प्रभावित करने का प्रयत्न
जब एक कॉलेज की क्लास एक सांस्कृतिक भ्रमण पर गई, तो निर्देशक ने अपने एक सितारे विद्यार्थी को बिलकुल भी नहीं पहचाना। कक्षा में उसने अपनी पैंट के नीचे छ: इंच की एड़ी के जूते पहने हुए थे। परन्तु अपने वाकिंग बूट्स में वह पाँच फुट से भी कम लम्बी थी। “मेरी जूती की एड़ियाँ बिलकुल वैसी ही हैं, जैसी मैं होना चाहती हूँ,” उसने हँसकर बताया। “परन्तु मेरे बूट्स ठीक वैसे ही हैं, जैसी मैं वास्तव में हूँ।”
हमारी शारीरिक दिखावट यह नहीं बताती कि हम कौन हैं; यह हमारा हृदय ही है जो महत्वपूर्ण है। यीशु के उन लोगों के लिए बहुत ही कठोर शब्द थे जो दिखावे के गुरु कहलाते थे—अत्यधिक धार्मिक “फरीसी और व्यवस्था के शास्त्री।” उन्होंने यीशु से पूछा कि उसके शिष्य भोजन से पहले हाथ क्यों नहीं धोते हैं, जैसा उनकी धार्मिक परम्पराएँ बताती हैं (मत्ती 15:1-2)। यीशु ने पूछा, “तुम भी अपनी परम्पराओं के कारण क्यों परमेश्वर की आज्ञा टालते हो?” (पद 3)। फिर उसने बताया कि अपने माता-पिता की देखभाल करने के स्थान पर उन्होंने उनकी सम्पत्ति लेने के लिए किस प्रकार एक वैधानिक बचाव बना रखा है (पद 4-6), इस प्रकार वे अपने माता-पिता का अनादर करते और पाँचवीं आज्ञा का उल्लंघन करते हैं (निर्गमन 20:12)।
यदि हम अपने दिखावे से अभिभूत हैं और परमेश्वर की स्पष्ट आज्ञाओं में बच निकलने का रास्ता खोजते हैं, तो हम उसकी व्यवस्था के आत्मा का उल्लंघन कर रहे हैं। यीशु ने कहा कि “बुरे विचार, हत्या, परस्त्रीगमन, व्यभिचार, चोरी, झूठी गवाही और निन्दा मन ही से निकलती है (मत्ती 15:19)। केवल परमेश्वर, अपने पुत्र यीशु की धार्मिकता के द्वारा हमें एक साफ़ मन प्रदान कर सकता है।
सर्वदा परमेश्वर की एक सन्तान
कलीसिया की एक सभा के दौरान, जिसमें मैंने अपने माता-पिता के साथ भाग लिया, उस सभा के सामान्य अभ्यास के अनुसार प्रभु की प्रार्थना को एकसाथ बोलते हुए हम ने अपने हाथों को पकड़ा। जब मैं एक हाथ से अपनी माता और दूसरे हाथ से अपने पिता को पकड़े हुए थी, तो मेरे मन में एक विचार आया कि मैं सर्वदा उनकी बेटी रहूँगी। यद्यपि मैं पूरी तरह से मेरी मध्य आयु में हूँ, मुझे अभी भी “लियो और फिलिस की सन्तान” बुलाया जा सकता है। मैंने गौर किया कि मैं न केवल उनकी बेटी हूँ, परन्तु मैं सर्वदा परमेश्वर की भी सन्तान रहूँगी।
प्रेरित पौलुस रोम की कलीसिया के लोगों को समझाना चाहता था कि उनकी पहचान परमेश्वर के परिवार में गोद लिए हुए सदस्यों पर आधारित थी (रोमियों 8:15)। क्योंकि वे आत्मा से जन्में थे (पद 14), अब उन्हें उन बातों का और दास रहने की आवश्यकता नहीं है, जो वास्तव में महत्व नहीं रखती हैं। बल्कि, पवित्र आत्मा के उपहार के द्वारा, वे “परमेश्वर के वारिस और मसीह के संगी वारिस हैं” (पद 17)।
उन लोगों के लिए जो मसीह के पीछे चलते हैं, यह क्या अन्तर पैदा करता है? बिलकुल साधारण सी बात, यह हर प्रकार का अन्तर पैदा करता है! परमेश्वर की सन्तान के रूप में हमारी पहचान हमें बुनियाद उपलब्ध करवाती है और हम स्वयं और संसार को कैसे देखते हैं, इसकी दृष्टि प्रदान करती है। उदाहरण के लिए यह जानना कि हम परमेश्वर के परिवार का हिस्सा हैं हमें, जब हम उसके पीछे चलते हैं, अपने आराम से बाहर आने में सहायता करता है। हम दूसरों की सहमति खोजने से भी स्वतन्त्र हो जाते हैं।
आज, क्यों न हम इस बात पर मनन करें की परमेश्वर की सन्तान होने का क्या अर्थ है?
