क्या मैं क्षमा करूँ?
मैं एक घटना की तैयारी हेतु अपने चर्च में जल्दी पहुँच गयी l अतीत में मेरे प्रति क्रूर और आलोचनात्मक रही एक स्त्री चर्च की वेदी के दूसरी ओर खड़ी रो रही थी l इसलिए मैंने जल्द ही वैक्युम क्लीनर की आवाज़ में उसकी सिसकियों को दबा दिया l मुझे पसंद नहीं करने वाले की चिंता मैं करूँ क्यों?
पवित्र आत्मा ने मुझे परमेश्वर की बड़ी क्षमा स्मरण करायी l मैं उसके पास गयी l उस स्त्री ने बताया कि उसका बच्चा हॉस्पिटल में महीनों से भरती है l हम रोए, गले मिले, और उसकी बेटी के लिये प्रार्थना की l अपने मतभेदों को मिटाकर, अब हम अच्छे मित्र थे l
मत्ती 18 में, यीशु स्वर्गिक राज्य की तुलना एक राजा से करता है जो हिसाब करना चाहता है l एक अत्यधिक कर्ज़दार दास ने दया माँगी l राजा द्वारा क्षमा मिलने पर उसने अपने एक कर्ज़दार व्यक्ति को दोषी ठहराया जो राजा के प्रति उससे कम कर्ज़दार था l राजा ने, क्षमा नहीं करने के कारण दुष्ट दास को कैद कर दिया (पद. 23-34) l
क्षमा करने का चुनाव पाप की अनदेखी नहीं है, गलतियों को बहाना नहीं मानता, अथवा हमारी क्षति को कम नहीं करता l क्षमा केवल परमेश्वर की अनर्जित करुणा का आनंद लेने में मदद करता है, जब हम उसको अपने जीवनों और हमारे संबंधों में शांति अर्थात अनुग्रह के कार्य करने देते हैं l
स्मृति की सेवा
हानि, और निराशा के हमारे अनुभव हमें क्रोधित, दोषी और भ्रमित करते हैं l चाहे हमारे चुनावों के कारण कुछ दरवाज़े नहीं खुलेंगे अथवा, हमारे दोष के बगैर, त्रासदी हमारे जीवनों में है, परिणाम अक्सर वही है जिसे ऑस्वाल्ड चेम्बर्स कहते हैं ‘हो सकता है’ का “अगाध दुःख l” हम दर्दनाक स्मृति को दबाने में असफल होंगे l
चैम्बर्स हमें याद दिलाते हैं कि परमेश्वर हमारे जीवनों में क्रियाशील है l “जब परमेश्वर अतीत को वापस लाए कभी भयभीत न होना,” उसने कहा l “स्मृति को कार्य करने दें l यह डांट, दंड और दुःख के साथ परमेश्वर का मंत्री है l परमेश्वर ‘हो सकता है’ को भविष्य हेतु एक अदभुत संस्कृति [उन्नति का स्थान] में बदल देगा l
जब परमेश्वर ने पुराने नियम के समय इस्राएलियों को बेबिलोन के निर्वासन में भेजा, उनको वापस उनके घर लाने तक उसने उनको उस विदेशी भूमि पर अपने विश्वास में बढ़ने को कहा l “क्योंकि यहोवा की यह वाणी है, कि जो कल्पनाएँ मैं तुम्हारे विषय करता हूँ उन्हें मैं जानता हूँ, वे हानि की नहीं, वरन् कुशल ही की हैं, और अंत में तुम्हारी आशा पूरी करूँगा” (यिर्मयाह 29:11) l
परमेश्वर ने उनको अतीत की घटनाओं को नज़रंदाज़ नहीं करने अथवा उनमें फंसने के बदले उस पर केन्द्रित होकर आगे देखने को कहा l परमेश्वर की क्षमा हमारे दुःख की स्मृति को उसके अनंत प्रेम में भरोसा में बदल सकती है l
पांच मिनट का नियम
मैं एक माँ को याद करता हूँ जिसके पास पांच मिनट का नियम था l प्रतिदिन बच्चों को स्कूल जाने से पांच मिनट पूर्व प्रार्थना के लिए इकट्ठा होना होता था l
बच्चे माँ के चारों ओर इकठ्ठा होते और वह प्रत्येक का नाम लेकर उनके दिन पर प्रभु का आशीष मांगती l फिर उसके प्यार करने के बाद वे चले जाते l पड़ोस के बच्चे भी इसमें शामिल हो जाते थे l कई वर्षों बाद एक बच्चे ने सीखी गई दैनिक प्रार्थना की विशेषता का अनुभव बताया l
