क्या मैं महत्वपूर्ण हूँ?
मैं एक सुपर-मार्किट में भुगतान करने खड़ा चारों-ओर देख रहा हूँ l मैं सर मुंडाए और नाक में नथ पहने किशोरों को अल्पाहार/स्नैक लेते, एक युवा व्यवसायी को एक टिक्का, कुछ नागदौन की टहनियां, और शकरकंद खरीदते देखता हूँ; एक बुज़ुर्ग स्त्री आड़ू और स्ट्रॉबेरी देख रही है l क्या परमेश्वर नाम से इनको जानता है? क्या ये लोग उसके लिए महत्वपूर्ण हैं?
सारी सृष्टि के परमेश्वर ने मनुष्य को बनाया, और हम उसके व्यक्तिगत ध्यान और प्रेम के योग्य हैं l परमेश्वर ने उस प्रेम को व्यक्तिगत रूप से इस्राएल के बदसूरत पहाड़ी और आखिरकार क्रूस पर दिखाया l
जब यीशु दास बनकर पृथ्वी पर आया, उसने दर्शाया कि परमेश्वर का हाथ संसार के सबसे छोटे व्यक्ति के लिए बहुत शेखी मारनेवाला नहीं है l उस हाथ में हमारे व्यक्तिगत नाम खुदे हैं और घाव हैं, हमसे अत्यधिक प्रेम के लिए परमेश्वर द्वारा चुकाई हुई कीमत l
अब, जब मैं खुद को आत्म-ग्लानी, अकेलेपन के दर्द से अभिभूत पाता हूँ, जो अय्यूब और सभोपदेशक की पुस्तक में खूबसूरती से वर्णित है, मैं सुसमाचार में यीशु की कहानियों और कार्यों की ओर मुड़ता हूँ l यदि मैं इस निश्चय पर पहुँचता हूँ कि मेरा अस्तित्व “धरती पर” परमेश्वर के लिए अर्थहीन है, मैं परमेश्वर के इस धरती पर आने के मुख्य कारण का विरोधी हूँ l निश्चित तौर पर क्या मैं महत्वपूर्ण हूँ? प्रश्न का उत्तर यीशु है l
अब सब एक मन
ऑस्ट्रेलिया, पर्थ में ट्रेन में चढ़ते समय निकोलस टेलर का पाँव रेल और प्लेटफार्म के बीच दरार में फंस गया l सुरक्षा अधिकारियों के असफल होने पर, उन्होंने 50 लोगों के समन्वित प्रयास से रेल के डिब्बे को झुकाकर उसका पाँव निकाल दिया l एकता द्वारा, उन्होंने टेलर का पाँव निकाल दिया l
आरंभिक कलीसियाओं को लिखते हुए प्रेरित पौलुस ने मसीहियों की समन्वित सामर्थ्य को पहचाना l उसने रोमी विश्वासियों को उसी तरह परस्पर स्वीकारने के लिए आग्रह किया जैसे मसीह ने उनको स्वीकार था, “... परमेश्वर तुम्हें यह वरदान दे कि मसीह यीशु के अनुसार आपस में एक मन रहो l ताकि तुम एक मन और एक स्वर में हमारे प्रभु मसीह के पिता परमेश्वर की स्तुति करो” (रोमियों 15:5-6) l
दूसरे विश्वासियों के साथ एकता हमें परमेश्वर की महानता बताने में और सताव सहने में मदद करता है l जानते हुए कि फिलिप्पियों को अपने विश्वास के लिए कीमत चुकानी पड़ेगी, पौलुस ने उनसे “एक चित्त होकर सुसमाचार के विश्वास के लिए परिश्रम करते [रहने] और किसी बात में भय नहीं [खाने]” हेतु उत्साहित किया (फ़िलि. 1:27-28) l
शैतान को तोड़ना और अधीन करना पसंद है, किन्तु उसके प्रयास परमेश्वर की मदद से ख़त्म होते हैं, जब हम “मेल के बंधन में आत्मा की एकता रखने का यत्न [करते हैं] (इफि. 4:3) l
पूरा ध्यान दें
मैं प्रेक्षागृह में बैठे हुए, पासवान की ओर ध्यान से देखता रहा l मेरी मुद्रा बता रही थी मैं उनकी हर बात पर ध्यान दे रहा था l अचानक मैंने सबको हँसते और ताली बजाते सुना l चौंककर, इधर-उधर देखा l प्रचारक ने ज़रूर कुछ हास्यकर कहा था, जो मैंने नहीं सुनी l मैं ध्यान दे रहा था, किन्तु वास्तव में मेरा ध्यान दूर था l
