आपका जुनून क्या है?
मेरे बैंक का एक गणक(teller) अपनी खिड़की पर शेल्बी कोबरा गाड़ी का फोटोग्राफ लगा रखा है l (फोर्ड मोटर कम्पनी द्वारा निर्मित कोबरा एकउच्च-प्रदर्शन मोटर-गाड़ी है l)
एक दिन बैंक में व्यवसाय सम्बंधित लेन-देन करते समय, मैंने उनसे पूछा कि क्या वह उनकी कार थी l उनका उत्तर था, “नहीं,” यह मेरा जुनून है, प्रतिदिन सुबह उठकर काम पर जाने का कारण l एक दिन मेरे पास भी यह गाड़ी होगी l”
मैं इस युवा व्यक्ति का जुनून समझ सकता हूँ l मेरे एक मित्र के पास कोबरा गाड़ी थी, और एक बार मैंने भी उसे चलाया था! यह सचमुच करने का इरादा रखने वाली गाड़ी है! किन्तु संसार में और सब वस्तुओं की तरह, कोबरा गाड़ी का जुनून व्यर्थ है l जो लोग परमेश्वर के अलावा अन्य वस्तुओं पर भरोसा रखते हैं, वे भजनकार के अनुसार “झुक [जाएंगे] और गिर [पड़ेंगे] (भजन 20:8) l
इसलिए कि हम परमेश्वर के लिए रचे गए हैं और बाकी बातें व्यर्थ हैं अर्थात् एक ऐसा सच जिसे हम अपने दैनिक अनुभव में प्रमाणित करते हैं : हम ये वस्तु या वह वस्तु खरीदते हैं क्योंकि हमारी सोच है कि ये वस्तुएं हमें खुशी देंगी, किन्तु हम एक बच्चे की तरह जो क्रिसमस के एक दर्जन से अधिक उपहार पाता है, खुद से पूछते हैं, “क्या इतना ही है?” हमेशा कुछ न कुछ कम ही होता है l
ये संसार हमें कुछ नहीं दे सकता अर्थात् बहुत अच्छी वस्तुएं भी जो हमें तृप्त कर सकें l उनमें एक सीमा तक ही आनंद है, किन्तु हमारी ख़ुशी जल्द ही समाप्त हो जाती है (1 यूहन्ना 2:17 l वास्तव में, सी.एस.लयूईस कहते हैं “परमेश्वर खुद से बाहर हमें ख़ुशी और शांति दे नहीं सकता है l और यह बिलकुल सच है l
मैं कर ही नहीं सकता हूँ
उदास विद्यार्थी दुखी होकर बोला, “मैं कर ही नहीं सकता हूँ l” पन्ने पर उसे केवल छोटे अक्षर, कठिन विचार, और बेरहम निर्धारित तिथि दिखाई दे रही थी l उसे अपने शिक्षक की सहायता की ज़रूरत थी l
यीशु का पहाड़ी उपदेश “अपने शत्रु से प्रेम करो” (मत्ती 5:44) पढ़कर हमें भी उसी प्रकार का अनुभव हो सकता है l क्रोध एक बुरा हत्यारा है (पद.22) कुदृष्टि व्यभिचार के बराबर है (पद.28) l और अगर हम इन मानकों पर जीवन बिताने की हिम्मत करते हैं, तो हमारा सामना इससे होता है : तुम सिद्ध बनो, जैसा तुम्हारा स्वर्गिक पिता सिद्ध है” (पद.48) l
ऑस्वाल्ड चेम्बर्स कहते हैं, “पहाड़ी उपदेश निराशा उत्पन्न करता है” l किन्तु उन्होंने इसे अच्छा पाया, क्योंकि “निराशा के समय हम कंगाल की तरह [यीशु] के पास आकर उसे स्वीकार करना चाहते हैं l”
परमेश्वर अक्सर सहजज्ञान से हटकर कार्य करता है l जिन्हें मालुम है कि वे अपने ऊपर भरोसा करके नहीं कर सकते हैं, वे ही पमेश्वर का अनुग्रह स्वीकार करते हैं l जिस तरह प्रेरित पौलुस कहते हैं, “अपने बुलाए जाने को तो सोचो कि न शरीर के अनुसार बहुत ज्ञानवान . . . परन्तु परमेश्वर ने जगत के मूर्खों को चुन लिया है कि ज्ञानवानों को लजित करे” (1 कुरिन्थियों 1:26-27) l
