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एक भी गौरैया नहीं

अपने सम्पूर्ण जीवन में ओजस्वी और अनुशासित, मेरी माँ, अपनी उम्र के कारण इस समय एक मरणासन्न रोगियों के अस्पताल में है l श्वास के लिए तड़पती हुई, उनकी गिरती स्थिति उनकी खिड़की के बाहर लुभावना सुन्दर वसंत के दिन के विपरीत थी  l

संसार में समस्त भावनात्मक तैयारियाँ अलविदा के अटल सत्य के लिए हमें समुचित तौर से तैयार नहीं कर सकती l मृत्यु कितना बड़ा अनादर है!  मुझे ख्याल आया l

मैंने खिड़की के बाहर पक्षियों के दाने के बर्तन को देखा l एक छोटी चिड़िया दाना खाने आई l शीघ्र ही एक परिचित वाक्यांश मैंने याद किया : “तुम्हारे पिता की इच्छा के बिना उनमें से एक भी भूमि पर नहीं गिर सकती” (मत्ती 10:29) l यीशु ने यह आज्ञा यहूदिया के एक मिशन पर अपने चेलों को दी, किन्तु यह सिद्धांत आज हम पर भी लागू है l “तुम गौरैयों से बढ़कर हो” (पद.31) l

मेरी माँ द्रवित होकर ऑंखें खोली l अपने बचपन को याद करके अपनी माँ के लिए हॉलैंड में प्रयुक्त प्रेम शब्द द्वारा बताया, “मुती मर गयी!”

“हाँ,” मेरी पत्नी सहमत थी l “वह यीशु के साथ है l” अनिश्चित, माँ ने आगे कहा l “और जोइस और जिम?” उसने अपनी बहन और भाई के विषय पूछी l “हाँ, वे भी यीशु के साथ हैं l “किन्तु हम भी शीघ्र उनके साथ होंगे!”

“इंतज़ार करना कठिन है,” माँ ने धीरे से कहा l

दुष्क्रियात्मक

शब्द दुष्क्रियात्मक  अक्सर व्यक्तियों, परिवारों, संबंधों, संस्थाओं, और सरकारों को परिभाषित करने में उपयोग होता है l जबकि क्रियात्मक  का अर्थ है, उचित क्रियाशील  व्यवस्था में होना, दुष्क्रियात्मक  इसका विपरीत है-टूटा हुआ, ठीक से कार्य नहीं कर रहा, अपने बनाए जाने के मकसद को पूरा नहीं कर रहा l

रोमियों की अपनी पत्री में पौलुस आत्मिक दुष्क्रियात्मक मानवता का वर्णन करना आरम्भ करता है (1:18-32) l हम सब उस विद्रोही समूह के हैं : “सब भटक गए हैं, सब के सब निकम्मे बन गए हैं; कोई भलाई करने वाला नहीं, एक भी नहीं ... इसलिए कि सब ने पाप किया है और परमेश्वर की महिमा से रहित हैं” (3:12,23) l

सुसमाचार है कि “[सब] उसके अनुग्रह से उस छुटकारे के द्वारा जो मसीह यीशु में है, सेंत-मेंत धर्मी ठहराए जाते हैं ... जो विश्वास करने से कार्यकारी होता है” (पद.24-25) l जब हम अपने जीवनों में मसीह को आमंत्रित करके परमेश्वर की क्षमा और नए जीवन की पेशकश स्वीकारते हैं, हम उसकी इच्छानुकूल व्यक्ति बनते हैं l हम तुरंत सिद्ध नहीं बनते, किन्तु अब हमें टूटा और दुष्क्रियात्मक रहने की ज़रूरत नहीं l

हम परमेश्वर के आदर हेतु अपने वचन और कार्य में पवित्र आत्मा द्वारा दैनिक सामर्थ्य पाते हैं और “पुराने मनुष्यत्व [को] उतारकर ... नए मनुष्यत्व को पहिन [लेते हैं] जो परमेश्वर के अनुरूप सत्य की धार्मिकता और पवित्रता में सृजा गया है” (इफि. 4:22-24) l

कठिनाई से निकलना

मैं उथले पानी में प्रथम रबर नौकायन अनुभव का आनंद ले रहा था-जब मुझे आगे तीव्र धारा की गर्जन सुनाई दी l एक ही समय में मेरी भावनाओं में अनिश्चितता, भय, और असुरक्षा भर गया l और तब, अचानक, वे समाप्त हो गए l गाईड ने नौका को पार कर दिया l मैं सुरक्षित था-कम-से-कम अगली तीव्र धारा तक l

