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अँधेरे पथ

पारिवारिक अवकाश से घर लौटते समय, सड़क मध्य ऑरेगन के कुछ विरान भाग से होकर थी l  लगभग दो घंटों तक हम गहरी घाटियों और मरुभूमि के पठारी क्षेत्रों से होकर निकले l अन्धकार में दस से भी कम गाड़ियों की हेड लाइट्स दिखाई दीं l आख़िरकार,  पहाड़ों के बीच-बीच क्षितिज पर चाँद दिखाई दिया, किन्तु निचले क्षेत्रों से जाते समय छिप गया l मेरी बेटी ने चाँद के प्रकाश को परमेश्वर की उपस्थिति  का ताकीद कहा l मैं परमेश्वर की उपस्थिति बताने हेतु उससे उसे देखने के लिए कहा l उत्तर था, “नहीं, किन्तु यह अवश्य ही लाभदायक रहेगा l

मूसा की मृत्यु पश्चात, यहोशू को परमेश्वर की चुनी हुई इस्राएली प्रजा को प्रतिज्ञात देश में ले जाने हेतु नेतृत्व मिला l दिव्य अधिकार-पत्र प्राप्ति बाद भी, यहोशू कार्य के चुनौतीपूर्ण स्वभाव से चुनौती महसूस किया होगा l परमेश्वर ने भविष्य की यात्रा में यहोशू के  साथ रहने का आश्वासन दिया (यहोशू 1:9) l

जीवन का मार्ग अनिश्चित क्षेत्र से गुज़रता है l हम अस्पष्ट मार्गों में भिन्न स्थितियों में गुज़रते हैं l परमेश्वर का मार्ग सर्वदा दिखाई नहीं देता, किन्तु उसने “जगत के अंत तक सदा” साथ रहने की प्रतिज्ञा की है (मत्ती 28:20) l चाहे कोई भी अनिश्चितता या चुनौती हो हमारे पास महान आश्वासन है l अँधेरे मार्ग में भी, ज्योति हमारे साथ है l

अत्यधिक अच्छा, बाँटना ही होगा

कचहरी की कार्यवाही के मध्य, दर्शकों से अधिक संख्याओं में गवाह होते हैं l किसी केस का परिणाम निर्धारित करने में ये क्रियाशील भागीदारी निभाते हैं l मसीह के लिए हम गवाहों के साथ भी ऐसा ही है l हमें निरपेक्ष महत्त्व अर्थात् यीशु की मृत्यु और पुनरुत्थान के विषय क्रियाशील भागीदार बनना है l

यूहन्ना बपतिस्मादाता लोगों को जगत की ज्योति, यीशु के विषय बताते हुए यीशु के विषय अपने ज्ञान द्वारा घोषणा किया l और इन घटनाओं का लेखक, शिष्य यूहन्ना, ने यीशु के साथ अपने अनुभव की गवाही दी : “वचन देहधारी हुआ; और अनुग्रह और सच्चाई से परिपूर्ण होकर हमारे बीच में डेरा किया, और हम ने उसकी ऐसी महिमा देखी, जैसी पिता के एकलौते की महिमा” (यूहन्ना 1:14) l प्रेरित पौलुस अपने युवा शिष्य, तीमुथियुस को बताया, “और जो बातें तू ने बहुत से गवाहों के सामने मुझ से सुनी हैं, उन्हें विश्वासी मनुष्यों को सौंप दे; जो दूसरों को भी सिखाने के योग्य हों” (2 तीमू. 2:2) l

मसीही के रूप में हम भी संसार की कचहरी में उपस्थित हैं l बाइबिल अनुसार हम भागिदार हैं l यीशु की मृत्यु और पुनरुत्थान की सच्चाई के गवाह हैं l यूहन्ना बपतिस्मादाता मरुभूमि में पुकारनेवाली एक आवाज़ था l हमारी आवाज़ हमारे कार्यस्थल, पड़ोस, चर्च और परिजनों और मित्रों में सुनाई दे l हम अपने जीवनों में यीशु की सच्चाई के क्रियाशील गवाह हो सकते हैं l

इंतज़ार का बोझ

पिछले कुछ वर्षों में, मेरे परिवार के दो लोगों ने घातक बिमारियों का सामना किया l मेरे लिए उनके इलाज में सहयोग का कठिनतम भाग निरंतर अनिश्चितता रही है l मैं हमेशा डॉक्टर के निश्चित उत्तर के विषय निराश रहा हूँ, किन्तु शायद ही स्थितियाँ रही हों l स्पष्टता की जगह, हमें ठहरने को कहा जाता है l

