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दृश्य का आनंद लें

सूर्यास्त l  लोग इसे देखने के लिए काम रोक देते हैं .... उसका तस्वीर खींचते हैं ... सुन्दर दृश्य का आनंद लेते हैं l

हम दोनों पति-पत्नी ने हाल ही में मेक्सिको की खाड़ी में सूर्यास्त देखा l लोगों का एक समूह हमारे साथ था, अधिकतर अपरिचित जो संध्या की इस अद्भुत घटना को देखने हेतु तट पर इकट्ठा थे l जिस क्षण सूर्य क्षितिज पर अस्त हुआ भीड़ ने वाहवाही की l

लोग इस तरह प्रतिक्रिया क्यों देते हैं? भजन सहिंता संकेत देता है l भजनकार परमेश्वर के विषय लिखता है कि वह सूर्य से अपने सृष्टिकर्ता की प्रशंसा करवाता है (भजन 148:3) l और जब सूर्य की किरणें पृथ्वी पर चमकती हैं, लोग उनके साथ प्रशंसा करने को विवश होते हैं l

कुछ बातों की तरह प्रकृति की सुन्दरता हमारे मन से बातें करती है l उसके पास हमें मार्ग में रोकने की ताकत और हमारे ध्यान को खींचने की ताकत ही नहीं है, बल्कि वह सुन्दरता के रचयिता की ओर हमारा ध्यान ले जाता है l

परमेश्वर की बड़ी सृष्टि का विस्मय हमें रोककर सबसे महत्वपूर्ण बात याद दिलाता है l यह हमें याद दिलाता है कि इस दिन के इस अद्भुत आगमन और गमन के पीछे एक सृष्टिकर्ता है, जो इस संसार से जिसे उसने बनाया, से बहुत प्रेम करता है कि वह इसमें आया कि इसे बचा ले और नया कर दे l

यीशु के साथ घर में

“घर से अच्छी जगह कोई नहीं l” यह वाक्यांश एक विश्राम स्थान, उसमें रहने, और अपने घर के लिए हमारे अन्दर की गहरी चाह दर्शाता है l यीशु ने अपने शिष्यों के साथ अंतिम भोज खाने के बाद, अपनी भावी मृत्यु और पुनरुत्थान के विषय बोलते समय, इस बुनियादी ज़रूरत की इच्छा को संबोधित किया l उसकी प्रतिज्ञा थी कि यद्यपि वह चला जाएगा, वह फिर उनके लिए आएगा l और वह उनके लिए जगह तैयार करेगा l एक निवास स्थान l एक घर l

उसने यह स्थान परमेश्वर की व्यवस्था की अनिवार्यता को पूरा करते हुए निर्दोष मनुष्य होकर क्रूस पर अपनी जान देकर उनके और हमारे लिए तैयार किया l उसने शिष्यों को आश्वस्त किया कि यदि वह इस घर को बनाने हेतु कष्ट उठाता है, तो वह अवश्य ही उनके लिए लौटेगा और उनको अकेला नहीं छोड़ेगा l उन्हें अपने जीवन के विषय डरने और चिंता करने की ज़रूरत नहीं, चाहे पृथ्वी पर अथवा स्वर्ग में l

हमारा विश्वास है कि यीशु हमारे लिए घर बना रहा है; कि वह हमारे अन्दर अपना घर बनाता है (देखें यूहन्ना 14:23), और वह हमसे पहले हमारा स्वर्गिक घर बनाने गया है, हम उसके शब्दों से शांति और निश्चयता पाते हैं l हम किसी तरह के भौतिक घर में रहते हों, हम यीशु के हैं, उसका प्रेम हमें थामें है और हम उसकी शांति से घिरे हैं l उसके साथ, घर से अच्छी जगह कोई नहीं l

वह समझता और चिंता करता है

यह पूछने पर कि उसके विचार से क्या अज्ञानता और बेपरवाही आधुनिक समाज में समस्याएँ हैं, एक व्यक्ति ने मज़ाक किया, “मुझे नहीं मालुम और मुझे परवाह नहीं l”

