प्रेम का उदार प्रगटन
हमारी शादी की सालगिरह पर मेरे पति, एलन मुझे ताज़े फूलों का गुलदस्ता देते हैं l संगठित पुनःनिर्माण कंपनी (corporate restructure)में नौकरी छूटने पर, मैंने प्रेम के खर्चीले प्रदर्शन जारी रहने की आशा नहीं की थी l किन्तु हमारे उन्नीसवीं सालगिरह पर, डाइनिंग हॉल के मेज़ पर रखे फूलों के रंगीन गुलदस्ते ने मेरा स्वागत किया l इसलिए कि उसके लिए यह वार्षिक रीत महत्वपूर्ण थी, एलन ने हर माह कुछ रूपये बचाकर मेरे लिए अपना व्यक्तिगत प्रेम प्रगट किया l
जिस तरह पौलुस ने कुरिन्थुस के विश्वासियों को संबोधित करते हुए उत्साहित किया, उसी प्रकार मेरे पति की चिन्ताशील योजना ने मेरे लिए भरपूर उदारता प्रगट की l प्रेरित पौलुस ने कलीसिया को उनके साभिप्राय और उत्साहवर्धक भेंट के लिए प्रशंसा करते हुए (2 कुरिं.9:2,5), उनको याद दिलाया कि परमेश्वर उदार और आनंद दे दिए गए भेंट से प्रसन्न होता है (पद.6-7) l आखिरकार, कोई भी हमारे प्रबंधकर्ता, जो हमारी हर एक ज़रूरत को पूरी करने को तत्पर है, से अधिक नहीं देता है, (पद.8-10) l
हम हर प्रकार के भेंट देने में उदार हो सकते हैं, परस्पर देखभाल कर सकते हैं क्योंकि प्रभु हमारे हर एक भौतिक, भावनात्मक, और आत्मिक ज़रूरतों को पूरी करता है (पद.11) l देने के द्वारा, हम परमेश्वर को सभी बातों के लिए धन्यवाद दे सकते हैं l हम दूसरों को भी परमेश्वर से प्राप्त आशीषों के लिए प्रशंसा करने और उसमें से देने हेतु प्रेरित कर सकते हैं (पद.12-13) l मुक्त हाथों का भेंट, प्रेम और कृतज्ञता का उदार प्रदर्शन, परमेश्वर के प्रबंध में हमारे भरोसे को प्रगट कर सकता है l
स्वार्थहीन सेवा
कुछ लोग इकठ्ठा होकर उस बड़े वृक्ष को मैदान में पड़ा देख खुद को बौना महसूस कर रहे थे l एक वृद्ध महिला अपनी छड़ी के सहारे खड़ी होकर पिछली रात आए तूफ़ान की बात कर रही थी जिसके कारण उसका वह “विशाल वृक्ष गिर चुका था” l उसकी आवाज़ में भावुकता थी, “सबसे बुरी बात यह थी कि उसके कारण हमारे विवाह के बाद मेरे पति द्वारा बनायी गयी पत्थर की दीवाल भी गिर गयी थी l उन्हें इस दीवार से प्रेम था l मैं भी उस दीवार से प्रेम करती थी! अब मेरे पति की तरह यह भी नहीं रहा l”
अगली सुबह, कंपनी के कर्मियों को गिरे वृक्ष को हटाते हुए और स्थान को साफ़ करते देखकर उसका चेहरा खिल उठा l उसने दो वयस्कों और एक किशोर को जो उसके लॉन का घास काटता था सावधानीपूर्वक उनकी प्रिय दीवाल को नापते और पुनः बनाते देखा!
परमेश्वर जिस सेवा के पक्ष में है यशायाह नबी उसी का वर्णन करता है: जिस प्रकार मरम्मत करनेवाले उस वृद्ध महिला के लिए किये कार्य उसी तरह के कार्य जो हमारे चारों ओर के लोगों के मन को आनंदित करते हैं, l यह परिच्छेद सिखाता है कि परमेश्वर पाखंडी आत्मिक रीति रिवाजों से ऊपर उठकर दूसरों को स्वार्थहीन सेवा देनेवालों को महत्त्व देता है l वास्तव में, परमेश्वर निःस्वार्थ सेवा के लिए अपनी संतान पर दो-तरफ़ा आशीष बरसाता है l पहली, परमेश्वर शोषित और ज़रुरतमंदों की सहायता करने में हमारी इच्छित कार्यों का उपयोग करता है (यशायाह 58:7-10) l उसके पश्चात परमेश्वर ऐसी सेवा में संलग्न लोगों का अपने राज्य में सामर्थी सकारात्मक बल के रूप में उपयोग करके हमारी नेकनामी का निर्माण या पुनःनिर्माण करता है (पद. 11-12) l आज आप कौन सी सेवा देना चाहते हैं?
