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किसी का उत्सव मनाना

चरनी के अनेक दृश्यों में, ज्योंतिषियों को चरवाहों के साथ बेतलहम में यीशु से मिलते दर्शाया जाता है l किन्तु मत्ती के सुसमाचार के अनुसार, ज्योतिषी यीशु से मिलने एक घर में आते हैं l वह एक सराए के गौशाले की चरनी में  नहीं था l मत्ती 2:11 हमें बताता है, “उन्होंने उस घर में पहुँचकर उस बालक को उसकी माता मरियम के साथ देखा, और मुँह के बल गिरकर बालक को प्रणाम किया, और अपना-अपना थैला खोलकर उसको सोना, और लोबान, और गंधरस की भेंट चढ़ाई l”

यह जानकार कि ज्योतिषी बाद में यीशु से मिलने आए हमें नया वर्ष आरंभ करते समय एक ताकीद मिलती है l छुट्टियों के बाद जब हम पुनः अपने दिनचर्या में लौटते हैं, हमारे पास अभी भी कोई है जिसके साथ हम उत्सव माना सकते हैं l

यीशु मसीह प्रत्येक मौसम में इम्मानुएल, “परमेश्वर हमारे साथ” है (मत्ती 1:23) l उसने “सदा” (28:20) हमारे साथ रहने का वादा किया है l क्योंकि वह सदा हमारे साथ है, हम अपने हृदयों में उसकी आराधना प्रतिदिन कर सकते हैं और भरोसा कर सकते हैं कि वह आनेवाले वर्षों में भी विश्वासयोग्य रहेगा l जैसे ज्योतिषियों ने उसको खोजा, हम भी उसको अपने स्थान पर खोजें और उपासना करें l

परमेश्वर की सुनना

मेरे युवा पुत्र को मेरी आवाज़ पसंद है, सिवाय इसके कि जब मैं उसका नाम ज़ोर से और कठोरता से इस प्रश्न के साथ पुकारती हूँ, “तुम कहाँ हो?” ऐसा मैं तब करती हूँ, जब वह कुछ नटखटी करके मुझसे छिप रहा होता है l मैं चाहती हूँ कि मेरा बेटा मेरी आवाज़ सुने क्योंकि मैं उसकी भलाई और सुरक्षा चाहती हूँ

आदम और हव्वा परमेश्वर की आवाज़ से परिचित थे l l हालांकि, वर्जित फल को खाकर अनाज्ञाकारिता के बाद, वे उसकी आवाज़ सुनकर, “तुम कहाँ हो?” छिप गए (उत्पत्ति 3:9) l वे गलती करने के कारण परमेश्वर का सामना नहीं कर पा रहे थे-कुछ जिसे उसने माना किया था (पद.11) l

जब परमेश्वर ने आदम और हव्वा को पुकारकर उन्हें बगीचे में पाया, उसके शब्दों में अवश्य ही सुधार और परिणाम था (पद.13-19) l किन्तु परमेश्वर ने उन पर दया दिखाई और उद्धारकर्ता की प्रतिज्ञा में मानवता के लिए आशा भी दी(पद.15) l

परमेश्वर हमें खोजे, यह ज़रूरत नहीं है l उसे ज्ञात है हम कहाँ हैं और हम क्या छिपाने की कोशिश कर रहे हैं l किन्तु एक प्रेमी पिता होने के कारण, वह हमारे हृदयों से बातें करना चाहता है और हमें क्षमा और आरोग्यता देना चाहता है l उसकी इच्छा है हम उसकी आवाज़ सुने-और ध्यान दें l

गुणित प्रेम

जब केरेन के चर्च की एक महिला के विषय पता चला कि उसे ALS(amyotrophic lateral sclerosis या Lou Gehrig) नामक जानलेवा बीमारी हो गई है, स्थिति अच्छी नहीं थी l यह क्रूर बीमारी तंत्रिकाओं और मांशपेशियों को प्रभावित करके रोगी को लकवाग्रस्त कर देता है l पारिवारिक बीमा से घर में इलाज संभव नहीं था और उसका पति नर्सिंग होम में इलाज करने की कल्पना भी नहीं कर सकता था l

