निस्सारता आग के हवाले
1497 के फरवरी में, गिरोलामा सेवोनारोला नाम के एक भिक्षु/सन्यासी ने एक आग आरंभ की l इस बात को आगे बढ़ाते हुए, वह और उसके शिष्यों ने ऐसी वस्तुएं इकठ्ठा किये जो शायद लोगों को पाप करने की ओर आकर्षित कर सकते हैं या जिससे उनके धार्मिक कर्तव्यों को पूरा करने में लापरवाही हो सकती थी – जिसमें कलाकृतियाँ, सौन्दर्य प्रसाधन, वाद्ययंत्र, और वस्त्र सम्मिलित थे l नियुक्त दिन में, निस्सारता सम्बंधित हज़ारों सामग्रियां इटली के फ्लोरेंस शहर में एक सार्वजनिक चौराहे में इकट्ठी करके उनको आग के हवाले कर दी गयी l इस घटना को निस्सारता(Vanity) का अलाव/उत्त्सवाग्नि संबोधित किया गया l
संभवतः सेवोनारोला ने पहाड़ी उपदेश के चकित करनेवाले कुछ एक कथनों में अपने कठोर कार्यों के लिए प्रेरणा खोजी हो l “यदि तेरी दाहिनी आँख तुझे ठोकर खिलाए, तो उसे निकालकर फेंक दे,” यीशु ने कहा, [और] “यदि तेरा दाहिना हाथ तुझे ठोकर खिलाए, तो उस को काटकर फेंक दे” (मत्ती 5:29-30) l परन्तु यदि हम यीशु के शब्दों की शब्दशः व्याख्या करते हैं, हम उपदेश के मुख्य बिंदु से चूक जाते हैं l यह पूरा उपदेश सतह से गहरे में जाने के विषय है, बाहरी विकर्षण और परीक्षाओं पर अपने व्यवहार को दोष देने की अपेक्षा अपने हृदयों की दशा पर केन्द्रित होना l
निस्सारता(Vanity) का अलाव/उत्त्सवाग्नि ने वस्तुओं और कलाकृतियों को नष्ट करने का एक बड़ा दिखावा था, परन्तु यह असम्भाव्य है कि इस प्रक्रिया में उसमें शामिल लोगों के हृदय बदले हों l केवल परमेश्वर ही किसी हृदय को बदल सकता है l इसीलिए भजनकार की प्रार्थना थी, “हे परमेश्वर, मेरे अन्दर शुद्ध मन उत्पन्न कर” (भजन 51:10) l यह हमारा हृदय ही है जो महत्वपूर्ण है l
आनंद के साथ खेलना
मेरा एक बेटा ब्रायन, हाई स्कूल बास्केटबॉल कोच है l एक साल, जब उसकी टीम वाशिंगटन स्टेट बास्केटबॉल टूर्नामेंट के दौरान बॉल को आगे की तरफ ले जाने की कोशिश कर थी, शहर के नेक-नियत लोगों ने पूछा, “क्या तुम लोग पूरे वर्ष जीतोगे?” दोनों ओर के खेलाड़ी और कोच तनावग्रस्त हो गए, इसलिए ब्रायन ने एक आदर्श-वाक्य(motto) अपना लिया : “आनंद के साथ खेलें!”
