मंत्रमुग्ध करने वाली महिमा
यूरोप की यात्रा में लैंडस्केप को रंग-बिरंगा बनाने वाले ग्रैंड कैथेड्रल्स का दौरा करने का अपना आनंद है। ये गगनचुम्बी भव्य इमारतें अद्भुत रूप से सुन्दर हैं। इन भवनों की वास्तुकला और यहाँ प्रयुक्त प्रतीकात्मकता विस्मय और वैभव का मंत्रमुग्ध करने वाला अनुभव देती हैं।
परमेश्वर की महिमा और उनके महानतम वैभव को प्रदर्शन करने वाले इन भवनों को देखकर, मैं सोचने लगा कि परमेश्वर की भव्यता का अनुभव हम अपने मन और मस्तिष्क में किस प्रकार पुनः संभव बना सकते हैं जिससे उनकी महानता हमें स्मरण रहे। हमें मानव निर्मित भव्य इमारतों से बड़कर उस महान रचना पर विचार करना चाहिए जिसे परमेश्वर ने रचा है। तारों से टिमटिमाती रात परमेश्वर के सामर्थ को दिखाती है, जिन्होंने अपने शब्द से सृष्टि की रचना की। किसी नवजात शिशु को बाँहों में उठाकर जीवन के चमत्कार के लिए परमेश्वर का धन्यवाद करें। अलास्का के बर्फ़ीले पहाड़ों या विशालकाय अटलांटिक महासागर को देखें जो लाखों प्राणियों से भरे हैं जिनकी रचना परमेश्वर ने की है और ईकोसिस्टम चलाने वाली शक्ति की कल्पना करें।
ऊँची इमारतों से आकाश की ऊंचाईयां छूना गलत नहीं है, परन्तु हमारी सच्ची प्रशंसा परमेश्वर के लिए होनी चाहिए, जैसे लिखा है, "हे यहोवा! महिमा, पराक्रम, शोभा, सामर्थ्य और वैभव, तेरे ही हैं।" (1 इतिहास 29:11)
दौड़ ज़ारी रखना
अपने कार्यालय की इमारत के पास कंक्रीट स्लैब की दरार में से एक खूबसूरत फूल को पनपते देखकर मैं आश्चर्यचकित था। विपरीत परिस्थितियों के बावजूद इस नन्हें पौधे को पैर जमाने का स्थान मिल गया था। सूखी दरार में जड़े जमाकर यह फल-फूल रहा था। मैंने देखा कि पौधे के ठीक ऊपर लगे एक एयर कंडीशनिंग यूनिट से पूरे दिन उसपरर पानी गिरता रहता है। विपरीत परिवेश में भी पौधे को उस पानी से वह मदद मिल गई थी जिसकी उसे आवश्यकता थी।
मसीही जीवन में कभी-कभी विकास कठिन लगता है परन्तु जब हम मसीह के साथ दृढ़ता से बने रहेंगे तब बाधाएं पार करना आसन होगा। चाहे हमारी परिस्थितियां प्रतिकूल हों और हम निराश हों तो भी परमेश्वर के साथ अपने संबंध में आगे बढ़ते रहने से हम उस पौधे के समान फलवंत हो सकते हैं। गंभीर कठिनाइयों और चुनौतियों का सामना होने पर भी प्रेरित पौलुस ने हार नहीं मानी (2 कुरिन्थियों 11:23-27)। “मैं...उस पदार्थ को पकड़ने के लिये दौड़ता हूं...,” उसने लिखा “मैं निशाने की ओर दौड़ा चला जाता हूं, ताकि इनाम पाऊं।” (फिलिप्पियों 3:12,14)
पौलुस ने अनुभव किया कि वह प्रभु में...सब कुछ कर सकते हैं (4:13), हम भी उनकी मदद से दौड़ जारी रख सकते हैं जो हमें सामर्थ देते हैं।
फिर आरम्भ करना
क्रिसमस के बाद, अक्सर मैं आने वाले वर्ष के बारे सोचती हूँ और परखती हूँ कि पिछला वर्ष मुझे कहाँ लाया और अगले में कहाँ पहुँचने की मैं आशा कर सकती हूँ। एक नए वर्ष के आरम्भ की बात मुझे आशा और अपेक्षा से भर देती है। लगता है, कि पिछले साल में चाहे जो भी हुआ हो, मेरे पास फिर से आरम्भ करने का अवसर है।
नए आरम्भ की मेरी कल्पना उस आशा के समाने फ़ीकी पड़ जाती है जिसे इस्राएलियों ने तब अनुभव किया होगा जब बाबुल में सत्तर साल की लम्बी बंधुआई के बाद उनके देश यहूदा लौट जाने के लिए उन्हें मुक्त किया गया था। पिछले राजा नबूकदनेस्सर ने इस्राएलियों को उनके अपने देश से निर्वासित कर दिया था। परन्तु परमेश्वर ने राजा कुस्रू से बंधकों को यहोवा के भवन के पुनर्निर्माण के लिए उनके घर यरूशलेम भेज देने को कहा (एज्रा 1: 2-3)। कुस्रू ने उन्हें वे खजाने भी लौटा दिए जिन्हें यहोवा के भवन से लाया गया था। पापों के कारण बाबुल में कठिन और लंबा समय बिताने के बाद उनके जीवन का नया आरम्भ उस स्थान पर हुआ जिसे परमेश्वर ने उनके लिए ठहराया था।
