श्रेणी  |  odb

अत्यंत बेहतर

मेरा जन्म दिन मेरी माँ के जन्मदिन के बाद आता है l एक किशोरी के रूप में, मैं अपने बजट में रहकर ऐसा उपहार खरीदने का प्रयास करती हूँ जिससे मेरी माँ खुश हो जाए l उन्होंने मेरे उपहार को हमेशा पसंद किया, और अगले दिन मेरे जन्मदिन पर उसे मुझे दे दिया l कोई शक नहीं कि उनका उपहार मेरे उपहार को मात देता था l उनका उद्देश्य मेरे उपहार को फीका करना नहीं होता था, बल्कि वो अपने साधन से देती थीं, जो  मेरे से कहीं अधिक था l

मेरी माँ को देने की मेरी इच्छा मुझे दाऊद का परमेश्वर के लिए एक घर बनाने की इच्छा याद दिलाती है l अपने महल और उस तम्बू के विषय जहाँ परमेश्वर ने खुद को प्रगट किया था के बीच विरोध से प्रभाबित होकर, दाऊद परमेश्वर के लिए एक मंदिर बनाना चाहा l दाऊद के देने की इच्छा पूर्ति के स्थान पर, परमेश्वर ने उसे अत्यंत बेहतर उपहार दिया l परमेश्वर की प्रतिज्ञा थी कि दाऊद का एक पुत्र (सुलेमान) मंदिर ही नहीं बनाएगा (1 इतिहास 17:11), किन्तु वह दाऊद के लिए एक घर, एक वंश बनाएगा l वह प्रतिज्ञा सुलेमान से आरम्भ होकर अंततः यीशु में पूर्ण हुई, जिसकी राजगद्दी वास्तव में “सदैव स्थिर” है (पद. 12) l दाऊद अपने सिमित श्रोत में से देना चाहता था, किन्तु परमेश्वर ने कुछ असीमित देने की प्रतिज्ञा की l

दाऊद की तरह, हम भी परमेश्वर को कृतज्ञता और प्रेम से दें l और सर्वदा महसूस करें कि उसने यीशु में हमें अधिक बहुतायत से दिया है l

बियाबान में जीवित रहना

1960 के दशक में, गायकों की तगड़ी किंगस्टन ने “डेजर्ट पीट” नामक एक गीत जारी किया l प्रेम गीत में एक प्यासा चरवाहा है जो मरुभूमि पार करते समय एक हैण्ड पंप के निकट पहुँचता है, जहाँ डेजर्ट पीट पढ़ने वाले से एक पर्चा के द्वारा आग्रह करता है कि बर्तन में रखे पानी का उपयोग पीने के बजाए हैण्ड पंप को चलाने के लिए करें l

चरवाहा पानी पीने का लोभ त्यागकर कहे अनुसार पानी का उपयोग करता है l  आज्ञाकारिता के परिणामस्वरूप उसे अधिक मात्र में ठंडा और संतुष्ट करनेवाला जल मिलता है l यदि वह भरोसा नहीं करता, उसे पीने के लिए संतुष्ट न करनेवाला केवल एक बर्तन गर्म पानी ही मिलता l

यह मुझे बियाबान में इस्राएल की यात्रा याद दिलाती है l जब उनकी प्यास उनको परेशान करने लगी (निर्ग. 17:1-7), मूसा प्रभु के पास गया l उसे होरेब की चट्टान को अपनी लाठी से मारने को कहा गया l मूसा द्वारा विश्वास करके आज्ञा मानने से चट्टान से जल निकला l

दुर्भाग्यवश, इस्राएल लगातार मूसा के विश्वास के उदहारण पर नहीं चले l आखिरकार, “सुने हुए वचन से उन्हें कुछ लाभ न हुआ; क्योंकि सुननेवालों के मन में विश्वास के साथ नहीं बैठा” (इब्रा. 4:2) l

