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शांति कैसे मिलेगी?

“आप शांति के विषय क्या सोचते हैं?” साथ में दोपहर का भोजन खाते समय मेरे मित्र ने  पूछा l “शांति?” मैंने घबराकर उत्तर दिया l “मैं निश्चित नहीं हूँ – आप क्यों पूछ रहे हैं?” उसका उत्तर था, “अरे, जब तुम चर्च आराधना के समय अपने पैरों को हिला रही थी मैंने सोचा कि शायद तुम किसी बात के विषय क्षुब्ध थी l क्या तुमने उस शांति के विषय विचार किया है जो परमेश्वर अपने प्रेम करनेवालों को देता हैं?”

कुछ वर्ष पहले उस दिन, मुझे अपने मित्र के प्रश्न से ठेस पहुंचा था, किन्तु इससे मैं एक नयी यात्रा पर चल पड़ी l मैंने बाइबल में खोजना शुरू कर दिया कि किस प्रकार परमेश्वर के लोगों ने शांति और स्वास्थ्य के वरदान को, कठिनाई के समय भी गले लगाया है l जब मैंने कुलुस्सियों के नाम पौलुस की पत्री पढ़ी, मैंने प्रेरित के निर्देश को कि मसीह की शांति उनके हृदय में राज्य करे पर गहन चिंतन किया (कुलुस्सियों 3:15) l

पौलुस एक ऐसी कलीसिया को लिख रहा था जहाँ वह पहले कभी नहीं गया था किन्तु उनके विषय अपने मित्र इपफ्रास से सुना था l वह चिंतित था कि झूठी शिक्षा का सामाना करने के दौरान, वे मसीह की शांति को खो रहे थे l परन्तु उनको उलाहना देने के बजाए, पौलुस ने उनको मसीह में भरोसा करने के लिए उत्साहित किया, जो उन्हें निश्चितता और आशा दे सकता था (पद.15) l

हम सब ऐसे समयों का सामना करेंगे जब हम अपने हृदयों में मसीह की शांति के अधिकार का आलिंगन या उसका इनकार करने का चुनाव कर सकते हैं l जब हम यीशु को अपने अन्दर निवास करने के लिए उसकी ओर मुड़ते हैं, वह हमें कोमलता से चिंता और फ़िक्र से जो हमें दबाते हैं निकलेगा l जब हम उसकी शांति को खोजते हैं, हम भरोसा करते हैं कि वह अपने प्रेम के साथ हमसे पेश आएगा l

क्या आप अभी भूखे हैं?

थॉमस को मालूम था उसे क्या करना था? भारत में एक निर्धन परिवार में जन्म लिया और अमरीकियों द्वारा गोद लिया गया, और भारत लौटने पर उसने अपने ही गृह शहर के बच्चों  को खौफ़नाक स्थिति में देखा l इसलिए वह जान गया उसे सहायता करनी होगी l वह अमरीका लौटकर, अपनी शिक्षा समाप्त करके, ढेर सारा पैसा जमा करके, भविष्य में भारत लौटने की योजना बनाने लगा l

उसके बाद, याकूब 2:14-18 पढ़ने के बाद जिसमें प्रेरित प्रश्न करता है, “यदि कोई कहे कि मुझे विश्वास है पर वह कर्म न करता हो, तो इससे क्या लाभ?” थॉमस ने अपने मातृभूमि में एक छोटी लड़की को उसने अपनी माँ से चीखते सुना : “परन्तु माँ, मैं तो अभी भूखी हूँ!” उसने उन दिनों को याद किया जब वह भी बचपन में बहुत ही भूखा था – कूड़ेदानों में भोजन ढूढ़ता था l थॉमस ने सहायता करने के लिए वर्षों तक इंतज़ार नहीं कर सकता था l उसने निर्णय किया, “मैं अभी सहायता करना आरंभ करूँगा!!”

