जटिल रहस्य
सैर करते हुए मेरी मित्र और मैं बाइबिल के प्रति अपने प्रेम की बात करने लगे। उसने कहा, " मुझे पुराना नियम खास पसंद नहीं। जटिल बातें और प्रतिशोध-मुझे बस यीशु चाहिए!"
उसके कहे अनुसार कदापि हम भी नहूम जैसी पुस्तक में लिखे वचन को पढ़ कर, घबरा जाएँगे। “यहोवा जल उठने वाला...; (नहूम 1:2) और इसके बावजूद अगला ही पद हमें आशा से भरता है: "यहोवा विलम्ब से क्रोध...।" (पद 3)।
परमेश्वर के क्रोध के विषय पर अधिक गहराई से मनन करने पर हम पाते हैं कि वह अधिकतर अपने लोगों का या अपने नाम का बचाव करने के लिए इसका प्रयोग करते हैं। अपने असीम प्रेम के कारण, वह गलतियों के लिए न्याय और मनफिराव कर उनकी ओर मुड़ने वालों के लिए छुटकारा चाहते हैं। हम इसे न केवल पुराने नियम में देखते हैं-जब अपने लोगों को अपने पास वापस बुलाते हैं, परन्तु नए नियम में भी जब हमारे पापों के बलिदान के लिए वह अपने निज पुत्र को भेजते हैं।
भले ही हम परमेश्वर के चरित्र के रहस्यों को ना समझें, परन्तु हम भरोसा कर सकते हैं कि वह न केवल न्यायी परमेश्वर हैं वरन सभी प्रेमों का स्रोत भी हैं। हमें उनसे डरने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि वह "भला है; संकट के दिन में...।"(पद 7)
प्रबल प्रेम
शादी के एक हफ्ते पहले, सारा की सगाई टूट गई। उदास और निराश होने के बावजूद, उसने रिसेप्शन के खाने को बेकार ना जाने देने का फैसला किया। उत्सव की योजना और अतिथियों की लिस्ट बदल कर उसने स्थानीय आश्रय स्थलों के निवासियों को भोज में बुलाया।
फरीसियों को स्वार्थहीन दया करने के महत्व को समझाने के लिए यीशु ने कहा, "जब तू भोज करे..." (लूका 14:13-14)। उन्होंने कहा कि तू धन्य होगा, क्योंकि उनके पास बदले में मेज़बान को देने के लिए कुछ नहीं। यीशु ने उन लोगों की मदद करने की अनुमति दी जो ना तो दान दक्षिणा, न दिलचस्प बातें और नाही ऊंची जान-पहचान से इसकी आपूर्ति कर सकें।
यदि विचार किया जाए कि यीशु ने ये वचन तब कहे जब वे एक फरीसी के दिए भोज में बैठे थे तो, उनका कथन भडकाने वाला और उग्र लगेगा। परन्तु सच्चा प्रेम उग्र होता है। बदले में बिना कुछ पाने के उम्मीद किए दूसरों की मदद करना प्रेम है। इसी समान यीशु ने हम में से प्रत्येक से प्रेम किया। उन्होंने हमारी भीतरी दरिद्रता को देखकर हमारे लिए अपना जीवन दे दिया।
मसीह को व्यक्तिगत रूप से जानना, उनके अनंत प्रेम की थाह लेना है। हम सभी आमंत्रित हैं कि यह जानें कि "मसीह के प्रेम की चौड़ाई..." (इफिसियों 3:18)।
मेरे प्रिय मित्र के नाम
पहली सदी में प्रेरित यूहन्ना का गयुस को पत्र लिखना ऐसी कला है जो इक्कीसवीं सदी में लुप्त हो चुकी है। न्यूयॉर्क टाइम्स की लेखिका कैथरीन फील्ड लिखती हैं, "पत्र लिखना हमारी प्राचीनतम कलाओं में से एक है।
गयुस को लिखे पत्र में, यूहन्ना शारीरिक और आत्मिक चंगाई की आशा के साथ गयुस की सत्यनिष्ठा पर एक उत्साहवर्धक वचन शमिल करते हैं और कलीसिया के प्रति उसके प्रेम पर टिपण्णी करते हैं। यूहन्ना ने कलीसिया में किसी समस्या की बात कही जिसे अलग से बाद में संबोधित करने का वादा किया। और उन्होंने परमेश्वर की महिमा हेतु अच्छे कार्य करने के महत्व के बारे में लिखा। कुल मिलाकर यह पत्र उत्साहवर्धक और चुनौतीपूर्ण था।
डिजिटल बातचीत के युग का अर्थ है, कागज के पत्र का लुप्त होना, परन्तु इसे दूसरों को प्रोत्साहित करने से हमें नहीं रोकना चाहिए। पौलुस ने चर्मपत्र पर प्रोत्साहन भरे पत्र लिखे; हम विभिन्न तरीकों में दूसरों को प्रोत्साहित कर सकते हैं। मुख्य यह नहीं कि तरीका क्या है, परन्तु यह है कि हम दूसरों को बताएँ कि हम यीशु के नाम पर उनकी परवाह करते हैं!
