परमेश्वर की थाली में रख दें
वर्षों तक, एक माँ ने प्रार्थना की और अपनी व्यस्क बेटी को स्वास्थ्य सेवा प्रणाली का मार्ग निर्देशन करने और परामर्श और सर्वोत्तम दवाएं खोजने में सहायता की l उसके जीवन के उतार -चढ़ाव दिन-ब-दिन उसकी माँ के हृदय पर भारी पड़ता जा रहा था l अक्सर उदासी से थक जाने पर उसे एहसास हुआ कि उसे अपना भी ख्याल रखना होगा l एक मित्र ने सुझाव दिया कि वह अपनी चिंताओं और जिन चीज़ों को वह नियंत्रित नहीं कर सकती, उन्हें कागज़ के छोटे टुकड़ों पर लिखकर उन्हें अपने सिरहाने “परमेश्वर की थाली” पर रखें l इस सरल अभ्यास से सारा तनाव समाप्त नहीं हुआ, लेकिन उस थाली को देखकर उसे याद आया कि ये चिंताएं परमेश्वर की थाली में हैं, उसकी नहीं l
एक तरह से, दाऊद के कई भजन संहिता उसकी परेशानियों को सूचीबद्ध करने और उन्हें परमेश्वर की थाली में रखने का उसका तरीका था (भजन संहिता 55:1,16-17) l यदि बेटे अबशालोम द्वारा तख्तापलट के प्रयास का वर्णन किया जा रहा है, तो दाऊद के “घनिष्ठ मित्र” अहितोपेल ने वास्तव में उसे धोखा दिया था और उसे मारने की साजिश में शामिल था (2 शमूएल 15-16) l इसलिए “सांझ को, भोर को, और दोपहर को [दाऊद] दोहाई [देता रहा] और कराहता [रहा],” और [परमेश्वर ने उसकी] प्रार्थना सुन [ली]” (भजन संहिता 55:1-2, 16-17) l उसने “अपना बोझ यहोवा पर डाल [देने]” का निर्णय लिया और उसकी देखभाल का अनुभव किया (पद.22) l
हम प्रामाणिक रूप से स्वीकार कर सकते हैं कि चिंताएं और भय हम सभी को प्रभावित करते हैं l हमारे मन में भी दाऊद जैसे विचार आ सकते हैं: “भला होता कि मेरे कबूतर के से पंख होते तो मैं उड़ जाता और विश्राम पाता” (पद.6) l परमेश्वर निकट है और केवल वही है जो परिस्थितियों को बदलने की सामर्थ्य रखता है l सब उसकी थाली में रख दें l एनी सिटास
चार शब्दों में जीवन
जेम्स इनेल पैकर, जिन्हें जे. आई. पैकर के नाम से जाना जाता है, का 2020 में उनके चौरानवे जन्मदिन से केवल पांच दिन पहले निधन हो गया l एक विद्वान तथा लेखक, उनकी सबसे प्रसिद्ध पुस्तक, नोइंग गॉड, अपने प्रकाशन के बाद से 1.5 मिलियन(10,00,000) से अधिक प्रतियां बेच चुकी है l पैकर ने बाइबल के अधिकार और शिष्य-निर्माण का समर्थन किया और हर जगह यीशु मसीह में विश्वास करने वालों से यीशु के लिए जीने को गंभीरता से लेने का आग्रह किया l जीवन के अंतिम क्षणों में उनसे चर्च में कहे गए उनके अंतिम शब्दों के बारे में पूछा गया l पैकर का केवल चार शब्दों का एक वाक्य था : (हर तरीके से) “मसीह की महिमा करें” l”
ये शब्द प्रेरित पौलुस के जीवन को दर्शाते हैं, जिन्होंने अपने नाटकीय रूपांतरण के बाद, विश्वासयोग्यता से अपने सामने काम करना आरम्भ किया और परिणामों के लिए परमेश्वर पर भरोसा किया l रोमियों की पुस्तक में पाए गए पौलुस के शब्द पूरे नए नियम में सबसे अधिक धर्मशास्त्रीय ढंग से भरे हुए हैं, और पैकर ने प्रेरित द्वारा लिखी गयी बातों का बारीकी से सारांश दिया है: “प्रभु यीशु मसीह के पिता परमेश्वर की स्तुति करो” (15:6) l
