लालच
2016 की गर्मी में, मेरी भांजी ने मुझे स्मार्ट फोन में फोन के कैमरा द्वारा खेला जानेवाला खेल पोकेमोन गो खेलने को मजबूर किया l इस खेल का लक्ष्य पोकेमोन नामक छोटे प्राणियों को पकड़ना होता है l जो कोई खेल शुरु करता हैं, एक लाल और सफ़ेद बॉल फोन की स्क्रीन पर दिखाई देता है l किसी पोकेमोन के पकड़ने के लिए ऊँगली से बॉल को पोकेमोन की ओर करना होता है l पोकेमोन को, हालाँकि, लालच देकर भी पकड़ा जा सकता है l
केवल पोकेमोन के चरित्रों को ही लालच नहीं दिया जा सकता है l नये नियम में विश्वासियों को लिखते हुए यीशु का भाई, याकूब, हमें याद दिलाता है कि हम “अपनी ही अभिलाषा से खिंचकर और फँसकर परीक्षा में” पड़ते हैं (1:14, पर महत्व दिया गया है) l अर्थात्, हमारी इच्छाएँ परीक्षाओं के साथ मिलकर हमें गलत मार्ग में जाने की लालच देते हैं l हमारे पास अपनी समस्याओं के लिए परमेश्वर अथवा शैतान को दोषी ठहराने की परीक्षा आ सकती है, किन्तु वास्तविक खतरा हमारे अन्दर है l
किन्तु अच्छा समाचार है l यदि हम हमें परीक्षाओं में ले जानेवाली बातों के विषय परमेश्वर से बातचीत करते हैं हम उनसे बच सकते हैं l यद्यपि, “न तो बुरी बातों से परमेश्वर की परीक्षा हो सकती है, और न वह किसी की परीक्षा आप करता है,” जिस तरह याकूब 1:13 में समझाता है, वह गलत करने की हमारी मानवीय इच्छा समझता है l हमें केवल उस बुद्धि को माँगना है जिसे परमेश्वर ने देने की प्रतिज्ञा की है (1:1-6) l
दूसरों की रूचियाँ
मेरा मित्र जैमी एक बड़ी अंतर्राष्ट्रीय निगम में काम करता है l कंपनी के साथ अपने काम के आरंभिक दिनों में, एक व्यक्ति उसके दफ्तर में आकर बातचीत शुरु करके जैमी से पूछा कि वह वहां क्या करता है l उस व्यक्ति को अपने काम के विषय बताते हुए, जैमी ने उस व्यक्ति से उसका नाम पुछा l “मेरा नाम रिच है,” उसने उत्तर दिया l
“आप से मिलकर ख़ुशी हुई,” जैमी ने उत्तर दिया l “और आप यहाँ क्या करते है?”
“ओ, मैं मालिक हूँ l”
जैमी ने अचानक पहचाना कि आकस्मिक, सरल बातचीत संसार के एक सबसे धनी व्यक्ति के लिए उसका परिचय था l
आज आत्म-प्रशंसा और “खुद” के विषय ख़ुशी मनाने वाली यह छोटी कहानी फिलिप्पियों की पत्री में पौलुस के महत्वपूर्ण शब्दों की ताकीद हो सकती है : विरोध या झूठी बड़ाई के लिए कुछ न करो” (2:3) l जो लोग अपना ध्यान अपनी ओर न करके दूसरों की ओर करते हैं उनके भीतर पौलुस के बताए हुए गुण हैं l
जब हम “दूसरों को अपने से अच्छा” समझते हैं, हम मसीह की दीनता प्रगट करते हैं (पद.3) l हम मसीह का अनुसरण करते हैं, जो इसलिए नहीं आया कि उसकी “सेवा टहल की जाए”, किन्तु इसलिए कि “आप ही सेवा टहल करे” (मरकुस 10:45) l जब हम “दास का स्वरुप” धारण करते हैं (फ़िलि. 2:7), हममें मसीह का स्वभाव होता है (पद.5) l
आज जब हम दूसरों के साथ बातचीत करते हैं, हम केवल अपने ही हित के नहीं किन्तु “दूसरों के हित की भी चिंता करें” (पद.4) l
हमारा दोष मिट गया
