सेवा हेतु उपस्थित
हमारी कलीसिया नए अगुओं को समर्पित करनेवाली थी l सेवक-अगुआ के प्रतीक को बताने के लिए, कलीसिया के प्राचीनों ने पाँव धोने के यादगार क्षण में भागीदारी की l प्रत्येक अगुआ-पासवान के साथ-मण्डली की उपस्थिति में एक दूसरे के पाँव धोए l
उस दिन प्राचीनों द्वारा किये गए कार्य को यीशु ने हमारे लिए नमूना के तौर पर किया था, जैसे कि यूहन्ना 13 में वर्णित है l उस घटना में, जिसे अंतिम भोज कहा जाता है, यीशु ने “भोजन पर से उठकर ... बर्तन में पानी भरकर चेलों के पाँव धोने ... लगा” (यूहन्ना 13:4-5) l बाद में, यीशु अपने शिष्यों को इसका कारण बताते हुए कहा, “दास अपने स्वामी से बड़ा नहीं, और न भेजा हुआ अपने भेज्नेवेवाले से” (पद.16) l उसने यह भी कहा, “मैं तुम्हारे बीच में सेवक के समान हूँ” (लूका 22:27) l
यदि ऐसा छोटा काम यीशु की गरिमा से निम्न नहीं है, तो दूसरों की सेवा हमारे लिए भी निम्न नहीं है l उसने हमारे सामने कितना अद्भुत उदाहरण रखा l वास्तव में, वह “इसलिए नहीं आया कि उसकी सेवा टहल की जाए, पर इसलिए आया कि आप सेवा टहल करे” (मरकुस 10:45) l उसने हमें दिखाया कि एक अगुआ और एक सेवक होना क्या है l यह यीशु है, जो सेवा करता है l
संगीत समारोह में बजाना
हमारी पौत्री के स्कूल बैंड संगीत गोष्ठी, में 11 और 12 वर्ष के बच्चों को एक साथ ख़ूबसूरती से बजाते देख मैं प्रभावित हुआ l हर एक अकेले प्रदर्शित करके उपलब्धि प्राप्त नहीं कर सकते थे जो उन्होंने साथ मिलकर किया l सभी साजों ने अपनी भागीदारी निभायी और परिणाम था मधुर संगीत!
रोमियों को पौलुस ने लिखा, “हम जो बहुत हैं, मसीह में एक देह होकर आपस में एक दूसरे के अंग हैं l जबकि उस अनुग्रह के अनुसार जो हमें दिया गया है, हमें भिन्न-भिन्न वरदान मिले हैं” (रोमियों 12:5-6) l पौलुस द्वारा वर्णित वरदानों में भविष्यवाणी, सेवा, सिखाना, उपदेश देना, दान देना, अगुवाई, उत्साहित करना और दया है (पद.7-8) l प्रत्येक वरदान हर एक के लाभ के लिए स्वतंत्र रूप से उपयोग किया जाए (1 कुरिं. 12:7) l
संगीत मण्डली में की एक परिभाषा है “बनावट अथवा योजना में सहमति; संयुक्त क्रिया; तालमेल अथवा सामंजस्य l” यीशु मसीह द्वारा हम जो उसकी संतान हैं, के लिए प्रभु की योजना यही है l “भाईचारे के प्रेम से एक दूसरे से स्नेह रखो; परस्पर आदर करने में एक दूसरे से बढ़ चलो” (पद.10) l लक्ष्य सहभागिता है, प्रतियोगिता नहीं l
एक अर्थ में, हम प्रतिदिन देखनेवाले और सुननेवाले संसार के “मंच पर हैं l” परमेश्वर की संगीत मण्डली में कोई अकेला गायक नहीं है, किन्तु सभी वाद्य विशेष हैं l हम दूसरों के साथ एकता में अपने योगदान देकर संगीत को सर्वोत्तम बनाते हैं l
ख़ामोशी
सहायता ट्रकों के गाँव की टूटी झोपड़ियां हटाते समय चूज़े भागने लगे l नंगे पाँव बच्चे घूरते रहे l बारिश से उजड़ी “सड़क” पर यातायात कम थी l
अचानक, काफिले ने दीवारों से घिरी मेयर का बड़ा मकान देखा जो खाली था l लोगों के पास बुनियादी ज़रूरतें नहीं थीं जबकि वह दूर शहर में आलिशान मकान में रहता था l
ऐसा अन्याय हमें क्रोधित करता है, जिससे परमेश्वर का नबी भी क्रोधित हुआ l व्यापक शोषण देखकर हबक्कूक ने कहा, “हे यहोवा, मैं कब तक तेरी दोहाई देता रहूँगा, और तू न सुनेगा?” (हबक्कूक 1:2) l किन्तु परमेश्वर ने ध्यान देकर कहा, “हाय उस पर जो पराया धन छीन छीनकर धनवान हो जाता है? ... जो अपने घर के लिए अन्याय के लाभ का लोभी है” (2:6, 9) l न्याय निकट है!
