आरम्भ से पहले
“किन्तु यदि परमेश्वर का कोई आरंभ और अंत नहीं है, और वह हमेशा से है, तो वह हमें बनाने से पूर्व क्या कर रहा था? वह अपना समय किस तरह व्यतीत कर रहा था?” जब हम परमेश्वर के अनंत स्वभाव के विषय बात करते हैं, कुछ अपरिपक्व सन्डे स्कूल विद्यार्थी उपरोक्त प्रश्न ज़रूर पूछते हैं l मेरा उत्तर होता था कि यह थोड़ा रहस्यमय है l किन्तु हाल ही में मैंने सीखा कि बाइबल हमें इस प्रश्न का उत्तर देती है l
यूहन्ना 17 में जब यीशु अपने पिता से प्रार्थना करता है, वह कहता है “हे पिता, . . . तू ने जगत की उत्पत्ति से पहले मुझ से प्रेम रखा”(पद.24) l यह वह परमेश्वर है जिसे यीशु ने हम पर प्रगट किया : इससे पूर्व कि वह सृष्टि की रचना करता अथवा उस पर राज्य करता, परमेश्वर एक पिता होकर पवित्र आत्मा के द्वारा अपने पुत्र से प्रेम करता था l जब यीशु का बप्तिस्मा हुआ, परमेश्वर ने अपनी आत्मा को एक कबूतर के रूप में भेजा और बोला, “यह मेरा प्रिय पुत्र है, जिससे मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ”(मत्ती 3:17) l परमेश्वर के व्यक्तित्व की सबसे बड़ी मूल सच्चाई ही यह अप्रत्याशित, जीवनदायी प्रेम है l
यह हमारे परमेश्वर के विषय कितनी खुबसूरत और उत्साहवर्धक सच्चाई है! यह त्रिएक परमेश्वर अर्थात् पिता, पुत्र, और पवित्र आत्मा द्वारा आपस का, स्वेच्छाचारी प्रेम है जो परमेश्वर के स्वभाव को समझने की कुंजी है l समय के आरम्भ से पूर्व परमेश्वर पिता क्या कर रहा था? अपनी आत्मा द्वारा अपने पुत्र से प्रेम कर रहा था l परमेश्वर प्रेम है (1 यूहन्ना 4:8), और यह तस्वीर हमें इसका अर्थ समझने में सहायता करती है l
दृष्टिकोण में अंतर
पिछले 30 वर्षों के अंतराल में मेरे गृह-शहर ने इस वर्ष सबसे अधिक सर्दी के मौसम का अनुभव किया था l घंटों बर्फ को बेलचे से साफ़ करते हुए मेरी बाँहें दर्द करने लगीं l अपने प्रयास को व्यर्थ समझकर जब मैं थकी हुई घर के अन्दर आयी, जलती हुई आग की गर्मी मुझे मिली जिसके चारों-ओर मेरे बच्चे थे l घर के अन्दर से खिड़की से देखने पर मौसम के प्रति मेरा दृष्टिकोण बिलकुल बदला हुआ था l यह न देखकर कि मेरे पास बहुत काम है, मैंने पेड़ों पर जमीं बर्फ की खूबसूरती देखी और किस तरह पूरा परिदृश्य बर्फ से ढका हुआ था l
भजन 73 में आसाप के शब्दों को पढ़ते हुए, मैं उसके समान, बल्कि और अधिक मार्मिक अंतर देखती हूँ l प्रारम्भ में, वह संसार के कार्य करने के तरीके पर दुखित हुआ, अर्थात् किस तरह बुरे लोगों का कुशल होता है l वह भीड़ से अलग जीवन जीने के महत्त्व पर एवं दूसरों की भलाई के लिए जीवन पर शक करता है (पद.13) l किन्तु जब वह परमेश्वर के पवित्रस्थान में प्रवेश करता है, उसका दृष्टिकोण बदल जाता है (पद.16-17) : वह स्मरण करता है कि परमेश्वर संसार के साथ और उसकी समस्याओं के साथ न्याय करेगा, और उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है, कि परमेश्वर के साथ रहना भला है (पद.28) l
जब हम अपने संसार के अनवरत समस्याओं से प्रभावित होते हैं, हम प्रार्थना में परमेश्वर के पवित्रस्थान में प्रवेश करके जीवन-परिवर्तन करनेवाली, दृष्टिकोण- बदलनेवाली सच्चाई की गर्माहट प्राप्त कर सकते हैं अर्थात् उसका निर्णय हमारे निर्णय से उत्तम है l भले ही हमारी परिस्थितियां न बदलें, हमारी दृष्टिकोण बदल सकती है l
परमेश्वर के लिए अभिलाषित
एक दिन हमारी बेटी हमारे एक वर्ष के नाती के साथ हमारे घर आयी l मैं किसी काम से घर से निकलने ही वाला था, कि कमरे से निकलते ही मेरा नाती रोने लगा l ऐसा दो बार हुआ, और हर बार मैं लौट कर कुछ समय उसके साथ रहा l जब मैं तीसरी बार दरवाजे की ओर बढ़ा, उसके छोटे होंठ फिर हिलने लगे l उस समय मेरी बेटी बोली, “डैड, क्यों न आप इसे अपने साथ ले जाएं?”
