वोल्डो को ढूँढना
वोल्डो एक लोकप्रिय उत्कृष्ट सबसे ज्यादा बिकनेवाली बच्चों की पुस्तक श्रृंखला “Where’s Waldo” का हास्य कलाकार है l वोल्डो हर पृष्ठ की भीड़भाड़ रंग भरे दृश्यों में खुद को छिपाकर बच्चों से उसे खोजने बुलाता है l संसार में हर जगह माता-पिता ऐसे क्षण पसंद करते हैं l
आरंभिक कलीसिया का सेवक, स्तिफनुस के मसीह का प्रचार करने पर पत्थरवाह से मृत्यु के थोड़े समय बाद (देखें प्रेरित 7), अनेक मसीही व्यापक सताव के कारण यरूशलेम भागे l एक अन्य सेवक, फिलिप्पुस, इन मसीहियों का सामरिया तक पीछा किया, जहाँ उसका प्रचार और वह स्वीकार किया गया (8:6) l वहाँ पर पवित्र आत्मा ने उसे “रागिस्तानी मार्ग” पर विशेष उद्देश्य से भेजा l सामरिया में उसकी फलदायी सेवा के कारण यह एक विचित्र निवेदन था l फिलिप्पुस का आनंद महसूस करें, जब उसने कुश देश के खजांची को यशायाह की पृष्ठों में यीशु को ढूढ़ने में मदद की (पद.26-40) l
हमें भी, अक्सर दूसरों की मदद करने का अवसर मिलता है कि वे बाइबिल में “यीशु को खोजकर” उसे पूरी तौर से जाने l माता-पिता का अपने बच्चे की आँखों में खोजने का और फिलिप्पुस का आनंद जब उसने यीशु को खोजने में कुश देश के व्यक्ति की मदद की, हमारे लिए अपने चारों ओर के लोगों में ऐसा होते देखना स्फूर्तिदायक है l हम केवल एक बार अपने जीवन में आत्मा की प्रेरणा अनुसार परिचितों और अपरिचितों को मसीह के विषय ज़रूर बताएँ l
गाने का कारण
गीत गाना हमारे मस्तिष्क को बदलता है! अध्ययन अनुसार, गीत गाने से शरीर से होर्मोंस निकलकर चिंता और तनाव कम करते हैं l समूहगान से दिल की धड़कनें वास्तव में एक दूसरे के साथ एक ही समय में सहमत होती हैं l
प्रेरित पौलुस कलीसिया को आपस में भजन, स्तुतिगान और आत्मिक गीत गाने को उत्साहित करता है (इफि.5:19) l और बाइबिल “स्तुति करें” पचास से अधिक बार दोहराती है l
2 इतिहास 20 में, हम परमेश्वर के लोगों को गीत गाकर परमेश्वर में भरोसा जताते हुए युद्ध में जाने की कहानी पढ़ते हैं l शत्रु के यहूदा की ओर बढ़ने पर, राजा यहोशापात ने घबराकर, प्रार्थना में समाज की गहन अगुवाई की l उन्होंने उपवास करके प्रार्थना की, “हमें कुछ नहीं सूझता ... परन्तु हमारी आँखें तेरी ओर लगी हैं” (पद.12) l अगले दिन, उनके आगे उनके सबसे खुंखार सैनिक नहीं, किन्तु उनकी संगीत मण्डली थी l उन्होंने परमेश्वर की प्रतिज्ञा पर भरोसा करके युद्ध बिना छुटकारा पाया (17) l
जब वे गाते हुए लड़ाई करने चले, शत्रु आपस में लड़ने लगे! परमेश्वर के लोगों का युद्ध भूमि में पहुँचने से पूर्व, युद्ध समाप्त हो गया l विश्वास से अज्ञात की ओर चलते और स्तुति करते हुए अपने लोगों को परमेश्वर ने बचाया l
परमेश्वर हमें अच्छे कारणों से स्तुति हेतु उत्साहित करता है l हम युद्ध में जाएँ अथवा नहीं, परमेश्वर की स्तुति हमारे विचार, हृदय और हमारे जीवनों को बदलता है l
