कौन चला रहा है?
मेरा पड़ोसी टिम ने अपने डैशबोर्ड पर मौरिस सेनडैक की बच्चों की प्रिय पुस्तक वेयर द वाइल्ड थिंग्स आर (Where the Wild Things Are) पर आधारित एक "जंगली चीज़" की मुर्तिका लगा रखी है l
कुछ समय पूर्व, टिम यातायात से होकर मेरा पीछा कर रहा था और कुछ असंगत कदम उठाकर मुझ तक पहुँचने का प्रयास कर रहा था l जब हम पहुँच गए, मैंने पूछा, "क्या वह 'जंगली चीज़' गाड़ी चला रही थी l"
अगले रविवार मैं घर पर अपने उपदेश नोट्स भूल आया l मैं उसे लाने के लिए "शीग्रता से" चर्च से बाहर निकला, और उसी रास्ते से टिम गुज़रा l जब हम बाद में मिले, तो उसने मजाक किया, "क्या वह जंगली चीज गाड़ी चला रही थी?" हम हँसे, लेकिन उसका मुद्दा समझ में आ गया - मुझे गति सीमा पर ध्यान देना चाहिए था l
जब बाइबल बताती है कि परमेश्वर के साथ सम्बन्ध में रहने का क्या मतलब है, तो यह हमें "[अपने] हर हिस्से को अर्पित" करने के लिए प्रोत्साहित करता है (रोमियों 6:13) l मैंने अपना "सब कुछ," अर्पित करने के लिए उस दिन टिम की प्रतिक्रिया को परमेश्वर से एक सौम्य ताकीद के रूप में लिया, जिससे मुझे उसके प्रेम के कारण अपना सर्वस्व देना था l
"कौन चला रहा है?" का सवाल पूरे जीवन पर लागू होता है l क्या हम अपने पुराने पाप प्रकृति की "जंगली चीजें" को हमें चलाने देते हैं - जैसे चिंता, भय, या आत्म-इच्छा - या क्या हम खुद को परमेश्वर की प्रेमपूर्ण आत्मा और अनुग्रह के लिए अर्पित करते हैं जो हमें बढ़ने में मदद करते हैं?
परमेश्वर को अर्पित करना हमारे लिए अच्छा है l पवित्रशास्त्र कहता है कि परमेश्वर की बुद्धि हमें "आनंददायक [मार्ग पर ले चलती है] और उसके सब मार्ग कुशल के हैं" (नीतिवचन 3:17) l उसके मार्गदर्शन में चलना बेहतर है l
दृढ़ आशा
1940 के दशक में जब जापान ने चीन पर हमला बोला, डॉ. विलियम वॉलस वुजहू, चीन में मिशनरी डॉक्टर के रूप में सेवा कर रहे थे l वालेस ने, जो उस समय स्टउट मेमोरियल अस्पताल के प्रभारी थे, अस्पताल को नाव पर उनके उपकरण लोड करने का आदेश दिया और पैदल सेना के हमलों से बचने के लिए नदियों में तैरते हुए अस्पताल के रूप में काम करना जारी रखा l
खतरनाक समय के दौरान, फिलिप्पियों 1:21 - वॉलस का एक पसंदीदा पद - ने उसे याद दिलाया कि यदि वह जीवित रहेगा, उसे उद्धारकर्ता के लिए कार्य करना होगा; किन्तु यदि उसकी मृत्यु हो जाएगी, उसके पास मसीह के साथ अनंतता की प्रतिज्ञा है l इस पद की विशेष सार्थकता तब दिखाई दी जब 1951 में धोखे से कैद कर लिए जाने के बाद उनकी मृत्यु हो गयी l
पौलुस का लेखन एक गहरी भक्ति को दर्शाता है जिसे हम यीशु के अनुयायियों के रूप में स्वीकार कर सकते हैं; हमें उसके लिए परीक्षाओं और यहां तक कि खतरे का सामना करने में सक्षम बनाता है l यह पवित्र आत्मा द्वारा प्राप्त भक्ति और हमारे निकटतम लोगों की प्रार्थना है (पद.19) l यह एक प्रतिज्ञा भी है l यहां तक कि जब हम मुश्किल परिस्थितियों में निरंतर सेवा के लिए आत्मसमर्पण करते हैं, तो यह इस ताकीद के साथ है : जब हमारा जीवन और कार्य यहाँ समाप्त होता है, तब भी हमें यीशु के साथ अनंत काल का आनंद मिलता है l
