अलग किन्तु त्यागा हुआ नहीं
अपनी भांजी को उस शाम अलविदा कहते हुए मुझे बहुत दुःख हुआ जब वह मेसाच्युसेट्स में बोस्टन विश्वविद्यालय के स्नातक स्कूल में जा रही थी l यद्यपि पूर्वस्नातक होकर वह चार वर्ष तक दूर थी, वह राज्य के बाहर नहीं गयी थी l हम वाहन से ढाई घंटे की यात्रा करके आसानी से उससे मुलाकात कर लेते थे l अब वह 800 मील दूर जानेवाली थी l बात करने के लिए लगातार मिलना कठिन था l मुझे उसके देखभाल हेतु परमेश्वर पर भरोसा करना था l
इफिसुस के प्राचीनों को अलविदा कहते समय पौलुस ने भी ऐसा ही महसूस किया l चर्च स्थापना और उनको तीन वर्षों तक सिखाने के बाद, पौलुस ने उन प्राचीनों से उसके निकट परिवार की तरह रहने को कहा l अब यरूशलेम पहुंचने पर, उनसे उसकी मुलाकात होनेवाली नहीं थी l
किन्तु पौलुस ने इफिसियों को सलाह दिया l यद्यपि अब पौलुस उनका शिक्षक नहीं होगा, वे खुद को त्यागा हुआ न समझें l परमेश्वर निरंतर उनको कलीसिया की अगुवाई में अपने “अनुग्रह के वचन” द्वारा सिखाता रहेगा (प्रेरितों 20:32) l पौलुस के विपरीत, परमेश्वर हमेशा उनके साथ रहेगा l
बच्चों को घोंसले से बाहर करना हो या दूर जानेवाले परिवार के सदस्य और मित्रगण-विदाई बहुत कठिन हो सकती है l वे हमारे प्रभाव से दूर अपने नए जीवन में जाते हैं l हम भरोसा करें कि वे परमेश्वर के हाथों में हैं l वह उनके जीवन को निरंतर बनाएगा और हमसे भी अधिक उनकी वास्तविक ज़रूरतें पूरी करेगा l
तम्बुओं में निवास
अनेक सुन्दर झीलों के लिए प्रसिद्ध, मिनेसोटा में जहां मेरा पालन पोषण हुआ, मैं परमेश्वर की रचना की अद्भुत बातों का आनंद लेने हेतु कैम्पिंग करती थी l किन्तु पतले तम्बू में सोना मुझे नहीं पसंद है-जब रात्रि वर्षा और टपक्नेवाले तम्बू से स्लीपिंग बैग गीला हो जाए l
मैं सोचकर ताज्जुब करती हूँ कि हमारे विश्वास का एक शूरवीर तम्बूओं में सौ वर्ष बिताया l पचहत्तर वर्ष की उम्र में, परमेश्वर ने अब्राहम के द्वारा एक नए राष्ट्र का निर्माण करने के लिए उसे अपना देश छोड़ने को कहा (उत्पत्ति 12:1-2) l उसने प्रतिज्ञा पूरी करनेवाले परमेश्वर पर भरोसा करके उसकी आज्ञा मान ली l और अपने बाकी जीवन में, 175 वर्षों तक अर्थात् अपनी मृत्यु तक (25:7), अपने देश से दूर तम्बुओं में निवास किया l
हम अब्राहम की तरह शायद खानाबदोश का जीवन जीने के लिए नहीं बुलाये गए हों, किन्तु जब हम इस संसार से और उसमें के लोगों से प्रेम करते हैं और उनकी सेवा करते हैं, हमें घर की गहरी चाहत अर्थात् संसार में रहने की चाहत हो सकती है l अब्राहम की तरह, जब आंधी हमारे अस्थायी घर को हानि पहुंचाए, अथवा बारिश का पानी टपके, हम विश्वास से भावी नगर की आशा कर सकते हैं जिसका “बनानेवाला परमेश्वर है” (इब्रा. 11:10) l और अब्राहम की तरह, हम आशा कर सकते हैं कि परमेश्वर अपनी सृष्टि को नया कर रहा है, “एक उत्तम अर्थात [भावी]स्वर्गीय देश” तैयार कर रहा है (पद.16) l
जो शमौन ने कहा
रिफ्यूज रबिन्द्रनाथ नाम का एक व्यक्ति श्रीलंका में 10 वर्षों से अधिक से युवा कार्यकर्त्ता रहा है l वह अक्सर युवाओं के साथ देर रात को बातचीत करता है-खेलता है, उनकी सुनता है, सलाह देता है और सिखाता है, जो उसे पसंद है, किन्तु भरोसेमंद विद्यार्थीयों के कभी-कभी विश्वास से फिर जाने से निराशा मिलती है l वह कभी-कभी लूका 5 में शमौन पतरस की तरह कुछ-कुछ अनुभव करता है l
