आत्मा के सामर्थ के द्वारा
दशरथ मांझी की कहानी हमें प्रेरणा देती है। उनकी पत्नी की मृत्यु इसलिए हो गई, क्योंकि वह उसे तत्काल चिकित्सा के लिए अस्पताल न लेजा सके, मांझी ने वह किया जो असंभव था। 22 वर्ष लगा कर उन्होंने पहाड़ में बड़ी जगह बनाई ताकि गांववासी स्थानीय अस्पताल पहुंचकर आवश्यक चिकित्सा और देखभाल पा सकें। भारत सरकार ने उनकी उपलब्धि के लिए उन्हें सम्मानित किया।
देश निकाले से लौटे जरूब्बाबेल को मंदिर का पुनर्निर्माण असंभव लगा होगा। लोग निराश थे, दुश्मनों के विरोध का सामना कर रहे थे, और उनके पास संसाधन या एक बड़ी सेना न थी। परमेश्वर ने जरूब्बाबेल के पास जकर्याह को भेजकर उसे याद दिलाया कि यह कार्य सेना, मानव बल या मानव निर्मित संसाधनों की बजाय उससे होगा जो इनसे अधिक बलवान है। यह आत्मा के बल से होगा (जकर्याह 4:6)। जरूब्बाबेल ने विश्वास किया कि मंदिर के पुनर्निर्माण और समुदाय को पुनःस्थापित करने के रास्ते में किसी भी कठिनाई के पहाड़ को परमेश्वर मैदान कर देंगे।
हमारे सामने “पहाड़” हो तो हम क्या करते हैं? इसके दो विकल्प होते हैं: अपने पर भरोसा रखें या आत्मा के बल पर। जब हम उनके बल पर भरोसा करेंगे, तो वह या तो पहाड़ को मैदान बना देंगें या हमें उस पर चढने का बल और सहनशीलता देंगे।
विलम्ब से निपटना
ग्लोबल कम्प्यूटर सिस्टम आउटेज के कारण विमान उड़ाने रद्द हो जाने से, लाखों यात्री हवाई अड्डों में फंस जाते हैं। बर्फ़ीले तूफान के दौरान अनेकों वाहन दुर्घटनाओं के कारण प्रमुख राजमार्ग बंद हो जाते हैं। जिसने “तत्काल” कुछ करने का वादा किया हो, वह ऐसा नहीं कर पाता। विलम्ब अक्सर क्रोध और हताशा पैदा करता है, परन्तु यीशु के अनुयायी होने के नाते हमें मदद के लिए उनकी ओर देखने का सौभाग्य मिला है।
बाइबिल में संयम के महान उदाहरणों में से एक यूसुफ का है, जिसे उसके ईर्ष्यावान भाइयों ने दासों का व्यापार करने वालों को बेच दिया था, जिसे उसके स्वामी की पत्नी के झूठे आरोप के कारण मिस्र में कारावास मिला। "जब यूसुफ बंदीगृह में था, यहोवा यूसुफ के संग-संग रहा था"। (उत्पत्ति 39:20-21) वर्षों बाद जब यूसुफ ने फिरौन के स्वप्न की व्याख्या की, तो उसे मिस्र में दूसरा सबसे बड़ा स्थान मिला। (अध्याय 41)
उनके संयम का सबसे उल्लेखनीय फल तब आया जब उसके भाई अकाल के दौरान अनाज खरीदने आए तो उसने उनसे कहा, "मैं तुम्हारा भाई यूसुफ हूं, जिसको तुम ने मिस्र में बेच दिया था..."(45:4-5,8)।
यूसुफ के समान छोटे या लम्बे, हर विलम्ब में, जब हम प्रभु पर विश्वास रखेंगे तो हमें भी संयम, सही दृष्टिकोण और शांति मिलेंगे।