अनिश्चितता का बोझ उठाना कठिन है, सर्वदा अगली जांच के लिए उत्सुक l  क्या हमें मृत्यु द्वारा अलगाव से पूर्व सप्ताह, महिना, साल, या दशक का समय मिलेगा? किन्तु बिमारी और इलाज के बावजूद, एक दिन हमारी मृत्यु होगी-कैंसर जैसी बातें हमारी नश्वरता को हमारे मस्तिष्क के रिक्त स्थानों में छिपाने की जगह हमारे सामने ला देती हैं l  

हमारी नश्वरता की ऐसी गंभीर ताकीद से सामना होने पर, मैं मूसा की प्रार्थना करने लगता हूँ l भजन 90 हमसे कहता है कि यद्यपि हमारे जीवन घास के समान मुर्झा और सुख जाती है(पद.5-8), हमारे पास परमेश्वर के साथ अनंत निवास है(पद.1) l मूसा के समान, हम बुद्धिमान निर्णय लेने हेतु, परमेश्वर से अपने दिन गिनने की (पद.12), और अपने कार्यों द्वारा अपने संचिप्त जीवनों को उसके सामने महत्वपूर्ण बनाने हेतु  समझ मांगे(पद.17) l अनन्तः, यह भजन ताकीद देता है कि डॉक्टर के इलाज पर हमारी आशा नहीं किन्तु “अनादिकाल से अनंतकाल तक” के परमेश्वर पर है l

अँधेरे में स्तुति

अपनी आखों की रोशनी जाते देख कर भी मेरा मित्र मिकी ने कहा, “मैं प्रतिदिन परमेश्वर की स्तुति करता रहूँगा, क्योंकि उसने मेरे लिए बहुत किया है l”

यीशु ने मिकी और हमें निरंतर स्तुति करने का परम कारण किया है l मत्ती 26 अध्याय हमें बताता है कि यीशु किस तरह क्रूसित होने से पूर्व अपने शिष्यों के साथ फसह का भोज खाया l पद 30 हमें भोज का अंत बताता है : “फिर वे भजन गाकर जैतून पहाड़ पर गए l”

यह भजन कोई और नहीं स्तुति का भजन था l हजारों वर्षों से, यहूदियों ने फसह के समय “हल्लेल” [Hallel] नमक भजनों का एक समूह गाते आएं हैं (इब्री भाषा में हल्लेल अर्थात “स्तुति” है l) भजन 113-118 में पायी जानेवाली प्रार्थनाएं और गीत हमारे उद्धारक परमेश्वर के आदर में है (118:21) l वह निकम्मा ठहराए गए पत्थर का सन्दर्भ देता है जो कोने का सिरा हो गया (पद. 22) और जो प्रभु के नाम में आता है (पद.26) l वे यह भी गा सकते थे, “आज वह दिन है जो यहोवा ने बनाया है; हम इसमें मगन और आनंदित हों” (पद.24) l

यीशु ने अपने शिष्यों के साथ स्तुति करके, हमें हमारे तात्कालिक स्थितियों से ऊपर नज़र उठाने का अंतिम कारण दे रहा था l वह हमारे परमेश्वर के अविरल प्रेम और विश्वासयोग्यता की प्रशंसा में अगुवाई कर रहा था l

क्या मैं क्षमा करूँ?

मैं एक घटना की तैयारी हेतु अपने चर्च में जल्दी पहुँच गयी l अतीत में मेरे प्रति क्रूर और आलोचनात्मक रही एक स्त्री चर्च की वेदी के दूसरी ओर खड़ी रो रही थी l इसलिए मैंने जल्द ही वैक्युम क्लीनर की आवाज़ में उसकी सिसकियों को दबा दिया l मुझे पसंद नहीं करने वाले की चिंता मैं करूँ क्यों?

