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अनपेक्षित दयालुता

मेरी सहेली किराने की दूकान का भुगतान करने के लिए खड़ी थी जब एक व्यक्ति ने उसे 10 पौण्ड(14 डॉलर) दिए l उसकी नींद पूरी नहीं होने के कारण, वह उसकी दयालुता के कार्य के कारण रोने लगी; और उसके बाद अपने रोने पर हँसने लगी l यह अनपेक्षित दयालुता उसके हृदय को छु गया था और थकान में उसे आशा मिली थी l दूसरे व्यक्ति द्वारा भलाई  के लिए उसने प्रभु का धन्यवाद दिया l
इफिसुस के गैर-यहूदी मसीहियों को लिखे अपने पत्र में प्रेरित पौलुस का प्रमुख विचार देने के सम्बन्ध में था l उसने यह कहकर कि वे अनुग्रह से बचाए गए हैं, उनसे पुराने जीवनों को पीछे छोड़कर नए जीवन को गले लगाने को कहा l उसने समझाया कि इस बचाने वाले अनुग्रह से, “भले काम” करने की इच्छा निकलती है क्योंकि हम परमेश्वर के स्वरुप में बनाए गए हैं और उसके हाथ की “कारीगिरी हैं” (2:10) l  सुपर मार्केट में उस व्यक्ति की तरह, हम अपने दैनिक कार्यों के द्वारा परमेश्वर का प्रेम फैला सकते हैं l
निस्संदेह, ज़रूरी नहीं कि हम परमेश्वर का अनुग्रह बाँटने के लिए भौतिक वस्तुएँ दें; हम उसके प्रेम को दूसरे कार्यों द्वारा दर्शा सकते हैं l जो हमसे बात करना चाहता है, हम समय निकालकर उसकी सुन सकते हैं l जो हमारी सेवा करते हैं हम उनका हाल चाल पूछ सकते हैं l हम ठहरकर किसी की ज़रूरत पूरी कर सकते हैं l जब हम दूसरों को देंगे, हम बदले में आनंद प्राप्त करेंगे (प्रेरितों 20:35) l

प्रमुख उत्कर्ष

मेरे माता-पिता ने मुझे सभी प्रकार का संगीत पसंद करना सिखाया-देसी से लेकर शास्त्रीय संगीत तक l इसलिए जब मैं मास्को राष्ट्रीय सिम्फनी(सम स्वरता) सुनने के लिए रूस के एक सबसे बड़े संगीत हॉल, मास्को कन्सरवेटरी(रक्षा गृह) में गया मेरा हृदय गति से धड़कने लगा l जब संचालक ने संगीतकारों को कुशल काइकोफस्की(प्रसिद्ध रुसी गीतकार एवं संगीतकार) अंश बजाने को कहा, धुन विकसित होकर धीरे-धीरे एक प्रबल अर्थात् एक गहन/प्रगाढ़ और नाटकीय संगीत उत्कर्ष में बदल गया l
वचन इतिहास के सबसे प्रबल उत्कर्ष की ओर बढ़ता है : यीशु मसीह का क्रूस और उसका पुनरुत्थान l अदन के बगीचे में आदम और हव्वा के पाप में गिर जाने के बाद, परमेश्वर ने एक उद्धारकर्ता के आने की प्रतिज्ञा दी (उत्पति 3:15)), और पूरा पुराना नियम में यह मुख्य विषय आगे बढ़ता गया l यह प्रतिज्ञा फसह के मेमने में (निर्गमन 12:21), नबियों की आशा में (1 पतरस 1:10), और परमेश्वर के लोगों की चाहतों में गुंजायमान हुयी l
1 यूहन्ना 4:14 उस कहानी के लक्ष्य को प्रमाणित करता है : “हम ने देख भी लिया और गवाही देते हैं कि पिता ने पुत्र को जगत का उद्धारकर्ता करके भेजा है l” कैसे? परमेश्वर ने अपने टूटे संसार के लिए अपनी बचाव प्रतिज्ञा को पूरा किया जब यीशु हमें क्षमा देने के लिए और हमारे सृष्टिकर्ता के साथ हमारे सम्बन्ध को पुनःस्थापित करने के लिए मृत्यु सहा और जी उठा l और एक दिन वह पुनः वापस आएगा और अपने सम्पूर्ण सृष्टि को पुनःस्थापित कर देगा l
जब हम हमारे लिए परमेश्वर पुत्र का कार्य याद करते हैं, हम परमेश्वर का अनुग्रह अर्थात् यीशु का महान उत्कर्ष और अपने लिए और उसके संसार के लिए बचाव का उत्सव मानते हैं l

शांति कहाँ है?

