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अनुसरण करने की स्वतंत्रता

एक बार मेरे स्कूल के कोच ने मुझे एक दौड़ के पहले कहा, “आगे-आगे मत दौड़ना l आगे दौड़ने वाले जल्द ही थक जाते हैं l” इसके बदले उनकी सलाह थी कि मैं सबसे तेज दौड़ने वाले के निकट रहूँ l तेज दौड़ने वालों द्वारा गति बनाए रखने के कारण मैं अपने मानसिक और शारीरिक ताकत को बनाए रख सकूँगा और दौड़ भी अच्छी तरह पूरी कर लूँगा l

नेतृत्व थका सकता है; अनुसरण स्वतंत्र रखता है l इसको जानकार मेरा दौड़ना और बेहतर हो गया, किन्तु मसीही शिष्यता में यह लागू कैसे होता है, जानने में समय लगा l मेरे खुद के जीवन में, मेरी सोच थी कि यीशु का विश्वासी होने का अर्थ है सश्रम कोशिश करना  l एक मसीही को कैसा होना चाहिए के विषय अपनी थकाऊ इच्छा का पीछा करने के द्वारा, मैं सरलता से उसका अनुसरण करने की जगह गलती से आनंद और स्वतंत्रता को खो रहा था (यूहन्ना 8:32,36) l

किन्तु हमें अपने जीवनों को चलाने कि ज़रूरत नहीं है, और यीशु ने आत्म-सुधार कार्यक्रम आरंभ नहीं किया था l इसके बदले, उसकी प्रतिज्ञा थी कि उसका अनुसरण करके हम उस शांति को प्राप्त करेंगे जिसकी हम इच्छा करते हैं (मत्ती 11:25-28) l अन्य धार्मिक शिक्षकों के विपरीत जो वचन के कठोर अध्ययन अथवा नियम पालन पर बल देते हैं, यीशु की शिक्षा थी कि उसको जानने के द्वारा हम परमेश्वर को जान सकते हैं (पद.27) l उसको खोजने से, हमारे भारी बोझ उतर जाएंगे (पद.28-30) और हमारे जीवन बदल जाएंगे l

क्योंकि नम्र और दीन अगुए के पीछे चलना सरल है (पद.29) – यह आशा और चंगाई का मार्ग है l उसके प्रेम में विश्राम करने से हम स्वतंत्र रहते हैं l

कार्य में व्यस्त परमेश्वर

“अभी हाल में क्या आपने परमेश्वर को कार्य करते हुए देखा है?” मैंने अपने कुछ मित्रों से पूछा l एक का उत्तर था, “प्रति भोर को बाइबल पढ़ते समय मैं उसे कार्य करते हुए पाता हूँ; मैं उसे कार्य करते हुए देखता हूँ जब वह मुझे नए दिन का सामना करने में सहायता करता है; मैं उसे मार्ग में मेरे हर कदम पर मदद करते हुए देखता हूँ l मैंने मेहसूस किया है कि उसने मुझे आनंद देते हुए हर चुनौती का सामना करने में मदद की है l” मुझे उसका उत्तर पसंद है क्योंकि उससे पता चलता है कि किस तरह परमेश्वर का वचन और अन्दर निवास करने वाला पवित्र आत्मा के द्वारा, परमेश्वर उससे प्रेम करनेवालों के निकट रहता है, उनमें काम करता है l

परमेश्वर का अपने अनुयायियों में कार्य करना एक अद्भुत सेवा है जिसके विषय इब्रानियों का लेखक अपनी पत्री के समापन आशीष में लिखते हुए इस प्रकार कहता है : “ . . . जो कुछ उसको भाता है उसे यीशु मसीह के द्वारा हम में उत्पन्न करे” (इब्रानियों 13:21) l इस समापन के साथ, लेखक अपने विशेष सन्देश पर बल देता है – कि परमेश्वर उसका अनुसरण करने में अपने लोगों को सज्जित करेगा और कि वह अपनी महिमा के लिए उनमें होकर और उनके द्वारा कार्य करेगा l

परमेश्वर का वरदान जो हममें कार्य करता है हमें चकित कर सकता है; शायद हम किसी को क्षमा करते हैं जिसने हमारी हानि की है अथवा किसी कठिन व्यक्ति के साथ उसने हमें धीरज रखने में सहायता की है l हमारा “शांति का परमेश्वर” हममें होकर और हमारे द्वारा अपना प्रेम और शांति प्रगट करता है l अभी हाल में आपने परमेश्वर को किस तरह कार्य करते हुए देखा है?”