जो बोला जा रहा है उसे सुनना संभव है, किन्तु ध्यान नहीं देना, देखना किन्तु गौर न करना, उपस्थित रहना फिर भी अनुपस्थित l ऐसी स्थिति में, महत्वपूर्ण सन्देश छूट सकते हैं l
एज्रा द्वारा यहूदा के लोगों को परमेश्वर का निर्देश सुनाते समय, “लोग व्यवस्था की पुस्तक पर कान लगाए रहे” (नहे. (8:3) l वर्णन के प्रति ध्यान समझ उत्पन्न की (पद.8), जो पश्चाताप और जागृति में परिणित हुई l यरूशलेम में विश्वासियों का सताव आरंभ होने के बाद (प्रेरितों 8:1), सामरिया में एक और स्थिति में, फिलिप्पुस, सामरियों तक पहुंचा l भीड़ ने आश्चर्यजनक चिन्हों पर ही केवल ध्यान नहीं दिया, किन्तु उन्होंने “सुनकर ... एक चित्त होकर मन लगाया” (पद.6) l “और उस नगर में बड़ा आनंद छा गया (पद.8) l
मन एक अस्थिर अनुभवी होकर अपने निकट बहुत सारे उत्तेजनाओं को खो सकता है l उन शब्दों से अधिक ध्यान किसी को नहीं चाहिए जो हमारे स्वर्गिक पिता के आनंद और आश्चर्य प्राप्ति में हमारी सहायता करते हैं l
रोटी!
मैं मेक्सिको के एक छोटे शहर में रहती हूँ जहाँ आप प्रति भोर और शाम एक विशिष्ट आवाज़ सुन सकते हैं : “ब्रेड!” एक व्यक्ति अपनी मोटरबाइक पर बड़े टोकरे में अनेक प्रकार के मीठे और नमकीन ब्रेड बेचता है l इसलिए मैं अपने द्वार पर ही ताज़े ब्रेड का आनंद लेती हूँ l
शारीरिक भूख की पूर्ति से आत्मिक भूख की पूर्ति की ओर चलकर, मैं यीशु के शब्दों पर विचारती हूँ : “जीवन की रोटी जो स्वर्ग से उतरी, मैं हूँ l यदि कोई इस रोटी में से खाए, तो सर्वदा जीवित रहेगा” (यूहन्ना 6:51) l
किसी ने कहा है कि उद्धार वास्तव में एक भिखारी का दूसरे भिखारी को बताना है उसने रोटी कहाँ पाई है l हममें से अनेक कह सकते हैं, “मैं एक समय आत्मिक रूप से भूखा, अपने पापों के कारण भूखों मर रहा था l तब मैंने सुसमाचार सुना l किसी ने बताया रोटी कहाँ मिलती है : यीशु में l और मेरा जीवन बदल गया!”
अब हमारे लिए अवसर और जिम्मेदारी इस जीवन की रोटी के विषय दूसरों को बताना है l हम यीशु के विषय अपने पड़ोस, कार्य स्थल, स्कूल, अपने मनोरंजन स्थान में बताएँ l हम यीशु के विषय प्रतीक्षालय, बस, या रेल में बता सकते हैं l हम मित्रता से दूसरों तक सुसमाचार पहुंचा सकते हैं l
यीशु जीवन की रोटी है l यह महान समाचार सबको बताएँ l
सही दृष्टि
रेले शक्तिशाली कुत्ता है-बड़ा, बलवान, शरीर अत्यधिक रोएंदार, वजन 100 पौंड से अधिक! बावजूद इसके, रेले प्रेमी है l उसका मालिक लोगों की ख़ुशी के लिए उसे नर्सिंग होम्स और हॉस्पिटल ले जाता है l
एक दिन एक चार वर्षीय लड़की ने रेले पर हाथ फेरने से डरती थी l आख़िरकार, डर समाप्त हुआ और उसने कई मिनट तक उससे बातें कर उस पर हाथ फेरे l उसने जाना कि वह शक्तिशाली होकर भी विनम्र प्राणी है l
