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पवित्र, पवित्र, पवित्र

"मौज-मस्ती का समय बहुत जल्दी बीत जाता है"। यह बात तथ्य पर आधारित नहीं है, परन्तु अनुभव सत्य लगता है। जब जीवन सुहाना हो, समय तेज़ी से गुजरता है। कोई ऐसा काम, या ऐसा व्यक्ति जो मुझे पसंद हैं, मुझे दे दो, और समय महत्वहीन लगेगा।

मेरे इस अनुभव ने प्रकाशित वाक्य 4 में वर्णित दृश्य का मुझे एक नया दर्शन दिया। परमेश्वर के सिंहासन के चारों ओर बैठे चार जीवित प्राणियों के निरन्तर एक ही बात दोहरने पर, जब मैं पहले विचार किया करती थी, तो लगता था, कि कितनी बोरिंग स्थिति है!

अब मैं वैसा नहीं सोचती। मैं उन दृश्यों के बारे में सोचती हूँ जिन्हें वे अपनी अनेकों आँखों से निहारते होंगे (पद 6, 8)। स्वच्छंद भाव वाले पृथ्वीवासियों के प्रति परमेश्वर के विवेकपूर्ण और करुणामयी व्यवहार से वो कितने चकित रह जाते होंगे। तब लगता है कि, इससे बेहतर प्रतिक्रिया और क्या हो सकती है? वहाँ "पवित्र, पवित्र, पवित्र" के अलावा और कहने के लिए और क्या हो सकता है?

उन चार प्राणियों की तरह, हमें भी परमेश्वर का गुणगान करने के लिए डिज़ाइन किया गया है। यदि हम उन पर अपना ध्यान केंद्रित रखें और इस उद्देश्य को पूरा करते रहें तो हमारा जीवन कभी बोरिंग नहीं होगा।

सच्ची आशा

कुछ समय पहले मैं एक मित्र के साथ एम्पायर स्टेट बिल्डिंग में गया। लाइन छोटी लग रही थी, बस कोने तक ही। परन्तु अन्दर पहुंचे तो देखा, लाइन लॉबी से लेकर सीढ़ियों तक और एक अन्य कमरे तक फैली हुई थी । हर मोड़ और भी दूरी को बता रहा था।

आकर्षणस्थलों और थीम पार्क की लाइनों के रूट ऐसे बनाए जाते हैं जिससे भीड़ कम दिखे। फिर भी हर मोड़ पर वास्तविक दशा से निराशा हाथ आती है।

कभी कभी जीवन की निराशाएं और अधिक गंभीर हो जाती हैं। जो नौकरी मिलने की आशा हो वह नहीं मिलती, जिन मित्रों पर भरोसा किया उन्हीं ने धोखा दिया, जो संबंध बनाए वे  नकाम हुए। लेकिन इन पलों में, परमेश्वर पर हमारी आशा रखने के बारे में वचन एक सत्य कहता है। प्रेरित पौलुस ने लिखा, "क्लेश से धीरज और धीरज से खरा निकलना..."। (रोमियों 5:3-5)     

जब उनपर हम विश्वास रखते हैं, तो परमेश्वर अपनी आत्मा द्वारा, धीरे से बता देते हैं कि वे हमें बिना शर्त प्रेम करते हैं और एक दिन हम उनके साथ होंगे-चाहे कैसी भी बाधाओं का हमें सामना करना पड़े। एक ऐसे संसार में जो अक्सर हमें निराश करता है, यह जानना कितना भला है कि परमेश्वर हमें सच्ची आशा देते हैं।

जीवन का परमेश्वर

कुछ सर्दियों पहले, मेरे शहर ने हड्डियाँ जमा देने वाली असामान्य बर्फीली सर्दी का अनुभव किया जिसने अंत में वसंत ऋतु के थोड़े गर्म मौसम के किए मार्ग खोल दिया। बाहरी तापमान उप-शून्य डिग्री अंक से सीधे नीचे उतर गया (20 C; -5 F)।

एक सुबह में चहकते पक्षियों की आवाज़ ने रात की खामोशी तोड़ दी। दर्जनों, पक्षी दिल खोल कर गा रहे थे। कहा जाए तो वे जीव अपने सृष्टिकर्ता के लिए अपना राग सुना रहे थे!