मैंने इफिसुस के प्राचीनों से कहे गए पौलुस के शब्दों पर विचार किया : “कि मैं अपनी दौड़ को [प्रेम के साथ] पूरी करूँ” (प्रेरितों 20:24) उसका लक्ष्य उस सेवा कार्य को पूरी करना था जिसे यीशु ने उसे दिया था l मैंने इन शब्दों को अपना आदर्श वाक्य और अपनी प्रार्थना बना ली है : “मैं भी अपनी दौड़ को आनंद के साथ पूरी कर सकूँ l” या जिस प्रकार ब्रायन कहता है, “मैं भी आनंद के साथ खेल सकूँ!” और बहरहाल, ब्रायन की टीम ने उस वर्ष स्टेट चैंपियनशिप जीत ली l
हममें से हर एक के पास चिड़चिड़ा होने के लिए सारे अच्छे कारण हैं : संसार की खबरें, दैनिक तनाव, स्वास्थ्य समस्याएँ l तिस पर भी, यदि हम उससे मांगते हैं, परमेश्वर हमें ऐसा आनंद दे सकता है जो इन परिस्थितियों से आगे जाती है l हम उसे पा सकते हैं जिसे यीशु ने कहा, “मेरा आनंद” (यूहन्ना 15:11) l
आनंद यीशु की आत्मा का फल है (गलातियों 5:22) l इसलिए हम प्रति भोर याद से उससे सहायता मांगे : “मैं आनंद से खेल सकूँ!” लेखक रिचर्ड फोस्टर ने कहा, “प्रार्थना करना बदलना है l यह महान अनुग्रह है l परमेश्वर कितना भला है जो एक मार्ग बनाता है जहाँ आनंद हमारे जीवन पर अधिकार कर लेता है l
प्रभु आनंद होता है
अभी हाल ही में मेरी नानी ने मुझे ढेर सारी पुरानी तस्वीरें भेजीं, और जब मैं उनको देख रही थी, एक ने मेरा ध्यान खींच लिया l उसमें, मैं दो वर्ष की हूँ, और मैं चूल्हे के पास बैठी हुयी हूँ l दूसरी ओर, मेरे पिता मेरी माँ के कंधे पर हाथ रखे हुए हैं l दोनों प्रेम और आनंद भाव से मुझे निहार रहे हैं l
मैंने इस तस्वीर को अपने कपड़े की आलमारी पर लगा दिया, जहाँ मैं इसे प्रतिदिन सुबह देखती हूँ l यह उनका मुझसे प्रेम करने की अच्छी ताकीद है l यद्यपि, सच्चाई यह है, कि अच्छे माता-पिता का प्रेम भी अधूरा है l मैंने इस तस्वीर को सुरक्षित किया क्योंकि यह मुझे याद दिलाता है कि यद्यपि मानव प्रेम कभी-कभी चूक जाता है, परमेश्वर का प्रेम कभी नहीं चूकता है – और वचन अनुसार, परमेश्वर मुझे उसी तरह निहार रहा है जैसे मेरे माता-पिता इस तस्वीर में मुझे निहार रहे हैं l
नबी सपन्याह इस प्रेम का वर्णन इस प्रकार करता है जो मुझे चकित करता है l वह वर्णन करता है कि परमेश्वर गाता हुआ अपने लोगों के लिए मगन होता है l परमेश्वर के लोग इस प्रेम को अर्जित नहीं किये थे l वे अवज्ञाकारी थे या परस्पर करुणा से व्यवहार नहीं किये थे l किन्तु सपन्याह ने प्रतिज्ञा दी कि अंत में, परमेश्वर का प्रेम उनकी हार से अधिक महत्वपूर्ण होगा l परमेश्वर उनके दंड को क्षमा करेगा (सपन्याह 3:15), और वह उनके लिए आनंदित होगा (पद.17) l वह अपने लोगों को अपनी बाहों में इकठ्ठा करेगा, उनको घर लौटा लाएगा, और उनको पुनर्स्थापित करेगा l
प्रति भोर विचार करने योग्य यही प्रेम है l
लुका छुपी
“वह मुझे ढूँढ लेगा,” मैंने सोचा l मेरा छोटा दिल और तेजी से धड़कने लगा जब मैंने अपने निकट अपने पांच वर्षीय चचेरे भाई के क़दमों की आवाज़ सुनी l वह निकट आ रहा था l केवल पांच कदम दूर l तीन l दो l “मैंने तुम्हें ढूढ़ लिया!”