कभी-कभी जीवन एक निर्जल मरुभूमि के समान लगता है l किन्तु सबसे अविश्वसनीय परिस्थिति में भी परमेश्वर हमारी आत्मिक प्यास बुझा सकता है l जब हम विश्वास से परमेश्वर की प्रतिज्ञाएं मानते हैं, हम अपने दैनिक ज़रूरतों के लिए जीवन जल और अनुग्रह के सोते का अनुभव कर सकते हैं l

भेष बदले हुए यीशु

मेरी एक सहेली अपने लाचार सास की देखभाल करते समय, उससे पूछी कि उसकी सबसे बड़ी इच्छा क्या है l उसकी सास बोली, “मेरे पैर धो दो l” मेरी सहेली ने स्वीकारा कि  इस काम से वह बहुत घृणा करती थी! उनका मुझे यह काम बताने पर मैं नाराज़ होकर परमेश्वर से बोली कि मेरी भावनाएं उनसे छिपा दें l

किन्तु एक दिन अचानक उसका कुड़कुड़ानेवाला आचरण बदल गया l जैसे ही उसने चिलमची, और तौलिया लेकर अपनी सास के पाँव धोने के लिए झुकी, उसने कहा, “मैंने ऊपर देखा, और एक क्षण मैंने महसूस किया कि मैं स्वयं यीशु के पाँव धो रही हूँ l वह यीशु के वेश में थी!” उसके बाद, उसने अपनी सास के पाँव धोने में सम्मान अनुभव किया l

इस दिल को छूनेवाली घटना के विषय सुनकर, मैंने अंत समय के विषय यीशु की कहानी के विषय विचार की जो उसने जैतून के पहाड़ के ढलान पर बतायी थी l राजा यह कहकर अपने राज्य में अपने पुत्र और पुत्रियों का स्वागत करता है, कि जब उन्होंने बीमारों से मुलाकात की और भूखों को भोजन खिलाया, “तुमने जो मेरे इन छोटे से छोटे भाइयों में से किसी एक के साथ किया, वह मेरे ही साथ किया” (मत्ती 25:40) l हम भी यीशु ही की सेवा करते हैं जब हम बंदियों से बंदीगृह में मुलाकात करते हैं और ज़रुरतमंदों को वस्त्र पहनाते हैं l

आज, आप भी मेरी सहेली के साथ कहेंगे, जो किसी भी नए व्यक्ति से मिलकर विचार करती है, “क्या आप भेष बदले हुए यीशु तो नहीं?”

भाई- भाई में

मेरा भाई और मैं जिनमें एक वर्ष से भी कम अंतर है, उम्र में बढ़ते हुए बहुत “प्रतियोगी” रहे (अनुवाद : हम लड़ते थे! ) l पिता समझ गए l उनके पास भाई थे l माँ? थोड़ा समझ पायी l

हमारी कहानी उत्पत्ति की पुस्तक में ठीक बैठ सकती थी, जिसे एक अच्छा नाम दिया जा सकता था भाईयों के आपसी झगड़े का संक्षिप्त इतिहास l  कैन और हाबिल (उत्प.4); इसहाक और इश्माएल (21:8-10); बिन्यामिन को छोड़कर, यूसुफ और बाकी सब (अध्याय 37) l किन्तु भाईयों की दुश्मनी में याकूब और एसाव अव्वल हैं l  

एसाव अपने जुड़वाँ भाई याकूब से दो बार धोखा खाने पर उसकी हत्या करना चाहा (27:41) l दशकों बाद याकूब और एसाव मेल करनेवाले थे (अध्याय 33) l किन्तु उनके वंशज एदोम और इस्राएल राष्ट्र में शत्रुता चलती रही l इस्राएलियों के प्रतिज्ञात देश में प्रवेश करते समय, एदोम धमकी और सेना के साथ उनसे मिला (गिनती 20:14-21) l बहुत बाद में, जब आक्रमणकारियों से यरूशलेम वासी भागने लगे, एदोम ने शरणार्थियों को मारा (ओबद्याह 1: 10-14) l