परमेश्वर की बुद्धिमत्ता में, सिद्ध शिक्षक हमारा उद्धारकर्ता भी है l जब हम विश्वास से उसके पास आते हैं, उसके पवित्र आत्मा के द्वारा हम [उसकी धार्मिकता], और पवित्रता, और छुटकारा” का आनंद लेते हैं (पद.30), और उसके लिए जीने के लिए अनुग्रह और सामर्थ्य भी पाते हैं l इसीलिए वह कह सकता था, “धन्य हैं वे, जो मन के दीन हैं, क्योंकि स्वर्ग का राज्य उन्हीं का है” (मत्ती 5:3) l
सह-हस्ताक्षरकर्ता की ज़रूरत नहीं
जिस किसी व्यक्ति की भुगतान सम्बन्धी पिछली उपलब्धियाँ विलम्ब से देने का रहा हो, कर्ज देनेवाले वित्तीय जोखिम उठाकर उसे घर या कार ऋण देने में हिचकिचाएंगे l पिछला कार्य-निष्पादन रिकॉर्ड के बगैर, उस व्यक्ति का ऋण चुकाने का वादा बैंक के लिए पर्याप्त नहीं है l ऋण लेनेवाला संभावित व्यक्ति आमतौर पर ऐसे व्यक्ति को ढूँढ़ता है जिसका इतिहास ऋण चुकाने का रहा है, और उससे ऋण के दस्तावेज़ पर अपना नाम दर्ज करने को कहता है l सह-हस्ताक्षरकर्ता का हस्ताक्षर ऋण देनेवाले को आश्वास्त कर देता है कि कर्ज चुका दिया जाएगा l
जब कोई हमसे वादा करता है - चाहे वित्तीय, वैवाहिक, या कोई और कारण से, हम आशा करते हैं कि वह अपना वादा पूरा करेगा l हम जानना चाहते हैं कि परमेश्वर भी अपने वादे पूरी करेगा l जब उसने अब्राहम से वादा किया कि वह उसे आशीष देगा और उसके “सन्तान को बढ़ाता [जाएगा]” (इब्रानियों 6:14; देखें उत्पत्ति 22:17), अब्राहम ने परमेश्वर के वचन पर विश्वास किया l सबका सृष्टिकर्ता जो जीवित है, उससे महान और कोई नहीं है; केवल परमेश्वर अपने वादा की गारन्टी ले सकता था l
अब्राहम को अपने पुत्र के जन्म के लिए ठहरना था (इब्रानियों 6:15) (और वह कभी नहीं देख पाया कि उसकी संतान अनगिनित होगी), किन्तु परमेश्वर अपने वादे में सच्चा था l जब वह हमारे साथ सदा रहने का (13:5), हमें सुरक्षित तौर से थामने का (यूहन्ना 10:29), और हमें आराम देने का वादा करता है (2 कुरिन्थियों 1:3-4), हम भी भरोसा कर सकते हैं कि वह अपने वचन के प्रति सच्चा होगा l
सर्वोत्तम उपहार
जब मैं लन्दन, घर जाने के लिए सामन पैक कर रही थी, मेरी माँ मेरे लिए एक उपहार लेकर आई – उनकी एक अंगूठी जो मुझे बहुत पसंद थी l चकित होकर, मैंने पूछा, “यह किस लिए?” उन्होंने उत्तर दिया, “मेरे विचार से अब तुम इसको पहनने का आनंद लो l मेरी मृत्यु तक इंतज़ार करने की क्या ज़रूरत है? कैसे भी यह मेरी ऊँगली में आती भी नहीं है l” मुस्कराकर मैंने उनका अनापेक्षित उपहार प्राप्त किया, आरंभिक विरासत जो मेरे लिए आनंद का कारण है l