मेरे विचार से अनेक निराश लोग आज संसार और लोगों के विषय ऐसा ही सोचते हैं l किन्तु जब बात होती है हमारे जीवन की परेशानियों और चिंताओं की, यीशु पूरी तरह समझता, और गहरी चिंता करता है l यशायाह 53, यीश के क्रूसीकरण का पुराने नियम का नबूवत, हमारे लिए यीशु की चिंता की एक झलक है l “वह सताया गया, तौभी वह [वध होनेवाली भेड़ की तरह] शांत रहा” (पद.7) l “मेरे ही लोगों के अपराधों के कारण उस पर मार पड़ी” (पद.8) l “यहोवा को यही भाया कि उसे कुचले; उसी ने उसको रोगी कर दिया; जब वह अपना प्राण दोषबलि करे, तब वह अपना वंश देखने पाएगा, वह बहुत दिन जीवित रहेगा; उसके हाथ से यहोवा की इच्छा पूरी हो जाएगी” (पद.10) l

यीशु ने क्रूस पर स्वेच्छा से हमारे पाप और दोष सह लिए l हमारे लिए हमारे प्रभु से अधिक कोई नहीं सहा l उसे मालूम था कि हमारे पापों से हमें बचाने में उसको क्या कीमत देनी होगी, और प्रेम में, उसने अपनी इच्छा से कीमत चुका दी (पद.4-6) l

मृत्यु से पुनरुत्थान के कारण यीशु, जीवित है और हमारे साथ उपस्थित है l कोई भी स्थिति हो, यीशु समझता और चिंता करता है l वह हमें लिए चलेगा l

प्रेम की कीमत

हमारे अपने माता-पिता को अलविदा कहते समय मेरी बेटी रोने लगी l नाना-नानी इंग्लैंड में हमलोगों से मिलकर अपने घर अमरीका जानेवाले थे l मैं नहीं चाहती वे जाएँ,” उसने कहा l मेरे उसको शांत करने पर, मेरे पति ने कहा, “मुझे डर है कि यही प्रेम की कीमत है l”

हम अपने प्रेमियों से अलगाव का दर्द महसूस कर सकते हैं, किन्तु क्रूस पर प्रेम की कीमत चुकाते समय यीशु ने चरम अलगाव महसूस किया l जो मानव और परमेश्वर दोनों ही था, यशायाह द्वारा 700 वर्ष पूर्व दी गई नबूवत को पूरा किया जब “उसने अपना प्राण मृत्यु के लिए उंडेल दिया” (यशायाह 53:12) l इस अध्याय में हम यीशु को दुखी पुरुष दर्शाने वाले सुस्पष्ट संकेतक पाते हैं, जैसे जब वह “हमारे ही अपराधों के कारण घायल किया गया” (पद.5), जो क्रूस पर उसके साथ हुआ और जब सिपाहियों ने उसके पंजर में भाला भोंका (यूहन्ना 19:34), और कि “उसके कोड़े खाने से हम लोग चंगे हो गए” (यशा.53:5) l

प्रेम के कारण, यीशु संसार में आया और बालक के रूप में जन्म लिया l प्रेम के कारण, उसने व्यवस्था के शिक्षक, भीड़, और सिपाहियों का दुर्व्यवहार सहा l प्रेम के कारण उसने दुःख उठाया और सिद्ध बलिदान के रूप में मरकर, पिता के समक्ष हमारे स्थान पर खड़ा हुआ l हम प्रेम के कारण जीते हैं l

क्रूस को याद रखें

मेरे चर्च में, वेदी के सामने एक बड़ा क्रूस है l यह मूल क्रूस का प्रतिक है जहाँ यीशु मरा था-हमारे पाप और उसकी पवित्रता का मिलन स्थान l परमेश्वर ने वहाँ पर हमारे मन, वचन और कर्म द्वारा किये गए प्रत्येक पाप के लिए अपने निर्दोष पुत्र को मृत्यु सहने दिया l क्रूस पर, यीशु ने उस कार्य को पूरा किया जो हमें मृत्यु से, जिसके लायक हम थे, बचा सकता था (रोमि.6:23) l

यीशु ने जो हमारे लिए सहा, क्रूस का दृश्य हमें उस पर विचार करने को विवश करता है l उसे कोड़े मारे गए और उस पर थूका गया l सिपाहियों ने उसके सिर पर मारा और घुटने टेक कर उसकी दिखावटी आराधना की l उससे उसकी मृत्यु के स्थान तक अपना क्रूस उठाने को कहा, किन्तु वह कोड़ों की मार से बहुत दुर्बल था l गुलगुता पर, उन्होंने उसे क्रूस पर लटके रहने के लिए उसके हाथों में कीलें ठोकर क्रूस को खड़ा कर दिया l क्रूस पर उसके घावों ने उसके देह का वजन सहा l छः घंटे बाद, यीशु ने अंतिम सांस ली (मरकुस 15:37) l एक सेनानायक यीशु की मृत्यु देखकर बोल पड़ा, “सचमुच यह मनुष्य, परमेश्वर का पुत्र था!” (पद.39) l 