हमारे लिए सुखकर है कि बाइबिल केवल हमारे टूटेपन की नहीं किन्तु परमेश्वर के छुटकारे की कहानी भी बताती है l यीशु ने सब कुछ बदल दिया और अपने शिष्यों से कहा, “मैं तुम्हें एक नयी आज्ञा देता हूँ कि एक दूसरे से प्रेम रखो” (यूहन्ना 13:34) l तब वह हमारे लिए मर कर उसका अर्थ बता दिया l

बड़े होकर हम दोनों भाई निकट आ गए l परमेश्वर के साथ भी ऐसा है l जब हम उसके द्वारा प्रदत्त क्षमा का उत्तर देते हैं, वह भाई-बहनों के बीच विरोध को भाईचारे के प्रेम में बदल देता है l

अन्य प्रकार का प्रेम

अनेक वर्ष पूर्व मेरा एक पसंदीदा चर्च पूर्व-कैदियों के बीच एक सेवा के रूप में आरंभ हुआ जो समाज की मुख्य धारा में लौट रहे थे l वर्तमान में उस कलीसिया में समाज के हर क्षेत्र के लोग हैं l मैं उस कलीसिया को पसंद करता हूँ क्योंकि वह स्वर्ग की एक तस्वीर है-जिसमें विभिन्न तरह के लोग हैं, बचाए गए पापी, यीशु के प्रेम से बंधे हुए लोग l

कभी-कभी, यद्यपि, मुझे कलीसिया क्षमा प्राप्त पापियों के लिए एक सुरक्षित-आश्रय की जगह एक विशेष क्लब की तरह लगती है l जब लोग स्वाभाविक रूप से खींचकर “ख़ास प्रकार के” समूहों और झुंडों में उन लोगों के चारों ओर इकट्ठे हो जाते हैं जिनके साथ वे आरामदायक महसूस करते हैं, तब दूसरें अपने को अधिकार विहीन समझने लगते हैं l किन्तु जब यीशु ने अपने शिष्यों से कहा कि “जैसे मैंने तुम से प्रेम रखा, वैसा ही तुम घी एक दूसरे से प्रेम रखो” (यूहन्ना 15:12) उसके मस्तिष्क में उपरोक्त बात नहीं थी l उसकी कलीसिया को उसके प्रेम का विस्तार  होना था जिसमें सभी परस्पर भागीदार थे l

यदि दुखित, उपेक्षित लोग यीशु में स्नेही शरण, आराम, और क्षमा प्राप्त कर सकते हैं, उनको कलीसिया से कम अपेक्षा नहीं करनी चाहिए l इसलिए हम सभी के सामने यीशु के प्रेम को प्रदर्शित करें-विशेष रूप से उनके सामने जो हमसे भिन्न हैं l हमारे चारों ओर लोग हैं जिन्हें यीशु हमारे द्वारा प्रेम करना चाहता है l प्रेम में एक साथ आराधना करना कितना आनंदायक है-स्वर्ग का एक टुकड़ा जिसका आनंद हम पृथ्वी पर ले सकते हैं l

आपका सुरक्षित स्थान

मेरी बेटी और मैं एक बड़े पारिवारिक उत्सव के लिए तैयारी कर रहे थे l इसलिए कि वह उत्सव के विषय घबरायी हुई थी मैंने कहा कि मैं गाड़ी ड्राइव करुँगी l “ठीक है l किन्तु मैं अपनी कार में सुरक्षित महसूस करती हूँ l क्या आप चलाएंगी?” उसने पुछा l यह महसूस करके कि उसे मेरी गाड़ी छोटी लगती है, मैंने पूछा कि क्या मेरी गाड़ी बहुत छोटी थी l उसका उत्तर था, “नहीं, बस मेरी गाड़ी मुझे सुरक्षित लगती है l पता नहीं क्यों, मैं अपनी गाड़ी में आरामदायक महसूस करती हूँ l”