पक्षी विशेषज्ञ बताते हैं कि सर्दियों के अंत में आने वाली भोर में जिन सैंकड़ों पक्षियों का मधुर गीत हम सुनते हैं उन में अधिकतर अपने साथी को आकर्षित करने और क्षेत्रों का दावा भरने वाले नर पक्षी होते हैं। उनकी चहचहाहट ने मुझे याद दिलाया कि परमेश्वर ने जीवन को बनाए रखने और फलवंत करने के लिए अपनी सृष्टि में सुधार किया-क्योंकि वह जीवन का परमेश्वर है।

एक भजन यूँ आरंभ होता है, "वह सब जो मैं हूँ यहोवा को धन्य कहे" (भजन 104:1)। "नालों में बहते सोतों के पास..."। (12) बसेरा करते और बोलते पक्षियों से लेकर समुद्र के अनगिनत जलचर (25), उसकी प्रशंसा करने के लिए हमारे पास कितने कारण हैं जिसने यह सुनिश्चित किया है कि समस्त जीवन फलता फूलता रहे।

प्रेम की एक "हाँ"

21 अगस्त, 2016 को कैरिसा ने लुइसियाना में आई विनाशकारी बाढ़ की फोटो सोशल मीडिया पर पोस्ट की। अगले दिन बाढ़ ग्र्स्त क्षेत्र में मदद करने को उनके साथ चलने का आग्रह किया। चौबीस घंटे के भीतर वो अपने पति बॉबी और तेरह लोगों के साथ 1,000 मील की यात्रा पर थी।

ऐसा क्या है जो लोगों को सब कुछ छोड़ कर आशा प्रदान करने के लिए वहाँ जाने के लिए प्रेरित करता है जहाँ वे पहले कभी न गए हों? वह प्रेम है।

मदद मांगने के आग्रह के साथ उसने यह वचन भी पोस्टpost किया था: "अपने मार्ग की चिंता यहोवा पर छोड़; और उस पर भरोसा कर वही पूरा करेगा "(भजन 37:5)। यह विशेष रूप से तब सार्थक होता है जब हम मदद करने के लिए परमेश्वर की बुलाहट का अनुसरण करते हैं। प्रेरित यूहन्ना ने कहा, "वह अपने भाई को कंगाल देख कर उस पर तरस न खाना चाहे ..."(1 यूहन्ना 3:17) जब हम "वह करते हैं जो उन्हें भाता है तब हमारी मदद करने का परमेश्वर ने वादा किया है"। (22)

आवश्यकता पड़ने पर जब हमें लगे की परमेश्वर दूसरों के लिए कुछ करने के लिए हम से कह रहे हैं, तब हम स्वेच्छा से प्यार की एक "हाँ" से परमेश्वर का आदर कर सकते हैं।

यह स्वभाव में है

रेजिना के दिन का आरम्भ, एक दुखद खबर से हुआ था, फिर सहकर्मियों के साथ मीटिंग्स थीं जिनमें उसके सभी आईडिया अस्वीकृत हो गए। लौटते समय उसने एक केयर सेंटर में किसी बुजुर्ग मित्र के पास फूल ले जाकर उसे सरप्राइज देने का निर्णय लिया। मरिया के यह बताने पर कि परमेश्वर उसके लिए कितने भले हैं, उसकी आत्मा तरोताज़ा हो गई। उसने कहा, "मेरा अपना बिस्तर और अपनी कुर्सी हैं, तीन समय का भोजन और नर्सों की मदद है। और कभी किसी अपने को परमेश्वर मेरे पास भेज देते हैं क्योकि वे जानते हैं कि मैं उन से प्यार करती हूँ और वह स्वयं मुझ से प्यार करते हैं।"

