जहाँ आप हैं वहीं से आरम्भ करें
आज मैंने अपने खलिहान में एकलौता फूल देखा-एक छोटा बैगनी फूल “रेतीले स्थान में अपना मिठास बिखेरते हुए” कवि थॉमस ग्रे की खूबसूरत पंक्तियाँ हैं l निश्चित तौर पर इस ख़ास फूल को पहले किसी ने नहीं देखा था, और शायद आगे भी कभी नहीं देखेगा l यह ख़ूबसूरती ऐसी जगह क्यों? मैं विचारा l
प्रकृति बर्बाद नहीं होती l प्रतिदिन यह अपने सृष्टिकर्ता की सच्चाई, भलाई, और सुन्दरता दर्शाती है l प्रतिदिन प्रकृति परमेश्वर की महिमा को नए और निर्मल तरीके से प्रगट करती है l क्या मैं उसको उस खूबसूरती में देखता हूँ, अथवा उस पर सरसरी नज़र डालकर उसको नज़रन्दाज़ कर देता हूँ l
समस्त प्रकृति सृष्टिकर्ता की खूबसूरती फैलाती है l हमारा प्रतिउत्तर उपासना, प्रशंसा, और धन्यवाद हो सकता है-मक्के के फूल की चमक, सूर्योदय के प्रताप, और एक खास वृक्ष की बनावट के लिए l
सी.एस.ल्युईस गर्मी के एक दिन जंगल में टहलने का वर्णन करते हैं l उसने अभी-अभी अपने मित्र को परमेश्वर के प्रति धन्यवादी होना सिखाया था l उसके पैदल साथी ने निकट की एक छोटी नदी में जाकर झरने में अपना चेहरा और हाथ धोकर पुछा, “क्यों न इसी से आरंभ की जाए?” ल्युईस के अनुसार उसने उस क्षण एक महान सिद्धांत सिखा : “जहाँ आप हैं वहीं से आरम्भ करें l”
एक टपकती जलधारा, वृक्षों के मध्य बहती हवा, एक छोटी चिड़िया, एक छोटा फूल l क्यों नहीं हम इनसे धन्यवाद आरंभ करें?
सभी परिस्थितियों में
हम अपने उपनगर में निरंतर बिजली कटौती के विषय शिकायत करते हैं l सप्ताह में तीन बार चौबीस घंटों के लिए, हमारा पड़ोस अन्धकार में डूबा होता है l घरेलु उपकरण उपयोग नहीं कर पाने की स्थिति में यह असुविधा अत्यंत असहनीय है l
मेरी मसीही पड़ोसन अक्सर पूछती है, “क्या हम इसके लिए भी धन्यवाद दें?” वह 1 थिस्सलुनीकियों 5:18 दोहराती है : “हर बात में धन्यवाद करो; क्योंकि तुम्हारे लिए मसीह यीशु में परमेश्वर की यही इच्छा है l” हम हमेशा कहते हैं, “बिल्कुल सच, हम हर बात में धन्यवाद देते हैं l” किन्तु जिस आधे मन से हम ऐसा कहते हैं, हर बार बिजली जाने पर हमारा कुड़कुड़ाना इसका खण्डन करता है l
एक दिन, हालाँकि, हर बात में परमेश्वर को धन्यवाद देने के हमारे विश्वास ने नया अर्थ हासिल किया l कार्य से घर लौटने पर मैंने अपने पड़ोसन को वास्तव में कांपते हुए कहते देखा, “यीशु आपका धन्यवाद कि बिजली बंद थी l मेरे घर के साथ हम सब नाश हो जाते !”