अगली बार जब आप क्रूस का चिन्ह देखें, विचार करें कि आपके लिए उसका अर्थ क्या है l परमेश्वर पुत्र दुःख उठाकर वहाँ मरा और उसके बाद अनंत जीवन संभव बनाने के लिए पुनरुथित हुआ l

हमारे लिए त्यागा गया

क्या मित्र का निकट होना दर्द को सहनीय बनाता है? वर्जिनिया यूनिवर्सिटी के शोधकर्त्ताओं ने यह देखने के लिए इस पर दिलचस्प अध्ययन किया कि दर्द की सम्भावना में मस्तिष्क कैसी प्रतिक्रिया करता है, और क्या दर्द के भय का खुद सामना करने पर, एक अपरिचित का हाथ थामने पर, अथवा एक घनिष्ट मित्र का हाथ थामने पर भिन्न क्रिया करता है l

दर्जनों प्रयोग पश्चात शोधकर्त्ताओं को अनुकूल परिणाम मिले l आनेवाले दहशत में अकेला व्यक्ति अथवा किसी अपरिचित का हाथ थामे व्यक्ति में, मस्तिष्क का खतरा भापने वाला भाग सजग हो गया l किन्तु भरोसेमंद व्यक्ति का हाथ थामने पर, मस्तिष्क शांत हो गया l एक मित्र की उपस्थिति का सुख पीड़ा को सहनीय बना दिया l

गतसमनी के बगीचे में प्रार्थना करते समय यीशु को दिलासा चाहिए था l उसे मालुम था वह धोखा, गिरफ़्तारी, और मृत्यु सहनेवाला था l उसने अपने करीबी मित्रों से यह कहकर कि “मेरा जी बहुत उदास है” (मत्ती 26:38) उसके निकट रहकर प्रार्थना करने को कहा l किन्तु पतरस, याकूब, और यूहन्ना सोते रहे l

यीशु ने बगीचे में दिलासा के बगैर अकेले पीड़ा सही l किन्तु उसके पीड़ा सहने से, हम आश्वास्त हैं कि परमेश्वर हमें न छोड़ेगा और न त्यागेगा (इब्रा. 13:5) l हम परमेश्वर के प्रेम से अपने को कभी भी विरक्त नहीं पाएंगे (रोमि.8:39) l उसके सहचारिता से हमारे अन्दर और सहन शक्ति पैदा होती है l

अपने बाल खोल दें

यीशु के क्रूसित होने से कुछ पहले, मरियम नाम की स्त्री ने उसके पाँवों पर बहुमूल्य इत्र डालकर अपने बालों से उसको पोंछकर एक निर्भीक कार्य किया (यूहन्ना 12:3) l उसने केवल अपने जीवन की सम्पूर्ण बचत ही नहीं बल्कि अपना मान-मर्यादा भी न्योछावर कर दिया l प्रथम शताब्दी के मध्य-पूर्व संस्कृति में, शरीफ स्त्रियाँ सब के सामने अपने बाल नहीं खोलती थीं l किन्तु दूसरे हमारे विषय क्या सोचते हैं, सच्ची उपासना इसके विषय नहीं है (2 शमू. 6:21-22) l यीशु की आराधना में, मरियम ने खुद को लोगों के विचार में अशिष्ट, शायद अनैतिक भी मानने को तैयार थी l

हममें से कुछ लोग चर्च जाते समय सिद्ध बनने का तनाव महसूस करते हैं कि लोग हमारे विषय भला सोचेंगे l अलंकारिक रूप में, हम निश्चित करने के लिए मेहनत करते हैं कि सब कुछ यथास्थिति है l किन्तु एक स्वस्थ कलीसिया ऐसी जगह है जहाँ हम अपनी सभी रुकावटें हटा सकते हैं और सिद्धता के मुखौटा में हमें अपना दोष छिपाने की ज़रूरत नहीं है l चर्च में, हम सामर्थ्य पाने के लिए अपनी गलतियों को शक्तिशाली दर्शाने की जगह उसे प्रगट कर सकें l

मानो कुछ भी गलत नहीं, आराधना में ऐसा आचरण ठीक नहीं l यह पक्का करना है कि परमेश्वर और एक दूसरे के साथ सब कुछ सही है l जब अपनी कमजोरी बताना हमारा सबसे बड़ा भय हो, शायद उसे छुपाना सबसे बड़ा पाप हो सकता है l

क्यों क्षमा की जाएँ?