गयुस को यूहन्ना के पत्र से मिले प्रोत्साहन की कल्पना करें। हम भी मेसेज लिखकर या फ़ोन करके प्रेरणाप्रद शब्दों द्वारा अपने मित्रों को परमेश्वर का प्रेम दिखा सकते हैं।
चंगाई की वर्षा
तूफान मुझे हमेशा से पसंद रहा है। बचपन में तेज़ बारिश में अपने भाई-बहनों समेत घर के बाहर जमा पानी में छलांग लगाना, फिसलना, और पूरी तरह से भीगना रोमांचकारी होता था। उस समय यह कहना कठिन था कि हमें मज़ा आ रहा है या डर लग रहा है।
वचन परमेश्वर के पुनरुद्धार की तुलना उस निर्जल देश से करता है जिसमें जल के ताल भर जाएँ, उदाहरण के लिए भजन संहिता 107 को लें। जो रेगिस्तान को जल के ताल में बदल दे वह एक मंद वर्षा नहीं वरन घनघोर बारिश होगी जिससे बंजर भूमि की दरारों में नया जीवन भर जाएगा।
क्या हम ऐसे ही पुनरुद्धार की प्रतीक्षा नहीं कर रहे हैं? जब चंगे होने के भूखे-प्यासे हम लक्ष्यहीन भटकने लगते हैं (पद 4-5), तब हमें एक ज़रा सी तस्सली भर से बढ़कर कुछ और पाने की लालसा होती है। जब पाप की जड़ें हमें घोर अंधकार के बन्धनों में जकड़ती हैं (पद 10-11 ) तब हमें मात्र अपनी दशा में परिवर्तन से बढ़कर कुछ और पाने की लालसा होती है।
ऐसा परिवर्तन परमेश्वर ला सकते हैं (पद 20)। अपने डर और शर्म को परमेश्वर के पास लाने में देर नहीं हुई है, जो हमें पाप के अंधकार से निकालकर अपने प्रकाश में लाने से बढ़कर करने में सक्षम हैं।
असीम प्रेम
एक बुद्धिमान मित्र ने मुझे सलाह दी कि "तुम हमेशा" या "तुम कभी नहीं" जैसे बोल कभी न बोलूँ विशेष रूप से परिवार के साथ। हमसे प्रेम करने वाले लोगों की आलोचना करना तथा और उनके प्रति उदासीनता का भाव रखना कितना आसान होता है। परंतु हमारे प्रति परमेश्वर का प्रेम अपरिवर्तित रहता है।
भजन संहिता 145 शब्द सभों शब्द से भरा हुआ है। " यहोवा सभों के लिये..."(पद 9)। "यहोवा अपने सभी वायदों...”। "यहोवा सब गिरते हुओं...(13,14)
इस भजन में हमें एक दर्जन बार याद दिलाया गया है कि परमेश्वर का प्रेम असीम और अपक्षपाती है। और नया नियम बताता है कि इसकी सबसे बड़ी अभिव्यक्ति यीशु मसीह में दिखती है: "क्योंकि परमेश्वर ने जगत से ऐसा प्रेम रखा कि उस ने अपना एकलौता पुत्र दे दिया, ताकि जो कोई उस पर विश्वास करे, वह नाश न हो, परन्तु अनन्त जीवन पाए। " (यूहन्ना 3:16)
भजन संहिता 145 घोषणा करता है कि "जितने उसे पुकारते हैं, अर्थात जितने उसे सच्चाई से पुकारते हें; वह उन सभों के निकट रहता है। वह अपने डरवैयों की इच्छा पूरी करता है, ओर उनकी दोहाई सुन कर उनका उद्धार करता है। "(पद 18-19)
हमारे लिए परमेश्वर का प्रेम सदा बना है, और कभी विफल नहीं होता!
