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शत्रु प्रेम

1950 में युद्ध छिड़ने पर, 15 वर्षीय किम चीन-क्युंग ने अपने देश की रक्षा के लिए दक्षिण कोरियाई सेना में भर्ती हुआ l जल्द ही वह समझ गया कि वह युद्ध की विभीषिका के लिए तैयार नहीं था l अपने चारों ओर अपने मित्रों को मरते देखकर उसने परमेश्वर से आग्रह किया कि जीवन मिलने पर वह अपने शत्रुओं से प्रेम करना सीखेगा l

65 वर्ष बाद, डॉ. किम ने प्रार्थना का उत्तर देखा l दशकों, अनाथों की सेवा और उत्तर कोरियाई और चीनी युवकों की शिक्षा में सहयोग द्वारा उन्होंने अनेक शत्रुओं को मित्र बनाया था l आज वे राजनैतिक उपनाम से दूर रहकर, यीशु में विश्वास के होकर खुद को प्रेम करनेवाला  पुकारते हैं l

योना नबी ने एक भिन्न विरासत छोड़ा l एक महामच्छ के पेट से नाटकीय बचाव पश्चात भी उसका हृदय नहीं बदला l यद्यपि आखिर में वह परमेश्वर का आज्ञाकारी बना, उसने कहा कि परमेश्वर द्वारा उसके शत्रु पर दया करते देखने की बजाए उसके लिए मरना ही अच्छा है (योना 4:1-2, 8) l

योना निनवे के लोगों से प्रेम करना सीखा या नहीं, हम केवल अनुमान लगा सकते हैं l किन्तु हम अपने विषय सोचें l क्या हम उनके प्रति योना का आचरण अपनाएंगे जिनसे हम डरते हैं और घृणा करते हैं? या अपने शत्रु से प्रेम करने की योग्यता मांगेंगे जैसे परमेश्वर ने  हम पर करुणा की है l

तुम उसे क्या कहते हो?

1929 के एक शनिवार संध्या अखबार के साक्षात्कार  में, अल्बर्ट आइंस्टीन ने कहा, “बचपन में मैं बाइबिल और तालमूद(यहूदी धर्म साहित्य) दोनों ही की शिक्षा प्राप्त की, किन्तु मैं नासरी . . . . के प्रकाशमान रूप द्वारा सम्मोहित हूँ l कोई भी यीशु की उपस्थिति की वास्तविकता अनुभव किये बगैर सुसमाचारों को नहीं पढ़ सकता l उसका व्यक्तित्व प्रत्येक शब्द में धड़कती है l ऐसे जीवन में कोई मिथ्या नहीं है l”

नया नियम हमें यीशु के देशवासियों का उदहारण देता है जो उसके विषय कुछ विशेष पाते थे l जब यीशु ने अपने अनुयायियों से पुछा, “लोग मनुष्य के पुत्र को क्या कहते हैं?” उनके उत्तर थे कि कुछ यूहन्ना बप्तिस्मा देनेवाला, दूसरे कहते हैं वह एलिय्याह है, और अन्य उसे यिर्मयाह अथवा कोई और नबी (मत्ती 16:14) l  इस्राएल के महान नबियों के साथ गिनती वास्तव में एक सम्मान था, किन्तु यीशु को सम्मान नहीं चाहिए था l वह उनकी समझ देखना चाहता था और विश्वास खोज रहा था l इसलिए उसने दूसरा प्रश्न किया : “परन्तु तुम मुझे क्या कहते हो? (16:15) l

पतरस की घोषणा ने पूरी तरह यीशु की पहचान बता दी: “तू जीवते परमेश्वर का पुत्र मसीह है” (पद.16) l

यीशु चाहता है कि हम उसको और उसके बचानेवाले प्रेम को जाने l इसलिए हममें से प्रत्येक को इस प्रश्न का उत्तर देना ही होगा, “आप के लिए यीशु कौन है?”

