क्रोध प्रबंधन
जब मैं एक सहेली के संग रात्री भोजन कर रही थी, उसने बताया कि वह परिवार के एक ख़ास सदस्य से ऊब चुकी है l किन्तु वह अनदेखा करने अथवा उपहास करने की उसकी कष्टकर आदत के विषय उससे कुछ कहने में हिचकिचाती थी l समस्या के विषय जब उसने उसका सामना करना चाहा, उसने निन्दापूर्ण आलोचना की l वह उससे अत्यधिक क्रोधित हुई l दोनों पक्षों के एक दूसरे के विरुद्ध बोलने से, पारिवारिक फूट बढ़ गयी l
मैं भी ऐसी हूँ, क्योंकि मैं भी क्रोध से ऐसे ही पेश आती हूँ l मैं भी लोगों का सामना करने में कठिनाई महसूस करती हूँ l यदि कोई मित्र या परिवार का कोई सदस्य कुछ गन्दी बातें बोलता है, मैं अक्सर अपनी भावनाओं को दबा देती हूँ जब तक कि वह व्यक्ति या कोई और आकर कुछ और गन्दी बातें कहता या बोलता नहीं है l थोड़े समय बाद मैं, अधिक क्रोधित हो जाती हूँ l
इसलिए इफिसियों 4:26 में प्रेरित पौलुस ने कहा, “सूर्य अस्त होने तक तुम्हारा क्रोध न रहे l” अनसुलझी बातों के लिए समय सीमा निर्धारित करने पर क्रोध नियंत्रित रहता है l किसी गलती को बढ़ाने की अपेक्षा, जो कड़वाहट का घर है, हम परमेश्वर के “प्रेम में सच्चाई [बोलें]” (इफि.4:15) l
क्या किसी के साथ समस्या है? उसे पकड़े रहने की अपेक्षा परमेश्वर को प्रथम रखें l वह क्षमा और प्रेम की सामर्थ्य से क्रोध की आग बुझा सकता है l
आपके पिता का नाम क्या है?
मध्यपूर्व के क्षेत्र में मोबाइल फ़ोन खरीदते समय, मुझसे कुछ ख़ास प्रश्न पूछे गए : नाम, राष्ट्रीयता, पता l किन्तु उसके बाद क्लर्क ने फॉर्म भरते समय पूछा, “आपके पिता का नाम क्या है? मैं चकित हुई, और मैंने सोचा यह क्यों ज़रूरी है l मेरी संस्कृति में यह ज़रूरी नहीं है, किन्तु मेरी पहचान के लिए यहाँ यह ज़रूरी था l कुछ संस्कृतियों में, वंशावली ज़रूरी है l
इस्राएली भी वंशावली का महत्त्व मानते थे l वे अपने कुलपिता अब्राहम पर घमंड करते थे, और उनकी सोच में उनका अब्राहम का कुल का होना ही उनको परमेश्वर की संतान बनाता था l उनके अनुसार, उनकी मानवीय वंशावली उनके आत्मिक परिवार से जुड़ा था l
सैंकड़ों वर्ष बाद यहूदियों से बातचीत में, यीशु ने स्पष्ट किया कि यह ऐसा नहीं है l वे अब्राहम को अपना भौतिक पिता मान सकते थे, किन्तु यदि वे उससे प्रेम नहीं करते थे जिसे पिता ने भेजा था तो वे परमेश्वर के परिवार के नहीं थे l
आज भी वही सार्थक है l हम अपना भौतिक परिवार नहीं चुनते हैं, किन्तु हम अपना आत्मिक परिवार चुन सकते हैं जिसके हम हिस्से हैं l यीशु के नाम पर विश्वास करके, परमेश्वर हमें उसकी संतान बनने का अधिकार देता है (यूहन्ना 1:12) l
आपका आत्मिक पिता कौन है? क्या आपने यीशु का अनुसरण करने का चुनाव किया है? आज आप अपने पापों की क्षमा के लिए यीशु पर विश्वास करके परमेश्वर के परिवार का हिस्सा बन जाएँ l
हमारे पास एक राजा है!