“क्याआप अभी भी शांति की आशा करते हैं” 1984 में एक संवाददाता ने बॉब डिलन (एक अमरीकी गायक, गीतकार, संगीतकार) से पूछा l
“कोई शांति नहीं होगी,” डिलन ने उत्तर दिया l उसके उत्तर की आलोचना हुयी, फिर भी यह इनकार नहीं किया जा सकता कि शांति निरंतर दुष्प्राप्य है l
मसीह से 600 वर्ष पूर्व, अधिकतर नबी शांति की भविष्वाणी कर रहे थे l परमेश्वर का नबी उनमें से एक नहीं था l यिर्मयाह ने लोगों को स्मरण दिलाया कि परमेश्वर ने कहा है, “मेरे वचन को मानो, तब मैं तुम्हारा परमेश्वर हूँगा, और तुम मेरी प्रजा ठहरोगे” (यिर्मयाह 7:23) l फिर भी बार-बार उन्होंने प्रभु और उसकी आज्ञाओं की अवहेलना की l उनके झूठे नबियों ने कहा, “शांति है, शांति” (8:11), किन्तु यिर्मयाह ने विनाश की नबूवत की l ई.पु. 586 में यरूशलेम नष्ट हो गया l
शांति दुर्लभ है l किन्तु यिर्मयाह की खौफनाक नबुवतों के मध्य हम निरंतर एक प्रेम करनेवाले परमेश्वर को देखते हैं l प्रभु ने अपने अवज्ञाकारी लोगों से कहा, “मैं तुम से सदा प्रेम रखता आया हूँ . . . मैं तुझे फिर बसाऊंगा” (31:3-4) l
परमेश्वर प्रेम और शांति का परमेश्वर है l उसके प्रति हमारे विद्रोह के कारण विरोध उत्पन्न होता है l पाप संसार की शांति को नष्ट करता है और हमारी भीतरी शांति छीन लेता है l यीशु हमारे संसार में हमें परमेश्वर से मिलाने और हमें वही भीतरी शांति देने आया l पौलुस ने लिखा, “इसलिए विश्वास के द्वारा धर्मी ठहराए जाकर अपने प्रभु यीशु मसीह के द्वारा परमेश्वर से हमारा मेल है” (रोमियों 5:1) l उसके लिखे शब्द सबसे अधिक आशा से पूर्ण हैं l
चाहे हम प्रतिरोधक क्षेत्र में रहते हों या शांत पड़ोस में जहां लड़ाई की फुसफुसाहट मात्र भी न हो, मसीह हमें अपनी शांति देने के लिए आमंत्रित करता है l