छल्ला और अनुग्रह
अपने हाथों को देखकर मैं याद करती हूँ कि मैंने अपनी सगाई और शादी के छल्ले खो दिए l मैं यात्रा पर जाने के लिए अनेक काम में लगी थी, और नहीं मालुम वे कहाँ खो गए l
इस चिंता में कि मेरे पति को कैसा लगेगा मैं असावधानी में की गई गलती को उन्हें बताने में सहमी l किन्तु उन्होंने एक बार फिर छल्लों से अधिक मेरे प्रति सहानुभूति और चिंता दर्शायी l हालाँकि, कई बार मैं उनकी मनोहरता चाहती हूँ! इसके विपरीत, वह, मेरे विरुद्ध यह घटना याद नहीं करते है l
बहुत बार हम अपने पापों को याद करके परमेश्वर की क्षमा प्राप्ति के लिए कुछ करने की सोचते हैं l किन्तु परमेश्वर ने कहा है कि विश्वास के द्वारा अनुग्रह ही से तुम्हारा उद्धार हुआ है (इफि. 2:8-9) l परमेश्वर ने इस्राएल को एक नयी वाचा के विषय बताते समय कहा, “मैं उनका अधर्म क्षमा करूँगा, और उनका पाप फिर स्मरण न करूँगा” (यिर्म. 31:34) l हमारा परमेश्वर क्षमा करके हमारी गलतियों को स्मरण नहीं करता l
हम अपने अतीत के विषय उदास हो सकते हैं, किन्तु हमें उसकी प्रतिज्ञाओं पर भरोसा करके उसके अनुग्रह और क्षमा पर विश्वास करना है कि ये यीशु में विश्वास द्वारा वास्तविक हैं l यह समाचार और विश्वास की निश्चयता हमें धन्यवादित बनाए l जब परमेश्वर क्षमा करता है, वह भूल जाता है l
परमेश्वर बुलाता है
एक सुबह मेरी बेटी ने अपने ग्यारह माह के बेटे को मनाने के लिए अपना मोबाइल फ़ोन दे दिया l तुरन्त मेरा फ़ोन बजा, और उसे उठाते साथ उसकी छोटी आवाज़ सुनाई दी l उससे मेरे नंबर का “स्पीड डायल” बटन दब गया था और उसके बाद अविस्मरणीय “बातचीत” आरंभ हुई l मेरा नाती थोड़े शब्द बोलता है, किन्तु मेरी आवाज़ पहचानकर मुझे उत्तर देता है l इसलिए मैंने उससे बात करके कहा कि मैं उसे बहुत प्यार करती हूँ l
अपने नाती की आवाज़ सुनकर प्राप्त आनंद मेरे लिए परमेश्वर का हमारे साथ सम्बन्ध रखने की गहरी इच्छा की ताकीद थी l आरंभ ही से, बाइबिल बताती है कि परमेश्वर हमें सक्रियतापूर्वक खोज रहा है l आदम और हव्वा का परमेश्वर की आज्ञा उल्लंघन पश्चात छिपने पर परमेश्वर ने आदम से पूछा, “तू कहाँ है?” (उत्प. 3:9) l
परमेश्वर निरन्तर यीशु के द्वारा मानवता को खोजता रहा l क्योंकि परमेश्वर हमारे साथ सम्बन्ध चाहता है, उसने यीशु को संसार में क्रूस पर उसकी मृत्यु द्वारा हमारे पापों का दंड चुकाने भेजा l “जो प्रेम परमेश्वर ... रखता है, वह इस से प्रगट हुआ ....कि उसने ...हमारे पापों के प्रायश्चित के लिए अपने पुत्र को भेजा” (1 यूहन्ना 4:9-10) l
यह जानना कितना अच्छा है कि परमेश्वर हमसे प्रेम करता है और चाहता है कि हम यीशु के द्वारा उसके प्रेम का प्रतिउत्तर दें l बोलने में हमारी असमर्थता के बावजूद, हमारा पिता हमसे सुनना चाहता है!