मैंने अपनी युवावस्था में, एक सहेली से निकट के उपहार के दूकान में मेरे साथ चलने को कहा l हालाँकि, उसने मुझे चकित कर दिया l उसने बालों में लगानेवाले कुछ रंगीन क्लिप्स मेरे पॉकेट में डालकर दूकानदार को पैसे दिए बगैर मुझे खींचती हुई बाहर ले आयी l मैं एक सप्ताह तक खुद को दोषी मानती रही इससे पहले कि मैं रोती हुई अपनी माँ के पास जाकर अपनी गलती न मान ली l
अपनी सहेली को चोरी करने से न रोक पाने पर मैं दुखित थी l मैं चोरी की वस्तुओं को लौटाकर दूकानदार से क्षमा मांगी और फिर कभी चोरी नहीं करने का प्रण किया l दूकानदार ने मुझसे अपने दूकान में आने से मना कर दिया l किन्तु इसलिए कि मेरी माँ ने मुझे क्षमा करके भरोसा दिलाया था कि मैंने सही करने का पूरा प्रयास किया था, और उस रात मैं शांति से सो पायी थी l
राजा दाऊद ने पश्चाताप करके क्षमा प्राप्त किया (भजन 32:1-2) l दाऊद ने बतशेबा और ऊरिय्याह के विरुद्ध अपने पाप को छिपाया(2 शमु. 11-12) जब तक कि उसकी “तरावट धूप काल की से झुर्राहट” न बन गयी (भजन 32:3-4) l किन्तु जब दाऊद ने अपने पाप को “प्रगट किया”, तो प्रभु ने उसके पाप क्षमा कर दिए (पद.5) l परमेश्वर ने “संकट से” उसकी रक्षा करके उसे “छुटकारे के गीतों से घेर” लिया (पद.7) l दाऊद आनंदित हुआ क्योंकि “जो यहोवा पर भरोसा रखता है वह करुणा से गिरा रहेगा” (पद.10) l
पश्चाताप करते समय और क्षमा मांगते समय हम अपने पापों के परिणाम का चुनाव नहीं कर सकते अथवा लोगों के प्रतिउत्तर पर नियंत्रण नहीं रख सकते हैं l किन्तु प्रभु हमें हमारे दोष को मिटाकर पाप की गुलामी से स्वतंत्रता और पश्चाताप द्वारा शांति का आनंद लेने में हमेशा सामर्थी बना सकता है l
कटनी के लिए तैयार
गर्मी बाद, हम इंगलैंड के न्यू फारेस्ट में घूमने गए और वहां पर जंगली बेर चुनने का आनंद लिया और पास ही घोड़ों को उछलते कूदते देखा l दूसरों के द्वारा वर्षों पहले लगाए गए पेड़ों के मीठे फलों का आनंद लेते हुए, मैंने यीशु द्वारा शिष्यों को कहे गए शब्दों को याद किये, “मैंने तुम्हें वह खेत काटने के लिए भेजा जिसमें तुमने परिश्रम नहीं किया” (यूहन्ना 4:38) l
मैं इन शब्दों में परमेश्वर के राज्य की उदारता पसंद करता हूँ l वह हमें दूसरों की मेहनत के फल का आनंद लेने देता है, जैसे जब हम किसी सहेली के साथ, जिसके परिवार को हम नहीं जानते हैं, और जो वर्षों से उसके लिए प्रार्थना कर रहा है, के साथ मसीह का प्रेम बांटते हैं l मुझे यीशु के शब्दों की सीमा भी पसंद है, कि हम बीज बोएँगे किन्तु हम नहीं कोई और कटनी काट सकेगा l इसलिए हम उस कार्य में भरोसा कर सकते हैं जो हमारे सामने है l हम इस सोच से धोखा नहीं खाएंगे कि हम परिणाम के लिए जिम्मेदार हैं l आखिरकार, परमेश्वर का कार्य हम पर निर्भर नहीं है l भरपूर कटनी के लिए उसके पास समस्त साधन है, और हम सौभाग्यशाली हैं कि हम भी उसमें भूमिका निभा सकते हैं l
मैं सोचता हूँ कि किस तरह के खेत आपके सामने और मेरे सामने कटनी के लिए तैयार हैं? हम यीशु के प्रेमी निर्देश का पालन करें : “अपनी आँखें उठाकर खेतों पर दृष्टि डालो कि वे कटनी के लिए पाक चुके हैं” (पद. 4:35) l