जीवन में परिवर्तनकाल उथले पानी के अनुभव की तरह हो सकता है l जीवन के एक काल से अगले काल तक की अपरिहार्य छलाँगें-कॉलेज से जीविका, कार्यों में परिवर्तन, माता-पिता के संग रहने के बाद अकेले रहना अथवा जीवन साथी के साथ रहना, आजीविका से सेवा निवृति, युवावस्था से वृद्धावस्था-सब अनिश्चितता और असुरक्षा द्वारा चिन्हित हैं l

पुराने नियम के इतिहास के एक सबसे प्रमुख परिवर्तनकाल में, सुलेमान अपने पिता दाऊद से विरासत में सिंहासन प्राप्त करता है l मैं मानता हूँ कि वह भविष्य के विषय असुरक्षा से भरा होगा l उसके पिता की सलाह? “हियाव बाँध और दृढ़ होकर इस काम में लग जा ... क्योंकि यहोवा परमेश्वर जो मेरा परमेश्वर है, वह तेरे संग है” (1 इतिहास 28:20) l

हम सब को जीवन में कठिन परिवर्तानकाल से गुज़ारना होगा l किन्तु हम नौका में परमेश्वर के साथ अकेले नहीं हैं l अपनी निगाहें नौका चलनेवाले पर रखने से आनंद और सुरक्षा मिलती है l उसने पहले बहुतों को पार उतारा है l

ईर्ष्या का इलाज

मैं माता-पिता के शाम के बाहर जाने पर ख़ुशी से बच्चों की देखभाल करने हेतु सहमत हुई l उनको गले लगाकर मैंने लड़कों से उनके सप्ताहांत का अनुभव पुछा l (दोनों के अलग-अलग अनुभव थे l) तीन वर्षीय, ब्रिजर ने एक सांस में अपने अंकल और आंटी के संग एक रात बिताना, आइसक्रीम, हिंडोला में झुलना और एक फिल्म देखने का अनुभव बताया! पाँच वर्षीय सैमुएल ने कहा, “कैम्पिंग l” मैंने पुछा, “मजा आया?” “ज्यादा नहीं,” उसने दयनीय भाव में उत्तर दिया l

सैमुएल ने ईर्ष्या का पुराना भाव अनुभव किया l वह अपने भाई के उत्साहित होकर सप्ताहांत का अनुभव सुनते वक्त अपने पिता के साथ कैम्पिंग का आनंद भूल गया l

हम सब ईर्ष्या का शिकार होते हैं l राजा शाऊल दाऊद की प्रशंसा सुनकर ईर्ष्या के दानव से हार मान लिया : “शाऊल ने तो हज़ारों को, परन्तु दाऊद ने लाखों को मारा है” (1 शमूएल 18:7) l शाऊल क्रोधित होकर “उस दिन से दाऊद की ताक में लगा रहा” (1 शमूएल 18:9) l  वह चिढ़कर दाऊद को मारना चाहा!

तुलना खेल मूर्ख और आत्म-घाती है l दूसरों के पास जो है वह हमारे पास नहीं है अथवा हमसे भिन्न अनुभव l किन्तु परमेश्वर ने हमें अनेक आशीषें, जिसमें पृथ्वी पर जीवन और सभी विश्वास करनेवालों के साथ अनंत जीवन की प्रतिज्ञा दी है l हम उसकी सहायता पर निर्भर होकर और धन्यवादी मन से उस पर केन्द्रित रहकर ईर्ष्या पर विजयी हो सकते हैं l

एक जैसा

उनका कहना है, हम सब में वह है : कुछ लोग उसे Doppelgangers कहते हैं l एक जैसा l शायद हमसे असम्बद्ध लोग जो बहुत हद तक हमारे जैसा दिखाई देते हैं l

मेरी तरह दिखाई देने वाला संगीत के क्षेत्र में है l उसके एक समारोह में जाने पर, मध्यांतर के समय मुझे अनेक प्रशंसकों से हास्य प्रतिक्रियाएं मिलीं l किन्तु अफ़सोस, जब गाने और गिटार बजाने की बात होती है, मैं जेम्स टेलर नहीं हूँ l हम केवल एक जैसे दिखाई देते हैं l

