बुद्धिमत्ता का श्रोत
एक व्यक्ति ने एक महिला पर मुकद्दमा दायर कर दिया, कि महिला के पास उसका कुत्ता था l कोर्ट में महिला ने कहा, उसका कुत्ता उस व्यक्ति का नहीं हो सकता और जज को बताया उसने उसे कहाँ से ख़रीदा था l वास्तविक मालिक का पता चल गया जब जज ने कोर्ट के कमरे में ही उस कुत्ते को खोल दिया l पूंछ हिलाते हुए, वह अपने मालिक के पास दौड़ गया l
प्राचीन इस्राएल का एक न्यायी, सुलैमान को इस तरह का एक मामला सुलझाना पड़ा l दो महिलाएँ एक ही छोटे लड़के की माँ होने का दावा कर रही थीं l दोनों के दलील को सुनने के बाद, तलवार से उस बच्चे को दो भाग में विभाजित करने को कहा l बच्चे की असली माँ ने अपना बच्चा नहीं मिलने की स्थिति में भी उसकी जान बचाने के उद्देश्य से उसे दूसरी स्त्री को दे देने का आग्रह किया (1 राजा 3:26) l सुलैमान में उसे बच्चा दे दिया l
न्यायोचित और नैतिक, सही और गलत क्या है का निर्णय करने के लिए बुद्धिमत्ता अनिवार्य है l यदि हम सचमुच बुद्धि का मूल्य समझते हैं, हम सुलेमान की तरह, परमेश्वर से समझने वाला हृदय मांग सकते हैं (पद.9) l परमेश्वर दूसरों की रुचियों के साथ हमारी आवश्यकताओं और इच्छाओं को संतुलित करके हमारे निवेदन का उत्तर दे सकता है l वह दीर्घकालीन(कभी-कभी अनंत) लाभ के विरुद्ध अल्पकालीन लाभ को तौलने में हमारी मदद भी कर सकता है ताकि हम अपने जीवन जीने में उसका आदर कर सकें l
हमारा परमेश्वर केवल एक सिद्ध बुद्धिमान न्यायी ही नहीं है, किन्तु एक व्यक्तिगत परामर्शदाता भी है जो हमें बड़ी मात्रा में ईश्वरीय बुद्धिमत्ता भी देना चाहता है (याकूब 1:5) l
अब तक राजा
एक न्यूज़ रिपोर्ट ने इसे संबोधित किया “मसीहियों के लिए दशकों में एक सबसे प्राणघातक दिन l” अप्रैल 2017 में रविवारीय आराधकों पर हमले हमारी समझ को चुनौती देते हैं l हम आराधनालय में रक्तपात को समझाने में असफल हैं l किन्तु इस प्रकार की पीड़ा को अच्छी तरह समझने वालों से हम थोड़ी सहायता ले सकते हैं l
आसाप द्वारा भजन 74 लिखने के समय यरूशलेम के अधिकतर लोग निर्वासन में थे या उनकी हत्या कर दी गयी थी l वह अपने हृदय का शोक दर्शाते हुए, कठोर आक्रमणकारियों के हाथों मंदिर का विनाश वर्णन करता है l “तेरे द्रोही तेरे पवित्स्थान के बीच गरजते रहे हैं,” आसाप ने कहा (पद.4) l “उन्होंने तेरे पवित्रस्थान को आग में झोंक दिया है, और तेरे नाम के निवास को गिराकर अशुद्ध कर डाला है” (पद.7) l
फिर भी, भजनकार ने इस भयंकर वास्तविकता के होते हुए खड़े होने के लिए एक स्थान ढूंढ़ लिया अर्थात् वह उत्साह देता है कि हम भी ऐसा कर सकते हैं l “आसाप ने निर्णय किया, “परमेश्वर तो प्राचीनकाल से मेरा राजा है, वह पृथ्वी पर उद्धार के काम करता आया है” (पद.12) l यद्यपि उस क्षण उसका उद्धार उसे अनुपस्थित दिखाई दे रहा था, इस सच्चाई ने आसाप को परमेश्वर के महान सामर्थ्य की प्रशंसा करने में योग्य बनाया l “आसाप ने प्रार्थना की, “अपनी वाचा की सुधि ले; . . . पिसे हुए जन को अपमानित होकर लौटना न पड़े; दीन और दरिद्र लोग तेरे नाम की स्तुति करने पाएँ” (पद.20-21) l
जब न्याय और करुणा अनुपस्थित महसूस हों, परमेश्वर का प्रेम और सामर्थ्य किसी भी तरह से क्षीण नहीं होते हैं l आसाप के साथ, हम भरोसे के साथ कह सकते हैं, “किन्तु परमेश्वर . . . मेरा राजा है l”
अपने नगर को देखें