आभार की भावना विकसित करना
क्या आप आभार की भावना विकसित करना चाहते हैं? सतराहवीं शताब्दी के ब्रिटिश कवि जॉर्ज हरबर्ट, अपनी कविता “ग्रेटफुल्नेस” के माध्यम से पाठकों को उस लक्ष्य के प्रति प्रोत्साहित करते हैं: "आपने मुझे बहुत कुछ दिया है, एक चीज़ और दे दो: एक आभारी हृदय।" हर्बर्ट समझ गए थे कि आभारी होने के लिए केवल एक ही चीज़ उन्हें चाहिए थी, उन आशीषों के बारे में जागरूकता जो परमेश्वर ने उन्हें पहले ही दी थीं।
रोमियों 11:36 में बाइबिल मसीह यीशु को सभी आशीषों का स्रोत बताती है, "उसी की ओर से और उसी के द्वारा और उसी के लिए सब कुछ है"। इसमें हर रोज़ के जीवन के बहुमूल्य और सांसारिक, वरदान शामिल हैं। जीवन में जो हम प्राप्त करते हैं, वह हमारे स्वर्गीय पिता की ओर से आता है, (याकूब 1:17), और वह अपने प्रेम के कारण उन वरदानों को हमें स्वेच्छा से देते हैं।
उन सभी सुखों के स्रोत का आभार मानना मैं सीख रही हूं जिनका हर दिन अनुभव करती हूँ, और जिन्हें मैं अक्सर महत्वहीन समझती हूँ। जैसे एक ताज़ा सुबह में सैर, दोस्तों के साथ शाम, एक भरपूर रसोई, खिड़की के बाहर सुन्दर दुनिया और ताज़ा कॉफी की सुगन्ध।
इन आशीषों के प्रति जागरूकता आभारी हृदय विकसित करने में हमारी मदद करेगी।
प्रार्थना का सामर्थ
जब मैं अपने किसी करीबी मित्र के हित को लेकर चिंतित थी, तब पुराने नियम में शमूएल की कहानी से मुझे प्रोत्साहन मिला। मैंने पढ़ा कि जब परमेश्वर के लोग परेशान थे तो शमूएल ने कैसे उनके लिए यहोवा की दोहाई दी थी, मैंने भी अपने मित्र के लिए प्रार्थना करने का संकल्प किया।
इस्राएली लोग पलिश्तियों का सामना कर रहे थे, जो पहले उन्हें हरा चुके थे जब लोगों ने उन पर भरोसा नहीं किया था (1 शमूएल 4)। अपने पापों का पश्चाताप कर लेने के बाद, उन्होंने सुना कि पलिश्ती हमला करने वाले थे। अब उन्होंने शमूएल से उन लोगों के लिए प्रार्थना करते रहने को कहा (7:8), उत्तर में परमेश्वर ने उनके दुश्मन को भ्रम में डाल दिया(10)। यद्यपि पलिश्ती इस्राएलियों की तुलना में अधिक शक्तिशाली थे, परन्तु यहोवा उन सबमें सबसे बलवान थे।
अपने प्यारों को चुनौतियों का सामना करते देख हमें पीड़ा होती है, और डरते हैं कि स्थिति नहीं बदलेगी, या प्रभु कार्य नहीं करेंगे। लेकिन हमें प्रार्थना के सामर्थ को कम नहीं समझना चाहिए, क्योंकि हमारा प्रेमी परमेश्वर हमारी प्रार्थना सुनता है। हमारे पिता के रूप में उनकी इच्छा है कि हम उनका प्रेम अपनाएं और उनकी सच्चाई पर भरोसा करें।
क्या किसी के लिए आप आज प्रार्थना कर सकते हैं?