भजन 102 का लेखक प्रार्थना का महत्त्व जानता था l इस भजन को कहते हैं, “दीन जन की उस समय की प्रार्थना जब वह दुःख का मारा अपने शोक की बातें यहोवा के सामने खोलकर कहता हो l” उसने पुकारा, “हे यहोवा, मेरी प्रार्थना सुन; ... जिस समय मैं पुकारूँ, उसी समय फुर्ती से मेरी सुन ले” (पद. 1-2) l परमेश्वर “ऊँचे ... स्थान से दृष्टि करके ... स्वर्ग से पृथ्वी की ओर देखा” (पद. 19) l
परमेश्वर आपकी चिंता करता है और आपकी सुनना चाहता है l चाहे आप पांच मिनट का नियम मानकर अपने दिन पर आशीष मांगे, या परेशानी के समय उसे अधिक समय पुकारते हैं, प्रभु से रोज़ प्रार्थना करें l आपका उदाहारण आपके परिवार और पड़ोसी पर गहरा प्रभाव डालेगा l
अन्तरिक्ष में अकेला
अपोलो 15 के अन्तरिक्ष यात्री एल वोर्डन चाँद के ऊपर का अनुभव जानता था l क्योंकि तीन दिन पहले 1971 में, वह अकेले अपने अन्तरिक्ष यान (कमांड मोड्यूल) Endeavor में गया, जबकि दो सहयोगी हजारों मील नीचे चाँद की धरती पर कार्यरत रहे l उसके एकलौते मित्र अनगिनित तारे उसे ज्योति की चादर में लपेटे हुए थे l
जब सूर्यास्त बाद पुराने नियम के चरित्र याकूब ने अपने घर से दूर अकेले रात बिताई, वह भी अकेला था, किन्तु एक भिन्न कारण से l वह अपने सगे भाई से दूर भाग रहा था-जो उसे परिवार की आशीष का अधिकार जो स्वाभाविक तौर से पहलौठे का होता था, छीनने के कारण उसको मारना चाहता था l फिर भी नींद में, याकूब ने सपने में स्वर्ग और पृथ्वी के बीच एक सीढ़ी देखी l उसने स्वर्गदूतों को चढ़ते उतरते देखते हुए परमेश्वर को उसे प्रतिज्ञा देते सुना कि वह उसके साथ रहकर उसके बच्चों द्वारा समस्त संसार को आशीषित करेगा l याकूब जागकर बोला, “निश्चय इस स्थान में यहोवा है; और मैं इस बात को नहीं जानता था” (उत्पत्ति 28:16) l
अपने धोखे के कारण याकूब अकेला था l फिर भी अपने वास्तविक पराजय, और रात की कालिमा में, वह उसकी उपस्थिति में था जिसके पास हमेशा हमारे लिए दूर तक की बेहतर योजना है l हमारी कल्पना से निकट स्वर्ग है और “याकूब का परमेश्वर” हमारे साथ है l
स्पर्श मात्र
किली पूर्वी अफ्रीका के एक दुरस्त क्षेत्र में एक मेडिकल मिशन पर जाने का अवसर पाकर प्रसन्न थी, किन्तु असहज l उसके पास मेडिकल अनुभव नहीं था l फिर भी, वह बुनियादी देखभाल कर सकती थी l
वहाँ रहते हुए उसकी मुलाकात एक महिला से हुयी जो भयंकर किन्तु साध्य रोग से ग्रस्त थी l उसका विकृत टांग उसको अकेला रखता था, किन्तु किली को कुछ करना ही था l टांग को साफ़ करके पट्टी करते समय, मरीज़ चिल्लाने लगी l चिंतित किली ने पूछा कि वह उसको तकलीफ तो नहीं पहुँचा रही l “नहीं,” उसने उत्तर दिया l “नौ वर्षों में पहली बार किसी ने मुझे छुआ है l”
कुष्ठ एक और बिमारी है जो अपने शिकार को दूसरों से दूर करता है, और प्राचीन यहूदी संस्कृति में इसके प्रसार को रोकने के लिए कठोर मार्गदर्शिकाएं थीं : “उन्हें अकेला रहना था,” व्यवस्था की घोषणा थी l “उसका निवास स्थान छावनी से बाहर हो” (लैव्य. 13:46) l
इसलिए यह असाधारण है कि एक कुष्ठ रोगी यीशु के निकट आकर बोला, “हे प्रभु, यदि तू चाहे, तो मुझे शुद्ध कर सकता है” (मत्ती 8:2) l “यीशु ने हाथ बढ़ाकर उसे छुआ, और कहा, “मैं चाहता हूँ, तू शुद्ध हो जा” (पद. 3) l
एक अकेली महिला का रोग ग्रस्त टांग छूकर, किली ने मसीह के भयमुक्त, एक करनेवाला प्रेम प्रदर्शित किया l मात्र एक स्पर्श अंतर लाता है l