“हमारी नज़रों से अपना शहर देखें l” डेट्रॉइट, मिशिगन, शहरी विकास समूह ने नगर के भविष्य की उनकी परिकल्पना को इस स्लोगन से आरम्भ किया l किन्तु यह परियोजना अचानक थम गयी जब समूदाय के कुछ सदस्यों ने इस मुहिम में कुछ कमी देखी l नगर की जनसँख्या और श्रमिक संख्या में अधिक बहुमत अफ़्रीकी अमरीकी लोगों का है l इसके बावजूद जो साइन बोर्ड, बैनर, और विज्ञापन तख्त उनकी नज़रों से नगर को देखने का आग्रह कर रहे थे, उनमें सफ़ेद चेहरों की भीड़ में काले लोगों के चेहरे गायब थे l
यीशु के देश के लोगों की दृष्टि में भविष्य के प्रति एक कमज़ोर विषय था l अब्राहम की संतान होने के नाते, वे प्रमुख तौर पर यहूदी लोगों के भविष्य के विषय चिंतित थे l वे सामरियों, रोमी सैनिकों, या उनके पारिवारिक मूल, रब्बियों, या मंदिर उपासना के विषय यीशु की चिंता को समझ नहीं पा रहे थे l
मैं डेट्रॉइट और यरूशलेम के कमज़ोर विषय से सम्बन्ध रखता हूँ l मैं भी केवल उन लोगों को देखने के लिए प्रवृत हूँ जिनके जीवन अनुभव मैं समझ सकता हूँ l इसके बावजूद परमेश्वर हमारी अनेकता के मध्य अपनी एकता ला सकता है l हमारी समझ से अधिक हम एक जैसे हैं l
हमारे परमेश्वर ने संसार के समस्त लोगों तक आशीष पहुँचाने के लिए मरुभूमि में निवास करनेवाला एक खानाबदोश अब्राम को चुना (उत्पत्ति 12:1-3) l यीशु हर एक को जानता और प्रेम करता है जिन्हें हम नहीं जानते या प्रेम करते हैं l मिलकर हम उसके अनुग्रह और करुणा से जीवित हैं जो हमें एक दूसरे को, हमारे नगरों और उसके राज्य को देखने में सहायता कर सकता है – उसकी नज़रों से l
लोमड़ियों को पकड़ना
समुद्र तट के निकट रहनेवाली एक सहेली से फोन पर बातचीत करते समय, सामुद्रिक चिड़ियों के चीखने की आवाज़ सुनकर मैंने ख़ुशी दर्शायी l उसका उत्तर था, “वे दुष्ट प्राणी हैं,” क्योंकि उसके लिए वे दैनिक कष्ट हैं l लन्दन निवासी होने के कारण, लोमड़ियों के विषय मेरा विचार भी यही है l मैं उनको आकर्षक जानवर नहीं समझती हूँ किन्तु आवारा फिरनेवाले प्राणी जो सुबह के समय बदबूदार गंदगी छोड़ जाते हैं l
लोमड़ियों का वर्णन पुराने नियम की पुस्तक, श्रेष्ठगीत, की प्रेम कविता में है, जो पति-पत्नी के बीच और कुछ एक टिप्पणीकारों के अनुसार परमेश्वर और उसके लोगों के बीच प्रेम को दर्शाता है l दुल्हन छोटी लोमड़ियों के विषय चेतावनी देते हुए, अपने दूल्हे से उन्हें पकड़ने को कहती है (2:15) l दाख़ के अंगूर के लिए भूखीं लोमड़ियाँ, अंगूर के कोमल बेलों को हानि पहुँचा सकती हैं l अपने भावी वैवाहिक जीवन साथ बिताने की चाह रखते हुए, वह नहीं चाहती कोई बुरा व्यक्ति उनके प्रेम के वाचा में बाधा डाले l
किस तरह “लोमड़ियाँ” परमेश्वर के साथ हमारे सम्बन्ध को बाधित कर सकती हैं, जब मैं बहुत सारी इच्छाओं में “हाँ” कहती हूँ, मैं असहाय और अरुचिकर हो जाती हूँ l अथवा जब मैं सम्बन्धात्मक झगड़े का हिस्सा होती हूँ, मैं निराशा या क्रोध की परीक्षा में होती हूँ l जब मैं प्रभु से इन “लोमड़ियों” के प्रभाव को सीमित करने के लिए कहती हूँ – जिन्हें मैंने खुले फाटक से आने दिया है या जो छिपकर घुस गई हैं – मैं उसकी उपस्थिति और मार्गदर्शन को महसूस करके, परमेश्वर में भरोसा और प्रेम पाती हूँ l
आपके साथ क्या ऐसा है? आपको परमेश्वर से दूर रखने वाली किसी भी बात में आप किस प्रकार उससे सहायता प्राप्त कर सकते हैं?