पवित्र आत्मा ने मुझे परमेश्वर की बड़ी क्षमा स्मरण करायी l  मैं उसके पास गयी l उस स्त्री ने बताया कि उसका बच्चा हॉस्पिटल में महीनों से भरती है l हम रोए, गले मिले, और उसकी बेटी के लिये प्रार्थना की l अपने मतभेदों को मिटाकर, अब हम अच्छे मित्र थे l

मत्ती 18 में, यीशु स्वर्गिक राज्य की तुलना एक राजा से करता है जो हिसाब करना चाहता है l एक अत्यधिक कर्ज़दार दास ने दया माँगी l राजा द्वारा क्षमा मिलने पर उसने अपने एक कर्ज़दार व्यक्ति को दोषी ठहराया जो राजा के प्रति उससे कम कर्ज़दार था l राजा ने, क्षमा नहीं करने के कारण दुष्ट दास को कैद कर दिया (पद. 23-34) l

क्षमा करने का चुनाव पाप की अनदेखी नहीं है, गलतियों को बहाना नहीं मानता, अथवा हमारी क्षति को कम नहीं करता l क्षमा केवल परमेश्वर की अनर्जित करुणा का आनंद लेने में मदद करता है, जब हम उसको अपने जीवनों और हमारे संबंधों में शांति अर्थात अनुग्रह के कार्य करने देते हैं l  

स्मृति की सेवा

हानि, और निराशा के हमारे अनुभव हमें क्रोधित, दोषी और भ्रमित करते हैं l चाहे हमारे चुनावों के कारण कुछ दरवाज़े नहीं खुलेंगे अथवा, हमारे दोष के बगैर, त्रासदी हमारे जीवनों में है, परिणाम अक्सर वही है जिसे ऑस्वाल्ड चेम्बर्स कहते हैं ‘हो सकता है’ का “अगाध दुःख l” हम दर्दनाक स्मृति को दबाने में असफल होंगे l

चैम्बर्स हमें याद दिलाते हैं कि परमेश्वर हमारे जीवनों में क्रियाशील है l “जब परमेश्वर अतीत को वापस लाए कभी भयभीत न होना,” उसने कहा l “स्मृति को कार्य करने दें l यह डांट, दंड और दुःख के साथ परमेश्वर का मंत्री है l परमेश्वर ‘हो सकता है’ को भविष्य हेतु एक अदभुत संस्कृति [उन्नति का स्थान] में बदल देगा l

जब परमेश्वर ने पुराने नियम के समय इस्राएलियों को बेबिलोन के निर्वासन में भेजा, उनको वापस उनके घर लाने तक उसने उनको उस विदेशी भूमि पर अपने विश्वास में बढ़ने को कहा l “क्योंकि यहोवा की यह वाणी है, कि जो कल्पनाएँ मैं तुम्हारे विषय करता हूँ उन्हें मैं जानता हूँ, वे हानि की नहीं, वरन् कुशल ही की हैं, और अंत में तुम्हारी आशा पूरी करूँगा” (यिर्मयाह 29:11) l

परमेश्वर ने उनको अतीत की घटनाओं को नज़रंदाज़ नहीं करने अथवा उनमें फंसने के बदले उस पर केन्द्रित होकर आगे देखने को कहा l परमेश्वर की क्षमा हमारे दुःख की स्मृति को उसके अनंत प्रेम में भरोसा में बदल सकती है l

पांच मिनट का नियम

मैं एक माँ को याद करता हूँ जिसके पास पांच मिनट का नियम था l प्रतिदिन बच्चों को स्कूल जाने से पांच मिनट पूर्व प्रार्थना के लिए इकट्ठा होना होता था l

बच्चे माँ के चारों ओर इकठ्ठा होते और वह प्रत्येक का नाम लेकर उनके दिन पर प्रभु का आशीष मांगती l फिर उसके प्यार करने के बाद वे चले जाते l पड़ोस के बच्चे भी इसमें शामिल हो जाते थे l कई वर्षों बाद एक बच्चे ने सीखी गई दैनिक प्रार्थना की विशेषता का अनुभव बताया l

भजन 102 का लेखक प्रार्थना का महत्त्व जानता था l इस भजन को कहते हैं, “दीन जन की उस समय की प्रार्थना जब वह दुःख का मारा अपने शोक की बातें यहोवा के सामने खोलकर कहता हो l” उसने पुकारा, “हे यहोवा, मेरी प्रार्थना सुन; ... जिस समय मैं पुकारूँ, उसी समय  फुर्ती से मेरी सुन ले” (पद. 1-2) l परमेश्वर “ऊँचे ... स्थान से दृष्टि करके ... स्वर्ग से पृथ्वी की ओर देखा” (पद. 19) l