शमौन पूरी रात मेहनत करके भी मछली नहीं पकड़ा (पद.5) l वह हताश और थका हुआ था l किन्तु यीशु के कहने पर कि, “गहरे में ले चल, और ... अपने जाल डालो” (पद.4), शमौन का उत्तर था, “तौभी तेरे कहने से जाल डालूँगा” (पद.5) l
शमौन का आज्ञा मानना अद्भुत था l अनुभवी मछुआरे के रूप में, वह जानता था कि सूर्य निकलने के बाद मछलियाँ गहरे में चली जाती हैं, और उनके जाल गहराई में नहीं जा सकते थे l
यीशु पर भरोसा करने की उसकी इच्छा रंग लायी l शमौन को ढेर सारी मछलियाँ मिलीं और उसने जाना कि यीशु कौन है l वह यीशु को “स्वामी” (पद.5) से “प्रभु” कह पाया (पद.8) l वास्तव में, “सुनना” अक्सर हमें प्रगट रूप से परमेश्वर के कार्य देखने देता है और उसके निकट लाता है l
शायद परमेश्वर आपसे पुनः “अपने जाल डालने को कह रहा है l” हम शमौन की तरह प्रभु को उत्तर दें : “तौभी तेरे कहने से जाल डालूँगा l”
मीठा और खट्टा
हमारा छोटा बेटा नीबू को दांतों से काटकर, नाक सिकोड़कर, जीभ निकलकर, और आँखें मींचकर बोला, “खट्टा” l
मैंने हँसकर, उससे नीबू छीनकर कूड़े में फेंकना चाही l
“नहीं!” ज़ेवियर रसोई से दौड़कर मुझसे नीबू लेने आया l “और चाहिए!” उसने हर बार उस रसीले फल को काटते हुए अपने होंठ सिकोड़े l मैं चौंक गयी जब अंत में वह मुझे चिल्का देकर चला गया l
मेरी स्वाद-कोशिकाएं वास्तविक रूप से जीवन के मधुर क्षण के प्रति मेरा भेदभाव दर्शाती हैं l सभी कड़वी वस्तुओं को दूर रखने की मेरी पसंद अय्यूब की पत्नी की याद दिलाती है, जो दुःख के रूखेपन के प्रति मेरे विरोध के साथ है l
अय्यूब भी कठिनाई या परेशानी में आनंदित नहीं था, फिर भी हृदय की अत्यंत कष्ट पूर्ण स्थितियों द्वारा परमेश्वर का आदर किया (अय्यूब 1:1-22) l अय्यूब ने दुखदाई घावों का दुःख सहा(2:7-8) l उसकी पत्नी ने उससे परमेश्वर की निंदा करने को कहा (पद.9), किन्तु उसने कष्ट और पीड़ा में भी प्रभु पर भरोसा प्रगट किया (पद.10) l
जीवन की कड़वाहट से दूरी स्वाभाविक है l दुःख में परमेश्वर का विरोध करने की परीक्षा आ सकती है l किन्तु हमें भरोसा, निर्भरता, समर्पण सिखाने हेतु दुःख का उपयोग करते समय वह धीरज रखने में भी सहायता करता है l और अय्यूब की तरह, ज़रूरी नहीं कि हम दुःख के पीछे छिपी मिठास अर्थात् विश्वास की दृढ़ता प्राप्त करने के लिए उसका आनंद लें l
दैनिक प्रार्थना
गायक/गीतकार रोबर्ट हैमलेट ने “लेडी हु प्रेज़ फॉर मी” गीत अपनी माँ के सम्मान में लिखी जिन्होंने प्रति भोर अपने बेटों के बस स्टॉप जाने से पूर्व उनके लिए प्रार्थना की l हैमलेट की युवा माँ ने उसका गीत सुनकर, उसके साथ प्रार्थना करने का निश्चय किया l परिणाम आनंदित करने वाला था! उस बेटे के बाहर जाने से पूर्व, उसकी माँ ने उसके लिए प्रार्थना की l पाँच मिनट बाद वह अपने साथ कुछ और बच्चों को लेकर लौटा! उसकी माँ ने चकित होकर उससे पूछा कि क्या बात है l बेटे का उत्तर था, “इनकी माताएँ इनके लिए प्रार्थना नहीं करती हैं l”