कोई भी नाना-नानी आपको बता सकते हैं कि आगे क्या हुआ l मेरा नाती साथ में घूमने गया, केवल इसलिए क्योंकि मैं उसे प्यार करता हूँ l
यह जानना कितना भला है कि परमेश्वर के लिए हमारे हृदयों की अभिलाषाओं से भी परमेश्वर प्रेम करता है l बाइबल हमें भरोसा देती है कि “जो प्रेम परमेश्वर हम से रखता है, उसको हम जान गए और हमें उसका विश्वास है” (1 यूहना 4:16) l परमेश्वर हमसे इसलिए प्रेम नहीं करता कि हमने कुछ किया है अथवा नहीं किया है l उसका प्रेम हमारी योग्यता पर बिलकुल नहीं, किन्तु उसकी भलाई और विश्वासयोग्यता पर आधारित है l जब हमारे चारों-ओर का संसार प्रेम नहीं करता है और कठोर है, हम परमेश्वर के न बदलनेवाले प्रेम को अपनी आशा और शांति का श्रोत मानकर उस पर भरोसा कर सकते हैं l
हमारे स्वर्गिक पिता का हृदय उसके पुत्र और उसकी आत्मा के उपहार के रूप में हमें मिले हैं l यह भरोसा कितना सुखदायक है कि परमेश्वर हमसे प्रेम करता है जो कभी ख़त्म होने वाला नहीं!
प्रत्याशा में प्रतीक्षा
ऑक्सफ़ोर्ड, इंग्लैंड, में प्रत्येक मई दिवस (मई 1) पर, एक भीड़ प्रातःकाल बसंत को आमंत्रित करने के लिए इकट्ठी होती है l मैग्डालेन संगीत मण्डली प्रातः 6.00 बजे, मैग्डालेन मीनार से गीत गाते हैं l हजारों लोग गीत एवं घंटी की आवाज़ से काली रात के छटने का इंतज़ार करते हैं l
मैं भी अक्सर, इन मनोरंजन करनेवालों की तरह इंतज़ार करती हूँ l मैं प्रार्थना के उत्तर अथवा प्रभु के मार्गदर्शन का इंतज़ार करती हूँ l यद्यपि मुझे नहीं पता कि कब मेरा इंतज़ार करना समाप्त होगा l भजन 130 में भजनकार लिखता है कि वह किसी गहरी पीड़ा में रहते हुए एक ऐसी स्थिति का सामना कर रहा है जो सबसे काली रात सी महसूस हो रही है l अपनी परेशानियों में, वह परमेश्वर पर भरोसा करने का चुनाव करता है और जिस तरह पहरुआ अपनी ड्यूटी करते हुए भोर के आने का इंतज़ार करता है, वह भी उसी प्रकार जागता रहता है l “पहरुए जितना भोर को चाहते हैं, उस से भी अधिक मैं यहोवा को अपने प्राणों से चाहता हूँ” (पद. 6) l
भजनकार को अंधकार से बाहर निकालनेवाला परमेश्वर की विश्वासयोग्यता का इंतज़ार उसके दुःख के मध्य उसे सहन करने के लिए आशा देती है l सम्पूर्ण वचन में पायी जानेवाली परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं पर आधारित रहकर, वह आशा उस स्थिति में भी जब प्रथम किरणें अभी तक दिखाई नहीं दी है उसे इंतज़ार करने में उसकी सहायता करती है l
यदि आप काली रात के मध्य में भी हैं तो भी उत्साहित हो जाएं l सुबह होने वाली है – इस जीवन में अथवा स्वर्ग में! इस बीच, आशा को न त्यागें किन्तु प्रभु के छुटकारे के लिए इंतज़ार करते रहें l वह विशवासयोग्य है l
जंजीरों को तोड़ना
स्टोन टाउन, ज़ांज़ीबार में क्राइस्ट चर्च कैथेड्रल की यात्रा ने हमारे दिल को छू लिया, क्योंकि यह ऐसे स्थान पर स्थित है जहाँ पूर्व अफ्रीका का सबसे बड़ा गुलाम बाजार था। कैथेड्रल में वास्तविक प्रतीकों के माध्यम से सुसमाचार द्वारा दासता की जंजीरों का तोड़ा जाना प्रदर्शित किया गया है। अब यह बुरे कामों और भयानक अत्याचारों का नहीं, वरन परमेश्वर के प्रस्तुत अनुग्रह का स्थान होगा।