हम दूसरों पर परमेश्वर का न्याय चाहते हैं, किन्तु हबक्कूक की एक मुख्य बात हमें रोकती है : “यहोवा अपने पवित्र मंदिर में है; समस्त पृथ्वी उसके सामने शांत रहे” (2:20) l समस्त पृथ्वी l शोषित और उत्पीड़क l कभी-कभी परमेश्वर की प्रत्यक्ष खामोशी का उचित प्रतिउत्तर ... ख़ामोशी है!
ख़ामोशी क्यों? क्योंकि हम अपनी आत्मिक दरिद्रता नहीं देखते l हम ख़ामोशी में पवित्र परमेश्वर के सामने अपने पाप देख सकेंगे l
हबक्कूक की तरह हम भी परमेश्वर पर भरोसा सीखें l हम उसके सब मार्ग नहीं जानते, किन्तु जानते हैं कि वह भला है l सब कुछ उसके नियंत्रण और समय में है l
थोड़ा सुख बांटना
एक सहेली ने घर में बने मिट्टी के बर्तन भेजे l आते समय बहुमूल्य चीजें टूट गईं l एक कप के कुछ बड़े टुकड़े, और टुकड़े और मिट्टी की ढेर l
मेरे पति ने टुकड़ों को जोड़ दिया l मैंने इस जुड़े हुए खूबसूरत कप को सजा दिया l इस छिद्रित-जोड़े हुए मिट्टी के बर्तन समान, मेरे दाग़ भी प्रमाण हैं कि परमेश्वर मुझे कठिन समय से निकाला है, फिर भी मैं मजबूती से खड़ी हो सकती हूँ l सुख का वह प्याला याद दिलाता है कि मेरे जीवन में और मेरे जीवन के द्वारा परमेश्वर का काम दूसरों को उनके दुःख में सहायता पहुँचाती है l
प्रेरित पौलुस परमेश्वर की प्रशंसा करता हैं क्योंकि वह “दया का पिता और सब प्रकार की शांति का परमेश्वर है” (2 कुरिं. 1:3) l प्रभु हमारे आजमाइशों और दुखों का उपयोग हमें अपने समान बनाने के लिए करता है l हमारे दुखों में उसकी सांत्वना से हम दूसरों को बताते हैं कि उसने हमारी ज़रूरतें कैसे पूरी की हैं (पद.4) l
मसीह के दुखों पर विचार करके, हम अपने दुखों में दृढ़ रहकर, भरोसेमंद हैं कि परमेश्वर हमारे अनुभवों से हमें और दूसरों को धीरजवंत धैर हेतु सामर्थी बनाता है (पद.5-7) l पौलुस की तरह, हम सुख पाते हैं कि प्रभु हमारे संघर्षों को अपनी महिमा के लिए उपयोग करता है l हम उसकी सांत्वना के भागीदार होकर पीड़ितों के लिए आश्वासन भरी आशा ला सकते हैं l
मुस्कराने का कारण
कार्यस्थल में उत्साहवर्धक शब्द अर्थपूर्ण होते हैं l कार्यकर्ताओं का परस्पर संवाद ग्राहक की संतुष्टि, कंपनी का लाभ, और सहकर्मी के मुल्यांकन को प्रभावित करता है l अध्ययन अनुसार सबसे प्रभावशाली कार्य समूहों के सदस्य एक दूसरे को अस्वीकृति, असहमति, अथवा कटाक्ष के बदले छः गुना अधिक समर्थन देते हैं l
पौलुस ने अनुभव से संबंधों और परिणामों को आकार देने में शब्दों के महत्त्व को सीखा l दमिश्क के मार्ग पर मसीह से मुलाकात से पहले, उसके शब्द और कार्य यीशु के अनुयायियों को आतंकित करते थे l किन्तु थिस्सलुनीकियों को पत्री लिखने तक, उसके हृदय में परमेश्वर के काम से वह महान उत्साहित करनेवाला बन गया था l अब वह अपने नमूने से अपने पाठकों को परस्पर उत्साहित करने का आग्रह किया l चापलूसी से सावधान रहते हुए, उसने दूसरों को स्वीकार करने और मसीह की आत्मा को प्रतिबिंबित करना दिखाया l
