भूलने की बीमारी
कैरल्सबाड, कैलिफोर्निया में आपातकालीन सेवा ने ऑस्ट्रेलियाई लहज़े में बोलने वाली एक महिला को बचाया जिसे याद नहीं था कि वह कौन थी।
उसे भूलने की बीमारी थी और उसका कोई पहचान पत्र नहीं था। डॉक्टरों और अंतर्राष्ट्रीय मीडिया की मदद से उसकी हालत सुधरी, उसकी कहानी प्रसारित हुई और अंततः वह अपने परिवार से पुनः मिल पाई।
बाबुल का राजा नबूकदनेस्सर भी यह भूल गया था कि वह कौन था और कहां से आया था। हालांकि उसकी भूलने की बीमारी आध्यात्मिक थी। जो राज्य उसे मिला था उसका श्रेय स्वयं लेकर वह यह बात भूल गया था कि परमेश्वर राजाओं के राजा हैं और उसके पास जो कुछ भी था वह उन्हीं का दिया हुआ था( दानिय्येल 4:17, 28-30)।
परमेश्वर ने राजा के दिमाग की दशा को नाटकीय बना दिया जिससे वह खेतों में जंगली जानवरों के साथ रहने और गाय की तरह घास चरने लगाI आखिरकार 7वर्षों बाद उसने आंखें स्वर्ग की ओर उठाईं, और उसकी बुद्धि ज्यों की त्यों हो गईI तब उसने कहा, “अब मैं नेबूदुकनेस्सर...” (37) I
हमारे बारे में क्या? हमारी दृष्टि में हम कौन हैं? हम कहां से आए? क्योंकि हम भूल जाने की प्रवृति रखते हैं इसलिए याद करने के लिए राजाओं के राजा के अलावा हम किसकी ओर देख सकते हैं?
प्रतीक्षा का स्थान
"प्रतीक्षा चाहे मछली के जाल में फंसने की, पतंगबाजी में हवा के रुख की या शुक्रवार शाम की हो....हर कोई प्रतीक्षा कर रहा है"-बाल-पुस्तक लेखक डॉक्टर सिउस।
जीवन का बड़ा भाग प्रतीक्षा के बारे में है,परंतु परमेश्वर उतावले नहीं होते। कहावत है, “परमेश्वर का अपना अवसर और अपना विलम्ब होता है”। इसलिए हम प्रतीक्षा करें।
प्रतीक्षा कठिन बात है। हम अंगूठा मोड़ते, पैर बदलते, उबासी को दबाते, लंबी आहें भरते, और हताश होकर चिंतित होते हैं। इतने अजीब व्यक्ति के साथ क्यों रहूं, इतना कठिन कार्य, इतना उलझन भरा व्यवहार, इतनी लाइलाज बीमारी! परमेश्वर कुछ करते क्यों नही? परमेश्वर का उत्तर:"थोड़ा ठहर और देख मैं क्या करूंगा"।
प्रतीक्षा जीवन की शिक्षिका है, इसमें हम...प्रतीक्षा के गुण को सीखते हैं-जब परमेश्वर हममें और हमारे लिए कार्य करते हैं तो प्रतीक्षा करें। प्रतीक्षा हमारे धीरज और परमेश्वर की भलाई और करुणा पर भरोसा करने की क्षमता को बढ़ाते हैं, भले ही बातें हमारे अनुरूप ना हों (भजन संहिता 70: 5)।
परंतु प्रतीक्षा का अर्थ उदासीन होना या दांत पीसना नहीं। प्रतीक्षा करते हुए हम “हर्षित और [उनमें] अनन्दित हो सकते हैं (पद 4)। हम इस आशा में प्रतीक्षा करते हैं कि परमेश्वर हमें उचित समय में छुड़ा लेंगे-इस जीवन में या अगले मेंI परमेश्वर उतावली नही करते वरन वो सदा समय पर होते हैं।
शांति का रहस्य
ग्रेस एक विशिष्ट महिला है। उसके बारे में सोचकर एक ही शब्द मन में आता है:शांति। जबसे मै उसे जानती हूँ, उसके मुख का शांत और स्थिर भाव शायद ही कभी बदला हो, तब भी नहीं जब दुर्लभ रोग के कारण उसके पति को अस्पताल में भर्ती कराया गया।
मैंने ग्रेस से उसकी शांति का रहस्य पूछा, तो उसने कहा, "यह कोई रहस्य नहीं है, यह एक व्यक्ति है। यह यीशु है जो मुझमें है। इस तूफान में भी जिस शांति का मैं अनुभव करती हूं उसे बताने का कोई और तरीका नही है"।