एक सहेली के मुझे धोखा देने के बाद, मुझे मालूम था कि मुझे उसे क्षमा करना है, किन्तु मैं आश्वस्त नहीं थी कि मैं कर पाऊँगी l उसके शब्द मुझको चुभ गए थे, और मैं दर्द और क्रोध से भरी हुयी थी l यद्यपि हमनें इसके विषय बातें कीं और मैंने उससे कहा कि मैं क्षमा कर चुकी हूँ, बहुत समय तक उसे देखने पर मैंने चोट का दर्द महसूस किया, इसलिए मैं जानती थी कि मेरे अन्दर कुछ नाराज़गी थी l एक दिन, हालाँकि, परमेश्वर ने मेरी प्रार्थना सुन ली और मुझे उसे छोड़ने की ताकत दी l आखिरकार मैं स्वतंत्र थी l

हमारे उद्धारकर्ता के साथ जो क्रूस पर मरते वक्त भी क्षमा दिया, क्षमा मसीही विश्वास का केंद्र है l यीशु ने उनको क्षमा किया जिन्होंने उसे क्रूसित किया, और पिता से उन्हें क्षमा करने को कहा l उसके अन्दर कड़वाहट अथवा क्रोध नहीं था, किन्तु उसने उसे दुःख पहुँचानेवालों पर अनुग्रह दिखाया और उनसे प्रेम किया l

यीशु के आदर्श का अनुसरण करते हुए अपने प्रभु के समक्ष किसी को भी जिन्होंने आपको चोट पहुँचाया है, क्षमा करने और उसका प्रेम दिखाने का यह ठीक समय है l जब हम परमेश्वर से उसकी आत्मा द्वारा क्षमा करने की मदद मांगेंगे, वह हमारी सहायता करेगा-चाहे हम क्षमा करने में अधिक समय लगाने की सोचते हैं l हमारे ऐसा करने पर, हम नहीं क्षमा करने के कैद से छूट जाएंगे l

हमारा परम मित्र

बारह वर्ष की उम्र में, मेरा परिवार मरुभूमि क्षेत्र के एक शहर में रहने लगा l अपने स्कूल में, गर्म हवा में जिम कक्षाओं के बाद, हम दौड़ कर पानी पीने नल के पास भागते थे l अपनी कक्षा में दुबला और छोटा, मुझे पंक्ति से बाहर धकेल दिया जाता था l अपनी उम्र से बड़ा और ताकतवर मेरा मित्र, जोस, यह होते देखकर अपना एक बाँह आगे करके मेरे लिए जगह बना दिया l “सुनो!” वह चिल्लाया, “ बैंक्स को पहले पीने दो!” उसके बाद मुझे पानी पीने में परेशानी नहीं हुयी l

सीमा से परे दूसरों की दयाहीनता सहना यीशु जानता था l बाइबिल हमसे कहती है, “वह तुच्छ जाना जाता और मनुष्यों का त्यागा हुआ था” (यशा.53:3) l किन्तु यीशु केवल दुःख पीड़ित नहीं था, वह पक्षसमर्थक भी है l अपना जीवन देकर, यीशु ने हमारे लिए परमेश्वर के साथ सम्बन्ध में प्रवेश हेतु “[नया] और [जीवता] मार्ग” खोल दिया है (इब्रानियों 10:19) l उसने हमारे लिए वह किया जिसमें हम अक्षम थे l अपने पापों से पश्चाताप कर उस पर भरोसा करके हम उसके द्वारा उद्धार का मुफ्त उपहार पा सकते हैं l

यीशु हमारा सर्वोत्तम मित्र है l उसने कहा, “जो कोई मेरे पास आएगा उसे मैं कभी न निकालूँगा” (यूहन्ना 6:37) l दूसरे हमें अपनी ताकत से संभालेंगे अथवा धकेल देंगे, किन्तु परमेश्वर ने क्रूस द्वारा हमारे लिए अपनी बाहें फैलायी है l हमारा उद्धारकर्ता कितना सामर्थी है!