वश में रखना असम्भव

मेक्सिको की खाड़ी में अपने मित्रों के साथ तैरती हुयी, कैत्लिन का एक शार्क से सामना हुआ, जो उसके पैरों पर झपटकर उसे खींचने लगा l कैत्लिन ने जवाबी हमले में शार्क के नाक पर एक जोर का घूँसा मारा l हिंसक शार्क हारकर उसके पाँवों को छोड़कर चला गया l यद्यपि उसके काटने के कारण उसे 100 से अधिक टाँके लगे, शार्क कैत्लिन को अपने पकड़ में नहीं ले सका l
यह कहानी मुझे यह सच्चाई याद दिलाती है कि यीशु ने मृत्यु पर वार करके, उसके अनुयायियों को डराने और उन्हें पराजित करने की उसकी शक्ति समाप्त कर दी l पतरस के अनुसार, “क्योंकि मृत्यु के वश में रहना उसके लिए असम्भव था” (प्रेरितों 2:24) l
पतरस ने यरूशलेम में एक भीड़ से यह शब्द कहे l शायद उनमें से कईयों ने यीशु को दण्डित करने के लिए चिल्लाए होंगे, “वह क्रूस पर चढ़ाया जाए” (मत्ती 27:22) l परिणामस्वरूप, रोमी सैनिकों ने उसे मरने तक क्रूस पर टंगा हुआ रखा l परमेश्वर द्वारा यीशु को जिलाए जाने तक उसका शरीर तीन दिनों तक कब्र में रखा रहा l उसके पुनरुत्थान के बाद, पतरस और अन्य लोग उससे बात और उसके साथ भोजन किया, और चालीस दिनों के बाद वह स्वर्ग पर उठा लिया गया (प्रेरितों 1:9) l
पृथ्वी पर यीशु का जीवन शारीरिक दुःख और मानसिक पीड़ा के मध्य बीता, इसके बावजूद परमेश्वर की सामर्थ्य ने कब्र को पराजित कर दिया l इसके कारण, मृत्यु या कोई और संघर्ष/पीड़ा हमें सर्वदा अपने पकड़ में नहीं रख सकती l एक दिन सभी विश्वासी परमेश्वर की उपस्थिति में अनंत जीवन और परिपूर्णता का अनुभव करेंगे l उस भविष्य पर केन्द्रित होकर हम वर्तमान में स्वतंत्रता का अनुभव कर सकते हैं l  

मार्ग का चुनाव

मेरे पास शरद ऋतु की एक खूबसूरत तस्वीर है जिसमें कोलोराडो पहाड़ों पर एक युवा घोड़े पर बैठा हुआ सोच रहा है आगे कौन सा मार्ग चुनना है l यह मुझे रोबर्ट फ्रॉस्ट की कविता “द रोड नॉट टेकेन” (The Road Not Taken) की याद दिलाता है l उसमें फ्रॉस्ट अपने आगे दो मार्गों पर विचार करता है l दोनों लुभावने हैं, किन्तु उसे शक है वह पुनः इस स्थान पर लौटेगा, और उसे एक मार्ग चुनना होगा l फ्रॉस्ट लिखते हैं, “दो मार्ग भिन्न दिशाओं में जंगल में जाते हैं, और मैंने, हाँ मैंने उस मार्ग का चुनाव किया जिसपर कम लोग चलते हैं, और इस चुनाव ने सम्पूर्ण परिवर्तन ला दिया l”
यीशु के पहाड़ी उपदेश में (मत्ती 5-7), प्रभु ने अपने सुननेवालों से कहा, “सकेत मार्ग से प्रवेश करो, क्योंकि चौड़ा है वह फाटक और सरल है वह मार्ग जो विनाश को पहुंचता है; और बहुत से हैं जो उस से प्रवेश करते हैं l क्योंकि सकेत है वह फाटक और कठिन है वह मार्ग जो जीवन को पहुंचता है; और थोड़े हैं जो उसे पाते हैं” (7:13-14) l
जीवन की हमारी यात्रा में, किस मार्ग पर चलना है के विषय हमारे पास अनेक चुनाव होते है l बहुत से मार्ग भरोसा देनेवाले और आकर्षक होते हैं किन्तु जीवन का मार्ग केवल एक ही है l यीशु हमसे परमेश्वर के वचन के प्रति शिष्यता और आज्ञाकारिता का मार्ग चुनने को कहता है अर्थात् भीड़ की अपेक्षा उसका अनुसरण करना l
जब हम आगे के मार्ग पर विचार करते हैं, परमेश्वर हमें उसके मार्ग पर अर्थात् जीवन के मार्ग पर चलने में बुद्धिमत्ता और साहस दे l यह हमारे लिए और जिनसे हम प्रेम करते हैं उनके लिए सम्पूर्ण बदलाव लेकर आएगा l