आप किस की तरह दिखाई देते हैं? इस प्रश्न पर विचार करते हुए आप, 2 कुरिन्थिन्यों 3:18 पर चिंतन करें, जहाँ पौलुस हमें बताता है कि हम [प्रभु] के रूप में रूपांतरित होते जा रहे हैं l” अपने जीवनों में प्रभु को आदर देते हुए, हमारा एक लक्ष्य उसके स्वरुप को धारण करना है l अवश्य ही, इसका अर्थ दाढ़ी रखना और सैंडल पहनना नहीं है-इसका अर्थ है कि पवित्र आत्मा मसीह के चरित्र को हमारे जीवनों में प्रगट करने में सहायता करता है l उदाहरणार्थ, आचरण में (दीनता), चरित्र में(प्रेम), और दयालुता में(साथ हो लेने), हमें यीशु की तरह दिखाई देना और उसका अनुकरण करना है l

अपनी आँखों को यीशु की ओर लगाकर “प्रभु की महिमा पर विचारते हुए,” हम उसकी तरह और बनते जाते हैं l कितना अद्भुत होता यदि लोग हमें देखकर कहते, “मैं तुममें यीशु को देखता हूँ”!

परमेश्वर का बचाव

कार पर लगे परमेश्वर विरोधी स्टिकर्स ने विश्विविद्यालय व्याख्याता का ध्यान अपनी ओर खींचा l पूर्व में खुद एक नास्तिक, उसने सोचा कि शायद कार-मालिक विश्वासियों को क्रोध दिला रहा था l “क्रोध नास्तिक को अपनी नास्तिकता प्रमाणित करने में मदद करता है,” उसने समझाया l तब उसने चिताया, “अक्सर, नास्तिक अपनी इच्छा पा लेता है l”

अपनी विश्वास यात्रा में, उसने एक मसीही मित्र की दिलचस्पी याद की जिसने उसे मसीह की सच्चाई बतायी l उसके मित्र के “आग्रह भाव में क्रोध नहीं था l” वह उस दिन प्राप्त वास्तविक आदर और शिष्टता भूल नहीं सकता l

विश्वासी दूसरों द्वारा मसीह के अपमान को अनादर मानते हैं l किन्तु यीशु  को वह इन्कार कैसा लगता है? यीशु ने हमेशा धमकियां, और घृणा सही, किन्तु अपने ईश्वरत्व पर शक  नहीं किया l एक बार, एक गाँव के इन्कार करने पर, याकूब और यूहन्ना ने तुरंत विरोध किया, “हे प्रभु, क्या ...  हम आज्ञा दें, कि आकाश से आग गिरकर उन्हें भस्म कर दे?” (लूका 9:54) l यीशु ने “फिरकर उन्हें डांटा” (पद.5) l आखिरकार, “परमेश्वर ने अपने पुत्र को जगत में इसलिए नहीं भेजा कि जगत पर दंड की आज्ञा दे, परन्तु ... जगत उसके द्वारा उद्धार पाए” (यूहन्ना 3:17) l

हम चकित होंगे कि परमेश्वर नहीं चाहता हम उसका बचाव करें l उसकी इच्छा है कि हम उसके प्रतीक  बनें! इसमें समय, मेहनत, संयम, और प्रेम ज़रूरी है l

आँखें झपकाकर परमेश्वर के विषय विचार करें

मेरे मित्र राईली ने कहा, “परमेश्वर पलक समान है” और मैंने आश्चर्य से पलक झपकाया l  उसके कहने का क्या अर्थ था?

मुझे और बताइये,” मैं कहा l मिलकर, हमदोनों परमेश्वर के आश्चर्यजनक चित्रों का अध्ययन कर रहे थे, जैसे परमेश्वर एक जच्चा (यशा. 42:14) या मधुमक्खी पालक की तरह(7:18), किन्तु यह तो मेरे लिए नयी बात थी l राईली ने व्यवस्थाविवरण 32 की ओर इंगित की, जहाँ मूसा लोगों की देखभाल करने में परमेश्वर के तरीके की प्रशंसा करता है l पद 10 कहता है कि परमेश्वर अपने लोगों के चारों ओर रहकर उनकी रक्षा करता है, और अपनी आँख की पुतली के सामान उनकी सुधि लेता है l

और पुतली की रक्षा कौन करता है? जी हाँ, पलक! परमेश्वर पलक की तरह है, जो सहजज्ञान से कोमल आँख की सुरक्षा करता है l पलक आख को खतरे से बचाता है, और गंदगी और धूल को दूर रखता है l यह पसीने को दूर रखकर, आँख के गोले को चिकना रखता है l यह बंद होकर आँख को आराम देता है l