शांत रहें
हमनें बीते पांच वर्षों के मानव इतिहास में सबसे अधिक सूचनाएँ एकत्रित की हैं, और यह हर समय हमारे पास आ ररही हैं” (द आर्गनाइज्ड माइंड : थिंकिंग स्ट्रेट इन द एज ऑफ़ इन्फोर्मेशन ओवरलोड के लेखक डेनियल लेविटिन) l लेविटिन कहते हैं, “एक अर्थ में हम अधिक हलचल के आदि हो जाते हैं l” खबर और ज्ञान का निरंतर आक्रमण हमारे दिमाग पर अधिकार कर लेता है l हमारे परिवेश में मीडिया के निरंतर आक्रमण के कारण, शांत रहकर सोचने और प्रार्थना करने हेतु समय निकालना बहुत कठिन हो गया है l
भजन 46:10 कहता है, “चुप हो जाओ, और जान लो कि मैं ही परमेश्वर हूँ l” यह हमें समय निकलकर प्रभु पर केन्द्रित होने की आवश्यकता याद दिलाता है l अनेक लोग मानते हैं कि “मनन का समय” अर्थात् बाइबिल पढ़ना, प्रार्थना करना और परमेश्वर की भलाई और महानता पर विचार करना हर दिन का एक महत्वपूर्ण भाग है l
भजन 46 के लेखक की तरह जब हम, इस सच्चाई का अनुभव करते हैं कि “परमेश्वर हमारा शरणस्थान और बल है” (पद.1), यह हमारे भय को दूर करता है (पद.2), संसार के कष्ट से हमारा ध्यान हटाकर परमेश्वर की शांति की ओर ले जाकर, शांत भरोसा उत्पन्न करता है कि हमारा परमेश्वर नियंत्रण रखनेवाला है (पद.10) l
चाहे हमारा संसार कितना भी अस्त-व्यस्त हो, हम अपने स्वर्गिक परमेश्वर के प्रेम और सामर्थ्य में शांति और सामर्थ्य प्राप्त कर सकते हैं l
मोड़
एक सेवानिवृत सैनिक के अंतिम संस्कार के समय एक पासवान के मन में ख्याल आया कि वह सैनिक कहाँ होगा l किन्तु तब ही, लोगों को यह न बताकर कि वे परमेश्वर को कैसे जान सकते हैं, उसने काल्पनिक बातें करनी शुरू कर दी जो बाइबिल में नहीं हैं l ऐसी बातें सुनकर मैं सोचने लगा l आशा कहाँ है?
आखिर में उसने अंतिम गीत गाने को कहा l और जब हम खड़े होकर “प्रभु महान” गाने लगे, लोग अपने हृदय की गहराई से परमेश्वर की प्रशंसा करने लगे l कुछ ही क्षणों में, पूरे कमरे का वातावरण ही बदल गया था l अचानक, आश्चर्यजनक रूप से, तीसरे पद के मध्य मेरी भावनाएं मेरी आवाज़ से तीव्र थी l
जब सोचता हूँ कि पिता अपना पुत्र, मरने भेजा है वर्णन से अपार,
कि क्रूस पर उसने मेरे पाप सब लेकर, रक्त बहाया कि मेरा हो उद्धार l
उस गीत के गाने तक, मैं सोच रहा था कि परमेश्वर उस अंतिम संस्कार में उपस्थित होगा या नहीं l सच्चाई यह है कि वह तो कभी छोड़ता ही नहीं है l एस्तेर की पुस्तक से यह सच्चाई प्रगट होती है l यहूदी बन्धुआई में थे, और शक्तिशाली लोग उनको मारना चाहते थे l फिर भी सबसे कठिन समय में, अधर्मी राजा ने दास बनाए गए इस्राएलियों को उनके विरुद्ध खुद का बचाव करने की अनुमति दी जो उनको मार डालना चाहते थे (एस्तेर 8:11-13) l परिणामस्वरूप एक सफल बचाव दिखा और उत्सव मनाया गया (9:17-19) l
यदि किसी अंतिम संस्कार में परमेश्वर एक गीत के शब्दों द्वारा खुद को प्रगट करता है तो इसमें चकित होने की ज़रूरत नहीं l आखिरकार, उसने एक प्रयासित जातिसंहार को उत्सव में और एक क्रूसीकरण को जी उठने और उद्धार में बदल दिया!