परमेश्वर आपकी चिंता करता है और आपकी सुनना चाहता है l चाहे आप पांच मिनट का नियम मानकर अपने दिन पर आशीष मांगे, या परेशानी के समय उसे अधिक समय पुकारते हैं, प्रभु से रोज़ प्रार्थना करें l आपका उदाहारण आपके परिवार और पड़ोसी पर गहरा प्रभाव डालेगा l

अन्तरिक्ष में अकेला

अपोलो 15 के अन्तरिक्ष यात्री एल वोर्डन चाँद के ऊपर का अनुभव जानता था l क्योंकि तीन दिन पहले 1971 में, वह अकेले अपने अन्तरिक्ष यान (कमांड मोड्यूल) Endeavor में गया, जबकि दो सहयोगी हजारों मील नीचे चाँद की धरती पर कार्यरत रहे l उसके एकलौते मित्र अनगिनित तारे उसे ज्योति की चादर में लपेटे हुए थे l

जब सूर्यास्त बाद पुराने नियम के चरित्र याकूब ने अपने घर से दूर अकेले रात बिताई, वह भी अकेला था, किन्तु एक भिन्न कारण से l वह अपने सगे भाई से दूर भाग रहा था-जो उसे परिवार की आशीष का अधिकार जो स्वाभाविक तौर से पहलौठे का होता था, छीनने के कारण उसको मारना चाहता था l फिर भी नींद में, याकूब ने सपने में स्वर्ग और पृथ्वी के बीच एक सीढ़ी देखी l उसने स्वर्गदूतों को चढ़ते उतरते देखते हुए परमेश्वर को उसे प्रतिज्ञा देते सुना कि वह उसके साथ रहकर उसके बच्चों द्वारा समस्त संसार को आशीषित करेगा l याकूब जागकर बोला, “निश्चय इस स्थान में यहोवा है; और मैं इस बात को नहीं जानता था” (उत्पत्ति 28:16) l

अपने धोखे के कारण याकूब अकेला था l फिर भी अपने वास्तविक पराजय, और रात की कालिमा में, वह उसकी उपस्थिति में था जिसके पास हमेशा हमारे लिए दूर तक की बेहतर योजना है l हमारी कल्पना से निकट स्वर्ग है और “याकूब का परमेश्वर” हमारे साथ है l

स्पर्श मात्र

किली पूर्वी अफ्रीका के एक दुरस्त क्षेत्र में एक मेडिकल मिशन पर जाने का अवसर पाकर प्रसन्न थी, किन्तु असहज l उसके पास मेडिकल अनुभव नहीं था l फिर भी, वह बुनियादी देखभाल कर सकती थी l

वहाँ रहते हुए उसकी मुलाकात एक महिला से हुयी जो भयंकर किन्तु साध्य रोग से ग्रस्त थी l उसका विकृत टांग उसको अकेला रखता था, किन्तु किली को कुछ करना ही था l टांग को साफ़ करके पट्टी करते समय, मरीज़ चिल्लाने लगी l चिंतित किली ने पूछा कि वह उसको तकलीफ तो नहीं पहुँचा रही l “नहीं,” उसने उत्तर दिया l “नौ वर्षों में पहली बार किसी ने मुझे छुआ है l”

कुष्ठ एक और बिमारी है जो अपने शिकार को दूसरों से दूर करता है, और प्राचीन यहूदी संस्कृति में इसके प्रसार को रोकने के लिए कठोर मार्गदर्शिकाएं थीं : “उन्हें अकेला रहना था,” व्यवस्था की घोषणा थी l “उसका निवास स्थान छावनी से बाहर हो” (लैव्य. 13:46) l

इसलिए यह असाधारण है कि एक कुष्ठ रोगी यीशु के निकट आकर बोला, “हे प्रभु, यदि तू चाहे, तो मुझे शुद्ध कर सकता है” (मत्ती 8:2) l “यीशु ने हाथ बढ़ाकर उसे छुआ, और कहा, “मैं चाहता हूँ, तू शुद्ध हो जा” (पद. 3) l

एक अकेली महिला का रोग ग्रस्त टांग छूकर, किली ने मसीह के भयमुक्त, एक करनेवाला प्रेम प्रदर्शित किया l मात्र एक स्पर्श अंतर लाता है l