मेरी माँ ने मुझे एक भौतिक उपहार दी, किन्तु यीशु की प्रतिज्ञा है कि उसका पिता अपने मांगनेवालों को पवित्र आत्मा देगा (लूका 11:13) l यदि पाप के साथ जन्में माता-पिता अपने बच्चों की ज़रूरतें(जैसे भोजन) पूरी करते हैं, तो हमारा स्वर्गिक पिता अपने वच्चों को और भी अधिक देगा l पवित्र आत्मा के वरदान के द्वारा(यूहन्ना 16:13), हम परेशानी के समय आशा, प्रेम, आनंद, और शांति का अनुभव कर सकते हैं और हम इन वरदानों को दूसरों के साथ बाँट सकते हैं l
उम्र में बढ़ते हुए, शायद हमारे माता-पिता पूरी तौर से हमसे प्रेम नहीं कर सके और हमारी देखभाल नहीं कर सके l अथवा हमारे माता-पिता बलिदानी प्रेम के प्रशिद्ध नमूना थे l अथवा हमारा अनुभव इन दोनों के बीच था l जो भी हमने अपने सांसारिक माता-पिता के विषय जाना है, हम इस प्रतिज्ञा को थामे रह सकते हैं कि हमारा स्वर्गिक पिता हमसे अत्यधिक प्रेम करता है l उसने अपने बच्चों को पवित्र आत्मा का उपहार दिया है l
अपनी पीड़ा को छिपाना
मैंएक स्थानीय चर्च में अतिथि-उपदेशक होकर परमेश्वर के समक्ष अपना टूटापन रखकर उसके द्वारा दी जानेवाली उस चंगाई को प्राप्त करने के विषय एक सच्चा उपदेश दे रहा था l अंतिम प्रार्थना से पहले, पास्टर ने वीच के गलियारे में खड़े होकर अपनी मंडली की आँखों में देखते हुए बोले, “आपका पास्टर होने के कारण मैं आपसे सप्ताह के मध्य मिलूँगा और आपके हृदय के टूटेपन की कहानियाँ सुनना चाहूँगा l उसके बाद सप्ताह के अंत की आराधनाओं में, आप अपना दुःख छिपाएंगे और मुझे दुखित होकर यह सब देखना होगा l”
मेरा हृदय उन छिपी हुई पीड़ाओं को देखकर रोया जिसे परमेश्वर दूर कर सकता था l इब्रानियों का लेखक परमेश्वर के वचन को जीवित और क्रियाशील बताता है l कितनों ने इस “वचन” को बाइबल समझा है, किन्तु यह तो उससे कहीं अधिक है l यीशु परमेश्वर का जीवित वचन है l वह हमें प्यार करते हुए हमारे विचारों और व्यवहार को जांचता है l
यीशु बलिदान हुआ कि हमें सदैव परमेश्वर की उपस्थिति तक पहुँच मिल जाए l और जबकि हमें ज्ञात है कि सभी के साथ सब बातें बांटना बुद्धिमानी नहीं है, हम यह भी जानते हैं कि परमेश्वर चाहता है कि कलीसिया वह स्थान बने जहां हम ग्लानी के बगैर मसीह के टूटे और क्षमा प्राप्त अनुयायी की तरह जीवन जी सकें l कलीसिया को वह स्थान बनना है जहां हम “एक दूसरे का भार” उठाते हैं (गलातियों 6:2) l
आज आप दूसरों से क्या छिपा रहें हैं? और आप किस प्रकार परमेश्वर से भी छिपा रहे हैं? परमेश्वर यीशु के द्वारा हमें देखता है l और वह अभी भी हमें प्यार करता है l क्या हम उसे प्यार करने की अनुमति देंगे?
वह हमें जानता है
क्यापरमेश्वर जानता था कि मैं रात में गाड़ी चलाकर 100 मील दूर अपने गाँव जा रहा था? मैं जिस स्थिति में था, वह बताना सरल नहीं है l मुझे तेज़ बुखार था और मेरे सर में दर्द l मैंने प्रार्थना की, “प्रभु, मैं जानता हूँ कि आप मेरे साथ हैं, किन्तु मैं पीड़ा में हूँ!”