उसकी टिप्पणी ने मुझे मेरे “सुरक्षित स्थान” के सम्बन्ध में मुझे सोचने की चुनौती दी l तुरंत ही मैंने नीतिवचन 18:10 के विषय सोची, “यहोवा का नाम दृढ़ गढ़ है, धर्मी उसमें भागकर सब दुर्घटनाओं से बचता है l” पुराने नियम के काल में, दीवारें और पहरे की मीनार लोगों को बाहरी खतरों की चेतावनी के साथ-साथ उनकी रक्षा भी करती थीं l लेखक बताना चाहता है कि परमेश्वर का नाम, जो उसका चरित्र है, व्यक्तित्व और सब कुछ है जो वह है, उसके लोगों को वास्तविक सुरक्षा देती है l

ख़ास भौतिक स्थान खतरनाक क्षणों में इच्छित सुरक्षा देने का वादा करते हैं l तूफ़ान के मध्य एक मजबूत छत l चिकित्सीय सहायता देनेवाला एक हॉस्पिटल l एक प्रिय का गले लगाना l

आपका “सुरक्षित स्थान” क्या है? हम जहाँ भी सुरक्षा खोजते हैं, उस स्थान पर हमारे साथ परमेश्वर की उपस्थिति ही है जो हमारी ज़रूरत में हमें ताकत और सुरक्षा देती है l

जब खूबसूरती ख़त्म नहीं होती

मुझे ग्रैंड घाटी देखना पसंद है l जब मैं घाटी के किनारे खड़ा होता हूँ, मैं परमेश्वर की चौंकानेवाली कृति देखता हूँ l 

यद्यपि वह भूमि में एक (बहुत बड़ा) “गड्ढा” है, ग्रैंड घाटी मुझे स्वर्ग पर विचार करने हेतु विवश करता है l एक बारह वर्षीय ईमानदार युवक ने एक बार मुझ से पूछा, “क्या स्वर्ग अरुचिकर नहीं होगा? क्या आप नहीं सोचते कि हम हमेशा परमेश्वर की प्रशंसा करते हुए थक जाएंगे?” किन्तु यदि भूमि में एक “गड्ढा” इतना जबरदस्त खुबसूरत है और हम उसे देखते नहीं थकते हैं, हम खूबसूरती के श्रोत-हमारे प्रेमी सृष्टिकर्ता-को नयी सृष्टि के सम्पूर्ण असली आश्चर्य में एक दिन देखने की कल्पना ही कर सकते हैं l

“एक वर मैंने यहोवा से माँगा है, उसी के यत्न में लगा रहूँगा; कि मैं जीवन भर यहोवा के भवन में रहने पाऊं, जिससे यहोवा की मनोहरता पर दृष्टि लगाए रहूँ,” (भजन 27:4) दाऊद ने इन शब्दों को लिखते हुए यह इच्छा प्रगट की l परमेश्वर की उपस्थिति से सुन्दर कुछ नहीं, जो इस पृथ्वी पर हमारे निकट आती है जब हम भविष्य में उसका चेहरा आमने-सामने देखने की चाह में उसे विश्वास से खोजते हैं l

उस दिन हम अपने अद्भुत प्रभु की प्रशंसा करते हुए नहीं थकेंगे, क्योंकि हम उसकी उत्तम भलाई और उसके हाथों के कार्य के आश्चर्य की तरोताज़गी, और नयी खोज के अंत में कभी नहीं पहुंचेंगे l उसकी उपस्थिति उसकी खूबसूरती और उसके प्रेम का असाधारण प्रकाशन प्रगट करेगी l

हमारे पास सामर्थ्य है

कड़कड़ाहट की आवाज़ ने मुझे चौंका दिया l मैं आवाज़ को पहचानकर रसोई की ओर भागी l मैंने भूल से कॉफ़ी बनाने वाला बिजली का उपकरण ऑन कर दिया था l मैंने उपकरण का प्लग हटाकर, उसके तले को छूकर देखना चाही कि टाइल का काउंटर पैर रखने लायक बहुत गर्म तो नहीं है l उसके चिकने भाग से मेरी उंगलियाँ जल गयीं, और मेरे कोमल पैरों में छाले हो गए l