पौलुस का जीवन हमारे लिए एक उदाहरण है l हम कई तरीकों से परमेश्वर की महिमा(तथा सम्मान) कर सकते हैं, लेकिन उनमे से जो एक हैं वह है कि हमारे सामने निर्धारित जीवन को जीना और परिणामों को परमेश्वर के अपरिवर्तनीय हाथों में छोड़ना l चाहे पुस्तकें लिखना हो या मिशनरी यात्राएं करना हो या प्राथमिक विद्यालय में पढ़ाना हो या बूढ़े माता-पिता की देखभाल करना हो—एक ही लक्ष्य है: मसीह की महिमा करें! जैसे ही हम प्रार्थना करते हैं और पवित्रशास्त्र पढ़ते हैं, परमेश्वर हमें समर्पित आज्ञाकारिता के साथ जीने में मदद करता है और हम जो कुछ भी कहते हैं करते हैं उसमें यीशु का सम्मान करने के लिए हमारे दैनिक जीवन को ट्रैक/पटरी पर रखता है l जॉन ब्लेस
दूसरों पर हमारा प्रभाव
जब मेरे सेमिनरी प्रोफेसर डॉ.ली ने देखा कि हमारे स्कूल के संरक्षक बेंजी को हमारे दोपहर के भोजन समारोह में शामिल होने में देर हो जाएगी, तो उन्होंने चुपचाप उनके लिए भोजन की एक प्लेट अलग रख दी l जब मैं और मेरे सहपाठी बात कर रहे थे, डॉ. ली ने चुपचाप चावल के पकवान का आखिरी टुकड़ा भी उसके लिए एक डिश पर रख दिया—स्वादिष्ट टॉपिंग के रूप में कुछ कसा हुआ नारियल भी डाल दिया l एक प्रख्यात धर्मशास्त्री का यह दयालु कार्य अनेक कार्यों में से एक था—और इसे मैं डॉ. ली की परमेश्वर के प्रति अत्यधिक और अपार निष्ठा मानती हूँ l बीस वर्षों के बाद भी उन्होंने मुझ पर जो गहरी छाप छोड़ी वह आज भी कायम है l
प्रेरित यूहन्ना का एक प्रिय मित्र था जिसने कई विश्वासियों पर गहरी छाप छोड़ी l उन्होंने गयुस के बारे में बात की जो परमेश्वर और धर्मग्रंथों के प्रति विश्वासयोग्य था और लगातार “सत्य” पर चलता था (3 यूहन्ना 1:3) l गयुस ने यात्रा करने वाले सुसमाचार के प्रचारकों का अतिथि सत्कार किया, भले ही वे अजनबी थे(पद.5) l परिणामस्वरूप, यूहन्ना ने उससे कहा, “उन्होंने कलीसिया के सामने तेरे प्रेम की गवाही दी है” (पद.6) l गयुस की परमेश्वर और यीशु में अन्य विश्वासियों के प्रति निष्ठा ने सुसमाचार को आगे बढाने में मदद की l
मेरे शिक्षक का मुझ पर जो प्रभाव पड़ा और गयुस ने अपने समय में जो प्रभाव डाला, वे शक्तिशाली अनुस्मारक/ताकीद हैं जो हम दूसरों पर छोड़ सकते हैं—जिसका उपयोग परमेश्वर उन्हें मसीह की ओर आकर्षित करने में कर सकता है l जैसे हम परमेश्वर के साथ ईमानदारी से चलते हैं, आये इस तरह से जीएं और कार्य करें जिससे अन्य विश्वासियों को भी उसके साथ विश्वासयोग्यता से चलने में मदद मिल सके l करेन हुआंग
अव्यवस्था के बीच शांति