हमारे सबसे कठिन क्षणों में, हृदय जो मसीह के साथ चलने के लिए प्रतिबद्ध हैं, और हमारी आँखें उसके साथ अनंत काल की प्रतिज्ञा पर टिकी हुयी हैं, हमारे दिन और हमारे कार्य दूसरों को परमेश्वर के प्रेम की आशीष दें l
उसकी उपस्थिति
चिंतित पिता और उसका किशोर पुत्र मनोचिकित्सक के सामने बैठे थे l “मनोचिकित्सक ने पूछा, “आपका बेटा कितना दूर जानेवाला है?” उस व्यक्ति का उत्तर था, “उस बड़े शहर में, और वह बहुत समय तक वहाँ रहेगा l” पिता को एक ताबीज देते हुए, उसने कहा, “यह उसकी हर जगह रक्षा करेगा l”
हालाँकि, मैं ही वह लड़का था, मनोचिकित्सक और उसकी ताबीज मेरे लिए कुछ भी नहीं कर सके l उस शहर में रहते हुए, मैंने यीशु में विश्वास किया l मैंने वह ताबीज फेंककर मसीह में विश्वास कर लिया l मेरे जीवन में मसीह का होना परमेश्वर की उपस्थिति की गारंटी थी l
तीस वर्ष बाद, अब मेरे पिता विश्वासी हैं, मेरे भाई को हॉस्पिटल ले जाते समय उन्होंने मुझसे कहा, आओ पहले प्रार्थना करें; परमेश्वर का आत्मा तुम्हारे साथ जाएगा और सम्पूर्ण मार्ग में तुम्हारे साथ रहेगा!” हमने सीखा है कि परमेश्वर की उपस्थिति और सामर्थ्य ही हमारी सुरक्षा है l
मूसा ने ऐसा ही पाठ सीखा l उसे परमेश्वर ने एक चुनौतीपूर्ण कार्य सौंपा था - लोगों को मिस्र के दासत्व से निकालकर प्रतिज्ञात देश में पहुँचाना (निर्गमन 3:10) l किन्तु परमेश्वर ने उसे आश्वास्त किया, “मैं आप ही तेरे साथ चलूँगा” (पद.12) l
हमारी यात्रा में चुनौतियों का अभाव नहीं है, किन्तु हमें परमेश्वर की उपस्थिति की निश्चयता प्राप्त है l जिस प्रकार यीशु ने अपने शिष्यों से कहा, “देखो मैं जगत के अंत तक सदा तुम्हारे संग हूँ” (मत्ती 28:20 l
जो हम कर सकते हैं
अपने बिस्तर तक सीमित होने के बावजूद, 92 वर्षीय मोरी बुगार्ट मिशिगन के बेघर लोगों के लिए टोपियाँ बनाता था l ख़बरों की माने तो उसने पंद्रह वर्षों में 8,000 से अधिक टोपियाँ बनायीं l अपने स्वास्थ्य या सीमाओं पर केन्द्रित न होकर, श्री बूगर्ट ने खुद के बाहर देखा और अपनी ज़रूरतों के ऊपर ज़रुरतमंदों की ज़रूरतों को महत्त्व दिया l उसने प्रगट किया कि उसका काम उसे अच्छा लगता है और उसे एक उद्देश्य देता है l उसने कहा, “मैं यह काम प्रभु के पास उसके घर जाने तक करूँगा”-जो फरवरी 2018 में हुआ l यद्यपि उसकी बनायी हुयी टोपियाँ प्राप्त करनेवाले उसकी कहानी नहीं जान पाएंगे या हर एक टोपी बनाने के लिए उसने कितना त्याग किया, मोरी के प्रेम को संरक्षित रखने का सरल कार्य संसार के लोगों को प्रेरित कर रहा था l
हम भी अपने संघर्ष के परे देख सकते हैं, दूसरों को अपने आगे रख सकते हैं, और अपने दयालु उद्धारकर्ता, यीशु मसीह का अनुसरण कर सकते हैं (फिलिप्पियों 2:1-5) l देहधारित परमेश्वर - राजाओं का राजा - वास्तविक दीनता में “दास का स्वरुप धारण किया (पद.6-7) l अपने जीवन को देकर - अंतिम बलिदान - उसने क्रूस पर हमारा स्थान लिया (पद.8) l यीशु ने हमारे लिए सब कुछ दे दिया . . . परमेश्वर पिता की महिमा के लिए सब कुछ (पद.9-11) l