मेरी इच्छानुसार न होने पर अपने पति पर हानिकारक शब्दों से वार करने के बाद, मैंने पवित्र आत्मा के अधिकार का अपमान किया जब उसने बाइबिल पदों से मेरे पापी आचरण को उजागर किया l क्या मेरा अड़ियल घमण्ड मेरे विवाह में सम्बंधित हानि अथवा परमेश्वर के प्रति अनाज्ञाकारी होने के लायक था? बिल्कुल नहीं l किन्तु प्रभु और अपने पति से क्षमा मांगने से पूर्व मैंने अपने पीछे जख्में छोड़ी थीं अर्थात् बुद्धिमान सलाह की अवहेलना और केवल खुद के प्रति जवाबदेह होने का परिणाम l
एक समय इस्राएली विद्रोही थे l मूसा की मृत्यु बाद, यहोशू इस्राएलियों को प्रतिज्ञात देश में ले चला l उसकी अगुवाई में इस्राएलियों ने परमेश्वर की सेवा की (न्यायियों 2:7) l किन्तु यहोशू और उसकी पीढ़ी की मृत्यु बाद, अगली पीढ़ी के लोग परमेश्वर और उसके काम को भूल गए (पद.10) l उन्होंने ईश्वर की अगुवाई को त्यागकर पाप को गले लगाया (पद.11-15) l
परमेश्वर द्वारा राजा की तरह काम करनेवाले न्यायी खड़ा करने के बाद, स्थिति में सुधार आया (पद.16-18), l किन्तु प्रत्येक न्यायी की मृत्यु बाद, इस्राएलियों ने परमेश्वर का विरोध किया l उन्होंने केवल खुद के प्रति जवाबदेही का जीवन जीकर, हानिकारक परिणाम भुगता (पद.19-22) l किन्तु यह हमारी असलियत न हो l हम खुद को अनंत शासक यीशु के बड़े अधिकार के आधीन कर सकते हैं जिसके पीछे चलने के लिए हम बनाए गए हैं, क्योंकि वह हमारा जीवित न्यायी और राजाओं का राजा है l
थोड़ा ठहरें
तीन सम्बन्धित फिल्मों के सेट द लार्ड ऑफ़ द रिंग्स की चर्चा में, एक किशोर ने कहा कि उसे उसकी कहानियाँ फिल्म की अपेक्षा पुस्तक के रूप में पसंद हैं l कारण पूछे जाने पर, उस युवक ने उत्तर दिया, “मैं अपना समय लेकर पुस्तक को पढ़ सकता हूँ l” एक पुस्तक को पढ़ते रहने के प्रभाव के विषय कुछ कहना होगा, विशेषकर बाइबिल, और उसमें की कहानियों में “ठहरे रहना l”
“विश्वास का अध्याय” इब्रानियों 11, उन्नीस लोगों के नाम बताता है l हर एक कठिनाई और शंका के मार्ग पर चला, फिर भी परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारी रहा l “ये सब विश्वास ही की दशा में मरे; और उन्होंने प्रतिज्ञा की हुई वस्तुएं नहीं पाईं, पर उन्हें दूर से देखकर आनन्दित हुए और मान लिया कि हम पृथ्वी पर परदेशी और बाहरी हैं” (पद.13) l
बाइबिल को पढ़ते हुए उसमें वर्णित लोगों और घटनाओं पर विचार किये बगैर पढ़ना कितना सरल है l हमारी खुद की बनाई हुई समय-सारणी हमें परमेश्वर की सच्चाई और हमारे जीवनों के लिए उसकी योजनाओं की गहराइयों में जाने से रोकती है l किन्तु, उसके वचन में ठहरे रहने से, हम खुद को हमारी ही तरह लोगों के वास्तविक जीवन घटनाओं में गिरफ्तार पाते हैं जिन्होंने परमेश्वर की विश्वासयोग्यता पर अपने जीवनों को आधारित किया l
परमेश्वर के वचन को खोलकर यह याद करना अच्छा है कि हम देर तक उसमें ठहर सकते हैं l
पहला कदम
थाम दाशु ने अपने जीवन में कुछ कमी महसूस करके अपनी बेटी के चर्च जाने लगा l किन्तु वे अलग-अलग जाते थे l कुछ दिन पहले वह अपनी बेटी को ठेस पहुँचाया था, जिससे दोनों के बीच अलगाव हो गया था l इसलिए, थाम गीत आरंभ होने के बाद चुपचाप अन्दर जाकर आराधना समाप्ति के तुरंत बाद निकल आता था l
कलीसिया के सदस्यों ने थाम को सुसमाचार बताया, किन्तु वह यीशु पर विश्वास करने का उनका निमंत्रण नम्रता के साथ टाल जाता था l किन्तु, वह चर्च जाता रहा l
एक दिन थाम काफी बीमार हो गया l उसकी बेटी ने हिम्मत जुटाकर उसको पत्र लिखी l उसने बताया किस तरह मसीह ने उसका जीवन बदल दिया था, और उसने अपने पिता से मेल-मिलाप किया l उस रात, थाम यीशु पर विश्वास किया और परिवार में मेल हो गया l कुछ दिन बाद, थाम की मृत्यु हो गयी और वह यीशु की उपस्थिति में प्रवेश करके परमेश्वर और अपने प्रियों के साथ शांति पाया l
प्रेरित पौलुस ने लिखा कि हम भी परमेश्वर के प्रेम और क्षमा की सच्चाई “लोगों को समझाते हैं” (2 कुरिन्थियों 5:11) l मेल-मिलाप की सेवा हेतु “मसीह का प्रेम [ही] हमें विवश कर देता है” (पद.14) l
दूसरों को क्षमा करने की हमारी इच्छा उनको समझने में सहायता करेगा कि परमेश्वर हमसे मेल-मिलाप करना चाहता है (पद.19) l क्या आप परमेश्वर की सामर्थ्य पर भरोसा करके उनको उसका प्रेम दिखाएँगे?