सिद्ध अपूर्णता
मेरे कॉलेज के एक प्रोफेसर ने मुझमें आदर्शवाद-प्रेरित विलम्ब(टालमटोल) को देखते हुए मुझे कुछ बुद्धिमान सलाह दी l “सिद्धता को अच्छे का शत्रु मत बनाओ,” उसने कहा, सिद्ध प्रदर्शन का प्रयास उन्नत्ति के लिए आवश्यक जोखिम उठाने से रोकता है l स्वीकार करते हुए कि मेरे काम हमेशा अपूर्ण रहेंगे मुझे उन्नत्ति करने की स्वतंत्रता मिलेंगी l
प्रेरित पौलुस ने खुद को सिद्ध बनाने में अपने प्रयास को त्यागने का एक और ख़ास कारण समझाया : मसीह हमारी ज़रूरत है, यह हमें इसके प्रति अँधा कर सकता है l
पौलुस ने इस सच को कठिन तरीके से सीखा था l कई वर्षों तक परमेश्वर की व्यवस्था को सिद्धता से पालन करने के प्रयास में, जब यीशु से मुलाकात हुई सब कुछ बदल गया (गलातियों 1:11-16) l पौलुस ने समझ लिया कि यदि परमेश्वर के साथ पूर्ण और सही होने के लिए उसके प्रयास काफी हैं, “तो मसीह का मरना व्यर्थ होता” (2:21) l केवल खुद का इनकार ही, खुद पर भरोसा करना त्यागकर ही, वह यीशु को अपने जीवन में जीवित महसूस कर सकता था (पद.20) l अपनी अपूर्णता में वह परमेश्वर की पूर्ण सामर्थ्य अनुभव कर सकता था l
इसका अर्थ यह नहीं है कि हम पाप का सामना न करें (पद.17); किन्तु इसका अर्थ यह ज़रूर है कि हम आत्मिक उन्नत्ति के लिए अपनी सामर्थ्य पर भरोसा करना छोड़ दें (पद.20) l
इस जीवन में, हम प्रगति करने वाले बने रहेंगे l किन्तु जब हमारे हृदय सिद्ध परमेश्वर की ज़रूरत के लिए नम्र बने रहेंगे, यीशु वहां निवास करेगा (इफिसियों 3:17) l हम उसमें जड़वत रहकर, उस ज्ञान से परे प्रेम में और गहराई से बढ़ते जाएंगे (पद.19) l
यीशु कारण जानता है
मेरे कुछ मित्र हैं जिन्होनें आंशिक चंगाई पायी है किन्तु अपनी बीमारियों के दुखद पहलुओं से अभी भी संघर्ष कर रहे हैं l दूसरे मित्र किसी नशे की लत से चंगाई पाए हैं किन्तु अपनी अयोग्यता की भावनाओं और आत्म-घृणा से अभी भी संघर्ष कर रहे हैं l और मैं चकित हूँ,क्यों नहीं परमेश्वर ने उनको एक बार में ही पूरी रीति से चंगा कर दिया?
मरकुस 8:22-26 में, यीशु के एक दृष्टिहीन व्यक्ति को चंगा करता है l सर्वप्रथम यीशु उस व्यक्ति को गाँव से बाहर ले गया l उसके बाद उसकी आँखों में थूका और “उस पर हाथ रखे l” उस व्यक्ति ने कहा कि उसे मनुष्य “चलते हुए पेड़ों जैसे दिखाई देते हैं” उसके बाद यीशु ने उसकी आँखों पर दोबारा हाथ रखे, और इस बार वह “सब कुछ साफ़-साफ़ देखने लगा l”
यीशु की सेवा में, उसके शब्द और कार्य अक्सर लोगों को और उसके शिष्यों को चकित और चौंका दिया करते थे (मत्ती 7:28; लूका 8:10; 11:14) और बहुतों को उससे दूर भी ले गए (यूहन्ना 6:60-66) l इसमें कोई शंका नहीं कि ये दोनों आश्चर्यक्रम भी गड़बड़ी उत्पन्न कर दी l इस व्यक्ति को तुरन्त चंगा क्यों नहीं किया गया?