वो नहीं जो प्रतीत हो

“सुनो!” मेरी पत्नी ने मुझसे फोन पर बोलीl  “हमारे अहाते में एक बन्दर घुस आया है!” उसने फोन को रख दिया और मैंने बन्दर ही सुना l यह बहुत ही अजीब प्रतीत हो रहा था, क्योंकि जंगली बन्दर 2,000 मील दूर थे l

बाद में मेरे ससुर ने रहस्य खोल दी, “वह एक ख़ास प्रकार का उल्लू(Barred Owl) था l” वास्तविकता वह नहीं थी जो प्रतीत हो रही थी l

जब राजा सन्हेरिब की सेना ने यहूदा के राजा हिजकिय्याह को यरूशलेम की शहरपनाह के भीतर कैद कर दिया, अशूरों ने सोचा कि जीत उनकी है l सच्चाई भिन्न थी l यद्यपि अशूरों के क्षेत्र सेनापति ने मीठे शब्दों का उपयोग किया और परमेश्वर की ओर से बातें करने का ढोंग रचा, प्रभु का हाथ प्रभु के लोगों पर था l

“क्या मैं ने यहोवा के बिना कहे, इस स्थान को उजाड़ने के लिए चढ़ाई की है?” सेनापति ने पूछा (2 राजा 18:25) l यरूशलेम को हथियार डालने के लिए लुभाते समय, उसने यह भी कहा, “. . . तुम मरोगे नहीं, जीवित रहोगे” (पद.32) l

यह तो परमेश्वर के शब्द प्रतीत  हो रहे थे l किन्तु यशायाह नबी ने इस्राएलियों से प्रभु के वास्तविक शब्द कहे l परमेश्वर ने कहा, “[सन्हेरिब] इस नगर में प्रवेश करने, वरन् इस पर एक तीर भी मारने न पाएगा . . . मैं इस नगर की रक्षा करके इसे बचाऊंगा” (19:32-34; यशायाह 37:35) l उसी रात “यहोवा के दूत ने” अशूरों को नाश किया (पद.35) l

समय समय से, हमें मीठी बातें करनेवाले लोग मिलेंगे जो परमेश्वर की सामर्थ्य का इनकार करते हुए हमें “सलाह” देंगे l ये आवाज़ परमेश्वर की नहीं है l वह अपने वचन द्वारा बात करता है और पवित्र आत्मा द्वारा मार्गदर्शन देता है l उसका हाथ उसके अनुयायियों पर रहता है, और वह हमें कभी नहीं छोड़ेगा l

एक साल में बाइबल

उम्र में बढ़ते समय मैं अपनी दो बहनों के साथ देवदार की लकड़ी से बनी एक बक्से पर जो मेरी माँ की थी बैठना पसंद करती थी l मेरी माँ ऊन से बने हमारे स्वेटरों को उसमें रखती थी और हाथ के बने काम जो मेरी दादी ने कढ़ाई अथवा क्रोशिया से बनाए थे l उसके लिए वह बक्सा महत्वपूर्ण था l वह देवदार लकड़ी पर भरोसा करती थी जिसकी तेज़ महक अन्दर के सामान को कीट आदि से बचा सकती थी l

संसार की अधिकतर वस्तुएं आसानी से कीट अथवा मोर्चे से खराब हो सकते हैं अथवा उनके चोरी होने का डर होता है l मत्ती 6 हमें सीमित जीवन-अवधि वाली वस्तुओं पर नहीं किन्तु अनंत  मूल्य वाले वस्तुओं पर विशेष ध्यान देने को प्रोत्साहित करता है l जब 57 वर्ष की उम्र में मेरी माँ की मृत्यु हुयी, उन्होंने अधिक सांसारिक वस्तुएं इकठ्ठा नहीं किया था, किन्तु मैं उस धन के विषय विचार करना चाहती हूँ जो उन्होंने स्वर्ग में इकट्ठा किया था (पद.19-20) l