हमारा आवरण

मसीह में विश्वास के विषय संवाद करते समय, हम कभी-कभी शब्दों का उपयोग बगैर समझ और बिना समझाए करते हैं l उनमें से एक शब्द धर्मी  है l हम कहते हैं कि परमेश्वर में धार्मिकता  है और कि वह लोगों को धर्मी  बनाता है, किन्तु यह विचार समझने में कठिन है l

चीनी भाषा में जिस तरह शब्द धार्मिकता  लिखी हुई है सहायक है l यह दो शब्दों का मेल है l उपरी शब्द है भेड़ l नीचला शब्द है मुझे  l भेड़ ढांकता है या व्यक्ति के ऊपर है l

यीशु के इस संसार में आने के बाद यूहन्ना बप्तिस्मादाता ने उसे “परमेश्वर का मेमना,’ पुकारा “ जो जगत का पाप उठा ले जाता है” (यूहन्ना 1:29) l हमारे पापों को जाना ही होगा क्योंकि यह हमें सिद्ध और सही परमेश्वर से अलग करता है l क्योंकि उसका प्रेम हमारे लिए अत्याधिक है, परमेश्वर ने अपने पुत्र यीशु को “जो पाप से अज्ञात था, उसी को उसने हमारे लिए पाप ठहराया कि हम उसमें होकर परमेश्वर की धार्मिकता बन जाएं” (2 कुरिं.5:21) l

मेमना यीशु, ने खुद को बलिदान करके अपना लहू बहाया l वह हमारा “बचाव” बना l वह हमें धर्मी बनाता है, जो हमें परमेश्वर के साथ सही सम्बन्ध में पहुंचाता है l

परमेश्वर के साथ सही होना उसकी ओर से उपहार है l मेमना यीशु, हमें ढंकने का परमेश्वर का तरीका है l

सुख का दूसरा पहलु

हमारे व्यस्क कैंप की विषय-वस्तु थी, “मेरे लोगों को सुख दें l” सभी उपदेशकों ने आश्वास किया l किन्तु अंतिम उपदेशक का स्वर कठोर था l उन्होंने यिर्मयाह 7:1-11 से कहा  “नींद से जागें l” उन्होंने स्पष्टता और प्रेम से, नींद से जागकर  पाप से फिरने की चुनौती दी l

उन्होंने नबी यिर्मयाह समान नसीहत दी, “परमेश्वर के अनुग्रह के पीछे न छिपें और गुप्त पाप छोड़ें l” “हम गर्व करते हैं, ‘मैं मसीही हूँ; परमेश्वर मुझसे प्रेम करता है; मैं बुराई से डरता नहीं,’ फिर भी हम बुराईयाँ करते हैं l”

हमें ज्ञात था वह हमारे विषय चिंतित था, फिर भी हम उसकी घोषणा से अपनी सीटों पर बेचैन थे, “परमेश्वर प्रेमी और भस्म करनेवाली आग भी है! (देखें इब्रा. 2:29) l वह पाप को माफ़ नहीं करेगा!”

प्राचीन यिर्मयाह लोगों को घबरा किया, “तुम जो चोरी, हत्या और व्यभिचार करते, झूठी शपथ खाते ...दूसरे देवताओं के पीछे ... चलते हो, तो क्या यह उचित है कि तुम इस भवन में आओ जो मेरा कहलाता है, और मेरे सामने ... कहो, ‘हम छूट गए हैं,’ कि ये सब घृणित काम करें?” (7:9-10) l

इस उपदेशक का किस्म “मेरे लोगों को सुख दें” परमेश्वर के सुख का दूसरा पहलु था l जैसे एक कड़वी  औषधि मलेरिया ठीक करती है, उसके शब्द आत्मिक स्वास्थ्य देनेवाले थे l कठोर शब्द सुनते समय, मुहं न फेरकर, उसके स्वास्थ्यवर्धक प्रभाव को अपनाएं l

अल्प निद्रा

एक अन्य युग के स्कॉटलैंड के पास्टर, हेनरी दर्बनविले, स्कॉटलैंड के एक सुदूर इलाके में रहनेवाली अपनी ही कलीसिया की एक वृद्ध महिला के विषय बताते हैं l वह एडिनबर्ग शहर देखना चाहती थी, किन्तु उस लम्बे, अँधेरे  सुरंग से भय खाती थी जिसमें से होकर ट्रेन जाती थी l  

एक दिन, हालाँकि, अवस्था ने उसे एडिनबर्ग जाने को मजबूर किया, और ट्रेन तेज गति से शहर की ओर चली जिससे उसकी घबराहट बढ़ गई l किन्तु ट्रेन के सुरंग में पहुँचने से पूर्व उसकी आँख लग गई और वह गहरी नींद में सो गई l जागने पर उसने खुद को शहर में पाया!