एक कचरा-वाहन के घर के सामने लगे बिजली खम्भे से टकराने से हाई-टेंशन तार अनेक घरों पर गिरे l बिजली रहने से, विनाश हो सकता था l
कठिन परिस्थितियाँ “धन्यवाद प्रभु” कहने में कठिनाई उत्पन्न करती हैं l हम परमेश्वर को धन्यवाद दें जो हर स्थिति को उस पर भरोसा करने का अवसर बनाता है–चाहे हम उसके उद्देश्य को देखें या न देखें l
मैं आपको देखता हूँ
एक ऑनलाइन लेखक समूह में जहाँ हम परस्पर सहयोग और प्रोत्साहित करते हैं एक सहेली बोली, “मैं आपको देख सकती हूँ l तनाव और चिंता महसूस करते हुए, मैं उसके शब्दों से शांति और सुख महसूस करती हूँ l उसने मुझे “देखा”-मेरी आशाएँ, भय, संघर्ष, और सपने-और मुझसे प्रेम किया l
अपनी सहेली के सरल किन्तु सामर्थी प्रोत्साहन को सुनकर, मैंने अब्राहम के घर की दासी, हाजिर पर विचार किया l सारै और अब्राम के अनेक वर्षों तक वारिस की चाह में, सारै ने संस्कृति का अनुसरण करके अपने पति से हाजिर द्वारा संतान उत्पन्न करने को कहा l किन्तु हाजिरा गर्भवती होकर सारै को तिरस्कार की निगाहों से देखा, बदले में सारै के दुर्व्यवहार से हाजिरा दूर मरुभूमि की ओर भागी l
प्रभु ने हाजिरा को दुःख और भ्रम में देखकर उसे अनेक वंश देने की प्रतिज्ञा की l इस सामना के बाद, हाजिरा ने प्रभु को “एल रोई,” अर्थात् सर्वदर्शी ईश्वर पुकारा (उत्प. 16:13), क्योंकि उसे मालुम था कि वह अकेली और त्यागी हुई नहीं है l
हाजिरा की तरह हम भी देखे गए और प्रेम प्राप्त किये l मित्र अथवा परिवार द्वारा हम उपेक्षित अथवा अस्वीकृत किये जा सकते हैं, फिर भी हमारा पिता हमारे बाहरी चेहरे को नहीं, किन्तु हमारे समस्त भीतरी भावनाओं और भय को जानता है l वह हमें जीवन देनेवाले शब्द बोलता है l
अवसर क्या है?
चार-वर्षीय आशेर का मुस्कराता चेहरा उसके पसंदीदा टोपीवाली व्यायाम-कमीज़ से झाँका l मुलायम जबड़ों वाली घड़ियाल के सिर वाली उसकी कमीज़ मानो उसके सिर को निगलने वाली थी! उसकी माँ निराश हुई l वह एक परिवार को प्रभावित करना चाहती थी जिनसे वह हाल में नहीं मिली थी l
“अरे, हौन,” वह बोली, “इस अवसर के लिए यह ठीक नहीं है l”
“बिल्कुल है !” आशेर ख़ुशी से बोला l
“हूँ ..., और वह कौन सा अवसर हो सकता है?” उसने पुछा l आशेर बोला, “तुम जानती हो l जीवन!” उसे कमीज़ पहनना होगा l
यह बच्चा सभोपदेशक 3:12 का सत्य जानता है – “मनुष्यों के लिए आनंद करने और जीवन भर भलाई करने के सिवाय, और कुछ भी अच्छा नहीं l” सभोपदेशक निराशा और अक्सर ग़लतफ़हमी उत्पन्न कर सकता है क्योंकि यह परमेश्वर की नहीं किन्तु मानवीय दृष्टिकोण है l लेखक, राजा सुलेमान, पूछता है, “काम करनेवाले को अपने परिश्रम से क्या लाभ होता है? (पद.9) l फिर भी आशा दिखती है l वह यह भी लिखता है : “और यह भी परमेश्वर का दान है कि मनुष्य खाए-पीए और अपने सब परिश्रम में सुखी रहे” (पद.13) l
हम ऐसे परमेश्वर के सेवक हैं जो आनंद हेतु हमें अच्छी वस्तुएं देता है l जो कुछ वह करता है “सदा स्थिर रहेगा” (पद. 14) l उसको पहचानकर और उसकी प्रेमी आज्ञाएँ मानने पर वह हमारे जीवनों को उद्देश्यपूर्ण, अर्थपूर्ण, और आनंदित बनाता है l
हमेशा उसकी देखभाल में
जिस दिन मेरी बेटी म्युनिक से बार्सिलोना विमान यात्रा कर रही थी, मैंने अपने पसंदीदा विमान खोज वेबसाइट पर उसकी यात्रा देखना चाहा l वेबसाइट पर विमान संख्या डालने पर, कंप्यूटर ने बताया कि उसका विमान ऑस्ट्रिया को पार कर उत्तरी इटली के ऊपर से जा रहा था l उसके बाद विमान को भूमध्यसागर, फ्रांस के उष्ण तटीय क्षेत्र से होकर समय से पहुंचना था l मुझे केवल ऐसा महसूस हो रहा था कि मुझे नहीं मालूम था कि उसे दिन के भोजन में क्या परोसा जा रहा था!
