आशा पुनःस्थापित
क्या सूर्य पूरब में उदय होता है? क्या आकाश नीला है? क्या समुद्र नमकीन है? क्या कोबाल्ट(धातु) का एटॉमिक वजन 58.9 है? वाकई, उस अंतिम प्रश्न का उत्तर आप तभी जानेंगे यदि आप विज्ञान में दिलचस्पी लेते हैं या ऊपरी तौर से विवरण में दिलचस्पी लेते हैं, किन्तु उन दूसरे प्रश्नों के उत्तर स्वाभाविक हैं : वाकई l वास्तव में, इस प्रकार के प्रश्नों में आमतौर पर कटाक्ष की झलक मिली होती है l
यदि हम सावधान नहीं हैं, हमारे आधुनिक – कभी-कभी कलांत – कान उस अशक्त व्यक्ति के प्रति यीशु के प्रश्न में कटाक्ष का अंश सुन सकते हैं : “क्या तू चंगा होना चाहता है?” (यूहन्ना 5:6) l स्वाभाविक उत्तर प्रतीत हो सकता है, “क्या आप मेरे साथ मज़ाक कर रहे हैं?! मैं अड़तीस वर्षों से सहायता का इंतज़ार कर रहा हूँ!” किन्तु यहाँ पर कटाक्ष उपस्थित नहीं है, यह सच्चाई से सबसे दूर की बात है l यीशु के शब्द सदैव करुणा से भरे होते हैं, और उसके प्रश्न हमेशा हमारी भलाई के लिए होते हैं l
यीशु जानता था कि वह व्यक्ति चंगा होना चाहता था l उसे यह भी ज्ञात था कि संभवत: एक लम्बा अरसा बीतने के बाद भी किसी ने देखभाल की पेशकश नहीं की थी l दिव्य आश्चर्यक्रम के पहले, यीशु की इच्छा उसमें आशा को पुनःस्थापित करनी थी जो ठण्डी हो चुकी थी l उसने ऐसा अपेक्षाकृत प्रश्न पूछने के द्वारा किया, और उसके बाद उसे प्रतिउत्तर देने के तरीके बताकर : “उठ, अपनी खाट उठा, और चल फिर” (पद.8) l हम उस अशक्त व्यक्ति की तरह हैं, हममे से हर एक अपने जीवनों में ऐसे स्थानों पर हैं जहां आशा मुर्झा चुकी है l वह हमें देखता है और करुणा के साथ उस आशा में पुनः विश्वास करने और उसमें विश्वास करने के लिए नेवता देता है l
क्या आप वहाँ हैं?
जब माइकल की पत्नी को मरणान्तक बीमारी(Terminal illness) हो गयी, उसकी इच्छा हुयी कि वह भी उस शांति का अनुभव करे जो परमेश्वर के साथ सम्बन्ध रखने के द्वारा उसके पास थी l उसने उसके साथ अपना विश्वास साझा किया था, किन्तु उसमें रूचि नहीं थी l एक दिन, जब वह स्थानीय बुकस्टोर में गया, एक पुस्तक ने उसे अपनी ओर आकर्षित की, परमेश्वर, क्या आप वहाँ हैं? अनिश्चित कि इस पुस्तक के प्रति उसकी पत्नी का रवैया क्या रहेगा, पुस्तक खरीदने से पहले कई बार उसने दूकान के अन्दर बाहर आना जाना किया l वह चकित हुआ, उसकी पत्नी ने पुस्तक स्वीकार कर लिया l
उस पुस्तक ने उसे स्पर्श किया, और वह बाइबल भी पढ़ने लगी l दो सप्ताह बाद, माइकल की पत्नी गुज़र गयी – परमेश्वर के साथ शांति में और इस निश्चयता में कि वह उसे कभी नहीं त्यागेगा या छोड़ेगा l
जब परमेश्वर ने मूसा से अपने लोगों को मिस्र से निकलने के लिए बुलाया, उसने अपनी सामर्थ्य की प्रतिज्ञा नहीं दी l इसके बदले, उसने अपनी उपस्थिति की प्रतिज्ञा दी : “मैं तेरे संग रहूँगा” (निर्गमन 3:12) l अपने क्रूसीकरण से पूर्व यीशु ने अपने शिष्यों से परमेश्वर की अनंत ऊपस्थिति की प्रतिज्ञा की, जो वे पवित्र आत्मा द्वारा प्राप्त करेंगे (यूहन्ना 15:26) l