अतीत में किए अपने पापों का जब हम अंगीकार करते हैं, परमेश्वर हमें क्षमा और नया आरम्भ देते हैं।
विश्वास-निर्माण की समृतियाँ
संगीत से भरपूर चर्च में प्रवेश करके, मैंने उस भीड़ को देखा जो नए वर्ष की संध्या उत्सव में इकट्ठा हुई थी l पिछले वर्ष की प्रार्थनाओं को याद करने पर आनंद ने मेरे हृदय को आशा से भर दिया l हमारी मंडली ने मिलकर बिगड़े बच्चों, प्रियों की मृत्यु, नौकरियों का छूटना, और टूटे संबंधों पर दुःख प्रगट किया l किन्तु हमने परमेश्वर का अनुग्रह भी अनुभव किया जब हमने परिवर्तित हृदय और व्यक्तिगत संबंधों को ठीक होते देखा था l हमने विजय, विवाह, दीक्षांत, और लोगों को बप्तिस्मा लेकर परमेश्वर के परिवार में आने का उत्सव मनाया l हमारे बीच बच्चों का जन्म हुआ, और बच्चे गोद लिए गए, अथवा प्रभु की उपस्थिति में समर्पित किये गए के साथ और बहुत कुछ l
कलीसिया परिवार द्वारा परीक्षा का सामना करने के इतिहास को याद करते समय, जैसे यिर्मयाह ने अपना “दुःख और मारा मारा फिरना” याद किया(विलाप. 3:29), मैंने माना कि “हम मिट नहीं गए; यह यहोवा की महकरुणा का फल है, क्योंकि उसकी दया अमर है”(पद.22) l जैसे नबी ने अपने को भरोसा दिलाया कि बीते दिनों में परमेश्वर की विश्वासयोग्यता अमर रही, उसके शब्दों ने मुझे भी आराम दिया : “जो यहोवा की बाट जोहते और उसके पास जाते हैं, उनके लिए यहोवा भला है” (पद.25) l
उस शाम, हमारी मण्डली का हर एक व्यक्ति परमेश्वर के जीवन परिवर्तन करने वाले प्रेम का एक प्रतीक था l हम आगे के वर्षों में मसीह की स्वतंत्र देह के सदस्य के रूप में जिस भी स्थिति का सामना करेंगे, हम प्रभु पर निर्भर रह सकते हैं l और जैसे हम लगातार उसे खोजते हुए एक दूसरे की सहायता करते हैं, हम भी, यिर्मयाह की तरह, परमेश्वर का न बदलनेवाला चरित्र और निर्भरता में अपनी आशा को विश्वास निर्माण की स्मृतियों द्वारा प्रमाणित होते देख सकते हैं l
पूरा करने का समय
साल के अंत में अपूर्ण कार्य हमें दबा सकते हैं l घर की और नौकरी की जिम्मेदारियों का अंत नहीं हैं, और आज के अपूर्ण कार्य काल की सूची में चले जाते हैं l किन्तु हम अपने विश्वास की यात्रा में ठहरकर परमेश्वर की विश्वासयोग्यता और पूर्ण कार्यों का उत्सव मनाएं l
पौलुस और बरनबास अपनी प्रथम प्रचार यात्रा के बाद, “वहां से वे जहाज़ पर अन्ताकिया गए, जहाँ वे उस काम के लिए जो उन्होंने पूरा किया था परमेश्वर के अनुग्रह में सौंपें गए थे” (प्रेरितों 14:26) l जबकि अधिकतर काम दूसरों को यीशु के विषय बताना थे, उन्होंने ठहरकर पूर्ण किये गए काम के लिए धन्यवाद दिया l “उन्होंने कलीसिया इकट्ठी की और बताया कि परमेश्वर ने उनके साथ होकर कैसे बड़े-बड़े काम किये, और अन्यजातियों(गैरयहूदियों) के लिए विश्वास का द्वार खोल दिया”(पद.27) l
बीते वर्ष परमेश्वर ने आपके द्वारा कौन से काम किये हैं? जिसे आप जानते हैं और प्रेम करते हैं, उसके लिए उसने विश्वास का द्वार किस तरह खोला है? उन तरीकों से जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते हैं, वह हमसे ऐसे कार्य करवाता है जो महत्वहीन अथवा अपूर्ण जान पड़ते हैं l
जब हम प्रभु की सेवा करते हुए अपूर्ण कार्य से दुखित होते हैं, हम ठहरकर उन बातों के लिए धन्यवाद देना न भूलें जिनमें परमेश्वर ने हमें उपयोग किया है l परमेश्वर ने अपने अनुग्रह से जो किया है उसके लिए आनंदित होना हमारे आनेवाले कार्यों के लिए मार्ग तैयार करता है!