वर्तमान में इस अनाथालय में जिसे उन्होंने आरंभ किया था पचास बच्चे हैं जिन्हें भरपूर भोजन मिलता है और उनकी उचित देखभाल की जाती है और वे यीशु के बारे में सीखते हैं और शिक्षा भी प्राप्त कर रहे हैं – यह सब इसलिए क्योंकि एक व्यक्ति ने समझ लिया कि परमेश्वर उन्हें क्या करने को बुला रहा है और वह इस काम को टाल नहीं सकता है l

याकूब का सन्देश हम सब पर लागू होता है l यीशु मसीह में हमारा विश्वास हमें बहुत लाभ देता है – उसके साथ एक सम्बन्ध, बहुतायत का जीवन, और भविष्य की एक आशा l परन्तु इसका कुछ भी लाभ नहीं यदि हम आगे बढ़कर ज़रुरतमंदों की मदद नहीं करते हैं? क्या आप उस चीख को सुन रहे हैं : “मैं तो अभी भूखा हूँ!” 

एक नए दृष्टिकोण(Lens) से

मेरे पिता ने कहा, “एक वृक्ष को देखना और अस्पष्ट हरियाली की जगह अलग-अलग पत्तियों को देखना अद्भुत है!” मैं और अच्छे तरीके से बता नहीं सकता था l मैं उस समय अठारह वर्ष का था और चश्मा पहनने की अपनी नयी ज़रूरत को पसंद नहीं करता था, किन्तु मेरे चश्मे ने मेरे देखने का तरीका बदल दिया, धुंधले को सुन्दर बना दिया!

वचन को पढ़ते समय, मैं कुछ पुस्तकों को उसी तरीके से देखता हूँ जैसे चश्मे के बिना पेड़ों को देखना है l कुछ अधिक देखने के लिए नहीं है l परन्तु बारीकियों पर ध्यान देने से एक अरुचिकर परिच्छेद भी सुन्दरता को प्रगट कर देता है l

ऐसा मेरे निर्गमन पढ़ने के समय हुआ l मिलापवाला तम्बू – इस्राएलियों के मध्य उसका अस्थायी निवास – बनाने के लिए परमेश्वर का निर्देश धुंधला अरुचिकर वर्णन दिखाई देता है l परन्तु मैं अध्याय 25 के अंत में ठहर गया जहां परमेश्वर ने दीवट के लिए निर्देश दिया l वह “चोखे सोने” से बनाया गया था जिसमें उसका आधार, डंडी, पुष्पकोष, गाठ और फूल सम्मिलित थे (पद.31) l गाठों को “बादाम के फूल” के आकार का होना था (पद.34) l

बादाम के पेड़ असाधारण होते हैं l और परमेश्वर ने अपने निवासस्थान में उसी प्राकृतिक सुन्दरता को शामिल किया!

पौलुस ने लिखा, “उसके [परमेश्वर के] अनदेखे गुण, अर्थात् उसकी सनातन सामर्थ्य और परमेश्वरत्व’ सृष्टि में दिखाई देते और समझे जाते हैं (रोमियों 1:20) l परमेश्वर की सुन्दरता को देखने के लिए, कभी-कभी हमें सृष्टि को देखना होगा, और जो बाइबल में अरुचिकर परिच्छेद महसूस हो, उसे एक नए लेंस के द्वारा देखना होगा l

जब शार्क काटते नहीं

मेरे बच्चे उत्साहित थे, परन्तु मैं असहज थी l छुट्टियों में, हम एक्वेरियम(मछलीघर) धूमने गए जहां लोग एक विशेष टैंक में रखे छोटे शार्कों को दुलार सकते थे l जब मैंने अटेंडेंट(सहायक) से पूछा कि क्या कभी इन प्राणियों ने ऊंगलियों को काता है, उसने कहा कि शार्कों को अभी खिलाया गया है और उसके बाद अतिरिक्त भोजन दिया गया है l वे काटेंगे नहीं क्योंकि वे भूखे नहीं हैं l

जो मैंने शार्कों को दुलारने के विषय सीखा नीतिवचन के अनुसार अर्थपूर्ण है : “संतुष्ट होने पर मधु का छत्ता भी फीका लगता है परन्तु भूखे को सब कड़वी वस्तुएं भी मीठी जान पड़ती हैं” (नीतिवचन 27:7) l भूख – आन्तरिक खालीपन का भाव – हमारे निर्णय करने के समय निर्णय करने की शक्ति को कमजोर करता है l यह हमें भरोसा देता है कि कुछ भी जो हमें भरता है ठीक है, चाहे यह हमें किसी दूसरे को काट खाने को ही विवश क्यों न करे l