अनेक चीजें हैं जो परमेश्वर जीवन की चुनौतियों में हमें मदद के लिए दे सकता था, जैसे भौतिक आराम, चंगाई, या हमारी समस्याओं का त्वरित हल l कभी-कभी वह करता भी है l किन्तु खुद को देकर वह हमें सर्वोत्तम उपहार देता है l यह हमारे लिए महानतम सुख है : जीवन में जो भी हो, वह हमारे साथ रहेगा; वह हमें न छोड़ेगा और न त्यागेगा l
भस्म होना
अपनी पुस्तक, द कॉल, में ओस गिन्नेस उस क्षण का वर्णन करते हैं जब विंस्टन चर्चिल, दक्षिणी फ्रांस में अपने मित्रों के साथ छुट्टियों में, एक ठंडी रात खुद को गर्म करने के लिए आग के पास बैठ गए l आग को एक टक देखते हुए, पूर्व प्रधान मंत्री ने चीड़ के लट्ठो को “चटचटाहट, फुसफुसाहट, और खड़खड़ाहट की आवाज़ के साथ जलते हुए देखा l अचानक, उनकी परिचित आवाज़ में गर्जन थी, ‘मैं जानता हूँ लकड़ी के लट्ठे क्यों खड़खड़ाते हैं l भस्म होना क्या होता है मैं जानता हूँ l’”
कठिनाइयाँ, निराशा, ख़तरे, विपत्ति, और हमारी अपनी गलतियों के परिणाम सब हमें भस्म होने की तरह अहसास कराते हैं l परिस्थियां धीरे-धीरे हमारे हृदयों से आनंद और शांति छीन लेती हैं l जब दाऊद ने अपने ही पापी चुनावों के परिणाम को खुद पर पूरी तरह हावी होते देखा, उसने लिखा, “जब मैं चुप रहा तब दिन भर कराहते कराहते मेरी हड्डियां पिघल गईं . . . और मेरी तरावट धूपकाल की सी झुर्राहत बनती गयी” (भजन 32:3-4) l
ऐसे कठिन समय में, आप सहायता के लिए किस और मुड़ते हैं? पौलुस, जिसके अनुभव सेवकाई के बोझ और टूटेपन से भरे हुए थे, ने लिखा, “हम चारों ओर से क्लेश तो भोगते हैं, पर संकट में नहीं पड़ते; निरुपाय तो हैं, पर निराश नहीं होते; सताए तो जाते हैं, पर त्यागे नहीं जाते; गिराए तो जाते हैं, पर नष्ट नहीं होते” (2 कुरिन्थियों 4:8-9) l
यह किस तरह कार्य करता है? जब हम यीशु में विश्राम करते हैं, हमारा अच्छा चरवाहा मेरे जी में जी ले आता है (भजन 23:3) और हमारी यात्रा के अगले कदम के लिए हमें सामर्थ्य देता है l वह यात्रा के हर चरण में हमारा सहचर बनने की प्रतिज्ञा करता है (इब्रानियों 13:5) l
शांति से भरे हुए हृदय
एक व्यवसायिक एथलीट(खिलाड़ी) के रूप में उसकी आजीविका का अंत होने के बाद पैंतालिस वर्षों तक जेरी क्रेमर को उसके फेम ऑफ़ स्पोर्ट्स हॉल (सर्वोत्तम सम्मान) में प्रतिष्ठित होने नहीं दिया गया l उन्होंने अनेक उपाधियाँ और उपलब्धियों का आनंद उठाया, किन्तु यह उनके हाथ न लगा l यद्यपि उनको इस सम्मान के लिए दस बार नामित किया गया, यह उनको कभी नहीं प्रदान की गयी l अनेक बार उनकी आशा चूर होने का बावजूद, क्रेमर यह कहने में विनीत थे, “मैंने महसूस किया कि [नेशनल फूटबाल लीग] ने मुझे मेरे जीवनकाल में 100 उपहार दिए हैं और एक नहीं प्राप्त करने के विषय परेशान या क्रोधित होना बेवकूफी है!”