कद्दू में धन

एक युवा माँ होकर, मैंने अपनी बेटी के पहले साल का सनद(document) रखा l हर महीने, मैंने उसमें बदलाव और विकास देखने के लिए उसके फोटो खींचे l एक पसंदीदा फोटो में वह स्थानीय किसान से ख़रीदे गए कद्दू में जो खोखला किया गया था बैठी खिलखिलाती दिखाई दे रही थी l मेरा जिगर का टुकड़ा उस बड़े कद्दू में बैठी हुयी थी l वह कद्दू बाद में सूख कर ख़त्म हो गया, किन्तु मेरी बेटी निरंतर उन्नति करती और बढ़ती गयी l
जिस प्रकार पौलुस यीशु कौन है की सच्चाई जानने का वर्णन करता है, उससे मैं उस फोटो को याद करती हूँ l वह यीशु का हमारे हृदय में वास करने को मिट्टी के बरतन में रखे धन से तुलना करता है l हमारे लिए यीशु के कार्य का स्मरण “चारों ओर से क्लेश . . . भोगने” (2 कुरिन्थियों 4:8) की स्थिति के बावजूद हमें संघर्षों में धीरज धरने में साहस और सामर्थ्य देता है l हमारे जीवनों में परमेश्वर की सामर्थ्य के कारण, जब हम “गिराए . . . जाते हैं, पर नष्ट नहीं होते हैं,” हम यीशु का जीवन प्रगट करते हैं (पद.9) l
उस कद्दू की तरह जो नष्ट हो गया, हम अपने संघर्षों में टूट-फूट महसूस करेंगे l किन्तु उन चुनौतियों के बावजूद यीशु में हमारा आनंद बढ़ता जाएगा l हमारा उसका जानना अर्थात् हमारे जीवनों में उसकी सामर्थ्य का कार्य वह धन है जो हमारे दुर्बल मिट्टी के शरीरों में है l हम कठिनाई में उन्नति कर सकते हैं क्योंकि उसकी सामर्थ्य हमारे अन्दर कार्य करती है l

मेरा वास्विक रूप

अतीत में धर्मनिष्ठ जीवन से निम्न आचरण के कारण अयोग्यता और लज्जा की भावनाएं, वर्षों तक, मेरे जीवन के प्रत्येक भाग पर विपरीत प्रभाव डालती रहीं l मेरे कलंकित नेकनामी की सीमा को यदि दूसरे जान जाते तो क्या होता? यद्यपि परमेश्वर ने मुझे साहस दिया जिससे मैं एक सेवा अगुवा(महिला) को दोपहर भोजन पर आमंत्रित कर सकी l मैंने सिद्ध दिखाई देने का  प्रयास किया l मैंने अपने घर को साफ़ किया, तीन प्रकार का भोजन तैयार किया, और सबसे अच्छे वस्त्र पहने l
मैंने सामने के प्रांगन का फव्वारा(sprinkler) बंद कर दिया l रिसती हुयी टोंटी को बंद करते समय, अचानक पानी की तेज़ धार से पूरी तौर से भीगने पर मैं चिल्ला उठी l अपने बालों को तौलिये से लपेटकर और बिगड़े मेकअप के साथ, मैंने अपने कपड़े बदल लिए l और उसी समय दरवाजे की घंटी बजी l खीज कर, मैंने सुबह की अपनी सारी बेतुकी हरकत और उद्देश्य बताए l मेरी नयी सहेली ने अपने अतीत के पराजय से उत्पन्न दोष की भावना के कारण भय और असुरक्षा के साथ अपना संघर्ष बांटा l प्रार्थना करने के बाद, उसने परमेश्वर के अपूर्ण सेविकाओं की अपनी टीम में मेरा स्वागत किया l
प्रेरित पौलुस मसीह में अपने नए जीवन को स्वीकार किया, अपने अतीत का इनकार नहीं किया अथवा प्रभु की सेवा करने में उसे आड़े नहीं आने दिया (1 तीमुथियुस 1:12-14) l क्योंकि पौलुस जानता था कि क्रूस पर यीशु के कार्य ने उसे अर्थात् सबसे अधम पापी को  बचाया और रूपांतरित किया था, इसलिए उसने परमेश्वर की प्रशंसा की और दूसरों को उसका आदर करने और आज्ञा मानने के लिए उत्साहित किया (पद.15-17) l
जब हम परमेश्वर का अनुग्रह और क्षमा स्वीकार करते हैं, हम अपने अतीत से स्वतंत्र हो जाते हैं l हम दोषपूर्ण हैं किन्तु तीक्ष्णता से प्रेम किए गए हैं, और जब हम परमेश्वर से प्राप्त अपने  वरदानों द्वारा दूसरों की सेवा करते हैं, हमें अपने वास्तविक रूप से लज्जित होने की ज़रूरत नहीं है l 