परमेश्वर हमें हमारी भूख/इच्छा के रहम पर जीवन जीने से कहीं अधिक हमारे लिए चाहता है l वह चाहता है हम मसीह के प्रेम से भर जाएँ ताकि जो भी हम करें वह उसके प्रबंध की शांति और स्थिरता से प्रवाहित हो l निरंतर अभिज्ञता कि हमसे शर्तहीन प्रेम किया गया है हमें भरोसा देता है l यह हमें चयनात्मक बनाता है जब हम जीवन में “मीठी/अच्छी” वस्तुओं – उपलब्धियां, सम्पति, और सम्बन्ध - के विषय विचार करते हैं l

केवल यीशु के साथ सम्बन्ध ही सच्ची संतुष्टि देती है l काश हम अपने लिए उसके अद्वितीय प्रेम को समझ लें ताकि हम अपने लिए – और दूसरों के लिए “परमेश्वर की सारी भरपूरी तक परिपूर्ण हो [जाएँ]” (इफिसियों 3:19) l

दिव्य पथांतर

विशेषकर जब हम जान जाते हैं कि परमेश्वर ने हमारे लिए दूसरों की सेवा करने का द्वार खोल दिया है और हमसे कहा जाता है “नहीं” या “अभी नहीं” तो यह स्थिति कठिन हो सकती है l मेरी आरंभिक सेवा में, दो सुअवसर मेरे सामना आए जहां मैंने सोचा कि मेरे वरदान और कौशल कलीसियाओं की आवश्यकताओं के अनुकूल थे, परन्तु दोनों ही दरवाजे आखिरकार बंद हो गए l इन दो निराशाओं के बाद, एक और स्थिति आई, और मेरा चुनाव हो गया l उस सेवा की बुलाहट के बाद मुझे तेरह वर्षों का जीवन-स्पर्श करनेवाला पास्तरीए मेहनत की सेवा मिली l

प्रेरितों 16 में दो बार परमेश्वर ने पौलुस और सहयोगियों को पुनः प्रेषित किया l पहली बार, “पवित्र आत्मा ने उन्हें एशिया में वचन सुनाने से मना किया” (पद.6) l उसके बाद, “उन्होंने मूसिया के निकट पहुँचकर, बितूनिया में जाना चाहा; परन्तु यीशु के आत्मा ने उन्हें जाने न दिया” (पद.7) l उनको मालुम न था, कि परमेश्वर के पास दूसरी योजनाएं थीं जो उसके कार्य और सेवकों के लिए सही थीं l पूर्व योजनाओं के लिए उसके इनकार ने उन्हें उसकी सुनने और भरोसेमंद तौर से उसकी अगुवाई में ले गया (पद.9-10) l

हममें से किसने अपने आरंभिक विचार के विषय दुःख नहीं मनाया है जो एक दर्दनाक हानि साबित हुयी? जब हमें कोई ख़ास नौकरी नहीं मिली हम घायल महसूस किये, जब एक सेवा का अवसर मूर्तरूप नहीं ले सका, जब नए स्थान पर बसना सफल नहीं हुआ l यद्यपि ऐसी बातें कुछ पलों के लिए चिंताजनक हो सकती हैं, समय अक्सर प्रगट कर देता है कि ऐसे चक्करदार मार्ग वास्तव में दिव्य पथांतर हैं जो प्रभु दयालुता से हमें अपने इच्छित स्थान पर ले जाने के लिए लाता है, और हम इसके लिए अहसानमंद है l

रस्सी खोलना

एक मसीही संस्था का उद्देश्य/मिशन क्षमा की चंगाई प्रकृति को बढ़ावा देना है l उनकी एक आकर्षक गतिविधि में एक लघु नाटिका शामिल है जिसमें हानि सहने और हानि पहुँचानेवाले को पीठ से पीठ लगाकर एक रस्सी से बांध दिया जाता है l जिसके विरुद्ध पाप किया गया है केवल वही रस्सी खोल सकता है l चाहे वह जो भी करे, कोई तो उसके पीठ पर है l क्षमा किये बिना – रस्सी खोले बिना – वह छुट नहीं सकता है l