परमेश्वर को पलक की तरह देखते हुए, मैंने परमेश्वर को उन सभी अलंकारों के लिए धन्यवाद दिया जो उसने हमें उसके प्रेम को समझने के लिए दिये हैं l हमारी आँखों के रात में बंद होने और सूबह खुलने पर, हम हमारे प्रति सुरक्षा और देखभाल पर विचारकार परमेश्वर को धन्यवाद दे सकते हैं l

परमेश्वर को देखना

व्यंग-चित्र कलाकार,  सार्वजनिक स्थानों में अपने चित्र-फलक लगाकर उन लोगों का चित्र बनाते हैं जो अपने हास्यपद-चित्र के लिए ठीक कीमत देने के इच्छुक है l ये चित्र हमें आनंद देते हैं क्योंकि ये हमारे भौतिक मुखाकृति के किसी एक या अनेक भाग को इस तरह  बढ़ाकर दिखाते हैं जो पहचान जाता है किन्तु हास्यकर होता है l

अपितु परमेश्वर के व्यंग-चित्र, हास्यकर नहीं l उसके किसी गुण को बढ़ाने से उसका विकृत छवि दिखता है जिसे लोग सरलता से नकार देते हैं l व्यंग-चित्र की तरह, परमेश्वर का एक विकृत छवि गंभीरता से स्वीकारा नहीं जाता l परमेश्वर को क्रोधित और रौब जमानेवाले न्यायी के रूप में देखनेवाले लोग सरलता से करुणा को प्रमुखता देनेवाले की ओर उन्मुख होते हैं l उसे दयालु दादा के रूप में देखनेवाले लोग न्याय की आवश्यकता के समय उस छवि को नकार देंगे l उसे जीवित, प्रेमी व्यक्तित्व की अपेक्षा उसे बौद्धिक विचार माननेवाले लोगों के लिए आख़िरकार दूसरे और विचार चिताकर्षक होंगे l उसे परम मित्र के रूप में देखनेवाले अधिक पसंदीदा मानवीय मित्र मिलने पर उसे पीछे छोड़ देते हैं l

परमेश्वर खुद को करुणामय और अनुग्रहकारी घोषित करता है, किन्तु दोषी को दण्डित करता है (निर्ग. 34:6-7) l

अपने विश्वास को कार्य रूप देते समय, हमें परमेश्वर में केवल पसंदीदा गुण नहीं दिखने चाहिए l हम परमेश्वर को सम्पूर्ण मानकर उपासना करें, केवल जो हमें पसंद है उसकी नहीं l

मार्ग ढूँढना

कैलिफोर्निया, सैंटा बारबरा, शहर में कुतूहल उत्पन्न करनेवाली एक सड़क है l उसका नाम है “सैल्सिप्युडेस,” अर्थात् “छोड़ सकते हो तो छोड़ दो l” सड़क के नामकरण के वक्त, वह क्षेत्र दलदल के किनारे था और कभी-कभी बाढ़ आती थी, और स्पेनी-भाषी नगर आयोजकों ने ठिकाने को सरल नाम देकर लोगों को उससे दूर रहने को चिताया l

परमेश्वर का वचन हमें पाप और परीक्षा के “गलत मार्ग” से दूर रहने को कहता है : “उसे छोड़ दे, उसके पास से भी न चल, उसके निकट से मुड़कर आगे बढ़ जा” (नीतिवचन 4:15) l किन्तु वचन केवल यह नहीं कहता “छोड़ सकते हो तो छोड़ दो l”वह हमें आश्वस्त करके सही मार्ग पर ले जाता है : “परमेश्वर सच्चा है और वह तुम्हें सामर्थ्य से बाहर परीक्षा में न पड़ने देगा, वरन् परीक्षा के साथ निकास भी करेगा कि तुम सह सको” (1 कुरिं. 10:13) l

प्रतिज्ञा कि परमेश्वर हमें सामर्थ्य से बाहर परीक्षा में नहीं पड़ने देगा एक उत्साहवर्धक  ताकीद है l परीक्षा के समय परमेश्वर की ओर मुड़ते समय, हमें मालुम है कि वह हमें उससे दूर रखना चाहता है l

बाइबिल बताती है कि यीशु “हमारी निर्बलताओं में हमारे साथ दुखी” होता है l” किन्तु वह “सब बातों में हमारे समान परखा तो गया, तौभी निष्पाप निकला” (इब्र.4:15) यीशु हर परीक्षा से निकलने का हल जानता है l उसकी ओर मुड़ने से वह हमें दिखाएगा l