लुका छुपी l हममें से बहुतों के पास बचपन के इस खेल की स्नेही यादें हैं l फिर भी जीवन में किसी समय ढूढ़ लिए जाने का भय खेल नहीं है परन्तु भाग जाने के गहरे सहजज्ञान में है l लोग जो देखेंगे उसे पसंद नहीं करेंगे l
पतित संसार के बच्चे होने के कारण, हम वह करने के लिए प्रवृत हैं जिसे मेरा मित्र इस तरह कहता है, परमेश्वर और हमारे बीच में “लुका छुपी का उलझा हुआ एक खेल l” यह बहुत हद तक छिपने का बहाना करने वाले खेल की तरह है – क्योंकि दोनों ओर से ही है l वह पूर्ण रूप से हमारे मैले विचार और गलत निर्णयों के आर पार देखता है l हम जानते हैं, यद्यपि हम बहाना बनाना चाहते हैं कि वह वास्तव में हमें नहीं देख सकता है l
फिर भी परमेश्वर निरंतर ढूढ़ता रहता है l वह हमें आवाज़ देता है, “बाहर आ जाओ l मैं तुम्हें देखना चाहता हूँ, तुम्हारे जीवन के सबसे लज्जाजनक हिस्से भी” – उसी आवाज़ की प्रतिध्वनि जिसने उस पहले मानव को पुकारा था जो भय के कारण छिप गया था : “तू कहाँ है?” (उत्पत्ति 3:9) l इस प्रकार का निमन्त्रण जो एक चुभनेवाले प्रश्न के रूप में बोला गया l मेरे बेटे/मेरी बेटी, “छुपे हुए स्थान से निकल आओ, और वापस मेरे साथ सम्बन्ध बना लो l”
यह बहुत हद तक जोखिम भरा हो सकता है, और बेतुका भी l परन्तु वहाँ पर, हमारे पिता की देखभाल के सुरक्षित स्थान में, हममें से कोई भी, चाहे हम जो भी किए हों या नहीं कर पाए हों, उसके द्वारा पूर्ण रूप से जाने जा सकते हैं और प्रेम किये जा सकते हैं l
ईर्ष्या का अंत
लोकप्रिय फ़्रांसिसी कलाकार एडगर दिगास अपने बैले नर्तकियों(ballerinas) के पेंटिंग के लिए विश्व भर में याद किए जाते हैं l उन्होंने अपने मित्र एवं कलात्मक विरोधी एडौर्ड मेनेट, एक और माहिर पेंटर के प्रति जो इर्ष्या प्रगट की वह कम प्रगट है l एडगर मेनेट के विषय कहते हैं, “जो कुछ वह करता है हमेशा ही तुरंत आरंभ कर देता है, जबकि मैं बेहद कोशिश करता हूँ और उसके बाद भी सही नहीं कर पाता हूँ l”
ईर्ष्या, एक विचित्र भाव है – जिसे प्रेरित पौलुस ने सबसे खराब लक्षणों की सूची में रखा है, “सब प्रकार के अधर्म, और दुष्टता, और लोभ, और वैरभाव और डाह, और हत्या, और झगड़े, और छल, और ईर्ष्या . . . और चुगलखो[री]” (रोमियों 1:29) l पौलुस लिखता है कि यह मूर्खतापूर्ण सोच का परिणाम है – परमेश्वर के स्थान पर मूर्तियों की उपासना करने का परिणाम (पद.28) l
लेखिका ख्रिसटीना फॉक्स कहती हैं कि जब विश्वासियों के मध्य ईर्ष्या बढ़ती है, यह इसलिए है “क्योंकि हमारे हृदय हमारे एकमात्र सच्चे प्रेम से फिर गए हैं l” उसने कहा, “हमारी ईर्ष्या में हम यीशु की ओर देखने के बजाए इस संसार के घटिया सुख के पीछे भाग रहे होते हैं l परिणाम, हम भूल गए हैं हम किसके हैं l”
फिर भी एक समाधान है l परमेश्वर की ओर लौट जाएँ l पौलुस ने लिखा, “अपने अंगों को . . . परमेश्वर को सौंपों” (रोमियों 6:13) – विशेषकर अपने कार्य और जीवन l अपने एक अन्य पत्री में पौलुस ने लिखा, “पर हर एक अपने ही काम को जांच ले, और तब दूसरे के विषय में नहीं परन्तु अपने ही विषय में उसको घमण्ड करने का अवसर होगा” (गलतियों 6:4) l
परमेश्वर की आशीष के लिए धन्यवाद – केवल वस्तुएं नहीं, परन्तु उसके अनुग्रह की स्वतंत्रता के लिए l परमेश्वर द्वारा दिए गए अपने दानों को देखते हुए, हम पुनः संतोष प्राप्त करते हैं l
आंधी में उपस्थित