परमेश्वर से प्रश्न
यदि आपके किसी कार्य-दिवस में प्रभु एक सन्देश लेकर आपके पास आता, आप क्या करते? एक प्राचीन यहूदी, गिदोन के साथ ऐसा हुआ l “उसको यहोवा के दूत ने दर्शन दिया, ‘हे शूरवीर सूरमा, यहोवा तेरे संग है l’” गिदोन मूक रह सकता था, किन्तु उसने कहा, “यदि यहोवा हमारे संग होता, तो हम पर यह सब विपत्ति क्यों पड़ती?” (न्या. 6:12-13) l मानो परमेश्वर ने अपने लोगों को त्याग दिया था, गिदोन जानना चाहता था l
परमेश्वर ने उस प्रश्न का उत्तर नहीं दिया l गिदोन के सात वर्षों तक शत्रुओं का आक्रमण, भुखमरी और गुफाओं में छिपने के बाद, परमेश्वर ने हस्तक्षेप नहीं करने का कारण नहीं बताया l उसने इस्राएल के अतीत के पापों को न जताते हुए, उसको आशा दी l उसने कहा, “अपनी इसी शक्ति पर जा और तू इस्राएलियों को मिद्यानियों के हाथ से छुड़ाएगा l निश्चय मैं तेरे संग हूँ l (न्यायियों 6:14,16) l
क्या आपने कभी सोचा क्यों परमेश्वर ने आपके जीवन में दुःख आने दी? उस ख़ास प्रश्न के उत्तर के बदले, परमेश्वर आपको अपनी निकटता से आज संतुष्ट करके ताकीद देता है कि आप दुर्बलता में उसकी सामर्थ्य पर निर्भर हों l गिदोन के अंततः भरोसा करने पर कि परमेश्वर साथ था और मदद करेगा, उसने एक वेदी बनाकर उसको “यहोवा शालोम” नाम दिया (पद.24) l
इसमें शांति है कि हमारे हर काम और स्थान में, परमेश्वर साथ रहेगा l
हमेशा प्रेम किया गया
कोई भी दिन किसी न किसी तरह का अपमान, उपेक्षा और अनादर सहे बिना शायद बिताना असंभव है l कभी-कभी हम खुद के साथ भी ऐसा करते हैं l
दाऊद के शत्रुओं से धमकी देने, डराने और निंदा करने की बू आ रही थी l आत्म-सम्मान और भलाई का उसका भाव अचानक से धराशायी हो गया था (भजन 4:1-2) l उसने अपनी “सकेती” से निकलने के लिए सहायता मांगी l
तब दाऊद ने याद किया, “यह जान रखो कि यहोवा ने भक्त को अपने लिए अलग कर रखा है” (पद.3) l अंग्रेजी के विभिन्न अनुवाद दाऊद के दृढ़ उक्ति का पूर्ण भाव “भक्त” बताते हैं l यहाँ पर इब्रानी शब्द, हेसेद (hesed) का शब्दशः सन्दर्भ परमेश्वर के प्रेम के वाचा से है और उसका अर्थ हो सकता है “जिनको परमेश्वर हमेशा, हमेशा, हमेशा के लिए प्रेम करेगा l”
यहाँ पर वह बात है जो हमें याद रखना है : उस प्रिय पुत्र की तरह हमसे सदा प्रेम किया जाता है, हम विशेष रूप से अलग किये गए हैं l उसने हमें अनंतकाल के लिए अपनी संतान होने के लिए बुलाया है l
निराश होने की जगह, हम अपने पिता से प्राप्त प्रेम को याद करें जो हमें मुफ्त में मिला है l हम उसके अति प्रिय बच्चे हैं l अंत निराशा नहीं किन्तु शांति और आनंद है (पद.7-8) l वह हमें त्यागता नहीं, और वह कभी भी हमसे प्रेम करना नहीं छोड़ेगा l
जब सुबह होती है
जब हम म्युनिक के बाहर ग्रामीण विश्रामगृह में रात बिताने पहुंचे तो काफी रात हो चुकी थी l हम अपना बाल्कनी वाला आरामदायक कमरा पाकर खुश थे, यद्यपि एक कष्टकर कुहरे से अँधेरे में देखना असंभव था l किन्तु कुछ घंटे बाद सूर्योदय होने पर, धुंध फटने लगा l तब जो रात के समय बहुत छुपा हुआ था अब हम देख सकते थे-एक सम्पूर्ण रमणीय दृश्य-शांत और हरा-भरा चारागाह, घास चरती भेड़ें जिनके गलों में बजती छोटी घंटियाँ, और आकाश में सफ़ेद बादल जो और बड़ी, रोयेंदार भेड़ों की तरह दिखाई देती थीं!