किसी को क्षमा की पेशकश जो अपनी गलती के लिए खेद के साथ हमारे पास आता है हमारी और उनकी उस कड़वाहट और पीड़ा से निकलने की प्रक्रिया है जो हमारे द्वारा सहन की गयी गलातियों के लिए हमसे सख्ती से चिपक सकती है l उत्पत्ति में, हम याकूब द्वारा एसाव के पहिलौठे का अधिकार चुराने के बाद, दो भाइयों को बीस वर्षों तक एक दूसरे से अलग देखते हैं l इस लम्बे समय के बाद, परमेश्वर ने याकूब को अपनी जन्मभूमि लौटने को कहा (उत्पत्ति 31:3) l उसने आज्ञा मानी, परन्तु घबराहट के साथ, अपने आगे एसाव को भेंट स्वरुप पशुओं के झुंड भेजे (32:13-15) l जब भाई आपस में मिले, याकूब एसाव के पैरों पर गिरकर सात बार दण्डवत की (33:3) l उसके आश्चर्य की कल्पना करें जब एसाव दौड़कर उसे गले लगा लिया, और दोनों अपने मेल-मिलाप पर रो रहे थे (पद.4) l याकूब अब उस पाप से बिल्कुल छूट गया था जो उसने अपने भाई के विरुद्ध किया था l

क्या आप क्षमा न करने, क्रोध, भय, अथवा लज्जा के कैद में हैं? यह जान लें कि परमेश्वर अपने पुत्र और पवित्र आत्मा के द्वारा आपको छुटकारा दे सकता है जब आप उसकी सहायता मांगते हैं l वह किसी भी रस्सी को खोलने और आपको स्वतंत्र करने की प्रक्रिया आरंभ करने में आपको योग्य बनेगा l

आपकी प्रशस्ति

एक विश्वासी महिला के अंतिम संस्कार में उपस्थित होने के कारण मेरा हृदय भरा हुआ है l उसका जीवन असाधारण नहीं था l वह केवल अपने चर्च, पड़ोसी, और मित्रों के बीच में लोकप्रिय थी l परन्तु वह, उसके सात बच्चे, और 21 नाती-पोते यीशु से प्रेम करते थे l वह सरलता से हंसती थी, उदारतापूर्वक सेवा करती थी, और दूसरों के मन में लम्बे समय तक बस सकती थी l

सभोपदेशक कहता है, “भोज के घर जाने से शोक ही के घर जाना उत्तम है” (7:2) l “बुद्धिमान का मन शोक करनेवालों के घर की ओर लगा रहता है” क्योंकि हम वहाँ पर सबसे महत्वपूर्ण सबक सीखते हैं (7:4) l न्यू यॉर्क टाइम्स के स्तम्भ लेखक डेविड ब्रुक्स कहते हैं कि दो प्रकार के सद्गुण हैं : जो रिज्यूमे/आत्मकथा में अच्छे लगते हैं और दूसरा जो आप चाहेंगे कि आपके अंतिम संस्कार के समय आपके विषय कहे जाएँ l 

कभी-कभी ये मेल खाती हैं, यद्यपि अक्सर वे प्रतिस्पर्धा करती हुयी दिखाई पड़ती हैं l जब शंका हो, हमेशा अपनी अपनी प्रशस्ति/बड़ाई करनेवाले गुणों का चुनाव करें l

कफ़न में लिपटी महिला के पास कोई रिज्यूमे नहीं था, किन्तु उसके बच्चों ने गवाही दी कि “उन्होंने हमेशा नीतिवचन 31 का अभ्यास किया” और एक धर्मी स्त्री का जीवन जीया l उन्होंने उनको यीशु से प्रेम करने और दूसरों की देखभाल करने के लिए प्रेरित किया l जिस प्रकार पौलुस कहता है, “मेरी सी चाल चलो जैसा मैं मसीह की सी चाल चलता हूँ” (1 कुरिन्थियों 11:1), इसलिए उपरोक्त पदों ने हमें अपनी माँ का अनुकरण करने के लिए चुनौती दी जैसे वह यीशु का अनुकरण करती थी l

आपके अंतिम संस्कार के समय क्या बोला जाएगा? आप क्या चाहेंगे कि बोली जाए? अपनी प्रशस्ति/बड़ाई के गुण विकसित करने में देर नहीं हुयी है l यीशु में विश्राम करें l उसका उद्धार हमें जो सबसे महत्वपूर्ण है के लिए जीने में स्वतंत्र करता है l