हम नहीं जानते क्यों l किन्तु यीशु जानता था कि उस क्षण इस व्यक्ति को और शिष्यों को जो इस चंगाई के गवाह थे, क्या ज़रूरत थी l और वह जानता है कि आज हमें क्या चाहिए जिससे उसके साथ हमारे सम्बन्ध और निकट के हो जाएं, l यद्यपि हम हमेशा नहीं समझ पाएंगे, हम भरोसा करें कि परमेश्वर हमारे और हमारे प्रियों के जीवनों में कार्य कर रहा है और वह उसके पीछे चलने के लिए हमें सामर्थ्य, साहस और स्पष्टता देगा l
चौकस देखभाल
स्कूल जाने से पूर्व मैंने अपने बेटे से पूछा कि क्या उसने दांत साफ़ किए है l दोबारा पूछते हुए, मैंने उसे सच बोलने का महत्त्व याद दिलाया l मेरे कोमल चेतावनी से बेखबर, उसने मुझसे गंभीर किन्तु मज़ाकीय तरीके से कहा कि मेरे लिए बाथरूम में सुरक्षा कैमरा लगाना ज़रूरी है l तब मैं खुद जांच पाऊंगा कि मैंने अपने दांत साफ़ किये कि नहीं और फिर झूठ बोलने की परीक्षा नहीं आएगी l
सुरक्षा कैमरा नियम पालन करने में हमारी मदद कर सकता है, लेकिन इसके बाद भी कई स्थान हैं जहां हम जा सकते हैं और कई तरीके हैं जहाँ हम लोगों की आँखों से छिप सकते हैं l यद्यपि हम सुरक्षा कैमरा से बच सकते हैं या उसको धोखा दे सकते हैं, हम यह सोचकर कि हम परमेश्वर की निगाहों से दूर हैं खुद को ही धोखा देंगे l
परमेश्वर पूछता है, “क्या कोई ऐसे गुप्त स्थानों में छिप सकता है, कि मैं उसे न देख सकूँ? (यिर्मयाह 23:24) l उसके प्रश्न में उत्साह और चेतावनी दोनों ही हैं l
चेतावनी यह है कि हम परमेश्वर से छिप नहीं सकते हैं l हम न उससे आगे निकल सकते हैं और न ही उसको धोखा दे सकते हैं l हमारे सारे कार्य उसके सामने हैं l
उत्साह यह है कि पृथ्वी पर अथवा स्वर्ग में ऐसा कोई स्थान नहीं है जहां हम हमारे स्वर्गिक पिता के चौकस देखभाल से बाहर हैं l हमारे अकेलेपन में भी परमेश्वर हमारे साथ है l चाहे हम कहीं भी जाएं, उस सच्चाई का ज्ञान हमें उसके वचन के प्रति आज्ञाकारी बनने को उत्साहित करें और हमारी देखभाल करनेवाले परमेश्वर की शांति हमें प्राप्त हो l
फिर भी आशा
मेरे द्वारा 1988 से लेकर अब तक हमारी प्रतिदिन की रोटी के लिए लिखे गए सैंकड़ों लेखों में से, कुछ एक मेरे मन में बस गए हैं l उनमें से एक लेख 1990 के दशक के मध्य का है जिसमें मैंने लिखा था कि हमारी तीन बेटियाँ कैंप या मिशन दौरे पर गयी हुई थीं, इसलिए छः साल का स्टीव और मैंने कुछ मनोरंजक समय एक साथ बिताए l
एयरपोर्ट की ओर सैर पर जाते समय, स्टीव ने मुड़कर मुझसे कहा, “मलेस्सा के बिना उतना आनंद नहीं है l” मलेस्सा उसकी आठ वर्षीय बहन और दिलीदोस्त थी l उस समय हममें से कोई नहीं जानता था कि उसके वे शब्द कितने हृदयस्पर्शी होंगे l कार दुर्घटना में किशोरी मेलेस्सा की मृत्यु के बाद के वर्षों में जीवन “उतना आनंददायक” नहीं रहा है l बीच का समय दर्द को कम कर सकता है, किन्तु कोई भी दर्द को पूरी रीति से मिटा नहीं सकता l समय घाव को भर नहीं सकता है l लेकिन यहाँ कुछ है जिससे सहायता मिल सकती है : ढाढ़स देनेवाले परमेश्वर द्वारा प्रतिज्ञात दिलासा को सुनें, उस पर चिंतन करें, और उसका स्वाद लें l