अनेक बार जब दूसरे खिलाड़ियों के पक्ष में निर्णय आने पर अन्य द्वेषपूर्ण महसूस कर सकते थे, क्रेमर कष्ट का अहसास नहीं किया l उसका आचरण उस मार्ग का वर्णन करता है जिससे हम अपने हृदयों को इर्ष्या, जिससे “हड्डियां भी जल जाती हैं” (नीतिवचन) के क्षयकारी स्वभाव से सुरक्षित कर सकते हैं l जब हम उन बातों में तल्लीन हो जाते हैं जो हमारे पास है ही नहीं – और उन अनेक चीजों को पहचानने से चूक जाते हैं जो हम करते हैं – परमेश्वर की शांति हमें नहीं मिलेगी l
ग्यारवीं बार नामित होने के बाद, आखिरकार फरवरी 2018 में जेरी क्रेमर को नेशनल फूटबाल लीग[NFL] के फेम ऑफ़ स्पोर्ट्स हॉल से सम्मानित किया गया l शायद हमारी सांसारिक अभिलाषाएँ पूरी न हों जैसे अंत में उसकी हुयी l फिर भी हम सब के पास “शांति से भरा हृदय” हो सकता है जब हम उसके स्थान पर उन अनेक चीजों पर ध्यान केन्द्रित करते हैं जिसके प्रति परमेश्वर हमारे साथ उदार रहा है l इसकी परवाह किये बिना कि हमें क्या चाहिए किन्तु हमारे पास है नहीं, हम हमेशा जीवनदायक शांति का आनंद ले सकते हैं जो वह हमारे जीवनों में देता है l
तराई से होकर
हे वू (उसका वास्तविक नाम नहीं) चीन की सीमा पार करने के जुर्म में उत्तर कोरिया के श्रम शिविर में कैद की गयी थी l उसने कहा, “क्रूर गार्ड दिन और रात यातना देते थे, कमरतोड़ मेहनत, और अत्यधिक ठंडे फर्श पर चूहों और चीलरों(lice) के साथ सोने के लिए अल्प समय देते थे l किन्तु प्रतिदिन परमेश्वर उसकी सहायता करने के साथ-साथ कैदियों से मित्रता करके उसे अपने विश्वास को साझा करने का अवसर भी देता था l
शिविर से रिहा होने के बाद दक्षिणी कोरिया में रहते हुए, वू शिविर के अपने कैद के समय पर विचार करके बोली कि भजन 23 उसके अनुभव का सार है l एक अँधेरी घाटी में होने के बावजूद, यीशु ही उसका चरवाहा था जिसने उसे शांति दी : “यद्यपि मैंने अपने को मृत्यु की छाया वाली वास्तविक घाटी में पाया, मैं किसी भी बात से डरी हुयी नहीं थी l परमेश्वर प्रतिदिन मुझे सहानुभूति देता था l” जब परमेश्वर उसे आश्वास्त करता था कि वह उसकी प्रिय बेटी थी उसने उसकी भलाई और प्रेम का अनुभव किया l “मैं एक भयंकर स्थान में थी, किन्तु मैं जानती थी . . . मैं परमेश्वर की भलाई और प्रेम का अनुभव करुँगी l” और उसे मालुम था वह हमेशा परमेश्वर की उपस्थिति में रहेगी l
हम वू की कहानी से प्रोत्साहित हो सकते हैं l उसकी खौफ़नाक स्थिति के बावजूद, उसने परमेश्वर के प्रेम एवं मार्गदर्शन को महसूस किया; और उसने उसे थामा और उसके भय को दूर कर दिया l यदि हम यीशु का अनुकरण करते हैं, वह हमारी परेशानी के समय कोमलता से हमारी अगुवाई करेगा l हमें डरने की ज़रूरत नहीं है, क्योंकि “[हम] यहोवा के धाम में सर्वदा वास [करेंगे]” (23:6) l
बताने के लिए सुसमाचार
“आपका नाम क्या है?” एक ईरानी विद्यार्थी, अरमान ने पूछा l जब मैंने उसे बताया मेरा नाम एस्टेरा है, उसका चेहरा चमक उठा जब वह चिल्लाया, “फ़ारसी में हमारे नाम मिलतेजुलते हैं, यह सेटारेल है!” उस छोटे संवाद ने एक आश्चर्यजनक बातचीत का द्वार खोल दिया l मैंने उसे बताया मेरा नाम एक बाइबल चरित्र, “एस्तेर,” फारस(आज का ईरान) में एक यहूदी रानी के नाम पर रखा गया था l उस कहानी से आरम्भ करके, मैंने यीशु का सुसमाचार सुना दिया l उस बातचीत के परिणामस्वरूप, अरमान मसीह के विषय और सीखने के लिए एक साप्ताहिक बाइबल अध्ययन में जाने लगा l