कैथेड्रल निर्माता दिखाना चाहते थे कि किस प्रकार क्रूस पर यीशु की मृत्यु पाप से छुटकारा प्रदान करती है-जिसे प्रेरित पौलुस ने इफिसुस की कलीसिया को अपनी पत्री में व्यक्त किया था:"हम को उस में...."(इफिसियों 1:7)। यहां छुटकारा शब्द, पुराने नियम के बाज़ार के भाव को इंगित करता है, किसी व्यक्ति या वस्तु को वापस खरीद लेने द्वारा। यीशु मनुष्य को पाप की दासता और बुरे काम करने के जीवन से वापस खरीद लेते हैं।
मसीह में अपने छुटकारे के विचार से वह खुशी से फूले नहीं समाते(पद 3-14)। परत-दर-परत गुणगान करते हुए वह, यीशु की मृत्यु द्वारा हमारे लिए किए गए परमेश्वर के अनुग्रह के उस कार्य का बखान करते हैं, जो हमें पापों के बंधन से छुड़ा लेता है। अब हमें पाप के दास होने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि हम परमेश्वर और उसकी महिमा के लिए जीवित रहने के लिए स्वतंत्र हैं।
यीशु पर ध्यान करो!
ब्रदर जस्टिस एक विश्वासयोग्य व्यक्ति थे। अपने विवाह में निष्ठावान, एक समर्पित डाक कर्मचारी, तथा हर रविवार कलीसिया में अगुवे की भूमिका में सदैव उपस्थित रहते थे। जब मैं अपने बचपन की कलीसिया में गया, पियानो पर वही धुन बज रही थी जिसे ब्रदर जस्टिस बाइबिल अध्ययन के समय की समाप्ति पर बजाते थे। इस धुन ने समय की कसौटी का सामना किया है। ब्रदर जस्टिस के प्रभु के पास जाने के बाद, उनकी विश्वासयोग्यता की विरासत आज भी कायम है।
इब्रानियों 3 पाठकों को एक वफादार सेवक और विश्वासयोग्य पुत्र का ध्यान दिलाता है। हालाँकि, परमेश्वर के "दास" के रूप में मूसा की सच्चाई निर्विवाद है, परन्तु विश्वासियों को यीशु पर ध्यान केंद्रित करना सिखाया जाता है। “सो हे पवित्र भाइयों...”(पद 1)। परीक्षा में पढने वालों को ऐसा प्रोत्साहन मिला है (2:18)। उनकी विरासत केवल यीशु का अनुसरण करने से आती है, जो विश्वासयोग्य हैं।
परीक्षा की हवाएं आप सभी के आसपास घूम रही हैं। जब आप थके, जीर्ण, हार मानने को तैयार हों? एक व्याख्या में पाठ हमें यीशु पर ध्यान करने के लिए आमंत्रित करता है (3:1 मैसेज)। उस पर ध्यान करो, दोबारा, बार-बार। यीशु पर ध्यान करके हम परमेश्वर के एक विश्वासयोग्य पुत्र को देखते हैं जो हमें उनके परिवार में रहने का साहस देते हैं।
कार्य पर प्रशिक्षण
अपने बेटे के अध्यापक से विज्ञान शिविर में सहयोगी बनने के आग्रह से मैंने संकोच किया। अपने बेटे को प्रेम करने और उसकी परवरिश में परमेश्वर ने मेरी सहायता की है परंतु दूसरों के लिए वह मेरा इस्तेमाल करेंगे इसका मुझे संदेह था।
आज भी मैं नहीं समझ पाती कि परमेश्वर-एकमात्र परिपूर्ण, सिर्फ एक जो हृदयों और जीवनों को बदल सकते हैं-समय के साथ हमें भी बदल देते हैं। तब पवित्र-आत्मा याद दिलाती है कि पौलुस ने कैसे तीमुथियुस को विश्वास से उसको मिले वरदान को चमकाने के लिए कार्य-पर-प्रशिक्षण आरंभ करने को कहा (2तीमुथियुस 1:6)। जैसे तीमुथियुस लोगों की सेवा करेगा, उसे साहस मिलेगा क्योंकि उसके सामर्थ के स्रोत परमेश्वर उसकी प्रेम करने और अनुशासित रहने में उसकी मदद करेंगे (पद 7)।