मैं याद करती हूँ कि वह परमेश्वर को कितना अधिक प्यार करती थी और शांत तरीकों से उसकी सेवा करती थी : विश्वासयोग्यता से अपने परिवार की देखभाल, सन्डे स्कूल में बच्चों को पढ़ाना, पति द्वारा त्यागी गयी स्त्री से मित्रता निभाना, एक युवा माँ से सहानुभूति रखना जिसके बच्चे की मृत्यु हो चुकी थी l और वह प्रार्थना  भी करती थी . . . . अपनी दृष्टि खोने के बाद भी और व्हील चेयर तक सीमित होने पर भी,  वह दूसरों को प्यार और उनके लिए प्रार्थना करती रही l

जो हम इकठ्ठा करते हैं वह हमारे वास्तविक धन का माप नहीं है किन्तु हम क्या और किसमें अपना समय और मनोभाव निवेश करते हैं l हम सेवा और यीशु का अनुसरण करने के द्वारा कौन सा “धन” स्वर्ग में इकठ्ठा कर रहे हैं?

एक साल में बाइबल

सीरिया की एक स्त्री, रीमा जो अमरीका में आकर रहने लगी थी, ने अपने शिक्षक को हाथों के इशारों और सीमित अंग्रेजी भाषा की सहायता से बताने का प्रयास किया कि वह परेशान है l उसके आँसू बह रहे थे जब वह खूबसूरती से एक थाली में फतेयर (गोश्त, पनीर, और पालक से बना व्यंजन) लेकर आयी l तब उसने कहा, “एक व्यक्ति,” और उसने लम्बी साँस की आवाज़ निकलते हुए दरवाज़े से कमरे की ओर और कमरे से दरवाज़े की ओर इशारा किया l शिक्षक ने उसकी बातों को समझाया कि निकट के चर्च से बहुत से लोगों को कुछ उपहार लेकर रीमा और उसके परिवार से मिलने आना था l लेकिन केवल एक ही व्यक्ति आया l वह आकर अपने उपहार रखकर तुरन्त लौट गया l वह व्यक्ति अपनी जिम्मेदारियों में व्यस्त था, जबकि रीमा और उसका परिवार अकेलापन महसूस कर रहे थे और समुदाय की सहभागिता चाहते थे और अपने नए मित्रों के संग अपना नया व्यंजन फतेयर  बांटना चाहते थे l

यीशु हमेशा लोगों को समय देता था l उसने समारोहों में भाग लिया, भीड़ को शिक्षा दी, और समय निकलकर व्यक्तियों से बातचीत की l वह एक कर अधिकारी, जक्कई के घर का मेहमान भी बना, जो पेड़ पर चढ़ कर उसे देखना चाहता था l यीशु उसे देखकर उससे बोला था, “झट उतर आ; क्योंकि आज मुझे तेरे घर में रहना अबश्य है” (लूका 19:1-5) l और जक्कई का जीवन हमेशा के लिए बदल गया था l

अन्य जिम्मेदारियों के कारण, हम हमेशा समय नहीं दे सकते हैं l किन्तु जब समय निकलते हैं, हमारे पास दूसरों के साथ संगती करने का और यह देखने का अद्भुत समय होगा कि परमेश्वर हमारे द्वारा कार्य कर रहा है l

शांति के साथ दृढ़ रहना

अपने संघर्षों और पुराने दर्द में परमेश्वर पर भरोसा रखते हुए जब मैं आगे बढ़ रही हूँ, छोटी से छोटी रूकावट भी क्रोधी आक्रमणकारी दुश्मन महसूस होता है l प्रथम समस्या मुझे दाहिनी ओर से दबाती है l दूसरी समस्या मुझे पीछे से धक्का देती है l तीसरी समस्या सामने से आक्रमण करती है l इन समयों में, जब मेरी ताकत क्षीण होती है और तुरन्त आराम नहीं मिलता, दौड़कर छिप जाना एक अच्छी सोच लगती है l किन्तु इसलिए कि मैं दर्द से भाग नहीं सकती, अपनी स्थिति को बदल नहीं सकती, अथवा अपनी भावनाओं को अनदेखा नहीं कर सकती, मैं धीरे-धीरे अपनी समस्या से निकलने के लिए परमेश्वर पर भरोसा करना सीख रही हूँ l