तरस की थकान
एनी फ्रैंक अपने दैनिकी लिखने के लिए लोकप्रिय है जिसमें उसने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अपने परिवार के छिपने का वर्णन करती है l बाद में जब वह नाज़ी मृत्यु शिविर में कैद कर दी गयी, उनके साथ के लोगों ने कहा, “[उनके लिए] उसके आँसू कभी नहीं सूखते था,” जो उसे “उसके सभी जाननेवालों में धन्य उपस्थिति” बना देती थी l इस कारण, विद्वान केनेथ बेली यह निष्कर्ष निकालते हैं कि एनी “तरस दिखाने में कभी नहीं थकती थी l”
एक टूटे संसार में रहने का एक परिणाम तरस दिखाने में थकान हो सकती है l मानव दुःख का वास्तविक फैलाव हमारे बीच सर्वोत्तम इरादा रखनेवाले को भी स्तब्ध कर देता है l हलाकि, तरस दिखाने में श्रमित होना, यीशु के व्यक्तित्व में नहीं था l मत्ती 9:35-36 कहता है, “यीशु सब नगरों और गाँवों में फिरता रहा और उनके आराधनालयों में उपदेश करता, और राज्य का सुसमाचार प्रचार करता, और हर प्रकार की बिमारी और दुर्बलता को दूर करता रहा l जब उसने भीड़ को देखा तो उसको लोगों पर तरस आया, क्योंकि वे उन भेड़ों के समान जिनका कोई रखवाला न हो, व्याकुल और भटके हुए से थे” (मत्ती 9:35-36) l
हमारा संसार केवल भौतिक आवश्यकताओं से नहीं किन्तु आत्मिक टूटेपन से भी पीड़ित है l यीशु उस आवश्यकता को पूरा करने और अपने अनुयायियों को इस कार्य में मदद करने की चुनौती देने आया (पद.37-38) l उसकी प्रार्थना थी कि पिता हमारे चारोंओर अर्थात् अकेलापन, पाप, और बिमारी से संघर्षरत लोगों की आवश्यकताएँ पूरी करने के लिए कार्यकर्त्ताओं को खड़ा करेगा l काश पिता दूसरों के लिए हमारे अन्दर इच्छा दे जो उसके हृदय को प्रतिबिंबित करता है l उसकी आत्मा की शक्ति में, हम उसके दयालु फ़िक्र को पीड़ितों पर दर्शा सकते हैं l
अन्धकार में आशा
एक दन्त कथा के अनुसार, सात चीनी राज्यों के परस्पर लड़ाई और फूट (Warring States perios[475-246BC])के काल में क्यू युआन नमक एक बुद्धिमान और देशभक्त चीनी शासकीय अधिकारी था l ऐसा कहा जाता है कि उसने बारम्बार राजा को आसन्न आक्रमण के विषय चिताया जो उसके देश को नष्ट करने वाला था, किन्तु राजा ने उसकी सलाह को नज़रंदाज़ किया l अंत में, क्यू युआन को निर्वासित कर दिया गया l अपने प्रिय देश को शत्रु के आधीन जाने की खबर सुनकर, जिसकी चेतवानी उसने दी थी, उसने अपना जीवन समाप्त कर लिया l
क्यू युआन का जीवन कुछ हद तक नबी यिर्मयाह के जीवन के सदृश था l उसने भी राजाओं की सेवा की जो उसकी चेतावनियों का उपहास करते थे, और उसका देश लूट लिया गया l हालाँकि, जबकि क्यू युआन ने अपनी निराशा से हार मान लिया, यिर्मयाह ने वास्तविक आशा प्राप्त की l अंतर क्यों है?