सुनें: “हम मिट नहीं गए; यह यहोवा की महाकरूणा का फल है, क्योंकि उसकी दया अमर है l (विलापगीत 3:22) l
चिंतन करें: वह तो मुझे विपत्ति के दिन में अपने मण्डप में छिपा रखेगा l (भजन 27:5) l
स्वाद लें: मेरे दुःख में मुझे शांति उसी से हुई है, क्योंकि तेरे वचन के द्वारा मैंने जीवन पाया है l (119:50) l
किसी प्रिय की मृत्यु के बाद जीवन फिर कभी भी पहले जैसा नहीं होता l किन्तु परमेश्वर की प्रतिज्ञाएँ आशा और शांति/दिलासा लेकर आती हैं l
शरणस्थान
परन्तु परमेश्वर के समीप रहना, यही मेरे लिए भला है; मैंने प्रभु यहोवा को अपना शरणस्थान माना है l भजन 73:28
जब हम ओकलाहामा में रहते थे मेरा एक मित्र टोर्नेडो तूफ़ान का “पीछा करता था l” जॉन ध्यानपूर्वक अन्य अंकित करनेवालों(chaser) एवं स्थानीय रडार की मदद से रेडियो संपर्क द्वारा तूफान का पीछा करता था l वह तूफान और अपने बीच दूरी बनाकर रखते हुए तूफान की दिशा और उसके विनाशक मार्ग पर ध्यान रखता था ताकि वह लोगों के मार्ग में हानि की सम्भावना होने पर अचानक आनेवाले बदलाव की रिपोर्ट दे सके l
एक दिन कीप के आकार के तूफ़ान(funnel cloud) के अचानक अपना मार्ग बदलने पर जॉन खुद ही गंभीर खतरे में पड़ गया l संयोग से, उसे आश्रय मिल गया जिससे उसकी जान बच गयी l
उस दोपहर को जॉन का अनुभव मुझे एक और विनाशकारी मार्ग के विषय सोचने को विवश करता है : हमारे जीवनों में पाप l बाइबल कहती है, “प्रत्येक व्यक्ति अपनी ही अभिलाषा से खीँचकर और फंसकर परीक्षा में पड़ता है l फिर अभिलाषा गर्भवती होकर पाप को जनती है और पाप जब बढ़ जाता है तो मृत्यु को उत्पन्न करता है” (याकूब 1:14-15) l
यहाँ एक प्रगति है l जो आरम्भ में हानि रहित दिखाई देता हो, वह शीघ्र ही नियंत्रण से बाहर होकर बर्बादी ला सकता है l किन्तु जब परीक्षा डराने लगे, तब परमेश्वर विनाशक तूफान में शरणस्थान है l
परमेश्वर का वचन हमसे कहता है कि वह कभी भी हमारी परीक्षा नहीं लेता है, और हम केवल अपने चुनावों को ही दोषी करार दे सकते हैं l किन्तु जब हमारी परीक्षा होती है, “वह परीक्षा के साथ [हमारा] निकास भी करेगा कि [हम] सह [सकें]” (1 कुरिन्थियों 10:13) l जब हम परीक्षा की घड़ी में उसकी ओर मुड़कर यीशु से मदद मांगते हैं, वह हमें जयवंत होने के लिए सामर्थ्य देता है l
यीशु सदैव हमारा शरणस्थान है l
अति प्रिय घर
“हमें अपना घर छोड़कर क्यों कहीं और जाना पड़ता है?” मेरे बेटे ने पूछा l विशेषकर एक पाँच वर्ष के लड़के को समझाना कठिन है कि घर क्या होता है l हम एक मकान छोड़ रहे थे किन्तु अपना घर नहीं, अर्थात् एक अर्थ में घर वह है जहां हमारे प्रिय लोग रहते हैं l यह वह स्थान है जहां हम एक लम्बी यात्रा के बाद या एक व्यस्त दिन के काम के बाद लौटना पसंद करते हैं l