इन गुणों का मेल मुझे यीशु का स्मरण करता है l यीशु सुगम्य था-उसने छोटे बच्चों का स्वागत किया (मत्ती 19:13-15) l वह कठिन स्थिति में व्यभिचारिणी के साथ दयालु था (यूहन्ना 8:1-11) l करुणा ने उसे भीड़ को सिखाने को प्रेरित किया (मरकुस 6::34) l इसके साथ, यीशु की शक्ति विस्मयकारक थी l उसका दुष्टात्मा को अधीन करना, प्रचंड आंधी को शांत करना, मृतकों को जिलाना, से लोग ठगे से रह गए! (मरकुस 1:21-34; 4:35-41; यूहन्ना 11) l
यीशु के प्रति हमारा दृष्टिकोण उसके साथ हमारा सम्बन्ध निर्धारित करता है l उसकी सामर्थ्य पर केन्द्रित होकर, हम उसको लौकिक पुस्तक सुपर नायक से पृथक आदर देंगे l किन्तु उसकी दया पर अत्यधिक बल देकर, हम अत्यधिक लापरवाही से उसके साथ व्यवहार करने का जोखिम उठाएंगे l सच्चाई यह है कि यीशु एक ही समय दोनों है-हमारी आज्ञाकारिता के लिए महान फिर भी हमें मित्र कहने के लिए नम्र l
एक नया उद्देश्य
जेकब डेविस एक परेशान दरजी था l पश्चिमी अमरीका में 1800 के दशक में सोना खोदकर अप्रत्याशित लाभ उठाने की चाहत शीर्ष पर थी और सोने खोदने वालों के पैंट घिसते जाते थे l उसका समाधान? डेविस, लीवाई स्त्रौआस के कपड़े की दूकान से तम्बू बनाने का कपड़ा खरीदकर, उस वजनी, मजबूत सामग्री से पैंट बनाया-और नीले जीन्स बन गए l आज, विश्व में सर्वाधिक लोकप्रिय कपड़ों में अनेक प्रकार के डेनिम जीन्स(लिवाइस जीन्स भी) हैं, और केवल इसलिए कि तम्बू के कपड़े को नया उद्देश्य मिला l
शिमोन और उसके मित्र गलील की झील में मछुआरे थे l तब यीशु आकर उन्हें उसका अनुसरण करने को बुलाया l उसने उनको नया उद्देश्य दिया l अब वे मछली नहीं पकड़ेंगे l जब यीशु ने उनसे कहा, “मेरे पीछे आओ; मैं तुम को मनुष्यों के मछुए बनाऊंगा” (मरकुस 1:17) l
उनके जीवन में इस नए उद्देश्य के साथ, ये लोग यीशु द्वारा सिखाए और प्रशिक्षित किये गए ताकि, उसके स्वर्गारोहण पश्चात क्रूस और मसीह के पुनरुत्थान के सन्देश को लेकर वे परमेश्वर द्वारा लोगों के हृदयों को अपने अधीन करने हेतु उपयोग किये जाएंगे l आज,हम मसीह के प्रेम और उद्धार का सुसमाचार बांटते हुए उसके पद चिन्हों पर चलते हैं l
हमारे जीवन इस प्रेम को घोषित और प्रकट करें, जो दूसरों का जीवन, उद्देश्य, और अनंत गंतव्य बदल सकता है l
चिन्ह और चेतना
एक परिचित जवान आदतनुसार परमेश्वर से चिन्ह माँगता था l उसकी प्रार्थनाएँ उसकी भावनाओं का प्रमाण चाहती थीं l जैसे, उसकी प्रार्थना होगी, “परमेश्वर यदि तेरी इच्छा है मैं यह करूँ, तो आप वह करें, और मैं जान लूँगा वह ठीक है l”
इससे दुविधा हो गई है l क्योंकि उसका परमेश्वर से उत्तर प्राप्त करने के तरीके अनुसार वह अपनी पुरानी प्रेमिका के पास लौटना चाहता है जबकि वह मानती है कि परमेश्वर की यह इच्छा नहीं है l
यीशु के युग के धार्मिक अगुए उसके दावों के प्रमाण में चिन्ह मांगते थे (मत्ती 16:1) l वे परमेश्वर के मार्गदर्शन के बदले; उसके दिव्य अधिकार को चुनौती देते थे l यीशु का उत्तर था, “इस युग के बुरे और व्यभिचारी लोग चिन्ह ढूढ़ते हैं” (पद.4) l यीशु का सशक्त प्रतिउत्तर परमेश्वर का मार्गदर्शन खोजने से रोकने हेतु एकमुश्त कथन नहीं, बल्कि, वचन में उसके अभिषिक्त होने के संकेत की अवहेलना हेतु, उनको दोषी ठहराना था l