पंद्रह मिनट की चुनौती
लम्बे समय तक हार्वर्ड विश्वविद्यालय के अध्यक्ष रहे, डॉ. चार्ल्स डब्ल्यू इलियट, मानते थे कि साधारण लोग भी निरंतर विश्व के महान साहित्य से कुछ मिनट प्रतिदिन पढ़कर अनमोल ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं l 1910 में, उन्होंने विश्व-साहित्यों से कुछ भाग चुनकर द हार्वर्ड क्लासिक्स नाम से पचास पुस्तकें संकलित कीं l पुस्तकों के हर सेट में डॉ. इलियट की “हर दिन पंद्रह मिनट” शीर्षक की पठन मार्गदर्शिका थी जिसमें पूरे वर्ष हर दिन आठ से दस पृष्ठ पढ़ने की सलाह थी l
कितना अच्छा होता यदि हम प्रतिदिन पन्द्रह मिनट परमेश्वर का वचन पढ़ते? हम भजनकार के साथ बोल पाते, “मेरे मन को लोभ की ओर नहीं, अपनी चितौनियों ही की ओर फेर दे l मेरी आँखों को व्यर्थ वस्तुओं की ओर से फेर दे; तू अपने मार्ग में मुझे जिला” (भजन 119:36-37) l
प्रतिदिन पन्द्रह मिनट जुड़कर एक वर्ष में इक्यानवे घंटे हो जाते हैं l किन्तु हम बाइबिल पठन के लिए जितना भी समय देते हों, रहस्य निरंतरता और मुख्य सामग्री सिद्धता नहीं किन्तु दृढ़ता है l यदि हम एक दिन अथवा एक सप्ताह भूल जाते हैं, हम पुनः आरंभ करें l जैसे पवित्र आत्मा सिखाता है, परमेश्वर का वचन हमारे मस्तिष्क से हृदय को ओर, उसके बाद हमारे हाथों और पैरों तक अर्थात हमें ज्ञान से रूपांतरण तक ले जाता है l
“हे यहोवा, मुझे अपनी विधियों का मार्ग दिखा दे; तब मैं उसे अंत तक पकड़े रहूँगा” (पद.33) l
हमें क्या चाहिए?
एक वृद्ध ने बताया कि उसने अपनी नतिनी से घोड़ा और बग्गी से लेकर चाँद पर चलते हुए मानव की बात की l किन्तु फिर सोचकर बोला, “मैंने कभी नहीं सोचा यह इतनी छोटी होगी l”
जीवन छोटा है, और अनेक अनंतकालिक जीवन हेतु यीशु का अनुसरण करते हैं l यह बुरा नहीं है, किन्तु समझना होगा कि अनंत जीवन है क्या l हमारी इच्छा गलत हैं l हमें कुछ बेहतर चाहिए, और हमारी सोच है कि वह अति निकट है l काश मुझे स्कूल के शीघ्र बाद नौकरी मिल जाती, मेरी शादी हो जाती l मैं सेवा-निवृत हो जाता l काश मैं ... l और तब एक दिन दादा की आवाज़ प्रतिध्वनित हुई, समय बीत गया l
सच्चाई यह है, अभी हमारे पास अनंत जीवन है l प्रेरित पौलुस ने लिखा, “जीवन की आत्मा की व्यवस्था ने मसीह यीशु में मुझे पाप की और मृत्यु की व्यवस्था से स्वतंत्र कर दिया (रोमियों 8:2) l शारीरिक व्यक्ति शरीर की बातों पर मन लगाते हैं; परन्तु आध्यात्मिक आत्मा की बातों पर मन लगते हैं (पद.5) l अर्थात्, हमारी इच्छाएँ मसीह के निकट आने से बदल जाती हैं l यह स्वाभाविकता से हमारी सर्वोत्तम इच्छा पूरी करता है l “आत्मा पर मन लगाना जीवन और शांति है” (पद.6) l
यह जीवन का एक सबसे बड़ा झूठ है कि वास्तविक जीवन जीने से पूर्व हमें कहीं और रहना है, कुछ और करना है, किसी और के साथ l यीशु में जीवन पाने के बाद, हम जीवन की संक्षिप्तता के अफ़सोस को उसके संग जीवन के सम्पूर्ण आनंद से अभी और हमेशा के लिए बदल लेते हैं l
सम्पूर्ण शांति
एक सहेली ने मुझे बताया कि वर्षों तक वह शांति और संतोष खोजती रही l वह और उसके पति ने एक बड़ा व्यापार स्थापित करके एक बड़ा घर, सुन्दर कपड़े, और कीमती गहने खरीदे l किन्तु इन संपत्तियों के साथ प्रभावशाली लोगों से मित्रता ने भी शांति की उसकी आन्तरिक इच्छा को सनुष्ट न कर सके l तब एक दिन जब वह उदास और परेशान थी, एक सहेली ने उसे यीशु का सुसमाचार सुनाया l वहाँ उसने शांति के राजकुमार को खोज लिया, और सच्ची शांति और संतोष के विषय उसकी समझ हमेशा के लिए बदल गयी l