मेरे पति द्वारा मेरे घाव में दावा लगाते समय मैंने अपना सिर हिलाया l मैं जानती थी कि कांच गरम होगा l “मैं ईमानदारी से कहती हूँ, मुझे नहीं मालुम मैंने उसे क्यों छू दिया,” मैं बोली l

मेरी गलती ने मुझे वचन में एक गंभीर विषय, पाप के स्वभाव के विषय पौलुस का प्रतिउत्तर याद दिलाया l

प्रेरित स्वीकारता है कि जो वह करता है उस को नहीं जानता; क्योंकि जो वह चाहता है वह नहीं करता (रोमि. 7:15) l स्वीकार करते हुए कि वचन सही और गलत को निश्चित करता है (पद.7), वह पाप के विरुद्ध शरीर और आत्मा के बीच निरंतर चलनेवाली जटिल और वास्तविक युद्ध को पहचानता है (पद.15-23) l वह अपनी दुर्बलता स्वीकारते हुए, वर्तमान और सर्वदा की विजय की आशा प्रस्तुत करता है (पद.24-25) l

जब हम मसीह को अपना जीवन समर्पित करते हैं, वह हमें पवित्र आत्मा देता है जो हमें सही करने के लिए सामर्थी बनाता है (8:8-10) l जब वह हमें परमेश्वर का वचन मानने के लिए आज्ञाकारी बनाता है, हम झुलसाने वाले पाप से दूर हो सकते हैं जो हमें उस बहुतायत के जीवन से दूर करता है जो परमेश्वर अपने प्रेम करनेवाले को देने की प्रतिज्ञा की है l

पत्थरों से सामना

शताब्दियों के युद्ध और विनाश के बाद, यरूशलेम का आधुनिक शहर वस्तुतः अपने ही मलबा पर बना है l एक पारिवारिक भ्रमण पर, हम विया दोलोरोसा अर्थात् दुःख के मार्ग पर चले, परंपरा अनुसार वह मार्ग जिसपर यीशु क्रूस लेकर चला था l दिन गर्म था, इसलिए हम विश्राम के लिए ठहरकर सिस्टर्स के मठ के ठन्डे तलघर घूमें l वहाँ मैंने रास्ते के प्राचीन पत्थर देखे जो हाल ही के निर्माण के समय खोद कर निकले गए थे-ऐसे पत्थर जिनपर खेल खुदे हुए थे जो रोमी सिपाही अपने खाली समय में खेलते थे l

वे ख़ास पत्थर, जो संभवतः यीशु के काल के बाद के थे, ने मुझे मेरे आत्मिक जीवन पर विचार करने को विवश किया l एक थका हुआ और व्यर्थ समय बिताते हुए रोमी सिपाही की तरह, मैं परमेश्वर और दूसरों के प्रति लापरवाह और अस्नेही हो गया था l मैं याद करके द्रवित हुआ कि उस स्थान के निकट जहाँ में खड़ा था, प्रभु पर मार पड़ी, उसका उपहास किया गया, उसकी निंदा की गयी, और उसे अपमानित किया गया जब उसने मेरे समस्त पराजय और विरोध को अपने ऊपर ले लिए l

“वह हमारे ही अपराधों के कारण घायल किया गया, वह हमारे अधर्म के कामों के कारण कुचला गया; हमारी ही शांति के लिए उस पर ताड़ना पड़ी, कि उसके कोड़े खाने से हम लोग चंगे हो जाएँ” (यशा. 53:5) l

उन पत्थरों से मेरा सामना अभी भी मुझसे यीशु के स्नेही अनुग्रह की बात करता है जो मेरे समस्त पापों से महान है l