यिर्मयाह सच्ची आशा देनेवाले प्रभु को जानता था l परमेश्वर ने नबी को निश्चय दिया, “तेरे वंश के लोग अपने देश में लौट आएँगे” (यिर्मयाह 31:17) l यद्यपि यरूशलेम ई.पू. 586 में नाश कर दिया गया, लेकिन बाद में पुनः निर्मित किया गया (देखें नहेम्याह 6:15) l
किसी बिंदु पर, हम अपने को ऐसी स्थितियों में पाते हैं जो हमें निराश कर सकता है l यह एक ख़राब चिकित्सीय रिपोर्ट, अचानक नौकरी का छूटना, परिवार की बर्बादी हो सकता है l किन्तु जब जीवन हमें गिरा दे, हम फिर भी ऊपर देख सकते हैं क्योंकि परमेश्वर सिंहासन पर विराजमान है! उसके हाथों में हमारे दिन हैं, और वह हमें अपने हृदय के निकट रखता है l
असहमति के लिए सहमत
मैंअपने पिता को बाइबल की विभिन्न व्याख्याओं पर ख़त्म न होनेवाले विवाद से अलग होने की कठिनाई के विषय बात करते हुए याद करता हूँ l तुलनात्मक तरीके से यह बात कितनी अच्छी होती थी जब वे असहमति के लिए सहमत होते थे l
किन्तु जब इतना कुछ दाँव पर लगा हो तो क्या परस्पर-विरोधी बातों को एक ओर करना वास्तविक है? यह अन्य प्रश्नों में से एक प्रश्न है जिसका उत्तर प्रेरित पौलुस नया नियम में अपनी रोमियों की पत्री में देता है l सामजिक, राजनैतिक, और धार्मिक प्रतिद्वन्द में लिप्त पाठकों को लिखते हुए, वह अत्यधिक फूट डालने की स्थितियों में भी सामान्य आधार खोजने के लिए अनेक सलाह देता है (14:5-6) l
पौलुस के अनुसार, असहमत होने के लिए सहमत होना याद दिलाता है कि हर एक केवल अपने विचारों के लिए प्रभु को हिसाब नहीं देगा किन्तु अपनी असमानताओं के बीच हमारा परस्पर आचरण कैसा है (पद.10) l
विरोध की स्थितियां वास्तव में याद करने के अवसर बन जाते हैं कि हमारे अपने विचारों से कुछ बातें अधिक विशेष हैं अर्थात् बाइबल की हमारी व्याख्याओं से भी अधिक विशेष l हममें से प्रत्येक इस बात का हिसाब देंगे कि जिस तरह मसीह ने हमसे प्रेम किया है, क्या हमने परस्पर प्रेम किया है, और अपने दुश्मनों को भी l
अब जबकि मैं इसके बारे में सोचता हूँ, मैं अपने पिता की बातें याद करता हूँ कि असहमति के लिए सहमत होना कितना अच्छा है किन्तु परस्पर प्रेम और आदर के साथ l
धन्यवाद की समझ
पुरानी दर्द और निराशाओं के कारण वर्षों की थकान के साथ सीमित गतिशीलता ने आखिरकार मुझे अपनी पकड़ में ले लिया था l अपने असंतोष में, मैं अत्यधिक रौब जमानेवाली और कृतघ्न हो गयी l मेरे पति की मेरी देखभाल करने के कौशल के विषय मैं शिकायत करने लगी थी l घर की सफाई के उसके तरीके से मैं नाखुश हुयी l यद्यपि मैं जानती हूँ कि वह सबसे अच्छा भोजन बनाता है, मैं भोजन की विविधता की कमी पर कोलाहल मचाने लगी थी l अंततः उसके बताने पर कि मेरा कुड़कुड़ाना उसकी भावनाओं को ठेस पहुँचा रहे हैं, मैं क्रोधित हो गयी l आखिरकार, परमेश्वर ने मुझे अपनी गलतियाँ समझने में मेरी मदद की, और मैंने अपने परमेश्वर और पति से क्षमा मांग ली l