मैं अपनी बेटी के ठिकाने और स्थिति की चिंता क्यों कर रहा था? क्योंकि मैं उसे प्यार करता हूँ l वह कौन है, क्या कर रही है और वह जीवन में कहाँ जा रही है के विषय मैं चिंता करता हूँ l
भजन 32 में, दाऊद हमारे लिए परमेश्वर की क्षमा, मार्गदर्शन, और चिंता का उत्सव मनाता है l एक मानव पिता से हटकर, परमेश्वर हमारे जीवनों का हर अंश और हमारे हृदयों की स्थायी ज़रूरतें जानता है l प्रभु की प्रतिज्ञा है, “मैं तुझे बुद्धि दूँगा, और जिस मार्ग में तुझे चलना होगा उस में तेरी अगुवाई करूँगा; मैं तुझ पर कृपादृष्टि रखूँगा और सम्मति दिया करूँगा” (पद.8) l
हम आज अपनी हर परिस्थिति में, परमेश्वर की उपस्थिति और देखभाल में भरोसा कर सकते हैं क्योंकि “जो यहोवा पर भरोसा रखता है वह करुणा से घिरा रहेगा” (पद.10) l
बोलनेवाला वृक्ष
अंग्रेजी साहित्य में एक सबसे प्राचीन कविता है “द ड्रीम ऑफ़ द रूड l” अंग्रेजी शब्द रूड [rood] पुराने नियम के अंग्रेजी शब्द रॉड[rod] या खम्बा[pole] से आता है जिसका सन्दर्भ क्रूस से है जिस पर मसीह क्रूसित हुआ l इस प्राचीन कविता में क्रुसीकरण की कहानी क्रूस के परिप्रेक्ष्य से बतायी गयी है l जब वृक्ष को ज्ञात होता है कि उसका उपयोग परमेश्वर पुत्र की मृत्यु के लिए होगा, वह इस तरह के उपयोग का इन्कार करता है l किन्तु मसीह हर एक विश्वाश करनेवाले को छुटकारा देने में वृक्ष की सहायता स्वीकार करता है l
अदन के बगीचे में, एक वृक्ष प्रतिबंधित फल का श्रोत था जिसे हमारे आत्मिक माता-पिता ने चखा, जिससे पाप मानव जाति में प्रवेश किया l और जब परमेश्वर पुत्र ने समस्त मानवता के पाप के लिए अपना लहू बहाकर परम बलिदान दिया, उसे हमारे बदले एक पेड़ पर ठोंका गया l मसीह “आप ही हमारे पापों को अपनी देह पर लिए हुए क्रूस पर चढ़ गया” (1 पतरस 2:24) l
उद्धार के वास्ते मसीह पर भरोसा करनेवाले हर एक के लिए क्रूस ही परिवर्तन बिंदु है l यह एक महत्वपूर्ण चिन्ह है जो पाप और मृत्यु से हमारे छुटकारे के लिए परमेश्वर पुत्र की बलिदानी मृत्यु को दर्शाता है l क्रूस हमारे लिए परमेश्वर के प्रेम का अदभुत अकथनीय प्रमाण है l
पुनर्निर्माण
अनेक वर्षों के बाद, एडवर्ड ली बर्लिन लौटकर, याद किया कि जिसे वह याद और प्रेम करता था, जो अब नहीं था l उसके साथ, वह शहर भी पूर्णरूपेण बदल गया था l हेमिसफीयर्स पत्रिका में उसने लिखा, “एक शहर जिसे आप प्यार करते थे संयोग का प्रस्ताव लगता है . . . जिसे छोड़ देना चाहिए l” अपने अतीत के स्थान पर जाना दुःख और हानि के भाव उत्पन्न करता है l हम उस समय की तरह वही व्यक्ति नहीं हैं, न ही वह स्थान हमारे जीवन में पहले जैसा महत्वपूर्ण है l
नहेम्याह इस्राएल देश से अनेक वर्षों तक निर्वासन में था जब उसने अपने लोगों की दयनीय दशा और यरूशलेम शहर के विनाश के विषय सुना l उसने फारस के राजा, अर्तक्षत्र से दीवारों के पुनःनिर्माण के लिए अनुमति मांगी l एक रात स्थिति की टोह लेने के बाद (नहे. 2:13-15), नहेम्याह ने शहरवासियों से कहा, “हम कैसी दुर्दशा में हैं, कि यरूशलेम उजाड़ पड़ा है और उसके फाटक जले हुए हैं l आओ, हम यरूशलेम की शहरपनाह बनाएं, कि भविष्य में हमारी नामधराई न रहे” (पद.17) l
नहेम्याह यादें तरोताज़ा करने नहीं किन्तु पुनःनिर्माण करने लौटा l यह हमारे अतीत के ध्वस्त भागों को ठीक करने की सशक्त ताकीद है l यह मसीह में हमारा विश्वास और उसकी सामर्थ्य ही है जो हमें आगे देखकर, बढ़ने और पुनःनिर्माण करने की ताकत देता है l
अनंत उद्धारकर्ता
जेरलिन टैली की मृत्यु 2015 में विश्व के सबसे उम्रदराज़ व्यक्ति-116 वर्ष की उम्र में हुई l 1995 में, यरूशलेम शहर अपना 3,000 वां वर्षगाँठ मनाया l एक व्यक्ति के लिए एक सौ सोलह वर्ष, और एक शहर के लिए 3,000 बहुत है, किन्तु कैलिफोर्निया की श्वेत पहाड़ियों के देवदार वृक्षों की उम्र 4,800 वर्ष से भी अधिक होती है यानी कुलपति अब्राहम से भी 800 वर्ष बड़े!