अपने मित्रों के साथ आखिरी भोज खाने के बाद उसने इस तरह की ही शांति के शब्द कहे (यूहन्ना 14), जब उसने उनको आनेवाली घटनाओं-उसकी मृत्यु, पुनरुत्थान, और पवित्र आत्मा का अवतरण-के विषय तैयार किया, जो संसार देने में असमर्थ था l वह उनको कठिनाई के मध्य सुख के भाव प्राप्त करना सिखाना चाहता था l
बाद में, पुनरुत्थित प्रभु अपनी मृत्यु के बाद भयातुर शिष्यों के सामने प्रकट होकर, उनका अभिवादन किया, “तुम्हें शांति मिले!” (यूहन्ना 20:19) l अब वह उनको और हमें अपने किये हुए कार्य में विश्राम की एक नयी समझ दे सकता है l ऐसा करके हम हमेशा परिवर्तनशील भावनाओं के मध्य एक अति गहरा भरोसा प्राप्त कर सकते हैं l
कोई भरोसेमंद व्यक्ति
मेरी सहेली आँसुओं से बोली, “कोई भरोसेमंद नहीं है l भरोसा करने पर, वे हर समय मुझे दुःख देते हैं l” मैं उसकी कहानी से क्रोधित हुयी-एक भरोसेमंद पूर्व मित्र, ने उनके बीच सम्बन्ध टूटने पर अफ़वाहें फैलाने लगा l पीड़ादायक बचपन के बाद पुनः भरोसा करने हेतु प्रयासरत, यह धोखा मात्र एक और पुष्टिकरण था कि लोग भरोसेमंद नहीं हैं l
मुझे सुखकर शब्द नहीं मिला l एक बात मैं न कह सकी कि उसका यह ख्याल गलत था कि पूर्ण भरोसेमंद व्यक्ति खोजना कठिन है, अर्थात् अधिकतर लोग पूर्ण दयालु और भरोसेमंद हैं l उसकी कहानी दर्दनाक थी, और मैंने अपने जीवन में अनपेक्षित धोखे के क्षण याद किये l वस्तुतः, वचन मानवीय स्वभाव के विषय बहुत निष्पक्ष है l नीतिवचन 20:6 में, लेखक भी मेरी सहेली की तरह धोखे के दर्द को हमेशा याद करके विलाप करता है l
मैं यह कह सकती हूँ कि दूसरों की क्रूरता कहानी का केवल एक हिस्सा है l यद्यपि दूसरों का दिया हुआ घाव वास्तविक और पीड़ादायक है, यीशु ने सच्चा प्रेम सम्भव किया है l यूहन्ना 13:35 में, यीशु ने अपने शिष्यों से कहा कि संसार उनके प्रेम से जानेगा कि वह उसके शिष्य हैं l यद्यपि कुछ लोग हमें दुःख देंगे, यीशु के कारण हमेशा ऐसे लोग होंगे जो, खुलकर उसका प्रेम बाँटकर, हमें शर्तहीन सहयोग देकर देखभाल करेंगे l उसके अक्षय प्रेम में विश्राम करते हुए, चंगाई, संगति, और उसकी तरह प्रेम करने का साहस प्राप्त करें l
टेबल रॉक
मेरे शहर के सामने एक चट्टानी पहाड़ी मैदान, टेबल रॉक पर एक बड़ा, चमकदार क्रूस, खड़ा है l निकट की भूमि पर अनेक घर बनाए गए, किन्तु हाल ही में सुरक्षा कारणों से मालिकों से वहाँ से हटने को बोला गया है l टेबल रॉक के सुदृढ़ आधार पर होने के बावजूद, ये मकान सुरक्षित नहीं हैं l वे अपनी नींव के ऊपर से सरक रहे हैं-करीब तीन इंच प्रतिदिन-जिससे जल पाइपलाइन के टूटने का जोखिम उत्पन्न है, जो सरकन को और बढ़ाएँगी l
यीशु उसके शब्दों को सुनकर उस पर चलनेवालों को चट्टान पर घर बनानेवालों से तुलना करता है (लूका 6:47-48) l उनके घर आंधियों में भी टिके रहते हैं l तुलनात्मक तौर पर, वह कहता है कि जिस घर का नींव सुदृढ़ नहीं है-उसके वचन पर नहीं चलनेवालों की तरह-आंधियों का सामना नहीं कर पाएंगे l
कई अवसर पर, मैं अपने विवेक की बातें नहीं सुनने की परीक्षा में पड़ा हूँ जब परमेश्वर ने मेरे देने से अधिक मुझ से मांगी है, और मेरी सोच थी कि मेरा प्रतिउत्तर “काफी निकट” था l फिर भी सरकती पहाड़ी पर के घरों ने दर्शाया है कि उसके प्रति आज्ञाकारिता की तुलना में “निकटता” महत्वहीन है l उन लोगों की तरह जिन्होंने दृढ़ नींव पर अपने घर बनाए और अक्सर आक्रमण करती जीवन की आंधियाँ सहते हैं, हमें भी अपने प्रभु की बातें पूरी तरह मानना होगा l