जो याद रहती हैं
फुलचुसनी चिड़िया को अंग्रेजी में हमिंगबर्ड कहते हैं क्योंकि वह अपने पंख बहुत तीव्रता से फड़फड़ाती है l पुर्तगाली भाषा में इसे फुलचुसनी अथवा स्पेनी में “उड़ती मणि” कहते हैं l इस चिड़िया को मैं ब्युलू पुकारता हूँ, अर्थात् “जो सदा याद रहे l
जी. के. चेस्टरन लिखते हैं, “इस संसार में कभी भी अजूबों की कमी नहीं होगी, किन्तु अजीब बातों की इच्छा बनी रहेगी l” फुलचुसनी उनमें से एक अजूबा है l इन छोटे प्राणियों में कौन सी बातें रोमांचित करनेवाली हैं? शायद उनका छोटा आकार(औसत दो से तीन इंच) अथवा उनके पंख जो एक सेकंड में 50 से 200 बार फड़फड़ाते हैं l
हम नहीं जानते कि भजन 104 किसने लिखा, किन्तु अवश्य ही वह प्रकृति की सुन्दरता से मोहित था l सृष्टि की अनेक अबिबो-गरीब बातें जैसे लबानोन के देवदार और जंगली गदहों का वर्णन करने के बाद, वह गीत गाता है, “यहोवा अपने काम से आनंदित होवे”(पद.31) l उसके बाद वह प्रार्थना करता है, “मेरा ध्यान करना उसको प्रिय लगे” (पद.34) l
प्रकृति में अनेक बातें याद रहने लायक हैं क्योंकि वे सुन्दर और सम्पूर्ण हैं l हम उन पर ध्यान करके किस तरह परमेश्वर को खुश कर सकते हैं? जब हम उसके कार्य पर विचार करते हैं और चकित करनेवाली बातों का पुनः अनुभव करते हैं, हम उन पर ध्यान दे सकते हैं, आनंदित हो सकते हैं और परमेश्वर को धन्यवाद दे सकते हैं l
दैनिक क्षण
मैंने अपनी कार में किराने का सामन लादकर पार्किंग स्थल से निकला ही था कि अचानक एक व्यक्ति सड़क के किनारे से मेरे सामने आ पहुंचा l मैंने कार के ब्रेक्स लगाए और उसको बचा लिया l वह चौंककर मुझे घूरने लगा l उस क्षण, मैं अपनी आँखों को घुमाकर निराशा से उसे देख सकता था अथवा मुस्कराते हुए उसे क्षमा कर सकता था l मैं मुस्करा दिया l
उसके चेहरे पर शांति और उसके होठों पर धन्यवाद था l
नीतिवचन 15:13 कहता है, “मन आनंदित होने से मुख पर भी प्रसन्नता छा जाती है, परन्तु मन के दुःख से आत्मा निराश होती है l” क्या लेखक जीवन की हरेक बाधा, निराशा, और असुविधा में हमारे चेहरे पर मुस्कराहट चाहता है? शायद नहीं! वास्तविक शोक, निराशा, और अन्याय के प्रति क्रोध का समय होता है l किन्तु हमारे दैनिक क्षणों में, मुस्कराहट से आशा उत्पन्न होती है और आगे बढ़ने के लिए अनुग्रह मिलता है l
शायद नीतिवचन का इशारा है कि मुस्कराहट हमारे भीतरी व्यक्तित्व की स्थिति का स्वाभाविक परिणाम होता है l एक “आनंदित मन” शांत, संतुष्ट, और परमेश्वर से सर्वोत्तम पाने के प्रति समर्पित होता है l पूरी तौर से आनंदित हृदय द्वारा, हम चकित करनेवाली परिस्थितियों में भी वास्तविक मुस्कराहट से प्रतिउत्तर देकर, दूसरों को परमेश्वर के साथ आशा और शांति प्राप्त करने के लिए आमंत्रित कर सकते हैं l
धन्यवादी दैनिकी