जब लगभग एक साल तक तलाश करने के बाद भी मधु को नौकरी नहीं मिली, तो अनिश्चित भविष्य के डरावने विचार उसके दिमाग में छा गए। इस दौरान लोगों द्वारा कहे गए बुरे शब्दों की वजह से उसकी नींद और जीने की इच्छा भी चली गई। फिर एक दिन, सूरज की रोशनी की तरह, बाइबल के एक पद ने उसकी उम्मीद को फिर से जगा दिया। उसने इसे एक तख्ती पर लिख लिया और जब भी वह इसे जोर से पढ़ती, तो उसका विश्वास मजबूत होता, उसका डर दूर होता और वह शांत हो जाती थी।
यशायाह 26 एक शांत मन विकसित करने के बारे में व्यावहारिक अंतर्दृष्टि प्रदान करता है। पहली बात यह है कि हमें परमेश्वर पर अपना विश्वास बनाए रखना चाहिए जो हमें बचाता है (पद.2-3)। उस पर विश्वास करने के अलावा, हमें अपने मन और विचारों को भी परमेश्वर पर स्थिर रखना चाहिए (पद.3)। जब हम उस पर भरोसा करते हैं और अपने जीवन को उसके प्रति समर्पित करते हैं, तो वह हमारे मन की रक्षा करने और हमें “पूर्ण शांति” देने का वादा करता है (पद.3)। इस “पूर्ण शांति” में विवेक की शांति, अपराध बोध से शांति, चिंता से शांति या उन स्थितियों में शांति शामिल हो सकती है जिन पर हमारा बहुत कम नियंत्रण है। हमारी निश्चयता यह है कि जिस पर हम भरोसा करते हैं वह “सनातन चट्टान” है (पद.4)। हमारी परिस्थितियाँ चाहे जो भी हों, उसका चरित्र और प्रेम कभी नहीं बदलता।
जब हम अनिश्चितता के क्षणों से गुज़रते हैं, तो हमारा मन बेचैन और घबरा देनेवाले विचारों से जूझ सकता है। लेकिन, अगर हम अपनी परेशानियों को परमेश्वर के पास ले जाएँ, अपना मन उस पर लगाएँ और अपने विचारों को उसकी अद्भुत प्रतिज्ञाओं से भरें, जैसा कि मधु ने किया, तो हम जीवन की उथल-पुथल के बीच भी उसकी शांति का अनुभव कर सकते हैं। जब हम परमेश्वर पर भरोसा करते हैं और अपनी बेचैनी उसे सौंपते हैं, तो वह अपनी “पूर्ण शांति” से हमारे मन को शांत करता है और हमारे डर को दूर करता है। जो अनिश्चित है उसके बारे में चिंता करने के बजाय, आइए हम उस पर अर्थात् यीशु पर भरोसा करें जो कभी विफल नहीं होता। —कैरल मैकवॉन
स्वर्ग गीत गा रहा है
जब हाई स्कूल गायक मंडल ने अर्जेंटीना का गीत “एल सिएलो केंटो एलेग्रिया” गाया तो उनकी आवाज़ में ख़ुशी स्पष्ट थी l मैं प्रदर्शन का आनंद ले रही थी लेकिन गीत के बोल समझ नहीं पा रही थी क्योंकि मैं स्पेनिश नहीं जानती l लेकिन जब तक गाना बजानेवालों ने ख़ुशी से घोषणा करना आरम्भ नहीं किया तब तक मुझे एक परिचित शब्द पहचानने में अधिक समय नहीं लगा, “अलेलुया!” बार-बार मैंने सुना, ” अलेलुया” परमेश्वर की स्तुति की घोषणा है जो संसार भर की अधिकाँश भाषाओँ में समान लगती है l गाने की पृष्ठभूमि जानने के लिए उत्सुक, मैं संगीत कार्यक्रम के बाद ऑनलाइन गयी और पाया कि शीर्षक का अनुवाद “स्वर्ग आनंद के लिए गा रहा है l”