एकता के लिए प्रयत्नशील रहना
1950 के दशक में, गोरे-काले के भेदभाव के कारण अलगाव की स्थिति थी। स्कूलों, रेस्तरां, सार्वजनिक वाहनों और पड़ोसियों में, रंग के आधार पर लोग विभाजित किए जाते थे। 1968 में मैंने अमेरिकी सेना की बेसिक ट्रेनिंग में प्रवेश पाया। हमारी कंपनी में भिन्न सांस्कृतिक समूहों के कई युवा पुरुष थे। हमने जल्द ही सीख लिया कि एक-दूसरे को समझने और स्वीकार करने के साथ हमें मिलकर काम करके अपने मिशन को पूरा करने की आवश्यकता थी।
जब पौलुस ने कोलोस्से की कलिसिया को पत्र लिखा, तो वे उन की विविधता से परिचित थे। उन्होंने उन्हें याद दिलाया, "उस में न तो यूनानी रहा, न यहूदी...(कुलुस्सियों 3:11)। ऐसे समूह में जहां ऐसे मतभेद लोगों को आसानी से विभाजित कर सकते थे, पौलुस ने उनसे करूणा, भलाई, दीनता, नम्रता, और सहनशीलता धारण करने का आग्रह किया और इन सभी गुणों के ऊपर, “प्रेम को...बान्ध लेने को कहा" (12,14)।
इन सिद्धांतों के अभ्यास में प्रयत्न और समय दोनों लग सकता है, लेकिन यह कार्य करने को यीशु ने हमें बुलाया है। उनके प्रति हमारा प्रेम विश्वासियों की समानता है। हम मसीह की देह के सदस्यों के रूप में विवेक, शांति और एकता के लिए प्रयत्नशील बने रहें।
विविधता के बीच, हम मसीह में और भी अधिक एकता का प्रयत्न करते रहें।
जानते और प्रेम करते हुए
"जीसस लव्स में दिस आई नो" मसीही अराधना के सर्वप्रचलित गीतों में से एक इस गीत में बड़े कोमल भाव में यीशु के साथ हमारे सम्बंध की बात करता है-हमसे प्रेम किया जाता है।
किसी ने मेरी पत्नी को एक पट्टिका दी जो इन शब्दों को एक सरल मोड़ दे कर एक नया अर्थ देती है। उसमें ऐसा लिखा है, "जीसस नोस मी दिस आई लव"। यह उनके साथ हमारे सम्बंध पर एक भिन्न दृष्टिकोण प्रदान करता है-हमें जाना जाता है।
भेड़ से प्रेम करना और उनके बारे में जानना यह बात प्राचीन इज़राइल में, एक सच्चे चरवाहे को मजदूर चरवाहे से भिन्न बनाती थी। चरवाहा भेड़ों के साथ इतना समय बिताता कि उसे सदा भेड़ का ख्याल और परवाह होती। इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि यीशु ने उसकी अपनी भेड़ों के लिए कहा "अच्छा चरवाहा मैं हूं...(यूहन्ना 10:14, 27)।
वे हमें जानते हैं और हमें प्यार करते हैं! हमारे प्रति उनकी योजनाओं पर हम भरोसा कर सकते हैं और अपनी परवाह वायदे पर विश्राम कर सकते हैं क्योंकि उनका पिता "[हमारे] माँगने से पहले ही जानता है....(मत्ती 6:8)। आप जब उतार चढ़ाव का सामना करें, तो विश्राम में बने रहें। आपकी आत्मा का चरवाहा आपको जानता है और आपसे प्रेम करता है।
एक क्रोधित परमेश्वर?
कॉलेज में ग्रीक और रोमन माइथोलॉजी के अध्ययन से मैं हैरान थी कि कथाओं में कैसे मूडी और तुरंत नाराज़ हो जाने वाले देव थे। उनके क्रोध और कभी-कभी एक सनक पर लोगों के जीवन नष्ट हो जाते थे।
यह सोच कर मुझे हंसी आई कि ऐसे देवताओं पर कोई कैसे विश्वास कर सकता है। तब मैंने अपने आप से पूछा, क्या वास्तविक परमेश्वर के प्रति मेरे विचार भिन्न हैं? जब मैं संदेह करती हूं क्या मैं उन्हें आसानी से क्रोधित हो जाने वाले परमेश्वर के रूप में नहीं देखती? अफसोस है, हाँ।