यीशु में विश्वासी होने के कारण, दयालुता के कार्यों के द्वारा दूसरों को प्रेम दिखाना और उनकी परवाह करना हमारा सौभाग्य है l यदि हम विचार न भी करें हमारे पास देने के लिए बहुत है, हम सेवक का स्वभाव अपना सकते हैं l हम जो कर सकते हैं उसके द्वारा क्रियाशीलता से अवसर ढूढ़ कर लोगों के जीवनों में अंतर ला सकते हैं l
पिता और पुत्र
मेरे पिता एक अच्छे पिता थे, और, अधिकतर सभी बातों में, मैं आज्ञाकारी पुत्र था l किन्तु मैंने अपने पिता को एक बात से वंचित रखा जो मैं दे सकता था यानी अपने आप को l
वे एक शांत व्यक्ति थे; मैं भी बराबर से शांत था l परस्पर बिना बातचीत किये हुए हम अक्सर घंटों तक साथ- साथ काम करते थे l वे कभी नहीं पूछते थे; मैंने उनको अपनी गहरी इच्छाएँ और महत्वकांक्षाएँ, अपनी आशाएं और भय कभी नहीं बताए l
समय रहते हुए मैंने अपनी चुप्पी तोड़ी l शायद मेरे बड़े बेटे के जन्म के बाद मुझे अनुभूति हुयी, या जब, एक-एक करके, मेरे पुत्र इस संसार में खो गए l अब मेरी चाहत है काश मैं अपने पिता के लिए उनके बेटा समान होता l
मैं उन सारी बातों के विषय सोचता हूँ जो मैं उन्हें बता सकता था l और सब बातें जो वह मुझे बता सकते थे l उन्हें दफनाने के समय मैं उनके शव पेटी के निकट खड़ा होकर, अपनी भावनाओं को समझने में संघर्ष कर रहा था l “अब बहुत देर हो चुकी है, हैं न?” मेरी पत्नी धीमे से बोली l “बिलकुल,” मैंने कहा l
मेरा सुख इस तथ्य में है कि हम स्वर्ग में बातों को ठीक कर लेंगे, क्योंकि क्या वह स्थान नहीं जहां हर एक आँसू पोछा जाएगा? (प्रकाशितवाक्य 21:4) l
यीशु में विश्वासियों के लिए, मृत्यु स्नेह का अंत नहीं है किन्तु अनंत अस्तित्व का आरम्भ जहां कोई भी ग़लतफ़हमी नहीं होगी; सम्बन्ध ठीक हो जाएंगे और प्रेम हमेशा बढ़ता जाएगा l वहाँ पर, पुत्रों का मन माता-पिता की ओर और माता-पिता का मन पुत्रों की ओर फिरेगा (मलाकी 4:6) l
मैं माफ़ी चाहता हूँ
2005में, कॉलिंस के एक रिपोर्ट को झूठा ठहराने के कारण मेगी को चार साल के लिए जेल जाना पड़ा, और मेगी जेल से छूटने के बाद कॉलिंस को ढूंढ़ कर उसे “हानि” पहुँचाने की कसम खायी l अंततः सबकुछ खोने के बाद, मेगी दोषमुक्त हो गया l इस बीच, कॉलिंस के सभी रिपोर्ट झूठे साबित हुए, उसकी नौकरी छूट गयी, उसे भी कई वर्षों के लिए जेल में रहना पड़ा l जेल में रहते हुए दोनों मसीह में विश्वास में आ गए l
2015 में, दोनों ने खुद को एक साथ एक विश्वास-आधारित कंपनी में नौकरी करते हुए पाया l कॉलिंस याद करता है, “[मैंने मेगी से कहा], ‘इमानदारी से, मेरे पास स्पष्ट करने के लिए कुछ भी नहीं है, मैं केवल यह कह सकता हूँ मुझे क्षमा कर दो l” मेगी का उत्तर था, “मैं लगभग यही सुनना चाहता था,” और उसने उसे माफ़ कर दिया l दोनों में मेल हो सका क्योंकि उन्होंने परमेश्वर का अतुलनीय प्रेम और क्षमा का अनुभव किया था, जो हमें “एक दूसरे . . . [को] . . . क्षमा” करने की योग्यता देता है (कुलुस्सियों) 3;13) l