हमारे समान पापी
मेरी एक मित्र है जिसका नाम इडिथ है l उसने मुझे उस दिन के विषय बताया जिस दिन उसने यीशु के पीछे चलने का निर्णय लिया था l
इडिथ धर्म का परवाह नहीं करती थी l किन्तु एक दिन वह अपने घर के निकट स्थित चर्च में गयी क्योंकि वह अपनी असंतुष्ट आत्मा की तृप्ति के लिए कुछ ढूँढ़ रही थी l उस दिन का बाइबल वचन लूका 15:1-2 था, जिसे पास्टर ने किंग जेम्स अनुवाद से पढ़ा : “सब चुंगी लेनेवाले और पापी उसके पास आया करते थे ताकि उसकी सुनें l पर फरीसी और शास्त्री कुड़कुड़ाकर कहने लगे, “यह तो पापियों से मिलता है और उनके साथ खाता भी है l”
वहाँ पर यही लिखा था, किन्तु इडिथ ने कुछ और सुना : यह तो पापियों के साथ इडिथ से भी मिलता है l” वह अपने सीट पर सीधे बैठ गयी! आखिरकार उसने अपनी गलती मान ली, किन्तु वह विचार कि यीशु पापियों से मिलता है और उसमें इडिथ भी शामिल है, उसके मन में चल रहा था l वह सुसमाचार पढ़ने लगी, और जल्द ही उसमें विश्वास करके उसकी शिष्या बन गयी l
यीशु के दिनों के धार्मिक लोग इस वास्तविकता से अपमानित होते थे कि वह पापी, और बुरे लोगों के साथ खाता पीता था l उनका नियम ऐसे लोगों के साथ उनको सहभागिता रखने के लिए मना करता था l यीशु ने मनुष्यों द्वारा बनाए गए नियमों की परवाह नहीं करता था l उसने दीन-हीन व्यक्तियों को अपने पास बुलाया, चाहे वे कितनी ही दूर चले गए हों l
यह आज भी सच है, और आप जानते हैं : यीशु पापियों को बुलाता है और (आपका नाम शामिल है) l
चुनौतियों पर विजय
हम हर महीने अपने व्यक्तिगत लक्ष्यों के प्रति एक दूसरे को जिम्मेदार ठहराने के लिए इकट्ठे होते थे l मेरी सहेली मैरी वर्ष के अंत से पहले अपने डाइनिंग रूम की कुर्सियों पर गद्दियाँ लगाना चाहती थी l हमारी नवम्बर की सभा में उसने मजाकीय तरीके से अक्टूबर से अपनी प्रगति के विषय बताया : कुर्सियों पर गद्दियाँ लगाने में 10 महीने और दो घंटे लगे l” महीनों तक सामग्री उपलब्ध नहीं होने या नौकरी में बहुत मांग होने के कारण और अपने छोटे बच्चे की देखभाल करने के बाद समय निकालकर, मात्र दो घंटों में गद्दियाँ लगाने का काम पूरा हो गया l
प्रभु ने नहेम्याह को कहीं बड़े काम के लिए बुलाया था : यरूशलेम को पुनःस्थापित करने के लिए जिसकी दीवारें 150 वर्षों तक खंडहर पड़ी थीं (नहेम्याह 2:3-5, 12) l जब वह लोगों को काम करने में अगुआई कर रहा था, उन्होंने उपहास, आक्रमण, विकर्षण, और पाप के प्रति परीक्षा का सामना किया (4:3, 8; 6:10-12) l फिर भी परमेश्वर ने उनको अपने प्रयास में अडिग खड़े रहने हेतु सज्जित किया और केवल बावन दिनों में चुनौतीपूर्ण कार्य पूरा कर लिया गया l
इस तरह की चुनौतियों पर विजय पाने के लिए व्यक्तिगत इच्छा या लक्ष्य से अधिक की ज़रूरत होती है; नहेम्याह इस समझ से प्रेरित था कि परमेश्वर ने उसको इस काम के लिए नियुक्त किया था l असाधारण विरोध के बावजूद उसके उद्देश्य के कारण ने लोगों को उसके नेतृत्व में चलने के लिए बल दिया l चाहे किसी सम्बन्ध को ठीक करना हो अथवा अपनी साक्षी देना हो, जब परमेश्वर हमें कोई काम देता है वह हमें उस काम को करने के लिए समस्त कौशल और सामर्थ्य देता है ताकि सभी चुनौतियों का सामना करके हम अपने प्रयास में आगे बढ़ सकें l