यीशु का एक अनुयायी, फिलिप्पुस, पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन में, रथ से यात्रा कर रहे इथियोपिया के अधिकारी से एक प्रश्न पूछकर संवाद आरंभ कर दिया : “तू जो पढ़ रहा है क्या उसे समझता भी है?” (प्रेरित 8:30) l वह इथियोपियाई व्यक्ति यशायाह की पुस्तक पढ़ते हुए आत्मिक अंतर्दृष्टि प्राप्त करना चाहता था l इसलिए फिलिप्पुस का प्रश्न सही समय पर पहुँचा l उसने फिलिप्पुस को अपने निकट बैठाया और दीनता से उसको सुना l फिलिप्पुस ने, उस अद्भुत अवसर को पहचानकर, “इसी शास्त्र से आरम्भ करके उसे यीशु का सुसमाचार सुनाया” (पद.35) l
फिलिप्पुस की तरह, हमें भी सुसमाचार बताना है l प्रतिदिन अपने कार्यस्थल पर, किसी जनरल स्टोर पर, अथवा अपने पड़ोस में उन अवसरों को न जाने दें जो हमें मिलते हैं l मसीह में हमारी आशा और आनंद साझा करने के लिए पवित्र आत्मा को हमारे क़दमों को मार्गदर्शित और हमें शब्द देने दें l
अनापेक्षित विजेता
शायद 2018 शरद् ओलंपिक में सबसे अद्भुत, मंत्रमुग्ध करने वाला क्षण वह था जब चेक गणराज्य की विश्व विजेता स्नोबोर्डेर(बर्फ की ढाल पर पट्टी पर खड़े होकर फिसलने वाली) एस्टर लेडेका ने बिलकुल भिन्न स्पोर्ट्[खेल-कूद] : स्कीइंग में जीत हासिल की l और उसने प्रथम-स्थान स्वर्ण पदक जीत लिया यद्यपि उसके पास स्कीइंग का अनभिलाषित 26वाँ स्थान था - उपलब्धि जिसे बुनियादी रूप से असंभव माना जाता है l
आश्चर्यजनक रूप से, लेडेका महिलाओं का सूपर-G दौड़ - एक प्रतियोगिता जिसमें ढलान पर स्की करने के साथ स्लालोम कोर्स(सर्पिलाकार रास्ते पर स्की दौड़) सम्मिलित होता है - के लिए अहर्ता प्राप्त कर ली l वह उधार ली हुयी स्की द्वारा एक सेकंड के 0.1 भाग से जीत गयी, वह उतनी ही चकित थी जितना मीडिया और दूसरे प्रतियोगी थे जिन्होंने किसी सर्वोत्तम स्की करनेवाला के विजेता होने का अनुमान लगाया था l
संसार इसी प्रकार कार्य करता है l हम विजेताओं के निरंतर जीतने का आंकलन लगाते हैं जबकि दूसरे सभी हारेंगे l उस समय भी वह एक झटका था, जब शिष्यों ने यीशु को कहते हुए सुना “धनवान का स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करना [कितना] कठिन है” मत्ती 19:२३) l यीशु ने सबकुछ उल्टा कर दिया l किस तरह धनवान (एक विजेता) होना रुकावट हो सकता है? प्रत्यक्ष रूप से, यदि हम उन चीजों में भरोसा करते हैं जो हमारे पास हैं (जो हम कर सकते हैं, जो हम हैं), तब यह न केवल कठिन परन्तु वास्तव में परमेश्वर पर भरोसा करना असंभव बना देता है l
परमेश्वर के राज्य में हमारे नियम कानून नहीं चलते हैं l यीशु कहते हैं, “बहुत से जो पहले हैं, पिछले होंगे; और जो पिछले हैं, पहले होंगे” (पद.30) l और, चाहे आप पहले हैं या अंतिम, हम सबकुछ केवल अनुग्रह से प्राप्त करते हैं-परमेश्वर की कृपा से जिसके लिए हमने कीमत नहीं चुकाई है l
परिवर्तन संभव है
शनिवार की दोपहर, हमारी कलीसिया के युवा समूह के कुछ सदस्य एक दूसरे से फिलिप्पियों 2:3-4 पर आधारित कुछ कठिन प्रश्न पूछने के लिए इकठ्ठा हुए l “विरोध या झूठी बड़ाई के लिए कुछ न करो, पर दीनता से एक दूसरे को अपने से अच्छा समझो l हर एक अपनी ही हित की नहीं, वरन् दूसरों के हित की भी चिंता करे l” कुछ एक कठिन प्रश्न जो शामिल थे : आप कितनी बार दूसरों में रूचि लेते हैं? क्या कोई आपको दीन या घमण्डी कहेगा? क्यों?