वर्तमान में दोनों घनिष्ठ मित्र हैं l “हमारे पास संसार को बताने के लिए एक संयुक्त मिशन है . . . कि यदि आपको किसी से क्षमा मांगनी है, तो अहंकार छोड़कर उससे क्षमा मांग लें,” कॉलिंस ने कहा l “और यदि आपको किसी के विरुद्ध कोई शिकायत है, कड़वाहट छोड़ दें क्योंकि यह इस आशा से ज़हर पीने के समान है कि यह उन्हें हानि पहुंचेगा l”
परमेश्वर विश्वासियों को शांति और एकता में रहने के लिए बुलाता है l यदि हमारे पास “किसी पर दोष देने का कोई कारण हो,” हम उसे परमेश्वर के पास ले जाएँ l वह हमें मेल करने में मदद करेगा (पद.13-15; फिलिप्पियों 4:6-7) l
दन्त चिकित्सक के पास पिता
हे मेरे पिता, यदि हो सके तो यह कटोरा मुझ से टल जाए, तौभी जैसा मैं चाहता हूँ वैसा नहीं, परन्तु जैसा तू चाहता है वैसा ही हो l मत्ती 26:39
मैंने दन्त चिकित्सक के क्लिनिक में पिता के हृदय के विषय किसी गंभीर पाठ की अपेक्षा नहीं की थी-किन्तु मुझे एक मिल गयी l मैं अपने दस वर्षीय बेटे के साथ वहां था l उसके मूंह में दूध के एक दांत की जगह जो अभी टूटा नहीं थे स्थायी दांत निकल रहा था l दूध के दांत को हटना ही था l और कोई तरीका नहीं था l
मेरा बेटा रोते हुए मुझसे आग्रह करने लगा : “पापा, कोई और तरीका नहीं है क्या? क्या हम ठहर नहीं सकते? पापा, कृपया, मैं इस दांत को निकलवाना नहीं चाहता हूँ!” मुझे दुःख हुआ, किन्तु मैंने उससे कहा, “बेटा, इसे निकालना ही होगा l मुझे दुःख है l और कोई रास्ता नहीं है l” मैंने उसके हाथ को पकड़ लिया जब वह छटपटा रहा था और परेशान हो रहा था, और दांत के डॉक्टर ने उसकी सख्त दाढ़ को निकाल दिया l उस समय मेरे आँखों में भी आँसू थे l मैं उसके दर्द को ले नहीं सकता था; उसके लिए मेरी उपस्थिति ही सबसे अच्छी बात थी l
उस क्षण, मैंने याद किया गतसमनी के बगीचे में यीशु को, वह अपने पिता से कोई और मार्ग बताने के लिए प्रार्थना कर रहा था l अपने पुत्र को ऐसी पीड़ा में देखकर पिता का हृदय किस तरह टूटा होगा! किन्तु अपने लोगों की सेवा करने के लिए और कोई मार्ग नहीं था l
हमारे जीवनों में, हम भी कभी-कभी अपरिहार्य किन्तु पीड़ादायक क्षणों का सामना करते हैं-जैसे मेरे बेटे ने सहा l किन्तु उसकी आत्मा के द्वारा हमारे लिए यीशु के कार्य के कारण, हमारे सबसे अंधकारमय क्षणों में भी हमारा प्रेमी पिता हमेशा हमारे साथ उपस्थित रहता है (मत्ती 28:20) l
बुद्धिमत्ता का श्रोत
एक व्यक्ति ने एक महिला पर मुकद्दमा दायर कर दिया, कि महिला के पास उसका कुत्ता था l कोर्ट में महिला ने कहा, उसका कुत्ता उस व्यक्ति का नहीं हो सकता और जज को बताया उसने उसे कहाँ से ख़रीदा था l वास्तविक मालिक का पता चल गया जब जज ने कोर्ट के कमरे में ही उस कुत्ते को खोल दिया l पूंछ हिलाते हुए, वह अपने मालिक के पास दौड़ गया l
