उनके पापों के कारण, परमेश्वर ने उन्हें अपने शत्रुओं से पराजित होने दिया किन्तु डरने से मना किया l वह उनको नाम से जानकर समस्त अपमानजनक स्थिति में उनके साथ था (यशा. 43:1-2) l वे उसके हाथों में सुरक्षित थे (पद.13) और “अनमोल” थे (पद.4) l उनकी कुरूपता के बावजूद, परमेश्वर उनसे प्रेम करता था l

इस सच्चाई के हमारे अन्दर समा जाने से हम दूसरों का अनुमोदन कम चाहेंगे l परमेश्वर हमें जानता है और अभी भी हमसे असीमित प्रेम करता है (इफि.3:18) l