जब मैं यीशु में नयी विश्वासिनी थी, एक आत्मिक सलाहकार ने मुझ से धन्यवादी दैनिकी रखने को कहा l एक छोटा नोटबुक जिसे मैं अपने साथ हर जगह ले जाती थी l कभी-कभी मैं धन्यवाद की बात को तुरंत लिख लेती थी l अन्य समयों में, मैं सप्ताह के अंत में मनन के समय के बाद उसे लिखती थी l
प्रशंसा की बातों पर ध्यान देना एक अच्छी बात है, जो मैं अपने जीवन में फिर से स्थापित करना चाहती हूँ l यह मुझे परमेश्वर की उपस्थिति और उसके प्रावधान और देखभाल के लिए सचेत रहने में मदद करेगा l
सबसे छोटे भजन, भजन 117 में, लेखक सभी को प्रभु की प्रशंसा करने के लिए उत्साहित करता है क्योंकि “उसकी करुणा हमारे ऊपर प्रबल हुई है” (पद.2) l
इसके विषय सोचे : प्रभु ने आपसे आज, इस सप्ताह, इस महीना, और इस साल किस तरह प्रेम किया है? असाथारण की आशा न करें l उसका प्रेम साधारण, जीवन की दैनिक स्थितियों में दिखाई देता है l उसके बाद अनुभव करें कि आपके परिवार के प्रति, आपकी कलीसिया, और दूसरों के प्रति उसका प्रेम कैसे प्रगट हुआ है l हम सब के प्रति उसके प्रेम के विस्तार में डूब जाएं l
भजन यह भी कहता है कि “यहोवा की सच्चाई सदा की है”(पद.2 में ज़ोर दिया गया है) l अर्थात् वह हमेशा हमसे प्रेम करता रहेगा! इसलिए हम भविष्य में भी अनेक बातों के लिए परमेश्वर का धन्यवाद करते रहेंगे l उसके प्रिय बच्चों की तरह परमेश्वर की स्तुति करना और धन्यवाद देना ही हमारे जीवन का चरित्र हो!
कौन सा काम?
अपना मोबाइल फोन समुद्र तट पर खोने के बाद एंड्रू शिएटेल को लगा जैसे उसने हमेशा के लिए उसे खो दिया l हालाँकि, लगभग एक सप्ताह के बाद, मछुआरा, ग्लेन करले उसे पुकारकर उसका फ़ोन वापस कर दिया, जो सूखने के बाद ठीक काम कर रहा था l यह मोबाइल फोन एक 25 पौंड रेहू मछली के पेट से निकला था l
जीवन अनेक अजीब कहानियों से भरा पड़ा है, और हमें बाइबिल में अनेक कहानियाँ मिलती हैं l एक बार कर अधिकारी पतरस से मांग करने लगे, “क्या तुम्हारा गुरु मंदिर का कर नहीं देता?”(मत्ती 17:24) l यीशु ने सिखाने के लिए उस पल का उपयोग किया l वह चाहता था कि पतरस राजा के रूप में उसकी भूमिका को समझ ले l कर राजा के पुत्रों से नहीं वसूले जाते थे, और प्रभु ने स्पष्ट कर दिया कि न वह और न ही उसकी संतान कर देने के लिए बाध्य थे (पद.25-26) l
फिर भी यीशु किसी को “ठोकर (नहीं)” देना चाहता था(पद.27), इसलिए उसने पतरस को मछली पकड़ने भेजा l (यह कहानी का विचित्र हिस्सा है l) पकड़ी गयी पहली मछली के पेट में पतरस को एक सिक्का मिला l
यीशु यहाँ पर क्या करना चाहता है? एक बेहतर प्रश्न होगा, “यीशु परमेश्वर के राज्य में क्या करना चाहता है?” वह अधिकृत राजा है-उस समय भी जब अनेक उसे राजा के रूप में नहीं पहचान रहे हैं l जब हम अपने जीवन में उसे प्रभु स्वीकारते हैं, हम उसकी संतान बन जाते हैं l
जीवन हमसे बहुत कुछ मांगेगा, किन्तु यीशु हमारी ज़रूरतों को पूरा करेगा l जैसे कि भूतपूर्व पास्टर डेविड पोम्पो कहते हैं, “जब हम अपने पिता के लिए मछली पकड़ते हैं, हम अपनी ज़रूरतों की पूर्ति के लिए उस पर भरोसा कर सकते हैं l”