परेशानी के मध्य आशीष
मैं इस समस्या में फँस गयी हूँ, इसलिए मुझे इसमें से निकलना ही होगा, कभी-कभी मैं ऐसे सोचती हूँ l यद्यपि मैं परमेश्वर के अनुग्रह में विश्वास करती हूँ, फिर भी मैं ऐसा करने की ओर झुकती हूँ मानो उसकी सहायता केवल उसी समय उपलब्ध है जब मैं उसके योग्य होती हूँ l
परमेश्वर का याकूब के साथ पहली बार आमना-सामना एक खुबसूरत उदहारण है कि उपरोक्त बात कितनी गलत है l
इस प्रकार याकूब ने पिता की आशीष पाने के लिए वह सब कुछ किया जो वह कर सकता था l आख़िरकार, वह धोखा देकर सफल हो गया और अपने भाई की आशीष प्राप्त कर लिया (उत्पत्ति 27:19-29) l
उपरोक्त घटना का परिणाम एक विभाजित परिवार था, जब याकूब अपने क्रोधित भाई से भागा (पद. 41-43) l जब रात हुयी (पद.28:11), याकूब सदैव के लिए जीवन की एक आशीष से वंचित हो गया होता l
किन्तु आशीष एक निशानी छोड़ते हुए वहां पर थी, कि याकूब ने परमेश्वर से मुलाकात की थी l परमेश्वर ने उसे दिखा दिया था कि उसकी ज़रूरत जोखिम उठाकर आशीष पाना नहीं था; वह खुद ही आशीष था l उसकी नियति का उद्देश्य भौतिक समृद्धि से कहीं महान था (पद.14) और परमेश्वर द्वारा सुरक्षित था जो उसे कभी नहीं छोड़ने वाला था (पद.15) l
यह एक ऐसा पाठ था जो याकूब अपनी पूरी ज़िन्दगी सीखने वाला था l
और हम भी सीखेंगे l चाहे हम जितनी बार खेद प्रगट करें या परमेश्वर हमसे दूर नज़र आए, वह उपस्थित है और हमें परेशानियों में से निकालकर अपनी आशीष देना चाहता है l
हमारा सुरक्षित स्थान
मेरी पहली नौकरी एक फास्टफूड रेस्टोरेंट में थी l शनिवार की शाम को, एक व्यक्ति मेरे लिए इंतज़ार करते हुए मुझसे पूछता था कि मैं काम से कब छुट्टी पाऊँगी l इससे मैं असहज महसूस करती थी l विलम्ब होने पर वह चिप्स आर्डर करता था, फिर कोई पेय, ताकि होटल का प्रबंधक उस से बाहर जाने को न कह दे l यद्यपि मेरा घर निकट ही था, फिर भी मैं कुछ पार्किंग स्थलों से और एक रेतीले मैदान से होकर निकलने से डरती थी l आख़िरकार, मध्यरात्रि में, मैंने ऑफिस के अन्दर जाकर फ़ोन किया l
और जिस व्यक्ति ने फोन का उत्तर दिया वह थे मेरे पिता, जिन्होंने बिना दोबारा सोचे अपने गरम बिस्तर से उठकर पांच मिनट के अंतराल में मुझे घर ले जाने आ गए l
उस रात मेरे पिता का आकर मेरी मदद करने की निश्चयता मुझे भजन 91 में वर्णित आश्वासन की याद दिलाता है l हमारे भ्रमित, भयभीत अथवा ज़रूरत में होने पर हमारे स्वर्गिक पिता हमेशा हमारे साथ रहते हैं l वे कहते हैं : “जब वह मुझ को पुकारेंगे, तब मैं उनकी सुनूँगा” (भजन 91:15) l वह केवल एक स्थान नहीं है जहाँ हम सुरक्षा के लिए जाते हैं l वह हमारा आश्रय है (पद.1) l वह हमारा गढ़ है जिस पर हम भरोसा कर सकते हैं (पद.2) l
भय, खतरा, अथवा अनिश्चितता में, हम परमेश्वर की प्रतिज्ञा पर भरोसा कर सकते हैं कि जब हम उसे पुकारेंगे, वह हमारी सुनकर हमारी परेशानियों में हमारे साथ रहेगा (पद.14-15) l परमेश्वर हमारा सुरक्षित स्थान है l
