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सर्वोच्च स्थान

मेरे पति ने एक मित्र को चर्च बुलाया l आराधना के बाद उनके मित्र ने कहा, “मुझे गीत और वातावरण अच्छे लगे, किन्तु मुझे समझ में नहीं आता l आप यीशु को आदर का इतना ऊँचा स्थान क्यों देते हैं?” मेरे पति ने तब उसे समझाया कि मसीहियत मसीह के साथ एक रिश्ता है l उसके बिना, मसीहियत अर्थहीन हो जाता है l यीशु ने हमारे जीवनों में जो किया है उसी कारण हम इकठ्ठा होते और उसकी स्तुति करते हैं l

यीशु कौन है और उसने क्या किया है? प्रेरित पौलुस ने इस प्रश्न का उत्तर कुलुस्सियों 1 में दिया है l किसी ने परमेश्वर को नहीं देखा है, किन्तु यीशु उसे प्रतिबिंबित करने और प्रगट करने आया (पद.15) l परमेश्वर का पुत्र होकर, यीशु, हमारे लिए मृत्यु सहने और हमें पाप से छुड़ाने आया l पाप ने हमें परमेश्वर की पवित्रता से अलग कर दिया है, इसलिए किसी सिद्ध के द्वारा ही मेल हो सकता था l वही यीशु था (पद.14,20) l अर्थात्, यीशु ने हमें वह दिया जो कोई नहीं दे सकता था – परमेश्वर और अनंत जीवन तक पहुँच (यूहन्ना 17:3) l

क्यों वह इतने आदर के उच्च स्थान के योग्य है? उसने मृत्यु को पराजित किया l उसने अपने प्रेम और बलिदान से हमारे हृदयों को जीत लिया l वह हमें प्रतिदिन नयी सामर्थ्य देता है l वह हमारे लिए सब कुछ है?

हम उसकी महिमा करते हैं क्योंकि वह उसके योग्य है l हम उसे ऊँचा उठाते हैं क्योंकि वही उसका सही स्थान है l हम उसे अपने हृदयों में सर्वोच्च स्थान दें l

मात्र एक और दिन?

क्रिसमस एवरी डे  में, विलियम डीन होवेल्स एक छोटी लड़की की कहानी बताता है जिसकी इच्छा पूरी होती है l एक लम्बे, भयानक वर्ष के लिए यह वास्तव में हर दिन क्रिसमस है l तीन दिनों के बाद 24 दिसम्बर से 6 जनवरी का समय फीका पड़ने लगा है l जल्द ही मिश्री किसी को भी अच्छी नहीं लग रही है l टर्की पक्षी दुर्लभ हो गया है और मनमानी कीमत पर बिक रहा  है l उपहार धन्यवाद के साथ अब स्वीकारे नहीं जा रहे हैं और यहाँ वहाँ उनके ढेर लगे हैं l लोग एक दूसरे पर नाराज़ होते है l

शुक्र है कि, होवेल की कहानी सिर्फ एक व्यगात्मक कहानी है l लेकिन यह कितना अविश्वसनीय आशीष है कि बावजूद इसके कि हम उसे सम्पूर्ण बाइबल में देखते हैं, क्रिसमस उत्सव का विषय हमें कभी भी नहीं थकाता है l

यीशु के अपने पिता के पास स्वर्गारोहित होने के बाद, येरुशलम में मंदिर के निकट प्रेरित पतरस ने एक भीड़ को संबोधित किया कि यीशु ही वह था जिसके विषय मूसा ने कहा था, “प्रभु परमेश्वर तुम्हारे भाइयों में से तुम्हारे लिए मुझ सा एक भविष्यवक्ता उठाएगा” (प्रेरितों 3:22; व्यवस्थाविवरण 18:18) l अब्राहम को परमेश्वर का वादा, “तेरे वंश के द्वारा पृथ्वी के सारे घराने आशीष पाएंगे” (प्रेरितों 3:25, उत्पत्ति 22:18) l पतरस ने ध्यान दिया, “जितने भविष्यवक्ता बोले उन सब ने इन दिनों का सन्देश दिया है” – उद्धारकर्ता का आगमन (प्रेरितों 3:24) l