सृष्टि का गीत
ध्वनि सम्बन्धी खगोल विद्या प्रयोग करने के द्वारा वैज्ञानिक अन्तरिक्ष की ध्वनियों और स्पंदनों की निगरानी कर और उन्हें सुन सकते हैं। उन्होंने पाया है कि रात के रहस्यमय आकाश में सितारे चुपचाप चक्कर नहीं लगाते हैं, अपितु इसके स्थान पर संगीत पैदा करते हैं। जैसे हम्पबैक व्हेल्स ध्वनि उत्पन्न करती हैं, तारों की गूँज तरंग आयाम या आवृति में होती है, जिसे मानवीय कानों के द्वारा सुना नहीं जा सकता है। परन्तु सितारों और व्हेल और अन्य प्राणियों का संगीत एक सिम्फनी की रचना करते हैं, जो परमेश्वर की महानता का ब्यान करती है।
भजन संहिता 19:1-4 कहता है, “आकाश परमेश्वर की महिमा का वर्णन कर रहा है; और आकाशमण्डल उसकी हस्तकला को प्रगट कर रहा है। दिन से दिन बातें करता है, और रात को रात ज्ञान सिखाती है। न तो कोई बोली है और न कोई भाषा जहाँ उनका शब्द सुनाई नहीं देता है। उनका स्वर सारी पृथ्वी पर गूँज गया है, और उनके वचन जगत की छोर तक पहुँच गए हैं।”
नया नियम में, प्रेरित पौलुस प्रदर्शित करता है कि यीशु में “सारी वस्तुओं की सृष्टि हुई, स्वर्ग की हों अथवा पृथ्वी की, देखी या अनदेखी... सारी वस्तुएँ उसी के द्वारा और उसी के लिये सृजी गई हैं।” (कुलुस्सियों 1:16)। प्रत्युत्तर में, प्राकृतिक जगत की ऊंचाई और गहराई इसके सृष्टिकर्ता के लिए गाती है। परमेश्वर करे कि हम सृष्टि के साथ मिल जाएँ और उसकी महानता के लिए गाएँ जिसने “बित्ते से आकाश का नाप किया” (यशायाह 40:12)।
आप किस ओर जा रहे हैं?
जीवन में हमारी दिशा कौन निर्धारित करता है? एकबार मैंने एक आश्चर्यजनक स्थान: मोटरसाईकिल प्रशिक्षण कोर्स, पर इस प्रश्न का उत्तर सुना। मेरे कुछ मित्र और मैं मोटरसाईकिल चलाना चाहते थे, इसलिए यह सीखने के लिए कि यह कैसे करते हैं हम ने एक क्लास ली। हमारे प्रशिक्षण के एक हिस्से को लक्ष्य निर्धारित करना कहते थे।
“आखिरकार” हमारे निर्देशक ने कहा, “आप एक अनपेक्षित बाधा का सामना करोगे। यदि आप इसकी ओर देखते रहोगे-यदि तुम ने लक्ष्य निर्धारित किया है-तो तुम ठीक उसकी ओर जाओगे। परन्तु यदि आप ऊपर या इससे दूर देखोगे, जहाँ तुम्हें जाना है, तो तुम समान्यत: इससे बच सकते हो।” इसके बाद उसने कहा, “जिस दिशा की ओर आप देख रहे हो आप उसी ओर जाओगे।”
वह साधारण परन्तु प्रगाढ़ सिद्धांत हमारे आत्मिक जीवन पर भी लागू होता है। जब हम एक लक्ष्य को निर्धारित करते हैं-अपनी समस्याओं या संघर्षों पर केन्द्रित हो जाते हैं-तो हम अपने जीवनों को लगभग उन्हीं के चारों ओर घुमाते रहते हैं।
परन्तु पवित्रशास्त्र हमें अपनी कठिनाइयों से दूर उस व्यक्ति की ओर देखने के लिए प्रोत्साहित करता है, जो उनमें हमारी सहायता कर सकता है। भजन संहिता 121:1 में हम पढ़ते हैं, “मैं अपनी आँखें पर्वतों की ओर लगाऊंगा, मुझे सहायता कहाँ से मिलेगी?” फिर भजन संहिता उत्तर देती है: “मुझे सहायता यहोवा की ओर से मिलती है, जो आकाश और पृथ्वी का कर्ता है...यहोवा आने जाने में तेरी रक्षा अब से लेकर सदा तक करता रहेगा” (पद 2, 8)।
कई बार हमारी बाधाएँ अजेय प्रतीत होती हैं। परन्तु परमेश्वर हमें हमारी कठिनाइयों को हमारे नजरिये पर अधिकार रखने के स्थान पर उनसे दूर देखने में हमारी सहायता करने के लिए आमन्त्रित करता है।