जैसे विज्ञापित किया गया
छुट्टियों में, हम दोनों पति-पत्नी ने जॉर्जिया के शाताहुची नदी में रबर के बने नौका से सैर करने का फैसला किया l सैर की तैयारी में सैंडल, ग्रीष्मकालीन कपड़े, और एक चौड़ी टोपी पहनने के बाद हमनें पाया कि विज्ञापन के विपरीत हमारे सैर में थोड़ी गति से नौकायन करना भी शामिल था l यह तो भला था कि हम झागदार पानी में एक अनुभवी जोड़े के साथ नौकायन कर सके l उन्होंने मेरे पति को चप्पु चलाने की मूल बातें सिखाई और गंतव्य तक सुरक्षित पहुँचाने का वादा किया l मैं अपने जीवन रक्षक जैकेट के लिए धन्यवाद देती हूँ l नदी के निचले भाग के दलदली तट पर पहुँचने तक मैं चिल्लाती रही और नौका के प्लास्टिक हैंडल को जोर से पकड़ी रही l मैं नौका से तट पर उतरकर अपने थैले से पानी निचोड़ती रही और मेरे पति ने मेरे गीले कपड़ों को निचोड़ने में सहायता की l हम दोनों खूब खुश हुए, यद्यपि हमारा सैर विज्ञापन के विपरीत था l
उस सैर के विज्ञापन के विपरीत, जिसमें सैर के विषय ख़ास जानकारी नहीं थी, यीशु ने स्पष्ट रूप से अपने शिष्यों को बता दिया था कि भविष्य में कठिन दिन आएँगे l उसने उनसे कह दिया था कि वे सताए जाएंगे और शहीद भी होंगे और कि वह मृत्यु सहकर जी उठेगा l उसने अपनी विश्वसनीयता की गारन्टी देकर उन्हें आश्वस्त भी किया था कि वह निर्विवाद विजय और अनंत आशा की ओर उनकी अगुवाई करेगा (यूहन्ना 16:16-33) l
काश यीशु का अनुकरण करते समय जीवन सरल होता, किन्तु उसने स्पष्ट कर दिया था कि उसके शिष्य समस्याओं का सामना करेंगे l किन्तु उसने उनके साथ रहने का वादा किया है l परीक्षाएं हमारी सीमाओं को परिभाषित नहीं करेंगी, अथवा हमारे लिए परमेश्वर की योजना को नष्ट नहीं करेंगी, क्योंकि यीशु के पुनरुत्थान ने हमें अनंत विजय में पहुँचा दिया है l
“मनभावन!”
“मनभावन!”
एक सुबह मेरी बेटी तैयार होते समय उपरोक्त विस्मयबोधक शब्द कहे l मैं नहीं जानता वह क्या कहना चाहती थी l उसके बाद उसने अपने चचेरे भाई से मिली शर्ट को थपथपाया l उस शर्ट के सामने “मनभावन” शब्द अंकित था l मैंने उसे गले लगाया, और वह पवित्र प्रेम से मुस्करा दी l “तुम मनभावन हो!” मैंने दोहराया l उसकी मुस्कराहट और बड़ी हो गयी होती, और अगर ऐसा संभव होता, और वह उन शब्दों को दोहराते हुए कूदती हुयी चली गयी l
मैं एक सिद्ध पिता नहीं हूँ l किन्तु वह क्षण सिद्ध था l उस स्वाभाविक, खूबसूरत बातचीत में, मैंने अपनी बेटी के दीप्तिमान चेहरे में शर्तहीन प्रेम को परिभाषित देखा l वह ख़ुशी की छवि थी l उसे मालूम था कि उसके शर्ट पर अंकित शब्द उसके विषय उसके पिता की भावना से पूरी तरह मेल खा रहा था l