दुःख से आनंद तक
केली की गर्भावस्था में परेशानी आ गयी, और डॉक्टर चिंतित हो गए l उसके
लम्बे प्रसव पीड़ा में, उन्होंने फुर्ती से सर्जरी (Cesarean section) करने का निर्णय लिया l किन्तु कठिन समय में, केली अपना दर्द भूल गयी जब उसने अपने नवजात बेटे को अपनी गोद में उठाया l दर्द आनंद में बदल गया l
बाइबिल इस सच्चाई की पुष्टि करती है : “प्रसव के समय स्त्री को शोक होता है, क्योंकि उसकी दुःख की घड़ी आ पहुंची है, परन्तु जब वह बालक को जन्म दे चुकती है, तो इस आनंद से कि संसार में एक मनुष्य उत्पन्न हुआ, उस संकट को फिर स्मरण नहीं करती” (यूहन्ना 16:21) l यीशु ने इस बात पर बल देने के लिए अपने शिष्यों के साथ इस उदाहरण का उपयोग किया कि उसके शीघ्र जाने से उनको दुःख होगा, किन्तु जब वे उसे पुनः देखेंगे उनका मन फिर आनंद से भर जाएगा (पद.20-22) l
यीशु अपनी मृत्यु और जी उठने और उसके बाद आनेवाली बातों के विषय कह रहा था l उसके जी उठने के बाद, शिष्य आनंदित हुए, क्योंकि यीशु उनको छोड़कर स्वर्ग जाने से पूर्व चालीस दिनों तक उनके साथ रहा और उनको सिखाता रहा (प्रेरितों 1:3) l फिर भी यीशु उनको दुखित नहीं छोड़ा l पवित्र आत्मा उनको आनंद से भरने वाला था (यूहन्ना 16:7-15; प्रेरितों 13:52) l
यद्यपि हम लोगों ने यीशु को आमने-सामने नहीं देखा है, विश्वासी होने के कारण हमें भरोसा है कि एक दिन हम उसे देखेंगे l उस दिन, हम पृथ्वी पर का दुःख भूल जाएंगे l किन्तु उस समय तक, प्रभु ने हमें आनंद के बिना नहीं छोड़ा है l उसने हमें अपना पवित्र आत्मा दिया है (रोमि. 15:13; 1 पतरस 1:8-9) l
आप मूल हैं
परमेश्वर ने हममें से हर एक को मूल रूप में बनाया है l कोई भी पुरुष अथवा महिला खुद के द्वारा बनाए नहीं गए l कोई भी स्वयं से गुणवान, जानकार, या बुद्धिमान नहीं बनता l परमेश्वर ने ही हममें से हर एक को बनाया l उसने हमारे विषय सोचा और हमें अपने असीम प्रेम के कारण बनाया l
परमेश्वर ने आपका शरीर, दिमाग, और आत्मा बनाया l और वह अभी भी आप में अपना कार्य कर रहा है l वह अभी भी आपको बना रहा है l हमारी परिपक्वता ही उसका एकमात्र उद्देश्य है : “जिसने तुम में अच्छा काम आरम्भ किये हैं, वही उसे यीशु मसीह के दिन तक पूरा करेगा” (फ़िलि. 1:6) l परमेश्वर आपको और सामर्थी, ताकतवर, पवित्र, और शांतिमय, और प्रेमी, कम स्वार्थी अर्थात् जैसा आप बनना चाहते थे वैसा ही बना रहा है l
“[परमेश्वर की] सच्चाई पीढ़ी से पीढ़ी तक बनी रहती है” (भजन 100:5) l परमेश्वर ने हमेशा आपसे प्रेम किया है (“हमेशा” दोनों ओर), और वह आपके साथ अंत तक विश्वासयोग्य रहेगा l
आपको ऐसा प्रेम मिला है जो सर्वदा तक रहेगा और एक परमेश्वर जो आपको कभी नहीं छोड़ेगा l यही आनंद करने का अच्छा कारण है और “जयजयकार के साथ उसके सम्मुख [आने का कारण भी]!” (पद 2) l
यदि आप गा नहीं सकते, केवल उसे ऊंची आवाज़ में पुकारें : “यहोवा का जयजयकार करो” (पद.1) l