जब मैं सुन रही थी, मैं उनके ईमानदार उत्तर से उत्साहित हुयी l ये कीशोर सहमत थे कि अपनी गलतियों को स्वीकार करना सरल नहीं है, किन्तु इसे परिवर्तित करना कठिन है, अथवा-इस सम्बन्ध में-परिवर्तन की इच्छा l जिस प्रकार खेद के साथ एक किशोर बोला, “स्वार्थ मेरे खून में है l”
दूसरों की सहायता के लिए खुद पर से ध्यान हटाने की इच्छा हमारे अन्दर निवास करनेवाले यीशु की आत्मा द्वारा ही संभव है l इसी कारण से पौलुस ने फिलिप्पी की कलीसिया को उन बातों पर विचार करने की लिए याद दिलाया जो परमेश्वर ने किया था और उनके लिए संभव बना दिया था l उसने उनको दयालुता से गोद लिया था, उनको अपने प्रेम द्वारा आराम दिया था, और उनकी सहायता के लिए अपनी आत्मा दी थी (फिलिप्पियों 2:1-2) l किस तरह वे-और हम-इस अनुग्रह का प्रतिउत्तर दीनता से कुछ कम के द्वारा दे सकते हैं?
वाकई, हमारे परिवर्तन का कारण परमेश्वर ही है, और केवल वही हमें बदल सकता है l क्योंकि वह हमें “अपना प्रेमपूर्ण उद्देश्य पूरा करने के लिए . . . सद् इच्छा भी उत्पन्न करता और उसके अनुसार कार्य करने का बल भी प्रदान करता है” (पद.13 Hindi C.L.), हम खुद पर कम केन्द्रित होकर दीनता से दूसरों की सेवा कर सकते हैं l
असहनीय में भी जीवित
अनुभव प्रोजेक्ट, इक्कीसवीं सदी की एक सबसे बड़ी ऑनलाइन समुदाय, एक समय ऐसी साईट थी जिसपर बहुत बड़ी संख्या में लोगों ने अपनी गहरी पीड़ादायक प्रत्यक्ष अनुभवों को साझा किया l मर्मभेदी कहानियों को पढ़ते समय, मैंने विचार किया कि हमारे हृदय कितने बेसब्री से ऐसे किसी व्यक्ति के लिए लालायित होते हैं जो हमारा दर्द समझ ले l
उत्पत्ति में, एक युवा दासी की कहानी दर्शाती है कि यह उपहार कितना अधिक जीवनदायक हो सकता है l
हाजिरा एक दासी लड़की थी जिसे संभवतः मिस्र के फिरौन ने अब्राम को दी थी (देखें उत्पत्ति 12:16; 6:1) l जब अब्राम की पत्नी सारै गर्भवती न हो सकी, उसने अब्राम को हाजिरा से एक संतान उत्पन्न करने का आग्रह किया-उस काल का एक तकलीफ़देह अपितु सामान्य चलन l किन्तु जब हाजिरा गर्भवती हो गयी, तनाव बढ़ गया, जबतक कि हाजिरा सारै के दुर्व्यवहार से जंगल में न भाग गयी (16:1-6) l
किन्तु हाजिरा की कठिन परिस्थिति-एक कठोर, निर्मम मरुभूमि में गर्भवती और अकेले- दिव्य आँखों से भाग न सकी l एक स्वर्गिक दूत द्वारा हाजिरा को प्रोत्साहित करने के बाद (पद.7-12), उसने घोषणा की, “अत्ताएलरोई-तू सर्वदर्शी ईश्वर है” (पद.13) l
हाजिरा खाली तथ्यों से परे देखनेवाले परमेश्वर की स्तुति कर रही थी l वही परमेश्वर यीशु में प्रगट हुआ, जिसने, भीड़ को देखा तो उसको लोगों पर तरस आया, क्योंकि वे उन भेड़ों के समान . . . व्याकुल और भटके हुए से थे” (मत्ती 9:36) l हाजिरा का सामना एक ऐसे परमेश्वर से हुआ था जो समझ सकता था l
जिस परमेश्वर ने हाजिरा की पीड़ा को देखा और समझा हमारी भी समझता है (इब्रानियों 4:15-16) l स्वर्गिक परानुभूति का अनुभव असहनीय को थोड़ा अधिक सहनीय बनने में सहायता कर सकता है l