हममें से कितनों को गहराई से मालूम है कि हमारे स्वर्गिक पिता हमसे असीमित प्रेम करते हैं? कभी-कभी हम सच्चाई से संघर्ष करते हैं l इस्राएली संघर्ष करते थे l उनकी सोच थी कि उनकी परीक्षा का अर्थ था कि अब परमेश्वर उनसे प्रेम नहीं करता है l किन्तु यिर्मयाह 31:3 में, नबी, अतीत में परमेश्वर द्वारा कही गयी बातें याद दिलाता है : “मैं तुझ से सदा प्रेम रखता आया हूँ l” हमें भी ऐसा शर्तहीन प्रेम चाहिए l फिर भी चोट, निराशाएँ, और गलतियां हमें मनभावन महसूस होने नहीं देती l किन्तु सिद्ध परमेश्वर अपनी बाहें फैलाकर हमें अपने प्रेम का अनुभव करने और उसमें विश्राम करने को आमंत्रित करता है l
आलोचक को शांत करना
मैं एक समूह के साथ मिलकर वार्षिक समुदायिक कार्यक्रम आयोजित करती हूँ l हम आयोजन की सफलता के लिए ग्यारह महीने योजना बनाते और तैयारी करते हैं l हम तिथि और स्थान का चुनाव करते हैं l हम टिकट की कीमत निर्धारित करते हैं l हम भोजन बिक्रेता से लेकर ध्वनि टेक्नीशियन तक, सभी बातों का चुनाव करते हैं l आयोजन के निकट आने पर, हम लोगों के प्रश्नों का उत्तर देते हैं और उनको जानकारी भी देते हैं l बाद में हम उनसे भी प्रतिउत्तर लेते हैं l हमारी टीम को उपस्थित लोगों से उत्साहमयी प्रसन्नता और क्षेत्र से शिकायतें भी सुनने को मिलती हैं l नकारात्मक प्रतिउत्तर निराशाजनक हो सकती हैं और कभी-कभी हमारे सामने पराजित होने की परीक्षा भी आती है l
यरूशलेम की दीवार की मरम्मत के समय नहेम्याह और उसकी टीम की आलोचना भी हुई l उन्होंने नहेम्याह और उसके साथ कार्यरत टीम का यह कहकर ठठ्ठा उड़ाया, “जो कुछ वे बना रहे हैं, यदि कोई गीदड़ भी उस पर चढ़े, तो वह उनकी बनायी हुई पत्थर की शहरपनाह को तोड़ देगा” (नहेम्याह 4:3) l आलोचकों के प्रति उसका उत्तर मेरी भी मदद करता है : निरुत्साहित होने अथवा उनकी आलोचनाओं का खण्डन करने की जगह, उसने परमेश्वर से सहायता मांगी l उसने सीधे तौर पर प्रतिउत्तर देने की अपेक्षा, परमेश्वर से उसके लोगों की दशा समझने और जानने और उनकी रक्षा करने को कहा (पद.4) l उन चिंताओं को परमेश्वर को सौंपने के बाद, वह और उसके साथियों का “मन उस काम में नित लगा रहा” (पद.6) और वे निरंतर दीवार की मरम्मत करते चले गए l
हमारे कार्य की आलोचना करनेवालों से हम विचलित न हों, यह हम नहेम्याह से सीख सकते है l जब हमारी आलोचना हो या हमारा मज़ाक उड़ाया जाए, पीड़ा या क्रोध के साथ अपने आलोचकों को उत्तर देने की अपेक्षा, हम परमेश्वर से प्रार्थनापूर्वक निराशा से हमारा बचाव करने को कहें ताकि हम पूरे मन से आगे बढ़ते रहें l
विनम्र प्रेम
बेंजामिन फ्रैंकलिन ने अपने युवावस्था में बारह सद्गुणों की सूची बनाए थे जिनमें वे अपने जीवन काल में उन्नत्ति करना चाहते थे l उन्होंने उस सूची को अपने मित्र को दिखाया, जिसने उन्हें उसमें “विनम्रता” जोड़ने को कहा l फ्रैंकलिन को यह विचार पसंद आ गया l उनके मित्र ने हर एक गुण में उसकी सहायता के लिए कुछ मार्गदर्शिका भी जोड़ दीं l विनम्रता के सम्बन्ध में फ्रैंकलिन के विचारों में, उसने उसका अनुकरण करने के लिए यीशु का उदहारण दिया l