हमारे चर्च के छः लोगों के एक परिवार के घर में भयानक आग लग गयी l यद्यपि पिता और पुत्र बच गए, पिता अभी भी अस्पताल में भर्ती थे जबकि उसकी पत्नी, माँ, और दो छोटे बच्चों की मृत्यु हो गयी l दुर्भाग्यवश, इस प्रकार की दिल दहला देनेवाली घटनाएं बार-बार होती रहती हैं l जब उनकी पुनरावृति होती है, उसी तरह वह पुराना प्रश्न भी है : अच्छे लोगों के साथ बुरी बातें क्यों होती हैं? और यह हमें चकित नहीं करता कि इस पुराने प्रश्न के नए उत्तर नहीं हैं l
फिर भी भजन 46 में भजनकार द्वारा बताया गया सच दोहराया गया है और उसका अभ्यास किया गया है और बार-बार अपनाया गया है l “परमेश्वर हमारा शरणस्थान और बल है, संकट में अति सहज से मिलनेवाला सहायक” (पद.1) l पद. 2-3 में वर्णित स्थिति विनाशकारी है – पृथ्वी और पहाड़ का समुद्र में डाल दिया जाना और समुद्र का गर्जना l जब हम आंधी में घिरे होने की कल्पना करते हैं हम भयभीत होते हैं जिसका वर्णन यहाँ पर काव्यात्मक रूप से किया गया है l किन्तु कभी-कभी हम ज़रूर अपने को वहाँ पाते हैं – लाइलाज बीमारी की बढ़ती पीड़ा में, विनाशकारी आर्थिक संकट के द्वारा उछाले जाने में, प्रिय लोगों की मृत्यु द्वारा आहत और निस्तब्ध l
परेशानियों की उपस्थिति का अर्थ परमेश्वर की अनुपस्थितीत है पर तर्क संगत व्याख्या करना प्रलोभक है l परन्तु वचन का सच ऐसे विचारों का विरोध करता है l “सेनाओं का यहोवा हमारे संग है; याकूब का परमेश्वर हमारा ऊंचा गढ़ है” (पद.7,11) l जब हमारी स्थितियां बर्दाश्त करने से बाहर होती है वह उपस्थित होता है, और हम उसके चरित्र में आराम पाते हैं : वह अच्छा, प्रेमी और विश्वासयोग्य है l
हमारी दुर्बलता में
यद्यपि ऐनी शीफ मिलर की मृत्यु 90 वर्ष की आयु में 1999 में हुयी, वह अकाल प्रसव के बाद सेप्टिसीमिया(खून का जहरीला हो जाना/blood poisoning) हो जाने और सभी इलाज के असफल होने के बाद लगभग 1942 में मर चुकी थी l जबकि उसी अस्पताल के एक मरीज़ ने अपने संपर्क में एक विज्ञानी के विषय बताया कि वह एक नयी चमकारिक औषधि पर कार्य कर रहा है l ऐनी के डॉक्टर ने सरकार से ऐनी को उसी दवा की एक छोटी खुराक देने के लिए जोर डाला l एक ही दिन में, उसका तापमान नार्मल हो गया था! पेनिसिलिन(औषधि) ने ऐनी का जीवन बचा लिया था l
पतन के समय से, समस्त मानव जाति पाप द्वारा लायी गयी विनाशक आत्मिक स्थिति का अनुभव कर रही है (रोमियों 5:12) l केवल यीशु की मृत्यु और पुनरुत्थान और पवित्र आत्मा की सामर्थ्य ही हमारी चंगाई को संभव बनाया है (8:1-2) l पवित्र आत्मा हमें इस पृथ्वी पर और परमेश्वर की उपस्थिति में अनंत के लिए बहुतायत के जीवन का आनंद लेने के योग्य बनाता है (पद.3-10) l “यदि उसी का आत्मा जिसने यीशु को मरे हुओं में से जिलाया, तुम में बसा हुआ है; तो जिसने मसीह को मरे हुओं में से जिलाया, वह तुम्हारी नश्वर देहों को भी अपने आत्मा के द्वारा जो तुम में बसा हुआ है, जिलाएगा” (पद.11) l
जब आपका पापी स्वभाव आपके अन्दर के जीवन को निचोड़ने की धमकी दे, अपने उद्धार के श्रोत, यीशु, की ओर देखें, और उसकी आत्मा की सामर्थ्य द्वारा सुदृढ़ बनें (पद.11-17) l “आत्मा . . . हमारी निर्बलता में सहायता करता है” और “ हमारे लिए विनती करता है” (पद.26-27) l
खलनायकों को बचाना
कॉमिक पुस्तक का नायक(हीरो) हमेशा ही लोकप्रिय रहा है l केवल 2017 में ही, छः सुपरहीरो फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस बिक्री में $4 बिलियन(ख़रब) अमरीकी डॉलर कमाए l परन्तु लोग क्यों बड़े एक्शन फिल्मों की ओर आकर्षित होते हैं?