नर्स होने के कारण केरेन उस महिला की सेवा करने उसके घर जाने लगी l किन्तु जल्द ही वह समझ गई कि अपने मित्र की सेवा करते हुए वह अपने परिवार की देखभाल नहीं कर पा रही थी, इसलिए उसने चर्च में दूसरों को सेवा भाव सीखना आरंभ कर दी l अगले सात वर्षों में  बीमारी के बढ़ने पर केरेन ने अपने अलावा इकतीस स्वयंसेवकों को प्रशिक्षित किया जिन्होंने उस परिवार को प्रेम, प्रार्थना, और व्यावहारिक सहायता दी l

“जो कोई परमेश्वर से प्रेम रखता है [उसे] अपने भाई [और बहन] से भी प्रेम [रखना होगा],” प्रेरित यूहन्ना ने कहा (1 यूहन्ना 4:21) l केरेन उस प्रकार के प्रेम का एक दीप्त उदाहरण देती है l वह कुशल, प्रेमी, और एक चर्च परिवार को एक दुखित मित्र की सेवा हेतु प्रेरित करने वाली थी l एक ज़रूरतमन्द व्यक्ति के लिए उसका प्रेम गुणित व्यावहारिक प्रेम बन गया l

जैसा प्रतीत नहीं होता

डॉन, दक्षिणी लानकशायर, स्कॉटलैंड के एक फार्म में रहनेवाला एक बार्डर कुली है l एक दिन उसका मालिक और वह, एक छोटे वाहन में कुछ पशुओं को देखने गए l टॉम, वाहन में  ब्रेक लगाना भूलकर नीच उतार गया l डॉन, चालक के सीट पर बैठा था और वाहन सुरक्षित रुकने से पूर्व, ढलान पर और आगे दो पंक्तियों के यातायात में धीमी चलती गई l मोटर-चालकों को लगा जैसे कोई कुत्ता सुबह की सैर करने निकला है l बिल्कुल, बातें हमेशा जैसी होती हैं, वैसी दिखती नहीं l

ऐसा महसूस हो रहा था जैसे एलिशा और उसके सेवक को गिरफ्तार करके आराम के राजा के पास पहुंचाया जाएगा l राजा की सेना ने शहर को चारों ओर से घेर लिया था जहां एलिशा और उसका सेवक थे l सेवक का मानना था कि मृत्यु निकट है, किन्तु एलिशा ने कहा, “मत डर; क्योंकि जो हमारी ओर हैं, वह [शत्रु] ... से अधिक हैं” (2 राजा 6:16) l एलिशा की प्रार्थना पश्चात, सेवक स्वर्गिक सेना को उनकी सुरक्षा के लिए अपना मोर्चा संभाले देखा l

स्थितियाँ जो आशाहीन दिखाई देती हैं हमेशा वैसी नहीं होतीं जैसी हमें दिखती हैं l जब हम अभिभूत और संख्या में थोड़े महसूस करते हैं, हम स्मरण रखें परमेश्वर हमारी ओर है l वह “अपने दूतों को [हमारे] निमित्त आज्ञा [देगा] [कि वह हमारी] रक्षा करें” (भजन 91:11) l

पूर्ण उपहार

अमरीका में क्रिसमस के बाद के सप्ताह वर्ष का सबसे व्यस्त समय व्यवसाय के पुनः आरंभ होने का समय जब लोग अनचाहे उपहारों का लेन-देन वास्तविक ज़रुरतों की वस्तुओं से करते हैं l फिर भी शायद आप पूर्ण उपहार देनेवालों को जानते होंगे l उनको कैसे मालूम दूसरे व्यक्ति के लिए महत्वपूर्ण और अवसर के लिए उचित क्या है? सही उपहार देना दूसरों को सुनने और व्यक्ति की रुचि जानने से होती है कि वह किसमें आनंदित और प्रसन्नचित होते हैं l

यह परिवार और मित्रों के साथ सही है l किन्तु परमेश्वर के साथ क्या? क्या परमेश्वर को भेट करने के लिए कुछ अर्थपूर्ण और विशेष है? क्या कुछ है जो उसके पास नहीं है?