प्रकाशितवाक्य 19 में एक उत्सव पूर्ण अंश में, हमें उस सामूहिक गीत में व्यक्त वास्तविकता की एक झलक दी गयी है—पूरा स्वर्ग आनंदित हो रहा है! नए नियम की आखिरी पुस्तक में प्रेरित यूहन्ना के भविष्य के दृष्टिकोण में, उसने स्वर्ग में लोगों और स्वर्गदूतों की एक विशाल सभा की एक विशाल सभा को परमेश्वर के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए देखा l यूहन्ना ने लिखा कि स्वरों के समूह ने परमेश्वर की शक्ति का जश्न मनाया जिसने बुराई और अन्याय पर जीत प्राप्त की, पूरी पृथ्वी पर उसका राज्य और उसके साथ हमेशा के लिए अनंत जीवन l बार-बार, स्वर्ग के सभी निवासी “हल्लिलूय्याह” या “परमेश्वर की स्तुति करों!” की घोषणा करते हैं! (पद.1,3,4,6)
एक दिन “हर एक कुल और भाषा और लोग और जाति में से” (5:9) परमेश्वर की महिमा की घोषणा करेंगे l और ख़ुशी के साथ हर अलग-अलग भाषा में हमारी सभी आवाजें एक साथ चिल्लएंगी, “हल्लिलूय्याह!” लीसा एम सामरा
एक दूसरे की सहायता करें
जब एक कम स्थापित कॉलेज की क्रिकेट टीम क्रिकेट कॉलेज बास्केट बॉल टूर्नामेंट के लिए मैदान में उतरी, तो स्टैंड में मौजूद प्रशंसकों ने कमजोर टीम के लिए उत्साह बढ़ाया l इस टीम से पहले दौर से आगे बढ़ने की उम्मीद नहीं थी, लेकिन उन्होंने ऐसा किया l और अब उन्होंने स्टैंड से अपने स्कूल के गाने की आवाज़ सुनी जो उन्हें उत्साहित कर रही थी, हालाँकि उनके साथ कोई बैंड नहीं था l उनके प्रतिद्वंद्वी स्कूल बैंड ने हालाँकि जीत का पक्ष लिया था, लेकिन खेल से कुछ मिनट पहले उन्होंने अपने प्रतिद्वंद्वी का स्कूल का गाना सीख लिया था l बैंड केवल वे गाने बजा सकता था, जिन्हें वे जानते थे, लेकिन उन्होंने दूसरे स्कूल और दूसरी टीम की सहायता करने के लिए गाना सीखने का फैसला किया l
इस बैंड की गतिविधियों को फिलिप्पियों में वर्णित एकता के प्रतीक के रूप में देखा जा सकता है l पौलुस ने फिलिप्पी के आरंभिक चर्च को—और आज हमें—एकता में रहने, या “एक मन” (फिलिप्पियों 2:2) रहने के लिए कहा, खासकर इसलिए क्योंकि वे मसीह में एकजुट थे l ऐसा करने के लिए, प्रेरित ने उन्हें स्वार्थी महत्वाकांक्षा छोड़ने और अपने हितों से पहले दूसरों के हितों पर विचार करने के लिए प्रोत्साहित किया l
दूसरों को अपने से ऊपर महत्व देना स्वाभाविक रूप से नहीं आ सकता है l पौलुस ने लिखा, “विरोध या झूठी बड़ाई के लिए कुछ न करो, पर दीनता से एक दूसरे को अपने से अच्छा समझो”(पद.3) l “हर एक अपने ही हित की नहीं, वरंन् दूसरों के हित कि भी चिंता करें”(पद.4) l
हम दूसरों का समर्थन कैसे कर सकते हैं? उनकी रुचियों पर ध्यानपूर्वक विचार करके, चाहे उनके युद्ध गीत सीख करके या उन्हें जो कुछ भी आवश्यकता हो उसे प्रदान करके l कटारा पैटन
परिवार से बढ़कर