समझनेवाला
टेक्सास शहर समुदाय में पुलिस और अग्निशमन विभाग के पास्टर जॉन बैबलर, अपने कार्य से बाईस सप्ताह के विश्राम अवकाश के दौरान, क़ानून-व्यवस्था अमल में लानेवाले अफसरों द्वारा सामना की जानेवाली स्थितियों को समझने हेतु पुलिस अकादमी प्रशिक्षण लिया l दूसरे सैन्य विद्यार्थियों के साथ समय बिताकर और पेशे के अत्यंत चुनौतियों के विषय सीखकर, उनको दीनता और सहानुभूति का नया अनुभव मिला l भविष्य में, वे भावनात्मक तनाव, थकावट, और हानि के साथ संघर्ष कर रहे पुलिस अफसरों को सलाह देने में अधिक प्रभावशाली होने की आशा करते हैं l
हम जानते हैं कि परमेश्वर हमारी स्थिति जानता है क्योंकि उसने हमें बनाया और हमारे साथ होनेवाली सभी बातें देखता है l और हम यह भी जानते हैं कि वह समझता है क्योंकि उसने पृथ्वी पर मानव जीवन जीया l वह “देहधारी हुआ और ... हमारे बीच में [यीशु मसीह में] डेरा किया” (यूहन्ना 1:14) l
यीशु का सांसारिक जीवन कठिन था l उसने सूर्य की गर्मी, खाली पेट का दर्द, बेघर होने का अनिश्चिय अनुभव किया l उसने भावनात्मक रूप से, विरोध का तनाव, धोखे की दाग़, और हिंसा की लगातार धमकी सही l
यीशु ने हमारी तरह मित्रता का आनंद और पारिवारिक प्रेम के साथ-साथ संसार की सबसे बुरी परेशानियाँ अनुभव की l गहरी जानकारी और देखभाल के साथ हमारी चिंता करनेवाला अद्भुत सलाहकार ही (यशा.9:6) बोल सकता है, “मैंने उसका अनुभव किया है l मैं समझता हूँ l”
पत्र लेखन
मेरी माँ और उनकी बहने शीघ्र लुप्त हो रही कला रूप - पत्र लेखन करती हैं l दोनों ही लगातार एक दूसरे को व्यक्तिगत पत्र लिखतीं हैं इस कारण पत्र नहीं होने पर डाकिया चिंतित होता है! उनके पत्र में जीवन, आनंद और दुःख के साथ-साथ मित्रों और परिवार में होनेवाली दैनिक घटनाएँ होती हैं l
मुझे अपने परिवार की इन महिलाओं के साप्ताहिक अभ्यास पर विचार करना पसंद है l इससे मैं प्रेरित पौलुस के शब्दों को कि यीशु के विश्वासी “मसीह की पत्री” हैं जो “स्याही से नहीं परन्तु जीवते परमेश्वर के आत्मा से ... लिखी है” की प्रशंसा कर पाता हूँ (2 कुरिं. 3:3) l उसके सन्देश को नहीं माननेवाले झूठे शिक्षकों के प्रतिउत्तर में (देखें 2 कुरिं. 11), पौलुस ने कुरिन्थुस की कलीसिया को उसके उपदेश के अनुसार सच्चे और जीवते परमेश्वर का अनुसरण करने हेतु उत्साहित किया l ऐसा करके, उसने यादगार ढंग से विश्वासियों को मसीह का पत्र कहा, जो किसी और लिखित पत्र की तुलना में पौलुस की सेवा द्वारा अपने बदले हुए जीवनों से पवित्र आत्मा के अधिक सामर्थी गवाह थे l
कितना अद्भुत है कि परमेश्वर का आत्मा हममें अनुग्रह और छुटकारे की कहानी लिखता है! हमारे जीवन लिखित अर्थपूर्ण शब्दों से अधिक सुसमाचार की सच्चाई का सबसे उत्तम साक्षी है, क्योंकि वे हमारी दयालुता, सेवा, धन्यवाद, और आनंद द्वारा अत्यधिक बोलते हैं l हमारे शब्द और कार्य द्वारा, प्रभु जीवनदायक प्रेम फैलता है l आज आप क्या सन्देश फैला रहे हैं?