सर्वदा स्वीकार्य

अनेक वर्षों तक एंजी अपनी पढ़ाई में संघर्ष करती रही, जिसके बाद उसे, सर्वोत्कृष्ट प्रार्थमिक स्कूल से निकाल कर एक “साधारण” स्कूल में भर्ती कर दिया गया l सिंगापुर में जहां बहुत ही प्रतियोगी शिक्षा का परिदृश्य है, जहां एक “अच्छे” स्कूल में किसी की भावी संभावनाएं सुधर सकती है, अनेक लोगों ने इसे पराजय के रूप में देखा l   
एंजी के माता-पिता निराश थे, और एंजी ने भी खुद के विषय सोचा मानो उसे नीचे उतार  दिया गया है l किन्तु नये स्कूल में जाने के शीघ्र बाद, नौ वर्ष की एंजी समझ गयी कि औसत विद्यार्थियों की क्लास में पढ़ने का क्या अर्थ होता है l उसने कहा, “माँ, मैं सही जगह पर हूँ, यहाँ मैं स्वीकारी गयी हूँ!”
मैंने इस बात को याद किया कि जक्कई कितना उत्साहित हुआ होगा जब यीशु ने खुद ही उस चुंगी लेनेवाले के घर में जाने को तैयार हुआ होगा (लूका 19:5) l मसीह ने उन लोगों के साथ भोजन करने में रूचि लिया जिन्हें मालूम था कि वे दोषपूर्ण हैं और परमेश्वर के अनुग्रह के योग्य नहीं (पद.10) l हम जैसे भी हैं, यीशु हमें खोजकर और हमसे प्रेम करके अपनी मृत्यु और पुनरुत्थान द्वारा पूर्ण करने की प्रतिज्ञा देता है l हम उसके अनुग्रह द्वारा ही सिद्ध बनाए जाते हैं l
यह जानते हुए कि मेरा जीवन परमेश्वर के मानक के बराबर नहीं है, मैंने अक्सर अपनी आत्मिक यात्रा को संघर्षशील पाया है l यह जानना कितना आरामदायक है कि हम सर्वदा स्वीकार्य हैं, क्योंकि पवित्र आत्मा हमें यीशु की तरह बनाने में लगा हुआ है l

अपने नावें ले आओ

2017में तूफ़ान हार्वे(Hurricane Harvey) के कारण पूर्वी टेक्सास में विनाशकारी बाढ़ आ गयी l बारिश से हजारों लोग अपने घरों में घिर गए, और बाढ़ के पानी से भाग नहीं सके l “टेक्सास नेवी” नाम से अनेक साधारण नागरिकों ने राज्य और राष्ट्र के दूसरे भाग से नाव लाकर घिरे हुए लोगों को निकालने में मदद की l
इन बहादुर, दयालु पुरुष और महिलाएँ नीतिवचन 3:27 का उत्साह याद दिलाते हुए सीख देते हैं कि जब भी अवसर मिले हम दूसरों की मदद करें l उनके पास आवश्यक्तामंद लोगों के लिए अपनी नावों को लाकर मदद करने की ताकत थी l और उन्होंने ऐसा किया l उनकी क्रियाएँ दर्शाती हैं कि वे अपने संसाधन दूसरों के लाभ के लिए उपयोग करना चाहते थे l
जो कार्य हाथ में है उसे करने में हम अपने को हमेशा सक्षम नहीं पाते हैं; अक्सर हम दूसरों की मदद करने में खुद में कौशल, अनुभव, साधन, या समय की कमी महसूस करते हैं l ऐसे समय में, हम जल्दी ही अपने साधनों को जो दूसरों की मदद कर सकता है, नज़रंदाज़ करते हुए अपने को किनारे कर लेते हैं l टेक्सास नेवी बाढ़ के बढ़ते पानी को रोक नहीं सकते थे, और न ही सरकारी मदद के लिए कानून बना सकते थे l किन्तु उन्होंने अपने पड़ोसियों की गंभीर ज़रूरतों में अपनी सामर्थ्य की सीमा में अपने साधनों का अर्थात् नाव का उपयोग किया l काश हम सब भी अपनी “नावें” लाकर लोगों को ऊँची भूमि पर ले जा सकें l