इस प्रक्रिया में, पौलुस अपने पाठकों को उत्साहवर्धन का श्रोत बताता है l उसने पाया कि अपने को परमेश्वर को सौंपने से, जो हमसे प्रयाप्त प्रेम करके क्रूस पर मरकर, हमें सुख देने, क्षमा करने और प्रेरित करने, और परस्पर प्रेम भरी चुनौती देने का कारण देता है (1 थिस्स. 5:10-11) l
पौलुस हमें बताता है कि परस्पर उत्साहित करना परस्पर परमेश्वर का धीरज और भलाई का स्वाद चखने का एक मार्ग है l
परमेश्वर द्वारा मार्गदर्शित
कुछ माह पूर्व मुझे एक ई-मेल द्वारा “मार्गदर्शित लोगों” के समाज का सदस्य बनने का निमंत्रण मिला l मैंने जाना कि मार्गदर्शित शब्द का अर्थ है, लक्ष्य प्राप्ति हेतु परिश्रम करनेवाला उच्च प्रेरित व्यक्ति l
क्या मार्गदर्शित व्यक्ति होना अच्छा है? एक अचूक जांच है : “परमेश्वर की महिमा के लिए सब कुछ करें” (1 कुरिं. 10:31) l कितनी बार हम अपने गौरव के लिए करते हैं l नूह के दिनों में जल-प्रलय पश्चात, लोगों का एक समूह “[अपने नाम] के लिए एक गुम्मट बनाना चाहा (उत्प.11:4) l वे प्रसिद्धि चाहते थे और वे संसार में फैलना नहीं चाहते थे l इसलिए कि वे परमेश्वर की महिमा के विरुद्ध कर रहे थे, भले ही, उनको गलती से मार्गदर्शित किया गया l
इसके विपरीत, जब राजा सुलेमान ने वाचा का संदूक और नया निर्मित मंदिर समर्पित किया, उसने कहा, “मैं [ने] ... परमेश्वर यहोवा के नाम से इस भवन को बनाया है” (1 राजा 8:20) l तब उसने प्रार्थना की, “वह हमारे मन अपनी ओर ऐसा फिराए रखे कि हम उसके सब मार्गों पर चला करें” (1 राजा 8:58) l
जब हमारी महानतम इच्छा परमेश्वर की महिमा और उसकी आज्ञाकारिता है, हम मार्गदर्शित, आत्मा की अगुवाई में उसके प्रेम के खोजी और उसकी सेवा करनेवाले होते हैं l हम सुलेमान की प्रार्थना करें, हमारे “मन हमारे परमेश्वर यहोवा की ओर ... लगा रहे, कि ... [हम] उसकी विधियों पर चलते और उसकी आज्ञाएँ मानते [रहें]” (पद.61) l
एक सिद्ध पिता
मेरे पिता ने एक बार मेरे सामने स्वीकार किया, “जब तुम उम्र में बढ़ रहे थे, मैं बहुत बार घर पर नहीं होता था l”
मुझे यह याद नहीं l अपनी पूर्ण-कालिक सेवा के अलावा, वे चर्च संगीत मण्डली की अगुवाई करने, और कभी-कभी पुरुषों के चार लोगों के गायन समूह के साथ एक-दो सप्ताह के लिए बाहर जाते थे l किन्तु वे मेरे समस्त ख़ास पलों में (और अनेक छोटे पलों में) उपस्थित रहते थे l
जैसे, आठ वर्ष की आयु में, मुझे एक दोपहर स्कूल में एक छोटी भूमिका निभानी थी l सभी माताएँ आयीं, किन्तु केवल मेरे पिता l अनेक छोटे तरीकों से, उन्होंने हम बच्चों को जताया कि हम उनके लिए विशेष हैं और वे हमसे प्यार करते हैं l और उन्होंने माँ के अंतिम दिनों में कोमलता से उनकी सेवा करके स्वार्थहीन प्रेम प्रगट किया l पिता सिद्ध नहीं हैं, किन्तु उन्होंने मुझे हमेशा मेरे स्वर्गिक पिता की अच्छी झलक प्रस्तुत की है l और आदर्श रूप से, एक मसीही पिता को ऐसा ही करना चाहिए l