यह संभव है कि हम सब मृत्यु का अनुभव नहीं करेंगे l यीशु के लौटने पर यदि हम जीवित रहेंगे, हम “हवा में प्रभु से [मिलेंगे]” (1 थिस्स. 4:13-18) l किन्तु हममें से अनेक मृत्यु द्वारा प्रभु से मिलेंगे और यह विचार बहुत घबराहट पैदा करती है l हमारी चिंता है कि मृत्यु की प्रक्रिया सहना बहुत कठिन है l

अपने उद्धारकर्ता यीशु के आश्वासन द्वारा हमें भरोसा है कि पृथ्वी पर अपनी आँखें बंद करके मृत्यु से गुजरने पर हम परमेश्वर की उपस्थिति में अपनी आँखें खोलेंगे l “हमारी अल्प निद्रा पश्चात हम अनंत में जागेंगे,” जॉन डॉन कहते हैं l

ज्योति में रहना

अंधकारमय सुबह, आसमान में स्टील के रंग के बादल, वातावरण अँधेरा होने के कारण मुझे पुस्तक पढ़ने के लिए बत्ती जलानी पड़ी l मेरे कमरे में आराम करने आया ही था जब कमरा प्रकाशित हो गया l मैंने देखा कि हवा बादलों को पूरब की ओर उड़ा ले जा रही थी, आकाश साफ़ हो रहा था और सूरज दिखाई देने लगा था l

जब मैं यह दृश्य देखने खिड़की तक गया, एक विचार आया : “अन्धकार मिटता जाता है और सत्य की ज्योति अब चमकने लगी है” (1 यूहन्ना 2:8) l प्रेरित यूहन्ना ने विश्वासियों को प्रोत्साहित करने हेतु ये शब्द लिखे l वह आगे कहता है, “जो कोई अपने भाई से प्रेम रखता है वह ज्योति में रहता है, और ठोकर नहीं खा सकता” (पद.10) l तुलनात्मक रूप से, उसने घृणा करने वालों की तुलना अँधेरे में चलनेवालों से किया l घृणा दिशा भ्रमित करता है; वह हमारी नैतिक दिशा बोध छीन लेता है l

लोगों से प्रेम करना सरल नहीं है l किन्तु खिड़की से देखते हुए मैंने निराशा, क्षमा, और विश्वासयोग्यता को परमेश्वर के प्रेम और ज्योति में बने रहने का परिणाम महसूस किया l घृणा के बदले प्रेम का चुनाव करके, हम उसके साथ अपने सम्बन्ध दर्शाते हैं और अपने चारों ओर के संसार तक उसका प्रकाश चमकाते हैं l “परमेश्वर ज्योति है और उसमें कुछ भी अन्धकार नहीं” (1 यूहन्ना 1:5) l

शुभ सन्देश!

विश्व समाचार इन्टरनेट, टेलीविजन, रेडियो, और मोबाइल से हम पर बौछार करते हैं l  अधिकतर गलत बातें बतातीं हैं-अपराध, आतंकवाद, युद्ध और आर्थिक समस्याएँ l फिर भी कभी-कभी सुसमाचार हमारे दुःख और निराशा के अंधकारमय समय में प्रवेश करता है-स्वार्थहीन कार्यों की कहानी, एक चिकित्सीय खोज, या युद्ध से बर्बाद स्थानों में शांति प्रयास l

बाइबिल के पुराने नियम में दो लोगों के शब्द लड़ाई से व्यथित लोगों के लिए बड़ी आशा लेकर आयी l

एक बेरहम और शक्तिशाली राष्ट्र पर परमेश्वर के भावी न्याय का वर्णन करके, नहूम कहता है, “देखो, पहाड़ों पर शुभसमाचार का सुनानेवाला और शांति का प्रचार करनेवाला आ रहा है!” (नहूम 1:15) l इस खबर ने क्रूरता से शोषित लोगों के लिए आशा लेकर आयी l

एक मिलताजुलता वाक्यांश यशायाह में है : “पहाड़ों पर उसके पाँव क्या ही सुहाने हैं जो शुभ समाचार लाता है, जो शांति की बातें सुनाता है और कल्याण का शुभ समाचार और उद्धार का सन्देश देता है” (यशा. 52:7) l

नहूम और यशायाह के भविष्यसूचक शब्दों की परिपूर्णता प्रथम क्रिसमस में हुई जब स्वर्गदूत ने चरवाहों से कहा, “मत डरो; क्योंकि देखो, मैं तुम्हें बड़े आनंद का सुसमाचार सुनाता हूँ जो सब लोगों के लिए होगा, कि आज दाऊद के नगर में तुम्हारे लिए एक उद्धारकर्ता जन्मा है, और यही मसीह प्रभु है” (लूका 2:10-11) l

हमारे दैनिक जीवनों में बोला गया सर्वोत्तम समाचार है-मसीह उद्धारकर्ता जन्मा है!