इफिसियों की पत्री में, पौलुस “हर समय और हर प्रकार से ... प्रार्थना” करने को कहता है (6:18) l परिवार में सबको परमेश्वर पर दैनिक भरोसा प्रगट करना चाहिए क्योंकि बच्चे अपने निकट के लोगों को विश्वास करते देखकर ही परमेश्वर पर भरोसा करना सीखते हैं (2 तीमु. 1:5) l बच्चों के लिए और उनके साथ प्रार्थना करना ही उनको प्रार्थना का परम महत्त्व सिखाने का अहम् तरीका है l यह उनके लिए विश्वास से परमेश्वर के पास व्यक्तिगत रूप से जाने का ज़रूरी कारण समझने का एक तरीका है l
जब हम परमेश्वर में “असली विश्वास” की शिक्षा प्रगट रूप से “[बच्चों] को ... देना आरम्भ करते हैं” (निति. 22:6; 2 तीमु. 1:5), हम उनको एक विशेष इनाम, भरोसे से देते हैं कि परमेश्वर हमारे जीवनों में हमेशा उपस्थित रहकर निरंतर प्रेम, मार्गदर्शन, और सुरक्षा देता है l
पूरी दौड़
2016 के रिओ ओलंपिक्स में, 5,000 मीटर दौड़ में दो धावकों ने संसार का ध्यान आकर्षित किया l 3,200 मीटर दौड़ के बाद, न्यूज़ीलैण्ड की निक्की हैम्बलिन और अमरीका की एबे डीऔगुस्तटिनो आपस में टकराकर गिर गयीं l एबे तुरन्त खड़ी हो गयी, किन्तु निक्की की मदद करने ठहर गयी l क्षण भर बाद दोनों धावक दौड़ने लगे, और एबे गिरने के कारण दायीं पैर में चोट से लड़खड़ाने लगी l अब निक्की की बारी थी कि दौड़ पूरी करने के लिए ठहर कर सह-धावक को उत्साहित करे l एबे के लड़खड़ाने के बाद, निक्की समापन रेखा पर आख़िरकार, उसे गले लगाने के लिए खड़ी थी l आपसी उत्साह का कितना सुन्दर तस्वीर!
यह मुझे बाइबिल का एक परिच्छेद याद दिलाता है : “एक से दो अच्छे हैं .... यदि उनमें से एक गिरे, तो दूसरा उसको उठाएगा; परन्तु हाय उस पर जो अकेला होकर गिरे और उसका कोई उठानेवाला न हो” (सभो. 4:9-10) l आत्मिक दौड़ में धावक होकर, हमें परस्पर सहायता चाहिए-शायद और अधिक, क्योंकि हम दौड़ प्रतियोगिता में नहीं हैं किन्तु एक ही टीम के सदस्य हैं l गिरने के क्षण होंगे जहाँ उठने में किसी की मदद चाहिए; दूसरे क्षणों में किसी को प्रार्थना और उपस्थिति द्वारा उत्साह की आवश्यकता होगी l
आत्मिक दौड़ में अकेला नहीं दौड़ा जाता l क्या परमेश्वर आपको किसी के जीवन में निक्की या एबे बना रहा है? आज ही तुरंत मदद देकर, दौड़ पूरी करें!
सर्वोत्तम भाग
“उसका टुकड़ा मेरे से बड़ा है!”
बचपन में घर में बनी मिठाई के टुकड़े माँ से मिलने पर हम भाई एक दूसरे से लड़ते थे l एक दिन पिता ने अपनी भौंवें चढ़ाकर हमारे हरकत देखे, और अपना प्लेट उठाकर माँ को देखकर मुस्कराए : “कृपया मुझे अपने हृदय के बराबर टुकड़ा दो l” हम दोने भाई हैरान होकर माँ को हँसते हुए उनको सबसे बड़ा टुकड़ा देते हुए देखा l
परायी सम्पत्ति पर ध्यान देने से बहुत बार ईर्ष्या होती है l फिर भी परमेश्वर का वचन हमारे ध्यान को सांसारिक सम्पत्ति से कुछ अधिक मूल्यवान पर ले जाता है l भजनकार लिखता है, “यहोवा मेरा भाग है; मैंने तेरे वचनों के अनुसार चलने का निश्चय किया है l मैं ने पूरे मन से तुझे मनाया है” (भजन 119:57-58) l पवित्र आत्मा से प्रेरित होकर लेखक ने सच्चाई बतायी कि परमेश्वर के निकट रहना सबसे महत्वपूर्ण है l