यीशु हमें विनम्रता का सर्वश्रेष्ठ नमूना देता है l परमेश्वर का वचन हमें बताता है, “जैसा मसीह यीशु का स्वभाव था वैसा ही तुम्हारा भी स्वभाव हो; जिसने परमेश्वर के स्वरुप में होकर भी परमेश्वर के तुल्य होने को अपने वश में रखने की वस्तु न समझा l वरन् अपने आप को ऐसा शून्य कर दिया, और दास का स्वरुप धारण किया, और मनुष्य की समानता में हो गया” (फ़िलि.2:5-5) l
यीशु ने सबसे महान विनम्रता प्रस्तुत की l पिता के साथ अनंतता से होने के बावजूद, उसने प्रेम में क्रूस के नीचे झुकने का चुनाव किया कि अपनी मृत्यु के द्वारा वह हर एक को उन्नत कर सके जो उसके प्रेम की उपस्थिति में उसे स्वीकार करता है l
हम दूसरों की सेवा करके अपने स्वर्गिक पिता की सेवा करने का प्रयास करते हैं और इस तरह यीशु की विनम्रता का अनुसरण करते हैं l यीशु की दया हमें दूसरों की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए अलग करके अलगाव की सुन्दरता का असाधारण झलक लेने देता है l “सर्व प्रथम मैं” [अहम्] वाले संसार में विनम्र बनना सरल नहीं है l किन्तु हमारे उद्धारकर्ता के प्रेम में विश्राम करते समय, वह हमें उसका अनुसरण करने के लिए सब कुछ देगा l
नाम लेकर बुलाया गया
विज्ञापनदाता यह मानते हैं कि सर्वाधिक ध्यान आकर्षित करनेवाला शब्द दर्शक का नाम ही होता है जिस पर दर्शक प्रतिक्रिया करते हैं l इस प्रकार यू के में एक टेलीविजन चैनल ने अपने ऑनलाइन चलनेवाली सेवाओं में व्यक्तिगत विज्ञापनों को तैयार किया है l
हम टेलीविजन पर अपना नाम सुनना पसंद करेंगे, किन्तु जब तक आपका कोई प्रिय जो आपका नाम लेकर आपसे प्रेम करता है आपको न पुकारे तब तक वह सार्थक महसूस नहीं होता है l
मरियम मगदलीनी का ध्यान उस कब्र के निकट ठहर गया, जहां क्रूसित होने के बाद यीश का शव रखा गया था, जब यीशु ने मरियम का नाम लिया (यूहन्ना 20:16) l एक शब्द से उसने अपने गुरु को अविश्वास और आनंद के एक तीव्र प्रवाह द्वारा पहचान लिया जिससे वह प्रेम करती थी और जिसका वह अनुसरण करती थी l जिस लोकप्रियता से उसने उसका नाम पुकारा, उसने बगैर शक के मरियम को आश्वस्त कर दिया कि जो उसे पूरी तरह जानता था मृतक नहीं किन्तु जीवित था l
यद्यपि मरियम ने यीशु के साथ एक अनोखा और विशेष क्षण का आनंद उठाया, परमेश्वर हमें भी व्यक्तिगत रूप से प्रेम करता है l यीशु ने मरियम से कहा कि वह पिता के पास जाएगा (पद.17), किन्तु उसने अपने शिष्यों से यह भी कहा था कि वह उन्हें अकेले नहीं छोड़ेगा (यूहन्ना 14:15-18) l परमेश्वर पवित्र आत्मा को अपनी संतानों में निवास करने के लिए भेजेगा (देखें प्रेरितों 2:1-13) l
परमेश्वर की कहानी बदलती नहीं है l चाहे तब या वर्तमान में, वह जिनसे प्रेम करता है उनको जानता है (देखें यूहन्ना 10:14-15) l वह हमें नाम लेकर बुलाता है l
पिता की सलाह
“सम्पादकीय कार्य से मुक्त होने के बाद, मैंने परमेश्वर से एक नये कार्य के लिए प्रार्थना की l और नेटवर्किंग और आवेदन करने के मेरे प्रयास के बाद भी कोई सकारात्मक परिणाम नहीं मिलने की स्थिति में मैं खिजने लगी l “क्या आपको पता नहीं कि मेरे लिए नौकरी महत्वपूर्ण है?” यह महसूस करते हुए कि मेरी प्रार्थना सुनी नहीं गयी है, मैंने परमेश्वर से अपनी दोनों बाहें विरोध में मोड़ कर पूछा l