प्राचीन इस्राएल का एक न्यायी, सुलैमान को इस तरह का एक मामला सुलझाना पड़ा l दो महिलाएँ एक ही छोटे लड़के की माँ होने का दावा कर रही थीं l दोनों के दलील को सुनने के बाद, तलवार से उस बच्चे को दो भाग में विभाजित करने को कहा l बच्चे की असली माँ ने अपना बच्चा नहीं मिलने की स्थिति में भी उसकी जान बचाने के उद्देश्य से उसे दूसरी स्त्री को दे देने का आग्रह किया (1 राजा 3:26) l सुलैमान में उसे बच्चा दे दिया l
न्यायोचित और नैतिक, सही और गलत क्या है का निर्णय करने के लिए बुद्धिमत्ता अनिवार्य है l यदि हम सचमुच बुद्धि का मूल्य समझते हैं, हम सुलेमान की तरह, परमेश्वर से समझने वाला हृदय मांग सकते हैं (पद.9) l परमेश्वर दूसरों की रुचियों के साथ हमारी आवश्यकताओं और इच्छाओं को संतुलित करके हमारे निवेदन का उत्तर दे सकता है l वह दीर्घकालीन(कभी-कभी अनंत) लाभ के विरुद्ध अल्पकालीन लाभ को तौलने में हमारी मदद भी कर सकता है ताकि हम अपने जीवन जीने में उसका आदर कर सकें l
हमारा परमेश्वर केवल एक सिद्ध बुद्धिमान न्यायी ही नहीं है, किन्तु एक व्यक्तिगत परामर्शदाता भी है जो हमें बड़ी मात्रा में ईश्वरीय बुद्धिमत्ता भी देना चाहता है (याकूब 1:5) l
अब तक राजा
एक न्यूज़ रिपोर्ट ने इसे संबोधित किया “मसीहियों के लिए दशकों में एक सबसे प्राणघातक दिन l” अप्रैल 2017 में रविवारीय आराधकों पर हमले हमारी समझ को चुनौती देते हैं l हम आराधनालय में रक्तपात को समझाने में असफल हैं l किन्तु इस प्रकार की पीड़ा को अच्छी तरह समझने वालों से हम थोड़ी सहायता ले सकते हैं l
आसाप द्वारा भजन 74 लिखने के समय यरूशलेम के अधिकतर लोग निर्वासन में थे या उनकी हत्या कर दी गयी थी l वह अपने हृदय का शोक दर्शाते हुए, कठोर आक्रमणकारियों के हाथों मंदिर का विनाश वर्णन करता है l “तेरे द्रोही तेरे पवित्स्थान के बीच गरजते रहे हैं,” आसाप ने कहा (पद.4) l “उन्होंने तेरे पवित्रस्थान को आग में झोंक दिया है, और तेरे नाम के निवास को गिराकर अशुद्ध कर डाला है” (पद.7) l
फिर भी, भजनकार ने इस भयंकर वास्तविकता के होते हुए खड़े होने के लिए एक स्थान ढूंढ़ लिया अर्थात् वह उत्साह देता है कि हम भी ऐसा कर सकते हैं l “आसाप ने निर्णय किया, “परमेश्वर तो प्राचीनकाल से मेरा राजा है, वह पृथ्वी पर उद्धार के काम करता आया है” (पद.12) l यद्यपि उस क्षण उसका उद्धार उसे अनुपस्थित दिखाई दे रहा था, इस सच्चाई ने आसाप को परमेश्वर के महान सामर्थ्य की प्रशंसा करने में योग्य बनाया l “आसाप ने प्रार्थना की, “अपनी वाचा की सुधि ले; . . . पिसे हुए जन को अपमानित होकर लौटना न पड़े; दीन और दरिद्र लोग तेरे नाम की स्तुति करने पाएँ” (पद.20-21) l
जब न्याय और करुणा अनुपस्थित महसूस हों, परमेश्वर का प्रेम और सामर्थ्य किसी भी तरह से क्षीण नहीं होते हैं l आसाप के साथ, हम भरोसे के साथ कह सकते हैं, “किन्तु परमेश्वर . . . मेरा राजा है l”