भिन्न परिस्थितियों की इच्छा करना हमें शिकायत, और सम्बन्ध बिगाड़ने वाले आत्म-केन्द्रितता की ओर ले जाता है l इस्राएली इस दुविधा से परिचित थे l ऐसा महसूस होता है मानो वह हमेशा असंतुष्ट रहते थे और परमेश्वर के प्रबंध के लिए कभी भी धन्यवादी नहीं थे (निर्गमन 17:1-3) l यद्यपि प्रभु ने “आकाश से भोजन वस्तु” (16:4) देकर बियाबान में अपने लोगों की देखभाल की थी, वह अन्य प्रकार का भोजन खाना चाहते थे (गिनती 11:4) l इस्राएली परमेश्वर की विश्वासयोग्यता और प्रेमपूर्ण देखभाल के दैनिक आश्चकर्म के लिए आनंदित होने के बदले, और भी कुछ चाहते थे, कुछ बेहतर, कुछ भिन्न, या कुछ जो पहले खाते थे (पद.4-6) l वे अपनी कुण्ठा मूसा पर निकालते थे (पद.10-14) l
परमेश्वर की भलाई और विश्वासयोग्यता पर भरोसा रखने से धन्यवाद की समझ बढ़ती है l आज हम उसकी असंख्य देखभाल के लिए उसे धन्यवाद दे सकते हैं l
आपका तरीका, मेरा नहीं
जब केमिल और जोएले को पता चला कि उनकी आठ वर्षीय बेटी, रीमा को असाधारण कैंसर (leukemia) हो गया है, वे पूरी तौर से टूट गए l इस बिमारी के कारण उसे मस्तिष्क ज्वर(meningitis) हो गया और एक दौरा पड़ा, और रीमा अचेतन अवस्था(coma) में चली गयी l हॉस्पिटल की मेडिकल टीम ने उसके माता-पिता से रीमा के जीवित रहने की हर आशा छोड़कर उसका अंतिम संस्कार करने की तैयारी करने को कहा l
केमिल और जोएले ने आश्चर्यकर्म के लिए उपवास और प्रार्थना की l केमिल ने कहा, “प्रार्थना करते समय, हमें हर स्थिति में परमेश्वर पर भरोसा रखना होगा l और अपना तरीका नहीं बल्कि यीशु की तरह प्रार्थना करें, पिता, किन्तु तेरी इच्छा l” “किन्तु मैं पूरी तौर से चाहता हूँ कि परमेश्वर उसको चंगा कर दे!” जोएले ने इमानदारी से उत्तर दिया l “हाँ! और हमें माँगना चाहिए!” केमिल ने प्रतिउत्तर दिया l “कठिन समय में खुद को परमेश्वर को सौंपने से उसे आदर मिलता है, क्योंकि यीशु ने भी ऐसा ही किया l”
क्रूस पर जाने से पहले, यीशु ने प्रार्थना की : “हे पिता, यदि तू चाहे तो इस कटोरे को मेरे पास से हटा ले, तौभी मेरी नहीं परन्तु तेरी ही इच्छा पूरी हो” (लूका 22:42) l “इस कटोरे को हटा दे,” इस प्रकार प्रार्थना करने से यीशु ने क्रूस पर नहीं जाने की विनती की, किन्तु उसने प्रेम में खुद को पिता के सामने समर्पित कर दिया l
अपनी इच्छाओं को परमेश्वर को समर्पित करना सरल नहीं है, और चुनौतीपूर्ण पलों में उसकी बुद्धिमत्ता को समझना कठिन हो सकता है l केमिल और जोएले की प्रार्थना अद्भुत रीति से सुनी गयी – रीमा आज पंद्रह वर्ष की स्वस्थ बेटी है l
यीशु प्रत्येक संघर्ष को समझता है l उस समय भी, जब हमारे लिए, उसकी विनती सुनी नहीं गयी, उसने हर एक ज़रूरत के लिए अपने परमेश्वर पर भरोसा रखना दिखा दिया l