हमारे प्रेमी और असीम सृष्टिकर्ता से अधिक हमारा बेहतर भाग और क्या हो सकता है? संसार की किसी वस्तु से उसकी तुलना नहीं, और कुछ भी उसे हमसे छीन नहीं सकता l मानवीय इच्छा बड़ा खालीपन है; किसी के पास संसार का “सब कुछ” हो सकता है और फिर भी अभागा l किन्तु जब परमेश्वर हमारा आनंद है, हम वास्तव में संतुष्ट हैं l हमारे अन्दर एक खाली स्थान है जिसे केवल परमेश्वर ही भर सकता है l वही हमारे हृदयों में अनुकूल शांति दे सकता है l
निदेशक को देखें
विश्व-प्रसिद्ध वायलिन वादक, जोशुआ बेल, चालीस सद्सीय चैम्बर ऑर्केस्ट्रा, अकादमी ऑफ़ सैंट मार्टिन इन द फ़ील्ड्स, का निर्देशन अनोखे तौर से करते हैं l छड़ी से इशारा करने की बजाए वे अपने इतालवी वायलिन को दूसरे वायलिन वादकों के साथ बजाते हुए निर्देशन देते हैं l बेल ने कोलोराडो पब्लिक रेडियो से कहा, “ वायलिन बजाते हुए मैं उस वक्त उनके समझने लायक सब प्रकार के निर्देशन और संकेत दे सकता हूँ l वे मेरे वायलिन के प्रत्येक झुकाव को जानते हैं, या मेरे भौं के ऊपर उठाने को, या जिस तरह मैं अपने को धनुष के रूप में झुकाता हूँ l वे जानते हैं कि मैं पूरे ऑर्केस्ट्रा से कैसी आवाज़ चाहता हूँ l”
जिस तरह ऑर्केस्ट्रा के सदस्य जोशुआ बेल पर ध्यान केन्द्रित करते हैं, बाइबिल हमें हमारे प्रभु यीशु पर अपनी निगाहें रखने को कहती है l इब्रानियों 11 में विश्वास के अनेक नायकों की सूची के बाद, लेखक कहता है, “इस कारण जब कि गवाहों का ऐसा बड़ा बादल हम को घेरे हुए है, तो आओ, हर एक रोकनेवाली वस्तु और उलझानेवाले पाप को दूर करके, वह दौड़ जिसमें हमें दौड़ना है धीरज से दौड़ें, और विश्वास के करता और सिद्ध करनेवाले यीशु की ओर ताकते रहें” (इब्रा.12:1-2) l
यीशु ने प्रतिज्ञा की, “मैं जगत के अंत तक सदा तुम्हारे संग हूँ” (मत्ती 28:20) l क्योंकि वह है, उसके हमारे जीवन के संगीत का निर्देशन करते समय हमारे पास उसकी ओर देखने का अद्भुत सुअवसर है l
बाधाएँ हटाना
मैं मेरी को पूर्व कैदियों को समाज में जोड़नेवाला आश्रय-“द हाउस”-में हर मंगलवार को देखती थी l मेरा जीवन उससे भिन्न था : वह जेल से अभी-अभी बाहर आई थी , नशे की लत से जूझ रही थी, अपने पुत्र से अलग थी l आप कह सकते हैं कि वह समाज के बाहर रहती थी l
मेरी की तरह, उनेसिमुस भी था l एक दास के रूप में, उनेसिमुस ने अपने मसीही स्वामी, फिलेमोन को हानि पहुँचाकर, अब जेल में था जहां पर, पौलुस से मुलाकात करके उसने मसीह पर विश्वास किया (पद.10) l बदला हुआ व्यक्ति होने के बावजूद, उनेसिमुस अभी भी दास ही था l पौलुस ने पत्र के साथ उसे फिलेमोन के पास भेजा और उससे उनेसिमुस को “दास की तरह नहीं वरन् दास से भी उत्तम, अर्थात् भाई के समान” (फिलेमोन 1:16) ग्रहण करने का अनुरोध किया l
फिलेमोन के पास चुनाव था : वह उनेसिमुस से एक दास की तरह बर्ताव कर सकता था या उसे मसीह में एक भाई की तरह ग्रहण कर सकता था l मुझे भी चुनाव करना था l क्या मैं मेरी को एक पूर्व-बंदी और नशे से उबरने वाली की तरह देखूं अथवा मसीह की सामर्थ्य से बदले हुए जीवन के रूप में? मेरी प्रभु में मेरी बहन थी, हमारे पास विश्वास की यात्रा में संग चलने का मौका था l
हम सामाजिक-आर्थिक दर्जा, वर्ग, अथवा सांस्कृतिक भिन्नता को हमें अलग करने की अनुमति दें, यह सरल है l मसीह का सुसमाचार इन बाधाओं को हटाकर, हमेशा के लिए हमारे जीवन और संबंधों को बदल देता है l