दुःख में आशा
जब मैं उन्नीस वर्ष की थी, एक कार एक्सीडेंट में मेरी एक निकट सहेली की मृत्यु हो गयी l आगे के सप्ताहों और महीनों में, मैं प्रतिदिन गहरे दुःख से होकर निकली l इतनी छोटी उम्र में किसी को खो देने के दुःख से मेरी दृष्टि धुंधली हो गयी, और कभी-कभी मुझे यह भी पता नहीं होता था कि मेरे आस-पास क्या हो रहा है l दुःख और पीड़ा ने मुझे इतना अँधा कर दिया था कि मैं परमेश्वर को भी नहीं देख पा रही थी l
लूका 24 में, दो शिष्य, यीशु की मृत्यु के बाद भ्रमित और अति दुखित होने के कारण जान न सके कि वे पुनरुत्थित गुरु ही के साथ चल रहें हैं l मार्ग में वह उन्हें शास्त्र से समझाता जा रहा था कि क्यों प्रतिज्ञात उद्धारकर्ता को बलिदान होना और जी उठना अवश्य था l यीशु द्वारा रोटी लेकर तोड़ने के बाद ही उन्होंने उसको पहचाना (पद.30-31) l यद्यपि उसके अनुयायियों ने यीशु की मृत्यु के समय बहुत ही भयंकर मृत्यु का सामना किया था, मृत्यु से जी उठने के द्वारा परमेश्वर ने उनको दिखा दिया कि फिर से आशा कैसे रखी जा सकती है l
हमें भी उन शिष्यों की तरह, घबड़ाहट या गहरा दुःख दबा देता है l किन्तु हम इस सच्चाई में कि यीशु जीवित है और संसार में और हममें कार्य कर रहा है आशा और विश्राम पा सकते हैं l यद्यपि हम अभी भी व्यथा और दुःख का सामना करते हैं, हम यीशु को हमारे दुःख में साथ चलने को बुलाएं l जगत की ज्योति होकर (जूहन्ना 8:12), वह आशा की किरणों से हमारे कोहरे को साफ़ कर देगा l
मधुमक्खी और साँप
कुछ एक समस्याओं से पिता का नाम जुड़ा हुआ है l जैसे, हाल ही में मेरे बच्चों ने देखा कि मधुमक्खियों हमारे सामने के कंक्रीट बरामदे के दरार में छत्ते बना लिया है l इसलिए, मैंने कीट स्प्रे लेकर उनको हटाने लगा l
मधुमक्खियों ने मुझे पाँच बार डंक मारा l
मुझे कीटों का डसना अच्छा नहीं लगता है l किन्तु मैं सह लूँगा पर मेरे बच्चों या मेरी पत्नी को कुछ न हो l आखिरकार मेरे कार्य सूची में मेरे परिवार का हित मेरे लिए सबसे पहले है l मेरे बच्चों के पास एक ज़रूरत थी, और उन्होंने मुझसे उसको पूरा करने को कहा l वे जिन बातों से डरते हैं उनसे सुरक्षा देने के लिए मुझ पर भरोसा करते हैं l
मत्ती 7 में, यीशु की शिक्षा है कि हमें भी अपनी ज़रूरतों के लिए परमेश्वर के पास जाकर (पद.7), उसके प्रबंध पर भरोसा करना चाहिए l यीशु इसे किरदार की सहायता से समझाता है : “तुम में से ऐसा कौन मनुष्य है, कि यदि उसका पुत्र उससे रोटी मांगे, तो वह उसे पत्थर दे? या मछली मांगे, तो उसे साँप दे?” (पद.9-10) l प्रेमी माता-पिता के लिए, उत्तर स्पष्ट है l किन्तु यीशु फिर भी उत्तर देते हुए, हमारे पिता की उदार भलाई में विश्वास नहीं खोने की चनौती देता है : “अतः जब तुम बुरे होकर, अपने बच्चों को अच्छी वस्तुएं देना जानते हो, तो तुम्हारा स्वर्गीय पिता अपने मांगनेवालों को अच्छी वस्तुएं क्यों न देगा?” (पद.10) l
मैं अपने बच्चों को और अधिक प्यार करने की कल्पना भी नहीं कर सकता हूँ l किन्तु यीशु हमें निश्चित करता है कि हमारे लिए परमेश्वर के प्रेम के समक्ष संसार के सबसे अच्छे पिता का प्रेम भी कम है l