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यीशु के अलोकप्रिय विचार

पंद्रह वर्षों तक,  माइक बर्डन ने अपने छोटे से शहर में स्मरणीय वस्तुओं की दुकान में घृणा से भरी बैठकें कीं l लेकिन 2012 में जब उसकी पत्नी ने उसकी भागीदारी पर सवाल उठाना शुरू किया,  तो उनका हृदय नरम हो गया l उसने महसूस किया कि उसके जातिवादी विचार कितने गलत थे और वह अब वह व्यक्ति नहीं होना चाहता था l उग्रवादी समूह ने उसके परिवार को उस अपार्टमेंट से बाहर निकाल कर बदला लिया जो वे उनमें से एक सदस्य से किराये पर ले रखा था l

वह मदद के लिए कहाँ गया?  हैरानी की बात है,  वह एक स्थानीय काले पास्टर के पास गया, जिसके साथ उसका संघर्ष हुआ था l पास्टर और उनके चर्च ने कुछ समय के लिए माइक के परिवार के लिए आवास और किराने के सामान का प्रबंध किया l जब उनसे पूछा गया कि वह मदद करने के लिए क्यों सहमत थे, तो पास्टर कैनेडी ने समझाया, “यीशु मसीह ने कुछ बहुत ही अलोकप्रिय काम किये l जब मदद करने का समय आता है,  तो आप वही करते हैं जो परमेश्वर  चाहता है कि आप करें l” बाद में माइक ने कैनेडी के चर्च में बोला और नफरत फैलाने में अपने हिस्से के लिए अश्वेत समुदाय से माफी मांगी l

यीशु ने पहाड़ी उपदेश में कुछ अलोकप्रिय विचारों की शिक्षा दी : “जो कोई तुझ से मांगे, उसे दे ... अपने बैरियों से प्रेम रखो और अपने सतानेवालों के लिए प्रार्थना करो” (मत्ती 5:42,44) l यह सोचने का उल्टा तरीका है परमेश्वर जिसका अनुसरण करने के लिए हमें बुलाता है l यद्यपि यह कमजोरी की तरह दिखता है,  यह वास्तव में परमेश्वर की सामर्थ्य को कार्य्वान्वित करना है l

वह जो हमें सिखाता है ही वह है जो यह उल्टा जीवन के लिए जैसे वह हमसे मांग करता है हमें जीने की शक्ति देता है l

क्या नहीं देखा जा सकता?

इतिहासकारों का कहना है कि परमाणु युग 16 जुलाई, 1945 को शुरू हुआ था,  जब न्यू मैक्सिको के दूरदराज के रेगिस्तान में पहला परमाणु आयुध विस्फोटित किया गया था l लेकिन यूनानी दार्शनिक डेमोक्रिटस (सी. 460–370 ई.पू.) किसी भी चीज़ के आविष्कार से बहुत पहले परमाणु के अस्तित्व और शक्ति की खोज कर रहा था जो कायनात/सृष्टि के इन छोटे निर्माण खण्डों को भी देख सकता था l डेमोक्रिटस जितना देख सकता था उससे अधिक समझता था और उसका परिणाम परमाणु सिद्धांत था l

पवित्रशास्त्र हमें बताता है कि विश्वास का सार जो नहीं देखा जा सकता उसे मजबूती से पकड़ना है l इब्रानियों 11:1 पुष्टि करता है, “अब विश्वास आशा की हुई वस्तुओं का निश्चय, और अनदेखी वस्तुओं का प्रमाण है l” यह अभिलाषी या सकारात्मक सोच का परिणाम नहीं है l यह उस परमेश्वर में विश्वास है जिसे हम देख नहीं सकते हैं लेकिन जिसका अस्तित्व कायनात/सृष्टि में सबसे सच्ची वास्तविकता है l उसकी वास्तविकता उसके रचनात्मक कार्यों में प्रदर्शित किया गया है (भजन 19:1) और उसका अदृश्य चरित्र और तरीके उसके पुत्र, यीशु  में दिखाई देता है, जो हमें पिता का प्यार दिखाने के लिए आया था (यूहन्ना 1:18) l

यह वह परमेश्वर है जिसमें हम “जीवित रहते, और चलते-फिरते, और स्थिर रहते हैं,” जैसे प्रेरित पौलुस कहता है (प्रेरितों 17:28) l उसी तरह, “हम रूप को देखकर नहीं, पर विश्वास से चलते हैं (2 कुरिन्थियों 5: 7) l फिर भी हम अकेले नहीं चलते है l अनदेखा परमेश्वर हर कदम पर हमारे साथ चलता है l