जोन को एक प्रतिष्ठित कॉलेज में पूर्ण प्रोफेसर के रूप में स्थापित किया गया था l उनके बड़े भाई डेविड प्रसन्न थे, लेकिन, जैसा कि भाई करते हैं, वह जोन को चिढ़ाने से खुद को नहीं रोक सके कि जब वे लड़के थे तो कैसे उन्हें उसे कुश्ती में ज़मीन पर गिरा दिया था l जोन जीवन में बहुत आगे बढ़ गए थे, लेकिन वह हमेशा डेविड के छोटे भाई रहेंगे l
परिवार को प्रभावित करना कठिन है—भले ही आप मसीहा हों l यीशु नासरत के लोगों के बीच बड़ा हुआ था, इसलिए उन्हें यह विश्वास करने में कठनाई हुयी कि वह उन सबसे विशेष l और उसे देखकर हैरान हुए l “कैसे सामर्थ्य के काम इसके हाथों से प्रगट होते हैं? क्या यह वही बढ़ई नहीं, जो मरियम का पुत्र . . . है? (मरकुस 6:2-3) l यीशु ने उनसे कहा, “भविष्यद्वक्ता अपने देश, और अपने कुटुम्ब, और अपने घर को छोड़ और कही भी निरादर नहीं होता” (पद.4) l ये लोग यीशु को अच्छी तरह से जानते थे, लेकिन वे विश्वास नहीं कर सकते थे कि वह परमेश्वर का पुत्र था l
शायद आपका पालन-पोषण एक धार्मिक घर में हुआ हो l आपकी आरंभिक यादों में चर्च जाना और भजन संहिता गाना शामिल है l यीशु को हमेशा परिवार जैसे महसूस हुआ है l यदि आप उस पर विश्वास करते हैं और उसका अनुसरण करते हैं, तो यीशु आपका परिवार है l वह “[हमें] भाई-बहन कहने से नहीं लजाता” (इब्रानियों 2:11) l परमेश्वर के परिवार में यीशु हमारा बड़ा भाई है (रोमियों 8:29)! यह एक बड़ा विशेषाधिकार है, लेकिन हमारी निकटता उसे सामान्य बना सकती है l सिर्फ इसलिए कि कोई व्यक्ति परिवार है इसका मतलब यह नहीं है कि वह विशेष नहीं है l
क्या आप खुश नहीं है कि यीशु आपका परिवार है, और परिवार से भी बढ़कर? जैसा कि आप आज उसका अनुसरण करते हैं, वह आपके लिए और अधिक व्यक्तिगत और अधिक विशेष हो जाए l माइक विटमर
दोषी करार दिया गया और स्वतंत्र किया गया
“मैंने यह नहीं किया!” यह एक झूठ था, और मैं इससे लगभग बच ही गया था, जब तक कि परमेश्वर ने मुझे नहीं रोका l जब मैं माध्यमिक स्कूल में था, मैं एक प्रदर्शन के दौरान हमारे बैंड के पीछे स्पिटबॉल शूट करने वाले समूह का हिस्सा था l हमारे निदेशक एक पूर्व नौसैनिक थे और अनुशासन के लिए प्रसिद्ध थे, और मैं उनसे डरता था l इसलिए जब अपराध में मेरे साझेदारों ने मुझे फंसाया, तो मैंने इस बारे में उनसे झूठ बोला l फिर मैंने अपने पिता से भी झूठ बोला l
लेकिन परमेश्वर झूठ को चलने नहीं देने वाला था l उसने मेरे भीतर अपराधबोध की भावना जागृत की l कई सप्ताहों तक विरोध करने के बाद, मैं मान गया l मैंने परमेश्वर और अपने पिता से क्षमा मांगी l थोड़ी देर बाद, मैं अपने निदेशक के घर गया और रोते हुए स्वीकार किया l शुक्र है, वह दयालु और क्षमाशील था l