स्वभाव। दृष्टिकोण। कहावत है, "10 प्रतिशत जीवन उससे बना है जो हमारे साथ घटता है, और 90 प्रतिशत उसपर हमारी प्रतिक्रिया से।" याकूब ने उनके नाम पत्र लिख था जो सताव के कारण तित्तर बित्तर हो गए थे, और उनसे परख के समय अपने दृष्टिकोण पर गौर करने को कहा। उसने उन्हें इन शब्दों से चुनौती दी: “इसको पूरे आनन्द की बात समझो...”। (याकूब 1:2)

आनंद से भरे होने का यह दृष्टिकोण तब उत्पन्न होता जब हम यह देखना सीख लेते हैं कि परमेश्वर संघर्षों का उपयोग हमारे विश्वास में परिपक्वता लाने के लिए करते हैं।

प्रतिज्ञाएं, प्रतिज्ञाएं

मेरी बेटी और मैं "पिन्चर्स" खेल खेलते हैं। ऊपर चड़ते हुए मैं उसका पीछा करता हूँ और उसकी चुटकी काटता हूँ। मैं तभी पिंच कर सकता हूँ जब वह सीढ़ियों पर हो। ऊपर पहुंचते ही वह सुरक्षित होगी। जब वह खेलने के मूड में न हो और मैं उसे सीढ़ियों में पाऊँ तो कहती है, "पिंचर्स नहीं!" मैं कहता हूँ, "पिंचर्स नहीं! प्रॉमिस।"

ऐसी प्रतिज्ञा साधारण बात है। लेकिन जब मैंने जो कहा वह करता हूँ, तो उसे मेरे चरित्र की पहचान होती है। कथनी अनुसार करनी के मेरे गुण का उसे अनुभव और भरोसा होता है कि मेरा कहना काफ़ी है, कि वह मुझ पर भरोसा कर सकती है। यह एक छोटी बात है। लेकिन प्रतिज्ञाएं-या मुझे कहना चाहिए कि, उन्हें निभाना-संबंधों को जोड़ने की गोंद होती हैं। ये प्रेम और विश्वास की नींव बनाती हैं।

पतरस  ने लिखा कि परमेश्वर की प्रतिज्ञाएं हमें "ईश्वरीय स्वभाव में सहभागी" बनाती हैं। (2 पतरस 1:4) परमेश्वर की प्रतिज्ञा पर विश्वास कर, हमारे प्रति उनके ह्रदय को हम समझ पाते हैं। उनके वचन पर हमारा निर्भर होना उन्हें अपनी विश्वासयोगिता सिद्ध करने का अवसर देता है। मैं धन्यवादी हूँ कि बाइबिल उनकी प्रतिज्ञाओं से भरी है, जो याद दिलाती हैं कि "उसकी दया अमर है..."(विलापगीत 3:22-23)।

मेरी मदद!

प्रसिद्ध भजन मण्डली, ब्रुकलीन टैबरनैकल ने कई दशकों से आत्म-विभोर करने वाले  भजनों से सैंकड़ों लोगों को आशीषित किया है। उनकी रिकॉर्डिंग में भजन 121 पर आधारित "मेरी मदद" एक उदाहरण है।

भजन 121 का आरम्भ उस परमेश्वर के प्रति विश्वास के व्यक्तिगत अंगीकार से होता है जो सब बातों का रचयिता, और मदद का स्रोत है (1-2)। स्थिरता (3), दिन-रात की परवाह (3-4), और उपस्थिति और रक्षा (5-6), और हर बुराई से बचाव (7-8)।

शात्रों से प्रेरित होकर परमेश्वर के लोगों ने सदियों से अपने गीतों में परमेश्वर को  "सहायता" का स्रोत बताया है। महान सुधारक मार्टिन लूथर ने लिखा, "परमेश्वर हमारा एक मजबूत गढ़ है, एक दीवार जो कभी नहीं ढहती; हमारे दोषपूर्ण और नश्वर होने के वावजूद वह हमारी सदा मिलने वाली सहायता हैं"।

क्या आप अकेला, छोड़ा, निष्कासित, भ्रमित महसूस करते हैं? भजन 121 के शब्दों पर मनन करें। अपनी आत्मा में विश्वास और साहस भर जाने दें। आप अकेले नहीं हैं, इसलिए जीवन आप ही जीने का प्रयत्न ना करें। वरन् परमेश्वर की सांसारिक और अनन्त काल की परवाह में आनंदित हों जिसे प्रभु यीशु मसीह के जीवन, मृत्यु, पुनः जी उठने, और स्वर्गारोहण में प्रदर्शित किया गया है। और आगे जो भी हो, उसे उनकी सहायता से ग्रहण करें।