मसीह हमें बचाते और सामर्थी बनाते हैं ताकि mहम अपने जीवन से उन्हें आदर दें, हमारी योग्यता के कारण नहीं वरन इसी कि हम उनके परिवार के बहुमूल्य सदस्य हैं (पद 9)।
हमारा काम है परमेश्वर तथा दूसरों से प्रेम करें। मसीह का काम है हमें बचाएं और संसार के प्रति हमारी संकरी दृष्टि से बढ़कर उद्देश्य दें। प्रतिदिन जैसे हम उनके पीछे जहाँ वे ले जाएँ वहाँ चलते हैं, तो वह उनके प्यार और सच्चाई से दूसरों को उत्साहित करने में हमारा इस्तेमाल करते हुए हमें बदल देते हैं।
बुद्धि की बुलाहट
ब्रिटेन के प्रसिद्ध पत्रकार और सामाजिक आलोचक, मैल्कम मग्रिज, साठ वर्ष की आयु में मसीही बनेंI अपने पचत्तरवें जन्मदिन पर उन्होंने जीवन के बारे में पच्चीस व्यावहारिक टिप्पणियां कीं। एक में उन्होंने कहा, "मैं कभी ऐसे व्यक्ति से नहीं मिला हूँ जो धनी और खुश था, परंतु कभी-कभी ही ऐसे गरीब व्यक्ति से मिला हूं जो धनी नहीं बनना चाहता था।"
हम में से अधिकांश सहमत होंगे कि धन हमें ख़ुशी नहीं दे सकता, फिर भी हम अधिक धनी बनना चाहते हैं ताकि हम निश्चिन्त हो सकें।
राजा सुलैमान की संपत्ति का अनुमान दो ट्रिलियन अमेरिकी डालर से अधिक का लगाया गया है। हालांकि, वह बहुत धनी थे, पर जानते थे कि धन की बड़ी सीमाएं होती हैं। नीतिवचन 8 उनके अपने अनुभव पर आधारित है, और सभी लोगों को "बुद्धि की बुलाहट" प्रदान करता है, "मैं तुम को पुकारती...”(पद 4- 7)। “चान्दी नहीं, मेरी शिक्षा ...”(पद 10-11)।
बुद्धि कहती है मेरा फल चोखे सोने से, वरन कुन्दन से भी उत्तम है, और मेरी उपज उत्तम चान्दी से अच्छी है। मैं धर्म की बाट में, और न्याय की डगरों के बीच में चलती हूं, जिस से मैं अपने प्रेमियों को परमार्थ के भागी करूं, और उनके भण्डारों को भर दूं (पद 19- 20)। वास्तव में यही सच्चा धन हैं!
विधवा का विश्वास
आह-पाई सुबह तड़के उठ जाती है। बाकि लोग भी जल्दी उठकर रबड़ के बागानों में जाएँगे। रबड़ की फ़सल चीन के हांगझुआंग गांव-वासियों की आय का मुख्य स्रोत है। अधिक रबर इकट्ठा करने लिए सुबह से पेड़ों से क्षीर निकाला जाता है। आह-पाई भी उनमें शामिल होगी, परंतु पहले वह परमेश्वर के साथ समय बिताएगी।
आह-पाई के पिता, पति, और पुत्र का निधन हो चुका है। वह अपनी बुजुर्ग मां और दो पोतों को पालने के लिए मेहनत करती है। उसकी कहानी मुझे बाइबिल में एक विधवा की याद दिलाती है। जिसका पति कर्जा छोड़ कर मर गया (2राजा 4:1)। संकट में मदद पाने के लिए वह परमेश्वर के दास एलीशा के पास गई। उसे विश्वास था कि उसकी स्थिति में परमेश्वर ही कुछ कर सकते हैं। परमेश्वर ने किया। आश्चर्यकर्मों से उन्होंने विधवा की जरूरतों को पूरा किया (पद 5- 6)। परमेश्वर आह-पाई की जरूरतों को भी पूरा करते हैं-भले ही कम आश्चर्यकर्मों से-वह ऐसा उसकी मेहनत, भूमि की उपज और लोगों के उपहारों के माध्यम से करते हैं।
जीवन हमसे चाहे कई मांगे करे, हम सामर्थ सदा परमेश्वर से पा सकते हैं। अपनी चिंताओं को उन्हें सौंप कर हम जो संभव हो वह करें। और उन्हें वह करने का अवसर दें जो हमें अंततः आश्चर्यचकित कर देगा।