मैं कभी नहीं भूलूंगा कि उस बोझ का हटाया जाना कितना अच्छा लगा l मैं कई सप्ताहों में पहली बार अपराधबोध के बोझ से मुक्त और आनंदित था l दाऊद अपने जीवन में भी दृढ़ विश्वास और स्वीकारोक्ति के समय का वर्णन करता है l वह परमेश्वर से कहता है, “जब मैं चुप रहा तब दिन भर कराहते कराहते मेरी हड्डियाँ पिघल गयीं l क्योंकि रात दिन मैं तेरे हाथ के नीचे दबा रहा l” वह आगे कहता है, “मैंने अपना पाप तुझ पर प्रगट किया” (भजन संहिता संहिता 32:3-5) l
परमेश्वर के लिए सत्यता मायने रखती है l वह चाहता है कि हम उसके सामने अपने पापों को स्वीकार करें और उन लोगों के लिए क्षमा भी मांगे जिनके साथ हमने अन्याय किया है l दाऊद घोषणा करता है, “तू ने मेरे अधर्म और पाप को क्षमा कर दिया [है]” (पद.5) l परमेश्वर की क्षमा की स्वतंत्रता को जानना कितना अच्छा है! जेम्स बैंक्स
हमारा झंडा मायने रखता है
पिंगली वेंकैया को भारतीय राष्ट्रीय ध्वज के मूल डिजाइनर के रूप में श्रेय दिया जाता है। एक दूरदर्शी, जिन्होंने भारत को स्वतंत्रता प्राप्त करने से बहुत पहले एक स्वतंत्र देश के रूप में देखा और एक ऐसे ध्वज को देखने का सपना देखा जो भारत की विविधता का प्रतिनिधित्व करता हो। उन्होंने ए नेशनल फ्लैग फॉर इंडिया नामक एक पुस्तक प्रकाशित की जिसमें उन्होंने विचार के लिए 24 डिज़ाइन पेश किए। इसके बाद वे विजयवाड़ा में महात्मा गांधी से मिले और स्वतंत्रता के क्षितिज पर आने से पहले ही राष्ट्रीय ध्वज की आवश्यकता पर जोर दिया। उनकी दृढ़ता के कारण, 1947 में भारत की स्वतंत्रता से बहुत पहले, गांधीजी द्वारा सुझाए गए कुछ संशोधनों के साथ ध्वज को अंतिम रूप दिया गया।
यीशु एक अन्य व्यक्ति की दृढ़ता की बात करते हैं: एक विधवा। लूका 18:1-8 के दृष्टांत में, एक विधवा के हठ ने एक अन्यायी न्यायाधीश को राजी कर लिया, जिसका उसके प्रति न्याय करने का कोई झुकाव नहीं था (पद.5)। इस दृष्टांत में विधवा यीशु के शिष्यों का प्रतिनिधित्व करती है जिनके बारे में यीशु जानते थे कि उन्हें जल्द ही बहुत सताव सहना पड़ेगा (पद.1)। मसीह ने उन्हें बिना आशा छोड़े, ऐसी विपत्ति का सामना करते हुए लगातार प्रार्थना करने के लिए प्रोत्साहित किया, जैसा कि विधवा ने न्यायाधीश से किया था (पद.6)। क्योंकि जहाँ उत्साही और निरंतर प्रार्थना और दृढ़ कार्रवाई होती है, वहाँ परमेश्वर की विश्वासयोग्यता न्याय सुनिश्चित करेगी (पद.8)।
हमारे संसार में सताव और अन्याय बहुत है। हिंसा, घृणा और भ्रष्टाचार के बीच, हमें प्रार्थना में बने रहने के लिए कहा गया है। क्योंकि जब हम बने रहते हैं, तो हमारा स्वर्गीय न्यायाधीश हमें न्याय देने का वादा करता है। जैसा कि यीशु ने हमें सिखाया, आइए प्रार्थना करें, “तेरा राज्य आए, तेरी इच्छा जैसी स्वर्ग में पूरी होती है, वैसे पृथ्वी पर भी हो” (मत्ती 7:10)। जब वह वापस आए तो हम प्रार्थना में विश्वासयोग्य पाए जाएँ (लूका 18:8)। —रेबेका विजयन