मैं परमेश्वर से किए मूसा के अनुरोध की सराहना करती हूं कि "मुझे अपना तेज दिखा दे।" (निर्गमन 33:18) उनके विरुद्ध कुडकुडा रहे लोगों की अगुवाई करने के लिए चुने जाने पर, मूसा जानना चाहता था कि इस महान कार्य में क्या परमेश्वर वास्तव में उसकी मदद करेंगे। उत्तर में परमेश्वर ने अपनी महिमा और अपने नाम और विशेषताएं प्रकट कीं। यहोवा, ईश्वर दयालु...। (34:6) वे क्रोध में अचानक घात करने वाले परमेश्वर नहीं हैं। वे मुझे अपने जैसा ही बनाने के लिए लगातार कार्यरत हैं।
परमेश्वर और उनकी महिमा को हमारे प्रति उनके संयम में हम देख सकते हैं, किसी मित्र के प्रोत्साहन भरे शब्द में, सुंदर सूर्यास्त में, या मन में पवित्र आत्मा के धीमे स्वर में।
मेल खाना
ली (Lee) एक मेहनती और विश्वसनीय बैंक कर्मचारी है। विश्वासी होने के नाते वे दूसरों से अलग हैं और यह प्रत्यक्ष हो जाता है, जैसे किसी अनुचित बात पर उसका कमरे से निकल जाना। मित्रों से साझा करते हुए उसने कहा "डर है कि मेल ना खाने के कारण मैं उन्नति के अवसर गवा रहा हूं।"
भविष्यवक्ता मलाकी के समय में विश्वासियों ने एक ऐसी ही चुनौती का सामना किया था। वे देश निकाले से लौट कर आए थे और मंदिर का पुनर्निर्माण हो गया था, परन्तु परमेश्वर की भविष्य की योजना पर उन्हें संशय था। कुछ इस्राएली कह रहे थे, "परमेश्वर की सेवा करनी व्यर्थ है...(मलाकी 3:14-15)।
एक ऐसे समाज में परमेश्वर के लिए हम कैसे दृढ़ खड़े हों, जो हमें बताता है कि हम क्या खो देंगे यदि इससे मेल ना खाएं? मलाकी के समय में इस चुनौती का सामना विश्वासयोगी लोगों ने एक मन विश्वासियों के साथ मिलकर एक-दूसरे को प्रोत्साहित करके किया। मलाकी कहते हैं तब यहोवा का भय मानने वालों ने आपस में बातें की...”(16)।
परमेश्वर को उन सभी का ध्यान और परवाह है जो उनका भय और आदर मानते हैं। उन्होंने हमें मेल खाने के लिए नहीं बुलाया है। परन्तु इसलिए कि हम एक-दूसरे को प्रोत्साहित करें जिससे वे हमें अपने और निकट लाएं।
अंदर क्या है?
“तुम देखोगी कि अंदर क्या है?" मेरी मित्र ने पूछा। उसकी बेटी के हाथों में कपड़े की गुड़िया थी। “हाँ, अवश्य”, मैंने जवाब दिया। एमिली ने गुड़िया के पीठ में लगी ज़िप खोली। उसके अन्दर से, उसने एक ख़जाना निकाला: उसकी अपनी गुड़िया जिसके साथ 20 वर्ष पूर्व अपने बचपन में वह खेलती थी। "बाहरी" गुड़िया इस भीतरी गुडिया का केवल ढाँचा थी जिससे उसे ताकत और रूप दिया जा सके।
यीशु के जीवन, मृत्यु और पुनरुत्थान का विवरण पौलुस एक खजाने के रूप में करते हैं, जो परमेश्वर के लोगों की कमजोर मानवता के अन्दर छिपा है। जो विश्वासियों को बल देता है कि कठिन परिस्थितियों में डटे रहकर वे सेवा करते रहें। जिससे लोगों की मानवीयता से उनकी ज्योति-उनका जीवन प्रकाशित होता हैं। पौलुस हम सभी को “हियाव न छोड़ने का” प्रोत्साहन देते हैं (2कुरिन्थियों 4:16)। परमेश्वर हमें उनके कार्य करने के सामर्थ से भरते हैं।
"भीतरी गुड़िया", के समान हमारे भीतर सुसमाचार का खजाना इस जीवन को उद्देश्य और संयम देता है। जब परमेश्वर का सामर्थ हम में चमकता है, तो दूसरों को पूछने के लिए बाध्य करता है, कि "अंदर क्या है"? फिर अपने हृदय की ज़िप खोल कर हम मसीह में मिलने वाले उद्धार की जीवनदाई प्रतिज्ञा को दिखा सकते हैं।