प्रेम की सुन्दरता
“जाराब टपैटियो” जिसे मैक्सिको के हैट डांसर के रूप में भी जाना जाता है, में रोमांस का आनन्द होता है। इस अपबीट डांस के दौरान, पुरुष अपना टोप भूमी पर रख देता है। अन्त में एक महिला उस टोप को उठा लेती है और अपने चुम्बन के रोमांस को गुप्त रखने के लिए दोनों इस टोप के पीछे छिप जाते हैं।
यह डांस मुझे विवाह में विश्वासयोग्यता की महत्वपूर्णता का स्मरण करवाता है। नीतिवचन 5 में अनैतिकता के ऊँचे मूल्य के बारे में बात करने के पश्चात, हम पढ़ते हैं कि विवाह विशिष्ट है। “तू अपने ही कुण्ड से पानी, और अपने ही कूएँ के सोते का जल पिया करना” (पद 15)। मंच पर दस दम्पत्ति जाराब डांस करते हैं, फिर भी प्रत्येक व्यक्ति का ध्यान अपने ही साथी पर केन्द्रित रहता है। हम अपने विवाहित साथी के साथ एक गहन और अविभाजित समर्पण का आनन्द ले सकते हैं (पद 18)।
हमारे रोमांस पर भी ध्यान दिया जा रहा है। डांसर, जब वे अपने साथी के साथ आनन्द मना रहे हैं, जानते हैं कोई देख रहा है। उसी प्रकार, हम पढ़ते हैं कि “क्योंकि मनुष्य के मार्ग यहोवा की दृष्टि से छिपे नहीं हैं, और वह उसके सब मार्गों पर ध्यान करता है” (पद 21)। परमेश्वर हमारे विवाहों को सुरक्षित रखना चाहता है, इसलिए वह निरन्तर हमें देख रहा है। परमेश्वर करे कि हम एक दूसरे के प्रति विश्वासयोग्यता दिखाने के द्वारा उसे प्रसन्न करें।
ठीक जाराब के समान जीवन में भी एक ताल का पालन करना अनिवार्य है। जब हम उसके प्रति विश्वासयोग्य रहने के द्वारा अपने सृष्टिकर्ता के साथ ताल में रहते हैं-चाहे हम विवाहित या अविवाहित हों-हम आशीष प्राप्त करेंगे।
प्रश्नों के साथ आराधना करना
यात्रियों के समूह में एक लम्बी (या छोटी) यात्रा पर जाते हुए किसी के द्वारा यह पूछना असामान्य नहीं है, “क्या हम पहुँच गए हैं?” किस ने बच्चों का बड़ों के ओंठो से आते हुए इन सार्वभौमिक प्रश्नों को नहीं सुना होगा, जो अपनी मंजिल पर पहुँचने के लिए उत्सुक हैं? परन्तु सभी आयु वर्ग के लोग यही प्रश्न पूछने की ओर प्रवृत होते हैं, जब वे जीवन की चुनौतियों से थक जाते हैं, जो कभी भी समाप्त होती प्रतीत नहीं होती।
भजन संहिता 13 में ऐसी ही परिस्थिति दाऊद के साथ भी है। दो पदों में चार बार (पद 1-2) दाऊद-जिसे भुला दिए जाने, छोड दिए जाने और परास्त हो जाने का अहसास हुआ-दुखित होता है “कब तक?” पद दो में वह पूछता है, “मैं कब तक अपने मन ही मन में युक्तियाँ करता रहूँ?” भजन संहिता, जैसे यह भजन, जिनमें विलाप सम्मिलित है, हमें प्रत्यक्ष रूप से आराधना के रूप में अपने प्रश्नों के साथ प्रभु के पास आने की अनुमति देता है। आखिरकार, तनाव और दुःख के लम्बे समय में बात करने के लिए परमेश्वर से अच्छा और कौन हो सकता है? हम बीमारी, दुःख और परिजनों से दूर होने और सम्बन्धों में आई कठिनाइयों और अपने संघर्षों को उसके समक्ष ला सकते हैं।
जब हमारे पास प्रश्न हों, तब भी आराधना रुकनी नहीं चाहिए। स्वर्ग का परमप्रधान परमेश्वर हमारा स्वागत करता है कि हम अपने चिंता-युक्त प्रश्नों को उसके पास लेकर आएँl और सम्भवतः, समय के दौरान हमारे प्रश्न विनतियों और प्रभु के लिए हमारे भरोसे और स्तवन के भावों में बदल जाएँ (पद 3-6)।
आप क्या त्याग सकते हैं?