परमेश्वर को देखना
लेखक और पासवान इरविन लूज़र एक टेलेविज़न कार्यक्रम में मेज़बान आर्ट लिंकलेटर और एक छोटे बच्चे की परमेश्वर की तस्वीर बनाने की कहानी बताते हैं l लिंकलेटर, खुश होकर, बोले, “तुम नहीं बना पाओगे क्योंकि कोई नहीं जानता कि परमेश्वर कैसा है l”
“मेरे बनाने के बाद वे जान जाएंगे!” बच्चे ने कहा l
हम सोच सकते हैं, परमेश्वर कैसा है? क्या वह अच्छा है, दयालु है, चिंता करता है? फिलिप्पुस के निवेदन पर यीशु का प्रतिउत्तर इसका उत्तर था : “हे प्रभु, पिता को हमें दिखा दे l” यीशु ने उत्तर दिया, “हे फिलिप्पुस, मैं इतने दिन से तुम्हारे साथ हूँ, और क्या तू मुझे नहीं जानता? जिसने मुझे देखा है उसने पिता को देखा है” (यूहन्ना 14:8-9) l
परमेश्वर को देखने की कभी इच्छा हो तो यीशु को देखें l “वह तो अदृश्य परमेश्वर का प्रतिरूप है,” पौलुस ने कहा (कुलुस्सियों 1:15) l मत्ती, मरकुस, लूका, और यूहन्ना, चारों सुसमाचार पढ़कर यीशु के कार्य और वचन पर ध्यान दें l “पढ़ते समय अपने परमेश्वर का दिमागी चित्र “बनाएं l” पूरा पढ़ने के बाद, वह कैसा है, आप बहुत कुछ जान जाएंगे l
एक बार मेरे एक मित्र ने मुझसे कहा कि यीशु में दिखाई देनेवाले एकमात्र परमेश्वर में ही वह विश्वास करता है l निकट से देखने पर आप भी मानेंगे l उसके विषय पढ़ने पर आपका हृदय बहुत खुश होगा, क्योंकि यद्यपि आप जानते नहीं, यीशु ही वह परमेश्वर है जिसे आप सम्पूर्ण जीवन खोज रहें हैं l
पूरी तरह संभाला गया
हाल ही में मुझे कॉलेज की अपनी कुछ डायरी मिली जिसे मैं दोबारा पढ़ने के लिए मजबूर हुयी l लेखों को पढ़ते हुए, मैंने महसूस किया कि मैं उस समय खुद के विषय ऐसा महसूस नहीं करती थी l इस समय मैं खुद को अकेलेपन से संघर्ष करते हुए और अपने विश्वास पर शक करते हुए देखकर हरी हुई महसूर करती होती हूँ, किन्तु मुझे याद है कि किस तरह परमेश्वर मुझे बेहतर स्थान पर ले गया था l उन दिनों में परमेश्वर की अगुवाई याद करके आज मैं मजबूत महसूर करती हूँ जो एक दिन उसके चंगा करनेवाले प्रेम की बड़ी कहानी का भाग होगा l
भजन 30 उत्सव भजन है जो आश्चर्य और धन्यवाद के साथ बीते समय में परमेश्वर की सामर्थी चंगाई को याद करता है : रोग से आरोग्यता तक, मृत्यु के डर से जीवन तक, परमेश्वर के न्याय से उसकी कृपादृष्टि तक, विलाप से आनंद तक (पद.2-3,11) l
हम इस भजन में, दाऊद का दर्द-भरा शोक देखते हैं l किन्तु दाऊद ने असाधारण चंगाई का अनुभव भी प्राप्त किया जिसे वह बता पाया, “कदाचित् रात को रोना पड़े, परन्तु उसकी प्रसन्नता जीवन भर की होती है” (पद.5) l समस्त दुःख उठाने के बाद भी, दाऊद ने और भी बड़ी बात खोज ली अर्थात् परमेश्वर का चंगा करनेवाला हाथ l
यदि आज आप दुखित हैं और आपको उत्साह चाहिए, अतीत को याद करें जब परमेश्वर ने आपको चंगाई के स्थान पर लिए चला l भरोसा के लिए प्रार्थना करें कि वह आज भी करेगा l