हमारे हृद्यों में निवास

कभी-कभी बच्चों के शब्द हमें ईश्वर के सत्य की गहरी समझ में डाल सकते हैं l एक शाम जब मेरी बेटी छोटी थी,  मैंने उसे मसीही विश्वास के महान रहस्यों में से एक के बारे में बताया─कि परमेश्वर अपने पुत्र और आत्मा के द्वारा अपने बच्चों में निवास करता है l जैसे ही मैंने उसे बिस्तर पर लिटाया,  मैंने कहा कि यीशु उसके साथ और उसके अन्दर है l “वह मेरे पेट में हैं?” उसने पुछा l “ठीक है, तुमने उसे निगला नहीं है,” मैंने उत्तर दिया l “लेकिन वह तुम्हारे साथ पूरी तरह से है l”

मेरी बेटी का यीशु का “उसके पेट में” होने का शाब्दिक अनुवाद मुझे ठहरकर विचार करने को विवश किया कि कैसे जब मैंने यीशु को अपना उद्धारकर्ता बनने के लिए कहा,  तो वह आया और मेरे भीतर निवास करने लगा l

प्रेरित पौलुस ने इस रहस्य का उल्लेख किया जब उसने प्रार्थना की कि पवित्र आत्मा इफिसुस के  विश्वासियों को मजबूत करेगा ताकि “विश्वास के द्वारा मसीह [उनके] हृदय में बसे” (इफिसियों 3:17) l यीशु के भीतर रहने के साथ,  वे समझ सकते थे कि वह उनसे कितना प्यार करता था l इस प्रेम से परिपूर्ण,  वे अपने विश्वास में परिपक्व होंगे और प्रेम में सच बोलते हुए दूसरों को दीनता और नम्रता से प्यार करेंगे (4:2,25) l

यीशु का अपने अनुयायियों के अंदर रहने का मतलब है कि उसका प्यार उन लोगों को कभी नहीं छोड़ता, जिन्होंने उसको अपने जीवन में निमंत्रित किया है l उसका प्रेम जो ज्ञान से परे है (3:19) हमें उसमें जड़वत करते हुए, समझने में मदद करता है कि वह हमसे कितना अधिक प्रेम करता है l

बच्चों के लिए लिखे गए शब्द इसे सबसे उत्तम तरीके से व्यक्त कर सकता है : “हाँ,  यीशु मुझे प्यार करता है!”

पहले दूध

सातवीं शताब्दी में, जिसे अब यूनाइटेड किंगडम कहा जाता है, अक्सर कई राज्य युद्ध में संलग्न होते थे l जब एक राजा, नॉर्थम्ब्रिया का ऑस्वाल्ड, यीशु में विश्वास करने वाला बन गया, तो उसने अपने क्षेत्र में सुसमाचार लाने के लिए एक मिशनरी को बुलाया l कॉर्मन नाम का एक आदमी भेजा गया, लेकिन बात नहीं बनी l अंग्रेजों को अपने उपदेश में “जिद्दी,” “बर्बर,” और अरुचिकर पाकर वह निराश होकर घर लौट आया l

“मेरी यह राय है,” एडन नाम के एक भिक्षु ने कॉर्मन से कहा, “ जितना आपको अपने अनजान श्रोताओं के लिए गंभीर होना था आप उससे अधिक गंभीर थे l” नॉर्थम्ब्रिया के लोगों को “अधिक आसान सिद्धांत का दूध” देने के बजाय, कॉर्मैन ने उन्हें शिक्षण दिया जिन्हें वे अभी समझ नहीं सकते थे l एडन नॉर्थम्ब्रिया गया, लोगों के समझ के अनुसार अपने उपदेश को अनुकूलित किया, और हजारों यीशु में विश्वास करने वाले बन गए l

एडन को मिशन के लिए यह संवेदनशील दृष्टिकोण पवित्र शास्त्र से मिला l पौलुस ने कुरिन्थियों से कहा, “मैंने तुम्हें दूध पिलाया, अन्न न खिलाया; क्योंकि तुम उसको नहीं खा सकते थे” (1 कुरिन्थियों 3:2) l लोगों से सही जीवनयापन की उम्मीद करने से पूर्व, इब्रानियों का कहना है, यीशु के बारे में बुनियादी शिक्षा, पश्चाताप और बपतिस्मा को समझ लेना चाहिए (इब्रानियों 5:13-6:2) l जबकि उसके बाद परिपक्वता का पालन जरूरी है (5:14), क्रम को न भूलें l ठोस भोजन से पहले दूध आता है l लोग उस शिक्षा को नहीं मान सकते हैं जिन्हें वे नहीं समझते हैं l

नॉर्थम्ब्रिया के लोगों का विश्वास आखिरकार देश के बाकी हिस्सों और उससे बाहर तक फैल गया l एडन की तरह, दूसरों के साथ सुसमाचार को साझा करते समय, हम उन लोगों से वहां मिलते हैं जहां वे हैं l