थका हुआ और कमज़ोर, मैंने अपनी गाड़ी एक छोटे गाँव के निकट सड़क के किनारे खड़ी कर दी l दस मिनट के बाद, मैंने एक आवाज़ सुनी l “हेल्लो, क्या आपको कोई मदद चाहिए?” एक व्यक्ति मित्रों के साथ उस गाँव से आकर बोला l उनकी उपस्थिति अच्छी लगी l मैं उनसे उनके गाँव का नाम ना मी न्याला(अर्थात्, “राजा मेरे विषय जानता है!”), सुनकर चकित हुआ l मैं बगैर रुके इस गाँव से कई बार गुज़रा था l इस बार, प्रभु ने मुझे याद दिलाने के लिए इस गाँव के नाम का उपयोग किया कि, वास्तव में, सड़क पर मेरी पीड़ादायक स्थिति में राजा मेरे साथ था l उत्साहित होकर, मैं निकट के दवाखाना की ओर आगे बढ़ गया l
हमारी परिस्थिति के बावजूद, हमारे दैनिक कामों में जो हम अलग-अलग स्थानों और स्थितियों में करते हैं, परमेश्वर हमें पूरी तरह जानता है (भजन 139:1-4, 7-12) l वह हमें न छोड़ता है न भूलता है; न ही वह इतना व्यस्त है कि हमारा परवाह न करे l परेशानी में या कठिन स्थितियों में अर्थात “रात” और “दिन” (पद 11-12), हम उसकी उपस्थिति से छिपे हुए नहीं हैं l यह सच्चाई हमें इतनी आशा और निश्चयता देती है कि हम प्रभु की प्रसंशा कर सकते हैं जिसने हमें सावधानी से रचा है और सम्पूर्ण जीवन में अगुवाई करता है (पद.14) l
हमारे भय में एक लंगर
क्याआप चिंता करनेवाले हैं? मैं हूँ l मैं प्रतिदिन चिंता से संघर्ष करता हूँ l मैं बड़ी बातों के विषय चिंता करता हूँ l मैं छोटी बातों के विषय चिंता करता हूँ l कभी-कभी, ऐसा महसूस होता है जैसे मैं सभी बातों के विषय चिंता करता हूँ l किशोरावस्था के समय एक बार, मैंने पुलिस को बुलाया जब मेरे माता-पिता घर लौटने में चार घंटे विलम्ब कर दिए l
बाइबल हमें बार-बार अभय रहने को कहती है l परमेश्वर की भलाई और सामर्थ्य के कारण, और इसलिए कि उसने यीशु को हमारे लिए बलिदान होने के लिए और पवित्र आत्मा को हमारा मार्गदर्शन करने के लिए भेजा, हमें अपने जीवन को भय में व्यतीत करने की ज़रूरत नहीं है l हम कठिन स्थितियों का सामना कर सकते हैं, किन्तु परमेश्वर ने सदैव हर स्थिति में हमारे साथ रहने की प्रतिज्ञा की है l
भय के क्षणों में यशायाह 51:12-16 ने मेरी अधिकाधिक सहायता की है l यहाँ पर, परमेश्वर ने अपने लोगों को जिन्होंने अत्यधिक दुःख सहा था, याद दिलाता है कि अब अभी भी वह उनके साथ था, और कि उसकी सांत्वना देनेवाली उपस्थिति आखिरी सच्चाई है l चाहे परिस्थितियाँ कितनी भी बुरी हो : उसने उनसे नबी यशायाह के द्वारा कहा, “मैं, मैं ही तेरा शांतिदाता हूँ” (पद.12) l
मुझे यह प्रतिज्ञा पसंद है l वे छः शब्द मेरी आत्मा के लिए भावनाओं को स्थिर करनेवाला लंगर रहा है l जब-जब जीवन पराजित करनेवाला महसूस हुआ, जब मेरी स्वयं की “लगातार [थरथराहट] अर्थात् खौफ़” (पद.13) दमनकारी महसूस हुआ, मैं बार-बार इस प्रतिज्ञा से लिपट गया l इस परिच्छेद के द्वारा, परमेश्वर मुझे विश्वास से अपनी निगाहें अपने भय से हटाने की ताकीद देता है और उसकी ओर आँखें उठाने को कहता है जो “आकाश [का ताननेवाला] है (पद.13) अर्थात् वह जो हमें दिलासा देने की प्रतिज्ञा की है l
परदेशियों द्वारा दूसरे परदेशियों का स्वागत