जब मैंने अपने पिता से, जिन्होंने मेरी नौकरी के विषय परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं पर विश्वास करने के विषय मुझे अक्सर याद दिलाया था, बातें की, तो उनका उत्तर था, “मेरी इच्छा है कि तुम परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं पर विश्वास करने की स्थिति में पहुँच जाओ l”
मेरे पिता की सलाह मुझे नीतिवचन 3 याद दिलाती है, जिसमें एक प्रिय बच्चे को एक अभिभावक की सलाह सम्मिलित है l यह परिचित परिच्छेद विशेषकर मेरी स्थिति के अनुकूल था : “तू अपनी समझ का सहारा न लेना, वरन् सम्पूर्ण मन से यहोवा पर भरोसा रखना l उसी को स्मरण करके सब काम करना, तब वह तेरे लिए सीधा मार्ग निकलेगा” (नीतिवचन 3:5-6) l “सीधा मार्ग निकालेगा” का अर्थ है कि वह हमारी उन्नत्ति के लिए अपने लक्ष्य की ओर हमारा मार्गदर्शन करेगा l उसका अंतिम लक्ष्य है कि मैं और भी उसके समान बन जाऊं l
इसका अर्थ यह नहीं है कि उसके द्वारा चुना गया मार्ग सरल होगा l किन्तु मैं उस पर भरोसा कर सकती हूँ कि उसका मार्गदर्शन और समय अंततः मेरी भलाई के लिए ही होगा l
क्या आप उत्तर के लिए परमेश्वर के समक्ष ठहरे हुए हैं? उसके निकट रहने का चुनाव करें और भरोसा करें कि वह आपका मार्गदर्शन करेगा l
हार्दिक स्वागत
“कौन सबको गले लगाएगा?”
यही सवाल उन अनेक सवालों में से एक था जो हमारे मित्र स्टीव ने तब पूछा जब उसे पता चला कि उसे कैंसर हो गया है और उसे जान पड़ा कि वह थोड़े समय के लिए हमारे चर्च में अनुपस्थित रहेगा l यदि हम रोमियों 16:16 को लागू करें जिसके अनुसार, “आपस में पवित्र चुम्बन से नमस्कार करो” लिखा है, तो, स्टीव सबके साथ मित्रवत भाव रखते हुए अभिनन्दन करता था, गर्मजोशी से हाथ मिलाता था, और “पवित्र चुम्बन” से बहुतों को गले भी लगाता था l
और अब जब हम सब स्टीव की चंगाई के लिए परमेश्वर से प्रार्थना कर रहे हैं, वह इस बात से चिंतित है कि जब उसकी शल्यचिकित्सा और इलाज होता है और वह हमारे चर्च से कुछ समय के लिए अनुपस्थित रहेगा, हम उसके अभिवादन करने की कमी को महसूस करेंगे l
शायद हम सब स्टीव की तरह एक दूसरे का अभिवादन खुलकर नहीं कर सकते, किन्तु लोगों की चिंता करने का उसका नमूना हमारे लिए ताकीद है l स्मरण करें कि पतरस कहता है, “बिना कुड़कुड़ाए एक दूसरे का अतिथि-सत्कार करो,” अथवा जिसका केंद्र प्रेम हो (1 पतरस 4:9; देखें फ़िलि. 2:14) l जबकि प्रथम शताब्दी की पहुनाई में यात्रियों को रहने की व्यवस्था करना होता था, तो उसमें भी गर्मजोशी से स्वागत सम्मिलित होता था l
जब हम दूसरों के साथ प्रेम से व्यवहार करते हैं, चाहे गले लगाकर या मित्रवत मुस्कराहट के द्वारा, हम “सब बातों में यीशु मसीह के द्वारा, परमेश्वर की महिमा प्रगट [करें]” (1 पतरस 4:11) l