जब मुझे प्रोत्साहन, आराम, और साहस की ज़रूरत होती है, मैं भजनकारों के भजनों को प्रार्थनापूर्वक पढ़ती हूँ, जो ईमानदारी पूर्वक अपनी स्थितियों को परमेश्वर के निकट लाते हैं l मेरे एक प्रिय भजन में, दाऊद अपने बेटे, अबशालोम से भाग रहा है, जो उसका राज्य उससे छीनकर उसे मार डालना चाहता है l यद्यपि दाऊद अपनी दर्द भरी स्थिति पर विलाप करता है (भजन 3:1-2), वह परमेश्वर की सुरक्षा पर भरोसा रखकर अपनी प्रार्थना के उत्तर का इंतज़ार किया (पद.3-4) l राजा ने न अपनी नींद नहीं खोयी और न ही अनहोंनी से भयभीत हुआ, क्योंकि उसने परमेश्वर पर उसे थामने और बचाने के लिए भरोसा किया (पद.5-8) l

भौतिक और भावनात्मक पीड़ा अक्सर आक्रामक शत्रुओं के समान महसूस होते हैं l हम हार मानने के लिए प्रेरित होते हैं अथवा घबराहट में भाग जाने की इच्छा होती है जब हमें हमारे वर्तमान के संघर्ष में उसका हल दिखाई नहीं देता l किन्तु, दाऊद की तरह, हम भरोसा कर सकते हैं कि परमेश्वर हमें थामेगा और हम उसके निरंतर और प्रेमी उपस्थिति में विश्राम कर सकते हैं l

लम्बा चौड़ा देश

एमी कार्माईकल (1867-1951) भारत में अनाथ लड़कियों को बचानेवाली और नया जीवन देनेवाली के रूप में जानी जाती है l इस थकानेवाले काम के मध्य उसके जीवन में ऐसे क्षण भी आए जिसे उसने “दर्शन का क्षण” कहा l अपनी पुस्तक गोल्ड बाई नाईट, में उन्होंने लिखा, “एक भीड़ भरे दिन के मध्य हमें ‘लम्बे चौड़े देश,’ की लगभग एक झलक मिल ही जाती है और हम मार्ग में शांत होकर ठहर जाते हैं l”

यशायाह नबी एक समय के विषय लिखता है जब परमेश्वर के विद्रोही लोग उसके निकट लौटेंगे l “तू अपनी आखों से राजा को उसकी शोभा सहित देखेगा; और लम्बे चौड़े देश पर दृष्टि करेगा” (यशायाह 33:17) l इस “लम्बे चौड़े देश” को देखने का अर्थ अविलम्ब वर्तमान की स्थिति से ऊपर उठकर स्वर्गिक दृष्टिकोण प्राप्त करना है l कठिन समयों में, प्रभु चाहता है कि हम अपने जीवनों को उसके दृष्टिकोण से देखकर आशा प्राप्त करें l “क्योंकि यहोवा हमारा न्यायी, यहोवा हमारा हाकिम, यहोवा हमारा राजा है, वही हमारा उद्धार करेगा” (पद.22) l

हर दिन, हम निराशा में सर झुका सकते हैं अथवा “लम्बे चौड़े देश” की ओर, उस प्रभु की ओर जो हमारा “महाप्रतापी यहोवा” है, अपनी ऑंखें उठा सकते हैं (पद.21) l

एमी कार्माईकल भारत में पचास वर्ष से भी अधिक तक अति आवश्यकतामंद जवान स्त्रियों की सहायता करती रही l उसने किस प्रकार यह किया? हर दिन वह यीशु की ओर देखती रही और उसकी देखभाल में अपने जीवन को सौंप दिया l और हम भी सौंप सकते हैं l

नहीं लौटने का स्थान

एक और नदी पार करने की तरह यह इतना सरल नहीं था l कानून के अनुसार, कोई भी रोमी सेनापति सेना के टुकड़ी के साथ रोम में प्रवेश नहीं कर सकता था l  इसलिए जब जुलियस सीज़र ई.पू. 49 में सेना की 13 वीं टुकड़ी को रुबिकोन नदी के पार इटली में प्रवेश कराया, यह राजद्रोह था l सीज़र का निर्णय बदला नहीं जा सकता था, और रोम के महान सेनापति का पूर्ण शासक बनने तक गृह-युद्ध होता रहा l  आज भी, वाक्यांश “रुबिकोन नदी पार करना,” अलंकार “जहां से लौटा नहीं जा सकता है उस स्थान को पार करना” के रूप में उपयोग किया जाता है l