जब यीशु अपनी मृत्यु के कुछ घंटे पूर्व ऊपर वाले कमरे में था, उसने अपने शिष्यों के कहा, “तुम्हारा मन व्याकुल न हो” (यूहन्ना 14:1) l शिष्य अपने भविष्य के विषय अनिश्चित थे क्योंकि यीशु ने अपनी मृत्यु के विषय भविष्यवाणी की थी l किन्तु यीशु ने उनको अपनी उपस्थिति के विषय निश्चित किया और उनको याद दिलाया कि वे उसे फिर देखेंगे l उसने उनसे कहा, “मेरे पिता के घर में बहुत से रहने के स्थान हैं . . . . मैं तुम्हारे लिए जगह तैयार करने जाता हूँ” (पद.2) l वह स्वर्ग का वर्णन करने के लिए दूसरे शब्दों का उपयोग कर सकता था l हालाँकि, उसने उन शब्दों का चुनाव किया जो एक असुविधाजनक और अपरिचित स्थान नहीं किन्तु ऐसा स्थान होगा जहां हमारा प्रिय, यीशु होगा l
सी.एस. ल्युईस लिखते हैं, “हमारा पिता हमारी यात्रा में हमें कुछ आरामदायक सराय में ले जाकर तरोताज़ा करता है, किन्तु वह नहीं चाहता कि हम उन्हें घर समझें l हम जीवन में आरामदायक सरायों के लिए उसको धन्यवाद दे सकते हैं, किन्तु याद रखें कि हमारा वास्तविक घर स्वर्ग में हैं जहां हम “सदा प्रभु के साथ रहेंगे” (1 थिस्स. 4:17) l
क्रूस का दृष्टिकोण
मेरे सहकर्मी टॉम के डेस्क पर 8 इंच चौड़ा और 12 इंच लम्बा क्रूस रखा हुआ है l उसका मित्र, फिल ने जो कैंसर के रोग से बच गया, उसे यह इसलिए दिया ताकि टॉम सब कुछ को “क्रूस के दृष्टिकोण” से ही देख सके l कांच का वह क्रूस परमेश्वर के प्रेम का और उसके लिए उसकी भली इच्छा का ताकीद है l
मसीह में यह सभी विश्वासियों के लिए चुनौतीपूर्ण विचार है, विशेषकर कठिन दिनों में l परमेश्वर के प्रेम की अपेक्षा अपनी समस्याओं पर केन्द्रित होना अधिक सरल है l
प्रेरित पौलुस का जीवन अवश्य ही क्रूस का दृष्टिकोण रखनेवाला एक उदहारण था l सताव के समय उसने खुद के विषय कहा कि “सताए तो जाते हैं, पर त्यागे नहीं जाते, गिराए तो ज़ाते हैं, पर नष्ट नहीं होते” (2 कुरिं. 4:9) l उसका विश्वास था कि कठिन दिनों में, परमेश्वर काम करता है, “हमारे लिए बहुत ही महत्वपूर्ण और अनंत महिमा उत्पन्न करता जाता है; और हम तो देखी हुई वस्तुओं पर नहीं परन्तु अनदेखी वस्तुओं को देखते रहते हैं” (पद.17-18) l
अनदेखी वस्तुओं को देखते” रहने का अर्थ यह नहीं कि हम अपनी समस्याओं को घटाते हैं l पॉल बर्नेट अपनी टीका में इस परिच्छेद की व्याख्या इस तरह करते हैं, “[हमारे लिए] परमेश्वर के उद्देश्य की सच्चाई पर आधारित, भरोसा होना चाहिए . . . दूसरी ओर, एक गंभीर मान्यता कि हम आशा के साथ कराहते हैं जिसमें पीड़ा भी है l”
यीशु ने हमारे लिए अपने जीवन की आहुति दे दी l उसका प्रेम गहरा और बलिदानी है l जब हम जीवन को “क्रूस के दृष्टिकोण” से देखते हैं, हम उसका प्रेम और विश्वासयोग्यता देखते हैं l और उसमें हमारा भरोसा बढ़ता है l