शांति का रहस्य यीशु मसीह के साथ संबंध में निहित है। वे हमारी शांति हैं। जब यीशु हमारे उद्धारकर्ता और परमेश्वर होते हैं, और हम और अधिक उनके समान बनते हैं तो शांति एक वास्तविकता बन जाती है। बीमारी, आर्थिक कठिनाइयों या विपत्ति में भी शांति आश्वासन देती है कि हमारे प्राण परमेश्वर के हाथों में हैं (दानिय्येल 5:23) और हम भरोसा कर सकते हैं, कि अंत में सब बातें भलाई को उत्पन्न करेंगी।
क्या हमने उस शांति को अनुभव किया है जो तर्क और समझ से परे है? क्या हमें निश्चय है कि परमेश्वर नियंत्रण में हैं? पौलुस के शब्दों को आज मैं सबके लिए दोहराना चाहती हूं:”अब प्रभु जो शान्ति का...”(2 थिस्सलुनीकियों 3:16)।
छोटी-छोटी बातों में परमेश्वर की उपस्थिति
अपने 3 मास के "चॉकलेट" रंग के लैब्राडोर कुत्ते को जब मैं टीकाकरण और जांच के लिए पशु चिकित्सक के पास लाया तो डाक्टर ने जाँच पर देखा कि उसके बाएं पंजे पर फर के पीछे एक सफेद निशान था। वह मुस्कराकर कहने लगी, "परमेश्वर ने यहाँ से तुम्हें उठा कर चॉकलेट में डुबो दिया होगा।"
मैं हंस पड़ा। अनजाने में उसने परमेश्वर के उनकी सृष्टि में गहरे और व्यक्तिगत रूप से ध्यान देने की सार्थक बात कह दी थी।
मत्ती 10:30 में यीशु ने कहा, “हमारे सिर के बाल भी गिने हुए हैं”। परमेश्वर इतने महान हैं कि वह हमारे जीवन की छोटी-छोटी बातों में भी रुचि रखते हैं। कोई भी बात इतनी छोटी नहीं जिसपर वे ध्यान न दें या जिसे उनके सम्मुख ना लाया जा सके। वह हमारा इतना ध्यान रखते हैं।
परमेश्वर ने ना केवल हमारी रचना की, वरन वे हमें थामते और हमारी रक्षा करते हैं। कुछ लोग कहते हैं कि “शैतान छोटी-छोटी बातों में है”। "परंतु यह समझना बेहतर होगा कि उनमें परमेश्वर होते हैं। वे उन चीजों पर भी ध्यान रखते हैं जिन पर हम ध्यान नहीं दे पाते। कितने दिलासे की बात है कि हमारे दयालु और स्वर्गीय पिता-अपनी समस्त सृष्टि के साथ-अपने सामर्थी और प्रेमी हाथों से हमें थामें रहते हैं।
कहीं भी
अपनी शादी की तस्वीरें देखते हुए, मैं एक पर रुक गई जिसमें हम नए "मिस्टर एंड मिसेज" बने थेI मेरा समर्पण भाव स्पष्ट दिख रहा था, मैं उनके साथ कहीं भी जाने को तैयार थीI
40 वर्षों बाद भी हमारी शादी प्रेम और प्रतिबद्धता की डोर से बंधी है, जिसने हमें कठिन और अच्छे समय से निकाला है। उनके साथ कहीं भी चलने के वचन को हर साल मैंने पुनःसमर्पित किया है।
यिर्मयाह 2:2 में परमेश्वर अपने प्रिय परंतु हठी इस्राइल से कहते हैं, "तेरी जवानी का..."। स्नेह भक्ति का इब्रानी शब्द सर्वोच्च कोटि की विश्वासयोग्यता और वचनबद्धता को व्यक्त करता है। पहले इस्राइल परमेश्वर के प्रति दृढ़ संकल्प से समर्पित रहने के लिए वचनबध्द था परंतु धीरे-धीरे वह दूर हो गया।
समर्पण में आत्मसंतुष्टता प्रेम को फ़ीका कर सकती है तथा उत्साह की कमी विश्वासघात पैदा कर सकती है। शादी में ऐसी लापरवाही से संघर्ष करने के महत्व को तो हम जानते हैं। परंतु परमेश्वर के साथ हमारे प्रेम-संबंध के बारे में क्या? क्या उनके प्रति हम आज वैसे समर्पित हैं जैसे पहली बार विश्वास में आने पर थे?