“वह कौन सी एक चीज़ है जिसे आप नहीं त्याग सकते हैं?” रेडियो पर एक होस्ट ने पूछा। श्रोताओं ने बहुत ही रोचक जवाब दिए। कुछ ने अपने परिवार बताए, पतियों ने अपनी मृत पत्नी की यादों को बताया। कुछ ने बताया कि वे अपने सपनों, जैसे कि संगीत में प्रसिद्ध होना या माँ बनना, को नहीं छोड़ सकते हैं। हम सभी के पास कुछ न कुछ है जिसे हम प्रतिदिन संजोकर रखते हैं-कोई व्यक्ति, कोई उत्साह, कोई सम्पत्ति-कोई न कोई ऐसी बात जिसे हम त्याग नहीं सकते हैं।
होशे की पुस्तक में, परमेश्वर हमें बताता है कि वह अपने चुने हुए लोग, अपने निज भाग, इस्राएल को कभी नहीं त्यागेगा। इस्राएल के प्रेमी पति के रूप में परमेश्वर ने उसे सबकुछ उपलब्ध करवाया जिसकी उसे आवश्यकता थी: भूमि, भोजन, पानी, वस्त्र और सुरक्षा। फिर भी एक व्यभिचारी पत्नी के रूप में इस्राएल ने परमेश्वर को अस्वीकार किया और अपनी खुशी और सुरक्षा कहीं ओर खोजी। जितना परमेश्वर उसके पीछे-पीछे आया, वह उतनी ही भटकती चली गई (होशे 11:2)। परन्तु यद्यपि उसने उसे बुरी तरह से आहत किया था, फिर भी वह उसे कभी नहीं त्यागेगा (पद 8)। उसका छुटकारा करने के लिए वह उसे अनुशासित करेगा; उसकी इच्छा उसके साथ सम्बन्ध को फिर से स्थापित करने की थी (पद 11)।
आज, परमेश्वर की समस्त सन्तान उसी आश्वासन को प्राप्त कर सकती है: हमारे लिए उसका प्रेम ऐसा प्रेम है जो हमें कभी जाने नहीं देगा (रोमियों 8:37-39)। यदि हम भटक कर उससे दूर हो गये हैं, तो वह हमारे वापिस लौटने के लिए इच्छा रखता हैl जब परमेश्वर हमें अनुशासित करता है, तो हमे सांत्वना मिल सकती है कि यह उसके हमारे पीछे-पीछे आने का चिह्न है, न कि उसके त्याग दिए जाने का चिह्न। हम उसके निज भाग हैं; वह हमें कभी नहीं त्यागेगा।
सामान से कुछ और अधिक बाँटना
“परन्तु मैं बाँटना नहीं चाहता!” मेरा सबसे छोटा बच्चा टूटे दिल के साथ चिल्लाया कि उसे अपने लेगो के अनेक टुकड़ों में से कुछ को बाँटना होगा। मैंने उसकी अपरिपक्वता को देखा, परन्तु वास्तविक रूप से यह नज़रिया छोटे बच्चों तक ही सीमित नहीं है। मेरे जीवन और वास्तव में मानवीय अनुभवों का कितना बड़ा हिस्सा दूसरों को स्वेच्छा और उदारता से देने से रोकने की ढिठाई से भरा हुआ है?