धन

अपनी जीविका के आरंभिक काल में मैंने अपनी नौकरी को उद्देश्य/मिशन माना, जिससे एक और कंपनी ने मेरे समक्ष खासा अच्छा वेतन वाला पद पेश किया l  इससे अवश्य ही परिवार लाभान्वित होता l किन्तु मैं एक नयी नौकरी नहीं तलाश रहा था, मैं वर्तमान कार्य से प्रेम करता था, जो एक बुलाहट बनती जा रही थी l

किन्तु वह पैसा . . .

शरीर से दुर्बल मेरे 70 वर्षीय पिता ने सटीक एवं स्पष्ट उत्तर दिया : “पैसे के विषय सोचों भी नहीं l तुम क्या करोगे?”

मैंने तुरंत निर्णय कर लिया l मेरे पसंदीदा कार्य को छोड़ने का कारण केवल पैसा होता! पिताजी, धन्यवाद l

यीशु ने अपने पहाड़ी उपदेश की शिक्षा का एक बड़ा हिस्सा पैसा और उसके प्रति हमारे लगाव पर केंद्रित किया l उसने हमसे धन इकट्ठा करने की बजाए “हमारी प्रतिदिन की रोटी” मांगने को कहा (मत्ती 6:11) l पृथ्वी पर धन इकट्ठा न करने की चेतावनी देकर पक्षियों और फूलों द्वारा बताया कि परमेश्वर अपनी सृष्टि की बहुत चिंता करता है (पद.19-31) l “पहले तुम परमेश्वर के राज्य और उसके धर्म की खोज करो,” यीशु ने कहा, “तो ये सब वस्तुएँ भी तुम्हें मिल जाएंगी” (पद.33) l

पैसा महत्वपूर्ण है l किन्तु हमारी निर्णय प्रक्रिया इसके ऊपर हो l कठिन समय और बड़े निर्णय अपने विश्वास को नए तरीकों से बढ़ाने के अवसर हैं. हमारा स्वर्गक पिता हमारी चिंता करता है l

अपनी प्रार्थना द्वारा परमेश्वर की सेवा

परमेश्वर अक्सर हमारी प्रार्थनाओं द्वारा अपने कार्य संपन्न करने का चुनाव करता है l ऐसे हम पाते हैं जब परमेश्वर ने एलिय्याह नबी से यह कहकर, “मैं भूमि पर मेंह बरसाऊंगा,” इस्राएल में साढ़े तीन वर्षों के अकाल को समाप्त करने की प्रतिज्ञा की (याकूब 5:17) l परमेश्वर द्वारा वर्षा की प्रतिज्ञा करने के बावजूद, कुछ समय बाद “एलिय्याह कर्मेल की चोटी पर चढ़ गया, और भूमि पर गिरकर अपना मुँह घुटनों के बीच [करके]”-वर्षा के लिए साभिप्राय प्रार्थना किया (1 राजा 18:42) l तब, प्रार्थना करते हुए, एलिय्याह ने “सात बार” अपने सेवक को समुद्र की ओर वर्षा के आने का संकेत देखने के लिए भेजा (पद.43) l

एलिय्याह समझ गया था कि परमेश्वर चाहता है कि हम दीन, और निरंतर प्रार्थना के द्वारा उसके कार्य में संलग्न हों l हमारे मानवीय सीमाओं के बावजूद, परमेश्वर हमारी प्रार्थनाओं द्वारा आश्चर्यजनक कार्य करता है l इसलिए याकूब की पत्री हमें ताकीद देते हुए कि “एलिय्याह हमारे सामान दुःख-सुख भोगी मनुष्य था” हमसे कहती है कि “धर्मी जन की प्रार्थना के प्रभाव से बहुत कुछ हो सकता है” (याकूब 5:16-17) l

जब हम एलिय्याह की तरह विश्वासयोग्य प्रार्थना द्वारा परमेश्वर की सेवा करने का लक्ष्य बना लेते हैं, हम एक खुबसूरत अवसर के हिस्से हैं-जब परमेश्वर हमारे द्वारा किसी समय आश्चर्यकर्म कर सकता है l