आत्मा के सामर्थ के द्वारा

दशरथ मांझी की कहानी हमें प्रेरणा देती है। उनकी पत्नी की मृत्यु इसलिए हो गई, क्योंकि वह उसे तत्काल चिकित्सा के लिए अस्पताल न लेजा सके, मांझी ने वह किया जो असंभव था। 22 वर्ष लगा कर उन्होंने पहाड़ में बड़ी जगह बनाई ताकि गांववासी स्थानीय अस्पताल पहुंचकर आवश्यक चिकित्सा और देखभाल पा सकें। भारत सरकार ने उनकी उपलब्धि के लिए उन्हें सम्मानित किया।

देश निकाले से लौटे जरूब्बाबेल को मंदिर का पुनर्निर्माण असंभव लगा होगा। लोग निराश थे, दुश्मनों के विरोध का सामना कर रहे थे, और उनके पास संसाधन या एक बड़ी सेना न थी। परमेश्वर ने जरूब्बाबेल के पास जकर्याह को भेजकर उसे याद दिलाया कि यह कार्य सेना, मानव बल या मानव निर्मित संसाधनों की बजाय उससे होगा जो इनसे अधिक बलवान है। यह आत्मा के बल से होगा (जकर्याह 4:6)। जरूब्बाबेल ने विश्वास किया कि मंदिर के पुनर्निर्माण और समुदाय को पुनःस्थापित करने के रास्ते में किसी भी कठिनाई के पहाड़ को परमेश्वर मैदान कर देंगे।

हमारे सामने “पहाड़” हो तो हम क्या करते हैं? इसके दो विकल्प होते हैं: अपने पर भरोसा रखें या आत्मा के बल पर। जब हम उनके बल पर भरोसा करेंगे, तो वह या तो पहाड़ को मैदान बना देंगें या हमें उस पर चढने का बल और सहनशीलता देंगे।

विलम्ब से निपटना

ग्लोबल कम्प्यूटर सिस्टम आउटेज के कारण विमान उड़ाने रद्द हो जाने से, लाखों यात्री हवाई अड्डों में फंस जाते हैं। बर्फ़ीले तूफान के दौरान अनेकों वाहन दुर्घटनाओं के कारण प्रमुख राजमार्ग बंद हो जाते हैं। जिसने “तत्काल” कुछ करने का वादा किया हो, वह ऐसा नहीं कर पाता। विलम्ब अक्सर क्रोध और हताशा पैदा करता है, परन्तु यीशु के अनुयायी होने के नाते हमें मदद के लिए उनकी ओर देखने का सौभाग्य मिला है।

बाइबिल में संयम के महान उदाहरणों में से एक यूसुफ का है, जिसे उसके ईर्ष्यावान भाइयों ने दासों का व्यापार करने वालों को बेच दिया था, जिसे उसके स्वामी की पत्नी के झूठे आरोप के कारण मिस्र में कारावास मिला। "जब यूसुफ बंदीगृह में था, यहोवा यूसुफ के संग-संग रहा था"। (उत्पत्ति 39:20-21) वर्षों बाद जब यूसुफ ने फिरौन के स्वप्न की व्याख्या की, तो उसे मिस्र में दूसरा सबसे बड़ा स्थान मिला। (अध्याय 41)

उनके संयम का सबसे उल्लेखनीय फल तब आया जब उसके भाई अकाल के दौरान अनाज खरीदने आए तो उसने उनसे कहा, "मैं तुम्हारा भाई यूसुफ हूं, जिसको तुम ने मिस्र में बेच दिया था..."(45:4-5,8)।

यूसुफ के समान छोटे या लम्बे, हर विलम्ब में,  जब हम प्रभु पर विश्वास रखेंगे तो हमें भी संयम, सही दृष्टिकोण और शांति मिलेंगे।