 रोमियों 11:33-36, परमेश्वर की महान बुद्धिमत्ता, ज्ञान, और महिमा के लिए प्रशंसा के गीत पश्चात उसके प्रति हमारे समर्पण की बुलाहट है l ”इसलिए हे भाइयों, मैं तुम से परमेश्वर की दया स्मरण दिला कर विनती करता हूँ कि अपने शरीरों को जीवित, और पवित्र, और परमेश्वर को भावता हुआ बलिदान करके चढ़ाओ l यही तुम्हारी आत्मिक सेवा है” (पद. 12:1) l अपने चारो ओर के संसार के सदृश न बनकर, हमारे “मन के नए हो जाने से [हमारा] चालचलन भी बदलता जाए” (पद.2) l

आज हम कौन सा सर्वोत्तम उपहार परमेश्वर को दे सकते हैं? हम धन्यवाद, दीनता, और प्रेम में सम्पूर्ण रूप से अपने को दें-हृदय,मन,और इच्छा l प्रभु यही हमसे चाहता है l

धन्यवादी जीवन

अपने आत्मिक जीवन में परिपक्व और अधिक धन्यवादी होने की इच्छा से, सु ने धन्यवादी-जीवन मर्तबान बनाया l रोज़ शाम वह एक कागज पर परमेश्वर के प्रति धन्यवाद का विषय लिखकर मर्तबान में डाल देती थी l कुछ दिन उसके पास अनेक प्रशंसा होती थी; दूसरे कठिन दिनों में वह एक ढूँढने के लिए संघर्ष करती थी l वर्ष के अंत में उसने मर्तबान को खाली करके सभी पर्चे पढ़े l उसने अपने को परमेश्वर को उसके हर एक कार्य के लिए धन्यवाद  देते हुए पाया l उसने खुबसूरत सूर्यास्त  या पार्क में घुमने के लिए ठंडी शाम और दूसरे मौकों पर उसे  किसी कठिन समस्या के हल के लिए अनुग्रह या प्रार्थना का उत्तर जैसी सरल आशीषें दी थीं l

सु की खोज मुझे भजनकार दाऊद के अनुभव की ताकीद देती है (भजन 23) l परमेश्वर ने उसे “हरी हरी चराईयों” और “सुखदाई जल” से तरोताज़ा किया (पद.2-3) l उसने उसे  मार्गदर्शन, सुरक्षा, और शांति दी (पद.3-4) l दाऊद अंत करता है : “निश्चय भलाई और करुणा जीवन भर मेरे साथ-साथ बनी रहेंगी” (पद.6) l

मैं इस वर्ष धन्यवादी-जीवन मर्तबान बनाउँगी l शायद आप भी l मेरा विचार है हमारे पास परमेश्वर को धन्यवाद देने के अनेक कारण होंगे-मित्र और परिवार और उसके भौतिक, आत्मिक, और भावनात्मक ज़रूरतों के साथ l हम देखेंगे कि परमेश्वर की भलाई और करुणा और प्रेम हमारे साथ जीवन भर रहेंगे l

आज वह दिन है

मेरी पूर्वस्कूली नातिन मैगी और उसकी KG क्लास में पढ़नेवाली बहन केटी घर के पीछे कम्बल तम्बू बनाकर खेलने के लिए अनेक कम्बल ले गए l दोनों कुछ समय तक बाहर थे जब माँ ने मैगी को उसे बुलाते सुना l

“माँ, जल्दी आइये!” मैगी चिल्लाई l “मैं यीशु को अपने हृदय में बुलाना चाहती हूँ, और मुझे आपकी सहायता चाहिए l प्रत्यक्ष तौर पर उसने अपने जीवन में यीशु की ज़रूरत महसूस किया, और वह उसमें विश्वास करने को तैयार थी l

मैगी का यीशु पर भरोसा हेतु सहायता माँगना 2 कुरिन्थियों 6 में उद्धार के लिए पौलुस के शब्द याद दिलाते हैं l वह यीशु मसीह की-मृत्यु और पुनरुत्थान के साथ-उसके आने की सत्यता पर चर्चा कर रहा था, एक युग का आरंभ जिसे वह “[परमेश्वर की प्रसन्नता का समय” कहता है l हम ऐसे ही युग में रहते हैं, उद्धार अभी उपलब्ध है l उसने कहा, “देखो, अभी वह प्रसन्नता का समय है; देखो, अभी बह उद्धार का दिन है” (पद.2) l यीशु से क्षमा प्राप्ति हेतु विश्वास नहीं करनेवाले हर एक के लिए ऐसा करने का समय अभी है l यह अत्यावश्यक है l

शायद पवित्र आत्मा ने यीशु में विश्वास करने हेतु आपकी ज़रूरत आपको बता दी है l मैगी की तरह, इसे दूर न करें l यीशु के पास जाएं l आज वह दिन है!