शायद इसलिए क्योंकि, कुछ हद तक, ऐसी कहानियाँ परमेश्वर की बड़ी कहानी के समान दिखाई देती हैं l एक नायक(हीरो) है, एक खलनायक(villain) है, लोग जिन्हें बचाना ज़रूरी है, और ढेर सारे दिलचस्प एक्शन l
इस कहानी में, सबसे बड़ा खलनायक शैतान है, हमारी आत्माओं का शत्रु l परन्तु इसके साथ और ढेर सारे “छोटे” खलनायक भी हैं l उदाहरण के लिए, दानिय्येल की पुस्तक में, एक नबूकदनेस्सर है, उस समय के ज्ञात संसार का राजा, जिसने ऐसे हर एक को मारने का निर्णय लिया जो उसकी विशाल मूर्ति को दंडवत नहीं करता था (दानिय्येल 3:1-6) l जब तीन साहसी यहूदी अधिकारियों ने इनकार किया (पद.12-18), परमेश्वर ने नाटकीय रूप से उनको उस धधकती भट्टी से बचाया (पद.24-27) l
परन्तु एक आश्चर्जनक मोड़ में, हम इस खलनायक के हृदय को बदलते हुए देखते हैं l इस असाधारण धटना के प्रतिउत्तर में, नबूकदनेस्सर कहता है, “धन्य है शद्रक, मेशक, और अबेदनगो का परमेश्वर” (पद.28) l
परन्तु उसने परमेश्वर का अनादर करनेवाले किसी भी व्यक्ति को मारने की धमकी दी (पद.29), नहीं समझते हुए कि परमेश्वर को उसकी सहायता नहीं चाहिए थी l नबूकदनेस्सर अध्याय 4 में और अधिक परमेश्वर के विषय सीखनेवाला था – परन्तु वह एक अलग कहानी है l
जो हम नबूकदनेस्सर में देखते हैं वह केवल एक खलनायक नहीं है, परन्तु आत्मिक यात्रा में एक व्यक्ति l परमेश्वर के उद्धार की कहानी में, हमारा नायक(हीरो) यीशु, हर एक के पास पहुँचता है जिसे बचाव की ज़रूरत है – जिसमें हमारे बीच के खलनायक भी सम्मिलित हैं l
यष्टि-चित्र(stick-figure) से सीख
मेरी एक सहेली – ठीक है, वह मेरी परामशदाता थी – ने एक कागज़ पर यष्टि चित्र(stick-figure) बनाया l उसने उसे निजी “व्यक्तित्व” संबोधित किया l उसके बाद उसने उस चित्र के चारोंओर रेखा खिंची, करीब आधा इंच बड़ा, और उसे “सार्वजनिक” व्यक्तित्व संबोधित किया l इन दोनों चित्रों में अंतर, निजी व्यक्तित्व और सार्वजनिक व्यक्तित्व, उस सीमा को दर्शाता है जिसमें हमारे पास ईमानदारी है l
मैं उनके पाठ पर विचार करके आश्चर्यचकित हुयी, क्या मैं सार्वजनिक रूप से वह व्यक्ति हूँ जो मैं व्यक्तिगत तौर से हूँ? क्या मैं ईमानदार हूँ?
पौलुस ने कुरिन्थुस की कलीसिया को पत्र लिखा, यीशु के समान बनने के लिए अपनी शिक्षा में प्रेम और अनुशासन को मिला दिया l जब वह इस पत्री(2 कुरिन्थियों) के अंत में पहुँचा, उसने दोष लगानेवालों को जिन्होनें उसकी सत्यता को चुनौती दी थी यह कहते हुए संबोधित किया कि वह अपने पत्रियों में दृढ़ था परन्तु व्यक्तित्व में निर्बल (10:10) l इन आलोचकों ने अपने श्रोताओं से धन प्राप्त करने के लिए व्यवसायिक भाषणबाज़ी का उपयोग किया l जबकि पौलुस के पास शैक्षणिक कौशल था, वह निष्कपटता और सादगी से बोलता था l “मेरे वचन, और मेरे प्रचार में ज्ञान की लुभानेवाली वातें नहीं,” उसने पहले की एक पत्री में लिखा था, “परन्तु [उसमें] आत्मा और सामर्थ्य का प्रमाण था” (1 कुरिन्थियों 2:4) l बाद की उसकी पत्री ने उसकी ईमानदारी को उजागर किया : “जो ऐसा कहता है, वह यह समझ रखे कि जैसे पीठ पीछे पत्रियों में हमारे वचन हैं, वैसे ही तुम्हारे सामने हमारे काम भी होंगे” (2 कुरिन्थियों 10:11) l
पौलुस ने अपने को सार्वजनिक रूप में और व्यक्तिगत रूप में एक सा दर्शाया l हमारे विषय क्या है?