परमेश्वर विश्वासयोग्यता से अपने लोगों को वापस आने की अनुमति देते हैं (3:14-15)।
हम नए सिरे से अपनी प्रतिज्ञा को दोहरा सकते हैं, कि हम उनके पीछे चलेंगे- कहीं भी।
माफ करने की कला
मैं एक कला प्रदर्शनी देखने गया-एक पिता और उसके दो पुत्र, माफ करने की कला-जो यीशु के उड़ाऊ पुत्र के दृष्टांत पर आधारित थी। (लूका 15:11–31 देखें)। एडवर्ड रीओजस के चित्र उड़ाऊ पुत्र ने मुझे प्रभावित किया I जिसमें एक पुत्र था जो कभी हठी था, पर अब फटे कपड़े पहने और सिर झुकाए घर लौट रहा था। मृत्यु के देश को पीछे छोड़ वह उस रास्ते पर कदम रखता है जिसमें उसका पिता पहले ही उसकी ओर दौड़ रहा है। चित्र के नीचे यीशु के शब्द हैं, “वह अभी दूर ही...” (पद 20)।
परमेश्वर के अपरिवर्तनीय प्रेम ने किस प्रकार मेरा जीवन बदल दिया था इस बात ने पुनः मुझे छू लिया। उनसे दूर जाने पर वह मुंह मोड़ने की बजाय मेरी राह देखते हुए प्रतीक्षा करते रहे। उनका प्रेम पाने की हम में योग्यता नहीं है, तो भी वह अपरिवर्तनीय है; प्रायः उपेक्षित होता है, तो भी निर्लिप्त नहीं होता।
हम सभी दोषी हैं, तो भी हमारे स्वर्गीय पिता हमें गले लगाने के लिए वैसे दौड़े आते हैं, जैसे इस कहानी में पिता ने अपने हठी पुत्र को गले लगाया। पिता ने अपने सेवकों से कहा; “हम भोज करें...(पद 23-24)।
परमेश्वर उन लोगों के लिए आनंदित होते हैं जो आज उनके पास लौटते हैं-और यह आनंद मनाने योग्य बात है!
उतावले ना बनो
"उतावलेपन को कठोरता पूर्वक निकाल डालो" दो दोस्तों द्वारा बुद्धिमान डालेस विलर्ड के इस कथन के दोहराए जाने पर मैं समझ गया कि मुझे इसके बारे में सोचना चाहिए। मैं अपना समय और ऊर्जा कहाँ बर्बाद कर रहा था? मार्गदर्शन और सहायता के लिए परमेश्वर की ओर देखने की बजाय मैं उतावला होकर बेसुध चल रहा था। आगे चलकर मैंने परमेश्वर और उनकी बुद्धिमत्ता की ओर रुख कियाI अपने तरीकों पर चलने के बजाय परमेश्वर पर विश्वास करने की बात को ध्यान में रखाI
बेतहाशा दौड़ना उसका विपरीत होता है जिसे भविष्यवक्ता यशायाह "पूर्ण शांति" कहते हैं। यह वरदान परमेश्वर उन्हे देते हैं जिनके मन उसमे स्थिर हैं क्योंकि वह उनपर भरोसा करते हैं। और वह सदा विश्वासयोग्य हैं आज, कल, और हमेशा, क्योंकि प्रभु यहोवा सनातन चट्टान हैं (पद 4)। धीरज धर कर परमेश्वर पर विश्वास करना उतावलेपन के जीवन का इलाज है।
हमारे बारे में क्या? क्या हम जानते हैं कि हम उतावलापन या जल्दबाजी कर रहे हैं? शायद हमें शांति भी अनुभव होती हो। या शायद हम इन दोनों चरम सीमाओं के बीच में कहीं हों। हम जहां भी हों, मैं आज प्रार्थना करती हूं कि हम अपने उतावलेपन को छोड़कर परमेश्वर पर भरोसा करें जो हमें कभी निराश नही करते और हमें अपनी शांति देते हैंI