यहूदी नेतृत्व द्वारा यीशु के व्यक्तित्व के विषय चुनौती देने पर, यीशु ने भी खुद को अब्राहम से पहले बताया l यीशु ने कहा, “पहले इसके कि अब्राहम उत्पन्न हुआ, मैं हूँ” (यूहन्ना 8:58) l उसके दृढ़कथन से उसका सामना करनेवाले चकित होकर उसे पत्थरवाह करना चाहा l उनको ज्ञात था कि वह कालानुक्रमिक उम्र की बात नहीं किन्तु परमेश्वर का प्राचीन नाम “मैं हूँ” (निर्ग. 3:14) द्वारा वास्तव में अनंत होने का दावा कर रहा था l वह त्रिएक परमेश्वर का सदस्य होकर, ऐसा दावा कर सकता था l
यूहन्ना 17:3 में, यीशु ने कहा, “ और अनंत जीवन यह है कि वे तुझे एकमात्र सच्चे परमेश्वर को और यीशु मसीह को, ... जानें l अनंत ने समय में प्रवेश किया ताकि हम सर्वदा जीवित रहें l वह हमारे बदले मृत्यु सहकर, पुनरुथित होकर अपना उद्देश्य पूरा किया l उसके बलिदान के कारण, हम अनंत भविष्य की राह देखते हैं, जहाँ हम उसके साथ अनंत बिताएंगे l वह अनंत है l
सर्वदा प्रेम किया गया, सर्वदा महत्वपूर्ण
हम ऐसे परमेश्वर की सेवा करते हैं जो हमसे हमारे कार्य से अधिक प्रेम करता है l
हाँ, यह सच है कि परमेश्वर चाहता है कि हम अपने परिवार की सुधि रखें और उसके द्वारा रचित संसार की चिंता करें l और उसकी इच्छा है कि हम अपने चारों ओर निर्बल, भूखे, निर्वस्त्र, प्यासे, और टूटे लोगों की सेवा करें जब कि हम उनके प्रति सचेत रहते हैं जो पवित्र आत्मा की खिंचाव का उत्तर नहीं देते हैं l
और फिर भी हम ऐसे परमेश्वर की सेवा करते हैं जो हमारे कार्य से अधिक हमसे प्रेम करता है l
हम यह कदापि न भूलें क्योंकि ऐसा समय आ सकता है जब स्वास्थ्य या पराजय या अनपेक्षित बर्बादी के कारण “परमेश्वर के लिए कार्य” करने की योग्यता नहीं रहेगी l ऐसे समय में हम स्मरण रखें कि परमेश्वर हमारे कार्य के कारण नहीं किन्तु हमारे व्यक्तित्व के कारण हमसे अर्थात् अपने बच्चों से प्रेम करता है l उद्धार के लिए एक बार मसीह का नाम लेने से, कुछ भी नहीं-“परेशानी या कठिनाई या सताव, या अकाल या नग्नता या खतरा अथवा तलवार-कभी हमें “परमेश्वर के प्रेम से जो हमारे प्रभु मसीह यीशु में है, अलग कर सकेगी” (रोमियों 8:35,39) l
जब हमारे समस्त कार्य या जो हमारे पास है हमसे ले लिया जाएगा, उस समय उसकी इच्छा है कि हम उसमें विश्राम करें जो हमारी पहचान है l