जब हमदोनों पति-पत्नी मेरी ननद के निकट रहने के लिए सिएटल(अमरीकी शहर) गए, हम नहीं जानते थे कि हम किस जगह रहेंगे या काम करेंगे l एक स्थानीय चर्च ने एक स्थान ढूंढने में हमारी सहायता की : एक किराये का घर जिसमें अनेक सोने के कमरे थे l हम एक सोने का कमरा अपने लिए रखते हुए, दूसरे कमरे अंतर्राष्ट्रीय विद्यार्थियों को दे सकते थे l अगले तीन वर्षों में, हम परदेशी होकर परदेशियों का स्वागत करते रहे : हमने समस्त संसार के लोगों के साथ अपने घर और भोजन को बाँटा l हम और हमारे साथ रहनेवालों ने दर्जनों अंतर्राष्ट्रीय विद्यार्थियों को प्रति शुक्रवार अपने घर में बाइबल अध्ययन के लिए आमंत्रित किया l
परमेश्वर के लोग घर से दूर रहने का अर्थ जानते हैं l सैंकड़ो वर्षों तक, इस्राएली पूरी तौर से मिस्र में परदेशी और दास थे l लैव्यव्यवस्था 19 में, “अपने माता-पिता का आदर करो” और “चोरी मत करो” (पद.3,11), जैसे परिचित निर्देशों के साथ-साथ परमेश्वर ने प्रभावशाली तरीके से परदेशियों की देखभाल करना याद दिलाया, क्योंकि उन्हें मालुम था कि परदेशी और भयभीत रहने का क्या अर्थ होता है (पद.33-34) l
जबकि हम सब जो आज परमेश्वर के अनुयायी हैं, हमने वस्तुतः निर्वासित जीवन नहीं जीया है, फिर भी हम जानते हैं कि इस पृथ्वी पर “परदेशी” (1 पतरस 2:11) अर्थात् ऐसे लोग जिन्हें परदेशी होने का अनुभव मालूम है क्योंकि उनकी अंतिम निष्ठा एक स्वर्गिक राज्य की है l हमसे पहुनाई करनेवाले समुदाय का निर्माण करने को कहा गया है अर्थात् परदेशी जो परदेशियों को परमेश्वर के परिवार में आमंत्रित करते हैं l हम दोनों पति-पत्नी ने सिएटल में जिस सत्कार शील निमंत्रण का अनुभव किया, उसने हमें इसे दूसरों तक पहुँचाना सिखाया और यह परमेश्वर के परिवार का केंद्र बिंदु है (रोमियों 12:13) l
गहराई का परमेश्वर
जीवविज्ञानी वार्ड एप्पलटन्स कहते है, “जब आप गहरे समुद्र में जाते हैं, और हर बार जब आप नमूना इकठ्ठा करते हैं, आपको नयी प्रजाति मिलेगी l हाल ही के एक वर्ष में, विज्ञानियों ने समुद्र के सतह के नीचे के जीवन में 1,451 नयी प्रजातियों को पहचाना l हम समुद्र के नीचे के आधे संसार को नहीं जानते हैं l
अय्यूब 38-40 में, परमेश्वर ने अय्यूब के लाभ के लिए अपनी सृष्टि की समीक्षा की l तीन काव्यात्मक अध्यायों में, परमेश्वर ने मौसम के आश्चर्य को, कायनात की विशालता को, और अपने-अपने निवास में रहनेवाले विविध प्राणियों के विषय समझाया l ये वे वस्तुएं हैं जिनको हम ध्यान से देख सकते हैं l उसके बाद परमेश्वर ने एक पूरे अध्याय में अद्भुत लिव्यातान के विषय बताया l लिव्यातान एक भिन्न प्राणी है जिसका कवच चारों ओर के आक्रमण को विफल कर सकता है (अय्यूब 41:7,13), आकर्षक शक्ति वाला (पद.12), और उसके दांत चारों ओर से डरावने हैं (पद.14) l उसके मुँह से जलते हुए पलीते निकलते हैं, और . . . उसके नथुनों से . . . धुआँ निकलता है (पद.19-20) l “धरती पर उसके तुल्य और कोई नहीं है (पद.33) l
बिलकुल ठीक, तो परमेश्वर एक विशालकाय जंतु के विषय बातचीत करता है जिसे हम सबों ने नहीं देखा है l क्या अय्यूब 41 की मुख्य बात यही है?
नहीं! अय्यूब 41 परमेश्वर के आश्चर्जनक चरित्र सम्बन्धी हमारी समझ को विस्तार देता है l भजनकार ने यह लिखते हुए इसे और विस्तारित किया, “. . . समुद्र बड़ा और बहुत ही चौड़ा है, . . . और लिव्यातान भी जिसे तू ने वहां खेलने के लिए बनाया है” (भजन 104:25-26) l लिव्यातान का उल्लास l
हमारे पास समुद्र में खोज करने के लिए वर्तमान है l हमारे पास महाप्रतापी, रहस्मय, उल्लासित परमेश्वर के विषय जानने के लिए अनंत काल होगा l