जन्म के अनुसार किसी का आंकलन करना
"आप कहां से हैं"? दूसरों को बेहतर जानने के लिए हम यह प्रश्न पूछ लेते हैं। परन्तु हम से अधिकांश सब कुछ नहीं बताना चाहते। न्यायियों की पुस्तक में यिप्तह शायद इस प्रश्न का उत्तर कदापि नहीं देना चाहता थाI उसके सौतेले भाइयों ने उसे यह कह कर गिलाद के घराने से निकाल दिया था कि, "तू तो पराई स्त्री का बेटा है" (न्यायियों 11:2)। पाठ बताता है कि," उसकी माता एक वैश्या थी" (पद 1)।
परंतु यिप्तह एक स्वभाविक अगुवा था। विरोधी जाति के गिलाद पर आक्रमण करने के कारण उसे बाहर निकालने वाले लोग अब उसे लौटने को कहने लगे। "हमारा प्रधान हो जा", उन्होंने कहा (पद 6)। यिप्तह ने पूछा, "क्या तुमने मुझ से..."( पद 7)? यह आश्वासन मिलने के बाद कि अब चीजें फ़र्क होंगी, वह उनकी अगुवाई करने के लिए सहमत हो गया। “तब यहोवा का आत्मा...” (पद 29)। विश्वास के द्वारा उसने उनकी अगुवाई कर एक महान विजय दिलायी। नया नियम उसे विश्वास के नायकों में सूचीबद्ध करता है (इब्रानियों 11:32)।
अक्सर परमेश्वर अपने कार्यों को करने के लिए विचार से परे लोगों को चुनते हैं, है ना? हम कहां से हैं, यहां कैसे आए, हमने क्या किया है, इससे फर्क नहीं पड़ता। मुख्य यह है, कि हम उनके प्रेम का प्रतिउत्तर विश्वास से दें।
परमेश्वर को जानना सीखना
मैं हमेशा से मां बनना चाहती थ और विवाह करने, गर्भवती होने, और बच्चे होने के सपने देखती थे। परंतु विवाह के बाद गर्भावस्था के नकारात्मक परीक्षणों के बाद मेरे पति और मुझे एहसास हुआ कि हम बांझपन से संघर्ष कर रहे थे। महीनों तक डॉक्टर के चक्कर, परीक्षण और आसूँ बहाना चलते रहे। हम तूफान के बीच में थे। बांझपन के कारण मैं परमेश्वर की भलाई और उनकी विश्वासयोग्यता पर संदेह करने लगी।
अपनी यात्रा से मुझे यूहन्ना 6 में समुद्री तूफान में फसें चेलों की कहानी याद आती है। जब वे अंधेरे में तूफान की लहरों से जूझते हुए नाव में थे तब उन्होंने यीशु को झील पर चलकर उनकी ओर आते देखा। उन्होंने अपनी उपस्थिति से चेलों को शांत किया और कहा, "मैं हूं; डरो मत"(पद 20)।
चेलों के समान हम दोनों नहीं जानते थे कि हमारा तूफान क्या लाएगा; परंतु हमें शांति मिली, क्योंकि हम परमेश्वर को अधिक गहराई से जानने लगे, कि वो सदा विश्वासयोग्य और सच्चे हैं। यद्यपि जिस बच्चे के हमने सपने देखे थे वह हमें नहीं मिलेगा, परन्तु हमने सीखा कि हमारे संघर्षों में हम परमेश्वर की शांतिदायक उपस्थिति अनुभव कर सकते हैं। क्योंकि वह हमारे जीवनों में सामर्थपूर्ण रूप से कार्य कर रहे हैं, इसलिए हमें चिंता करने की आवश्यकता नहीं है।