कभी-कभी जीवन निराशा के भारी कुहरे से ढक जाता है l हमारी स्थिति अत्यधिक अंधकारमय दिखाई देने के कारण आशा जाती रहती है l किन्तु जैसे सूरज से कुहरा फट जाता है, परमेश्वर में हमारा विश्वास सन्देह का शंका हटा देता है l इब्रानियों 11 में विश्वास की परिभाषा “आशा की हुयी वस्तुओं का निश्चय, और अनदेखी वस्तुओं का प्रमाण है” (पद.1) l परिच्छेद आगे हमें नूह का विश्वास याद दिलाता है, जो “दिखाई न देनेवाली बातों के विषय चेतावनी पाया,” फिर भी परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारी रहा (पद.7) l और अब्राहम जो परमेश्वर के मार्गदर्शन में चला-यद्यपि वह अपना गंतव्य नहीं जानता था (पद.8) l
यद्यपि हमनें उसे नहीं देखा है और हर समय उसकी उपस्थिति का आभास नहीं करते हैं, परमेश्वर हमेशा उपस्थित रहता है और हमारे अंधकारमय रातों में भी लिए चलेगा l
क्रोध का विकल्प
एक दिन पर्थ, ऑस्ट्रेलिया में फिओन मुलहॉलैंड ने देखा कि उसकी कार नहीं थी l उसने जाना कि गलती से उसने निषिद्ध क्षेत्र में कार खड़ी कर दी थी इसलिए वह खींच ली गयी थी l स्थिति की जांच के बाद, अर्थात्, खींचकर ले जाने और पार्किंग जुर्माना 600 डॉलर देने के बाद, मुलहॉलैंड निराश हुआ, किन्तु उसने निर्णय लिया कि वह अपनी कार को छुड़ाने के लिए सम्बंधित व्यक्ति पर क्रोधित नहीं होगा l उसने क्रोध न दर्शाते हुए उस स्थिति के विषय एक हास्य कविता लिखकर गाड़ी-यार्ड के कार्यकर्त्ता को पढ़कर सुनाया l कार्यकर्त्ता ने कविता पसंद की, और संभवतः भद्दी बातचीत टल गयी l
नीतिवचन की पुस्तक सिखाती है, “मुक़दमें से हाथ उठाना, ... महिमा ठहरती है” (20:3) l झगड़ा वह घर्षण है जो या तो अन्दर ही अन्दर उबलती रहती है अथवा खुले में फूट जाती है जब दो लोग एक मत नहीं होते l
परमेश्वर ने दूसरों के साथ शांतिपूर्ण ढंग से रहने के लिए संसाधन दिए हैं l उसका वचन आश्वस्त करता है कि क्रोध तो करो किन्तु पाप ने करो (इफि.4:26) l उसकी आत्मा हमें क्रोध की चिंगारियों को बुझाने की ताकत देता है जो हमें परेशान करनेवालों पर टूट पड़ने से हमें रोकती हैं l और उत्तेजित होने पर परमेश्वर ने हमें अनुसरण के लिए अपना उदाहरण दिया है (1 पतरस 2:23) l वह दयालु, अनुग्रहकारी, विलम्ब से कोप करनेवाला और अति करुणामय है l