परमेश्वर के साथ एकाकी

चर्च के कमरे में जहाँ मैं मदद कर रही थी एक व्यस्त सुबह थी l करीब एक दर्जन बच्चे चहक और खेल रहे थे l गतिविधियों के कारण कमरा गर्म हो गया और मैंने दरवाजा खोल दी l एक छोटा बच्चा यह सोचकर बाहर निकलना चाहा कि कोई उसे नहीं देख रहा है l मैं चौंकी नहीं, कि वह सीधे अपने पापा की बांहों में गया l

उस बच्चे ने वही किया जो ज़रूरी है जब जीवन व्यस्त और अभिभूत करता है-वह अपने पापा के पास भागा l यीशु भी अपने पिता के साथ प्रार्थना का समय ढूंढ़ता था l कुछ लोग कहेंगे कि उसको कमज़ोर करनेवाली मानवीय ऊर्जा की कमी को वह इसी तरह पूरा करता था l मत्ती रचित सुसमाचार के अनुसार वह एकान्त स्थान में जा रहा था जब भीड़ उसके पीछे थी l उनकी ज़रूरतों को जानकार, यीशु ने आश्चर्यजनक रूप से उनको चंगा किया और भोजन खिलाया l उसके बाद, हालाँकि, वह “प्रार्थना करने को अलग पहाड़ पर चला गया” (पद.23) l

यीशु ने बार-बार लोगों की मदद की, किन्तु खुद को थकित नहीं होने दिया और जल्दबाजी नहीं की l उसने प्रार्थना द्वारा परमेश्वर के साथ अपने सम्बन्ध को मजबूत किया l आपके साथ कैसा है? क्या आप परमेश्वर की सामर्थ्य और पूर्णता प्राप्त करने हेतु उसके साथ समय बिताएंगे?

अंगूठी(Signet ring)

एक नए विदेशी मित्र से मिलने पर मैंने उसकी शानदार अंग्रेजी उच्चारण और उसकी छोटी ऊँगली में अंगूठी देखी l बाद में पता चला कि वह मात्र आभूषण नहीं था; उस पर अंकित परिवार की शिखा पारिवारिक इतिहास बता रही थी l

वह मुद्रिका समान थी-शायद जिस तरह हाग्गै में वर्णित है l इस संछिप्त पुराने नियम की पुस्तक में, नबी हाग्गै परमेश्वर के लोगों से मंदिर के पुनःनिर्माण का आह्वान करता है l वे निर्वासन से अपने देश लौटकर मंदिर का पुनःनिर्माण आरंभ कर चुके थे, किन्तु शत्रु विरोध ने उनकी योजना स्थगित कर दिया था l हाग्गै के सन्देश में यहूदा के अगुआ, ज़रुब्बाबेल को दी गई प्रतिज्ञा भी है, कि एक अंगूठी की तरह वह उसका चुना हुआ और अलग किया हुआ अगुआ है l

प्राचीन काल में, अंगूठी पहचान हेतु उपयोग होती थी l हस्ताक्षर करने की बजाए, लोग अपनी अंगूठी से गरम मोम या मुलायम मिट्टी में निशान लगाते थे l परमेश्वर की संतान होकर, हम भी सुसमाचार फैलाकर, उसके अनुग्रह से पड़ोसी से प्रेम करके, और शोषण को ख़त्म करने में प्रयास करके, संसार पर निशान छोड़ते हैं l

हममें से प्रत्येक का अपना अद्वितीय निशान है  जो हममें परमेश्वर स्वरुप प्रकट करता है और ख़ास वरदान, अनुराग, और बुद्धिमत्ता का मिश्रण दर्शाता है l

हमें परमेश्वर के संसार में अंगूठी की तरह बनने की बुलाहट और अवसर मिला है l