परमेश्वर हमसे प्रार्थना में उसका मार्गदर्शन खोजने को कहता है (याकूब 1:5) l वह आत्मा (यूहन्ना 14:26) वचन (भजन 119:105) परामर्शदाता और बुद्धिमान अगुओं द्वारा भी मार्गदर्शन देता है l और उसने खुद यीशु का उदाहरण दिया है l
परमेश्वर का स्पष्ट मार्गदर्शन मांगने की इच्छा नेक है, किन्तु वह हमेशा हमारी इच्छानुसार नहीं करता l प्रार्थना का व्यापक बिंदु परमेश्वर का चरित्र जानना और पिता के साथ सम्बन्ध विकसित करना है l
हमें मालूम न था
एक स्थानीय कलीसिया के स्वयंसेवकों ने एक ठण्डी शाम को निम्न-आय वाले लोगों के भवन-समूहों में भोजन वितरण किया l एक स्त्री भोजन पाकर उल्लासित हुई l उसने अपनी खाली आलमारी दिखाकर उनसे कहा कि वे उसकी प्रार्थनाओं के उत्तर थे l
स्वयंसेवकों के चर्च लौटने पर एक महिला रोने लगी l “जब मैं छोटी थी,” उसने कहा, “वह महिला मेरी सन्डे स्कूल शिक्षिका थी l वह प्रत्येक रविवार चर्च आती है l हमें मालूम न था कि वह लगभग भूखी मर रही है!”
स्पष्तः: वे लोग चिंता करनेवाले लोग थे जो परस्पर बोझ उठाना चाहते थे, जैसे पौलुस गलातियों 6:2 में सलाह देता है l फिर भी उन्होंने स्त्रियों की ज़रूरतों पर ध्यान नहीं दिया था-जिसको वे प्रति रविवार देखते हैं-और उसने अपनी ज़रूरतें नहीं बताई थी l यह हमारे लिए अपने चारों-ओर के प्रति और अभिज्ञ रहने की कोमल ताकीद हो सकती है और, जैसे पौलुस कहता है, “जहां तक, अवसर मिले हम सब के साथ भलाई करें, विशेष करके विश्वासी भाइयों के साथ” (6:10) l
एक साथ उपासना करनेवालों को परस्पर सहायता करने का अवसर है ताकि मसीह की देह में कोई सहायता विहीन न रहे l जब हम एक दूसरे को जानते और चिंता करते हैं, शायद हमें कभी नहीं कहना पड़ेगा, “हमें मालूम न था l”
एक कठिन पहाड़
हमारे घर आइडाहो के उत्तर में पर्वतों की जुगहैंडल चोटी की परत में ऊपर एक हिम झील है l इस झील तक का मार्ग शिलाखंडों और अलग-अलग पत्थरों के बीच खड़ी चढ़ाई, और खुला संकरा ऊंचा भाग है l यह प्रचंड चढ़ाई है l
हालाँकि, चढ़ाई के आरंभ में, एक छोटी नदी है-एक जल-श्रोत जो मुलायम, काईदार धरती से निकलकर हरे-भरे मैदान के बीच से बहती है l यह आगे की कठिन चढ़ाई के लिए संतुष्ट होने तक जल पीने का स्थान और तैयारी है l
मसीही जीवन पर जॉन बनयन की उत्कृष्ट कृति, द पिल्ग्रिम्स प्रोग्रेस, में मसीही पहाड़ कठिनाई नामक, एक खड़ी चढ़ाई के निकट पहुँचता है, “जिसके नीचे एक सोता था ... मसीही अब उस सोते तक गया और तरोताज़गी हेतु जल पीया, और तब पहाड़ पर चढ़ने लगा l”
शायद आपके लिए कठिन पहाड़ एक विद्रोही बच्चा या एक गंभीर चिकित्सीय रोग की पहचान हो सकती है l चुनौती आपके सहन से बाहर दिखती है l
अपने अगले मुख्य कार्य का सामना करने से पूर्व, तरोताज़गी के सोता परमेश्वर से मिलें l
अपने समस्त कमजोरी, थकान, बेकसी, भय और शंका के साथ उसके पास आएँ l तब उसकी
सामर्थ्य, ताकत, और बुद्धिमत्ता का पान करें l परमेश्वर आपकी समस्त परिस्थितियाँ जानता है और आत्मिक शक्ति और धैर्य का अत्यधिक सुख देगा l वह आगे बढ़ने हेतु आपके सिर को ऊँचा
करके सामर्थ्य देगा l