कभी-कभी सांसारिक पिता अपने बच्चों को निराश करते अथवा पीड़ित करते हैं l किन्तु हमारा स्वर्गिक पिता “दयालु और अनुग्रहकारी, विलम्ब से कोप करनेवाला और अति करुणामय है” (भजन 103:8) l प्रेम करनेवाले पिता अपने बच्चों को ताड़ना, सुख, निर्देश देकर, और प्रावधान करके, हमारे सिद्ध स्वर्गिक पिता का नमूना प्रस्तुत करते हैं l
मिलकर समय बिताना
एक परिजन के विवाह से कार में लौटते समय दो घंटे की यात्रा में, मेरी माँ तीन बार मुझसे पूछी कि मेरे काम में नया क्या है l मैं उनको कुछ ख़ास बातें बतायीं जैसे मैं पहली बार बता रही थी, जबकि सोचती रही कि मेरे कौन से शब्द संभवतः यादगार बन सकते हैं l मेरी माँ स्मरण शक्ति नष्ट करनेवाली मानसिक रोग से पीड़ित है, जो गंभीर रूप से व्यवहार को प्रभावित करके बोलचाल की शक्ति के साथ और भी हानि कर सकता है l
माँ की बीमारी पर मैं दुखित होती हूँ किन्तु मैं उनके जीवित रहने और हमारे साथ समय बिताने और बात करने के लिए धन्यवादित हूँ l मैं उनसे मिलकर उत्तेजित होती हूँ क्योंकि वह आनंदित होकर कहती है, “एलिसन, कितना खूबसूरत आश्चर्य!” हम एक दूसरे की संगति का आनंद लेते हैं और उनकी खामोशी में भी, संगति करते हैं l
यह परमेश्वर के साथ हमारे सम्बन्ध की छोटी तस्वीर है l बाइबिल हमें बताती है, “यहोवा अपने डरवैयों ही से प्रसन्न होता है, अर्थात् उन से जो उसकी करुणा की आशा लगाए रहते हैं" (भजन 147:11) l परमेश्वर यीशु को अपना उद्धारकर्ता माननेवालों को अपनी संतान कहता है (यूहन्ना 1:12) l और यद्यपि हम शब्दों की कमी के कारण बार-बार वे ही निवेदन करते हैं, वह धीरजवंत है क्योंकि वह हमसे प्रेम सम्बन्ध रखता है l उससे प्रार्थना में शब्दों की कमी में भी वह खुश होता है l
जीवित किये गए
मेरे पिता अपने युवावस्था में मित्रों के एक समूह के साथ शहर के बाहर एक स्पोर्ट्स कार्यक्रम में जा रहे थे जब उनकी कार के पहिये गीली सड़क पर फिसल गए l उनके साथ गंभीर दुर्घटना हुई l एक मित्र को पक्षघात हो गया और दूसरे की मृत्यु l मेरे पिता को मृत घोषित करके लाश-घर में रख दिया गया l उनके स्तंभित और शोक-संतप्त माता-पिता उन्हें पहचानने पहुँचे l किन्तु मेरे पिता उस गहरे कोमा से वापस पुनर्जीवित हो गए l उनका विलाप आनंद में बदल गया l
इफिसियों 2 में, प्रेरित पौलुस हमें याद दिलाता है कि मसीह से अलग हम “अपने अपराधों और पापों के कारण मरे हुए थे” (पद.1) l किन्तु हमारे लिए उसके महान प्रेम के कारण, “परमेश्वर ने जो दया का धनी है, ... जब हम अपराधों के कारण मरे हुए थे तो हमें मसीह के साथ जिलाया” (पद.4-5) l मसीह के द्वारा हमें मृत्यु से जीवन में लाया गया है l
तो एक भाव में, हम सभों के जीवन का श्रोत स्वर्गिक परमेश्वर है l उसके महान प्रेम के द्वारा, उसने उनको जो पापों में मृत थे उसके पुत्र के द्वारा जीवन और उद्देश्य को संभव किया l