कभी-कभी हम दूसरों को कुछ बोलकर सम्बन्धात्मक रुबिकोन नदी पार कर देते हैं l कहे गए शब्द, वापस नहीं लिए जा सकते हैं l जब ये शब्द हमारे होठों से निकल जाते हैं, उनसे मदद और आराम मिलता है अथवा हानि होती है जो सुधारी नहीं जा सकती, उसी प्रकार जिस तरह सीज़र रोम में प्रवेश किया था l याकूब यह लिखते हुए, शब्दों के विषय एक और चित्रण देता है, “जीभ भी एक आग है; जीभ हमारे अंगों में अधर्म का एक लोक है, और सारी देह पर कलंक लगाती है, और जीवन गति में आग लगा देती है, और नरक कुण्ड कि आग से जलती रहती है (याकूब 3:6) l

जब हमें अहसास हो कि हमने किसी के साथ रुबिकोन नदी पार कर दी है, हम उनसे और परमेश्वर से क्षमा मांग सकते हैं (मत्ती 5:23-24); 1 यूहन्ना 1:9) l किन्तु इससे बेहतर परमेश्वर के पवित्र आत्मा में विश्राम प्राप्त करते हुए, पौलुस की चुनौती पर ध्यान देना है, “तुम्हारा वचन सदा अनुग्रह सहित और सलोना हो” (कुलु. 4:6), ताकि हमारे शब्दों द्वारा केवल प्रभु को आदर ही नहीं मिलेगा, किन्तु हमारे चारों ओर के लोग की उन्नत्ति होगी और वे उत्साहित होंगे l

परमेश्वर के मार्गदर्शन का प्रतिउत्तर

अगस्त 2015 में, जब मैं अपने घर से दो घंटे की दूरी पर एक विश्वविद्यालय में पढ़ने की तैयारी कर रही थी, मैंने महसूस किया कि पढ़ाई समाप्त करने के बाद मैं वापस अपने घर नहीं लौट पाऊंगी l मेरा मस्तिष्क बहुत तीव्रता से विचार करने लगा l मैं अपना घर कैसे छोड़ सकती हूँ? मेरा परिवार? मेरी कलीसिया? क्या होगा यदि बाद में परमेश्वर मुझे किसी और राज्य अथवा देश में जाने को कहता है?

मूसा की तरह ही, जब परमेश्वर ने उसे “फ़िरौन के पास [जाने को कहा] कि [वह] इस्राएलियों को मिस्र से निकाल ले [आए] (निर्गमन 3:10), मैं डर भी गयी l मैं अपने आराम के स्थान को नहीं छोड़ना चाहती थी l अवश्य, मूसा ने आज्ञा मानकर परमेश्वर का अनुसरण किया, किन्तु इसके पूर्व उसके पास अनेक प्रश्न थे और निवेदन भी कि उसके बदले किसी और को भेजा जाए (पद.11-13; 4:13) l

मूसा के उदाहरण से, हम महसूस कर सकते हैं कि स्पष्ट बुलाहट मिलने पर हमें क्या नहीं करना चाहिए l इसके बदले हमें शिष्यों के समान बनने का प्रयास करना चाहिए l जब यीशु ने उन्हें बुलाया, उन्होंने सब कुछ छोड़कर उसके पीछे हो लिए (मत्ती 4:20-22; लुका 5:28) l भय स्वाभाविक है, किन्तु हम परमेश्वर की योजना पर भरोसा कर सकते हैं l

आज भी घर से बहुत दूर रहना कठिन है l किन्तु जब मैं परमेश्वर को निरंतर खोजती रहती हूँ, वह मेरे लिए द्वार खोलता है और मुझे निश्चय देता है कि मैं सही स्थान पर हूँ l

जब हमें हमारे आराम के स्थान से बाहर निकाला जाता है, हम या तो मूसा की तरह अनिच्छुक होंगे, अथवा शिष्यों की तरह इच्छुक, जिन्होंने यीशु का अनुसरण हर जगह किया l कभी-कभी इसका अर्थ अपने आरामदायक जीवन को छोड़कर हज़ारों मील दूर रहना होता है l लेकिन चाहे जितनी दूर भी हो, यीशु के पीछे चलना सार्थक है l