यीशु पर विश्वास करने वालों के रूप में, हमें अपने जीवन एक दूसरे के साथ बाँटने के लिए बुलाया गया है। रूथ ने ठीक ऐसा ही अपनी सास नाओमी के साथ किया। एक गरीब विधवा के रूप में रूथ को देने के लिए नाओमी के पास बहुत कम था। परन्तु फिर भी रूथ ने अपना जीवन अपनी सास के जीवन के साथ इस प्रकार मिलाया और शपथ ली कि वे एकसाथ सामना करेंगे और यहाँ तक कि मृत्यु भी उन्हें अलग नहीं करेगी। उसने नाओमी से कहा, “तेरे लोग मेरे लोग होंगे, और तेरा परमेश्वर मेरा परमेश्वर होगा (रूथ 1:16)। उसने प्रेम और दया दिखाते हुए उस वृद्ध महिला को दे दिया।
इस रीति से अपने जीवनों को बाँटना कठिन हो सकता है, परन्तु हमें ऐसी उदारता के प्रतिफल को स्मरण रखना चाहिए। रूथ ने अपना जीवन नाओमी के साथ बांटा, परन्तु बाद में उसने एक पुत्र, राजा दाऊद के दादा, को जन्म दिया। यीशु ने हमारे साथ अपना जीवन बांटा, परन्तु फिर ऊँचा उठाया गया और अब स्वर्ग में पिता के दाहिने हाथ से राज्य करता है। जब हम उदारतापूर्वक एक दूसरे के साथ बाँटते हैं, तो हमें निश्चय कर लेना चाहिए कि हम अभी भी बहुत अच्छा जीवन जिएँगे!
रात्रिकाल में एक गीत
मेरे पिता का जीवन लालसा रखने का जीवन था, उन्होंने सम्पूर्णता की लालसा रखी, जब पार्किन्सन की बीमारी ने उनके मस्तिष्क और शरीर को धीरे धीरे और अधिक अपंग बना दियाl उन्होंने शान्ति की लालसा की, परन्तु वह गहन उदासी की पीड़ा से पीड़ित रहेl उन्होंने प्रेम और दुलार की लालसा की, परन्तु प्राय: अकेला ही महसूस कियाl
उन्होंने अपने आप को कम अकेला महसूस किया जब उन्होंने भजन संहिता 42, उनके पसन्दीदा भजन को पढ़ा, भजनकार एक गहन लालसा और चंगाई के लिए एक अनबुझी प्यास को जानता था (पद 1-2)l उनके समान भजनकार एक उदासी को जानता था, जिसका ऐसा अहसास होता था कि वह कभी गई ही नहीं (पद 3), जिसने भरपूर आनन्द के समय को एक बहुत दूर की याद बना दिया था (पद 6)l मेरे पिता के समान, जब गड़बड़ी और पीड़ा की लहरों ने उन्हें डूबा दिया (पद 7), भजनकार ने अपने आप को परमेश्वर के द्वारा छोड़ दिया गया महसूस किया और पूछा “क्यों?” (पद 9)l
और जब भजन संहिता के शब्दों ने उन्हें प्रेरित किया और आश्वासन दिलाया कि वह अकेले नहीं थे, तब मेरे पिता ने अपनी पीड़ा में एक शान्ति के आरम्भ का अहसास कियाl उन्होंने अपने आस-पास एक मध्यम आवाज़ को सुना, एक आवाज़ जो उन्हें आश्वासन दिला रही थी कि यद्यपि उनके पास जवाब नहीं थे, यद्यपि लहरें उन्हें अभी भी डुबा रही थीं, फिर भी उन्हें स्नेह के साथ दुलारा जा रहा था (पद 8)l
और एक तरह से रात में उस मध्यम गीत को सुनना पर्याप्त थाl मेरे पिता के लिए चुपचाप आशा, प्रेम, और आनन्द की किरणों से जुड़े रहने के लिएl और यह उनके लिए उस दिन की प्रतीक्षा करने के लिए पर्याप्त था जब एक दिन उनकी अभी लालसाएँ पूरी कर दी जाएँगी (पद 5,11)l