हम क्रिसमस की भावना को उत्सव के समापन के बहुत बाद तक जीवित रख सकते हैं l बाइबल की सम्पूर्ण कहानी में मसीह को देखकर यह सराहना कर सकते हैं कि क्रिसमस केवल एक दिन से कहीं अधिक है l

ठन्डे मौसम की बर्फ

सर्दियों में, मैंने अक्सर संसार को प्रातःकाल के बर्फ में लिपटा हुआ और शांत पाकर उसकी खूबसूरती से चकित हूँ l बसंत की आंधी की तरह बड़ी आवाज़ के साथ नहीं जो रात में अपनी उपस्थिति दर्शाती है, किन्तु बर्फ शांति से गिरती है l

“सर्दियों के बर्फ गीत में” (Winter Snow Song), में ऑड्रे एस्साद गाते हैं कि यीशु आंधी की तरह शक्ति के साथ पृथ्वी पर आ सकता था, किन्तु इसके बदले वह सर्दियों के बर्फ की तरह शांत और धीरे से मेरी खिड़की के बाहर आया l

यीशु का आना बहुतों को आश्चर्यचकित कर दिया l एक महल में जन्म लेने के बदले, वह एक विपरीत स्थान में जन्म लिया, बैतलहम के बाहर एक दीन निवास l और वह एक चरनी में सोया, केवल वही उसके लिए था (लूका 2:7) l उच्च अधिकारी और सरकारी अधिकारी उससे मिलने नहीं आए, साधारण चरवाहों ने उसका स्वागत किया (पद.15-16) l धन की कमी के कारण, यीशु के माता-पिता दो पक्षियों के सस्ते बलिदान भी चढ़ाने में असमर्थ थे जब उन्होंने उसको मंदिर में प्रस्तुत किया (पद.24) l

यीशु का संसार में प्रवेश करने वाला सरल तरीका नबी यशायाह का पूर्वाभास है, जिसने आनेवाले उद्धारकर्ता की नबूवत की थी कि “न वह चिल्लाएगा (यशायाह 42:2) न ही वह सामर्थ्य में आकर एक नरकट को तोड़ेगा या एक टिमटिमाती बत्ती को बुझाएगा (पद.3) l इसके बदले परमेश्वर की शांति की पेशकश के साथ वह हमें कोमलता से अपनी ओर खींचेगा l ऐसी शांति जो चरनी में जन्मे उद्धारकर्ता की अनपेक्षित कहानी पर विश्वास करनेवाले के लिए अभी भी उपलब्ध है l

उस पर विचार करें

लन्दन में ऑस्वाल्ड चैम्बर्स के बाइबल ट्रेनिंग कॉलेज (1911-15) के वर्षों के दौरान, वे अक्सर अपने व्याख्यानों के मध्य विद्यार्थियों को बातों से चौंका देते थे l एक युवती ने समझाया कि क्योंकि अगले भोजन के समय चर्चा रखी गयी थी, अक्सर चैम्बर पर प्रश्नों और आपत्तियों की बमबारी की जाती थी l उसने याद किया कि ऑस्वाल्ड सरल मुस्कराहट के साथ कहते, “बस इसे अभी छोड़ दें; यह आपके पास बाद में लौटेगा l” उसने उन्हें उन मुद्दों पर सोचने और परमेश्वर को अपनी सच्चाई प्रगट करने की अनुमति देने को कहा l

ध्यान केन्द्रित करना और उसके विषय गहराई से विचार करना ही सोचना है l बैतलहम में यीशु के जन्म की घटनाओं के बाद, स्वर्गदूतों और चावाहों की उपस्थिति के बाद जो  उद्धारकर्ता को देखने आए थे, “मरियम ने सब बातें मन में रखकर सोचती रही” (लूका 2:19) l नया नियम का विद्वान डब्ल्यू. ई. वाइन कहता है कि “सोचने” का अर्थ है “एक साथ फेंक देना, वार्तालाप करना, विचार करने के लिए एक वस्तु को दूसरे के साथ रखना” (Expository Dictionary of New Testament Words) l

जब हम समझने का प्रयास करते हैं कि हमारे जीवनों में क्या हो रहा है, हमारे पास मरियम का अद्भुत उदाहरण है कि परमेश्वर और उसकी बुद्धि को खोजने का क्या अर्थ होता है l

जब हम, उसकी तरह, अपने जीवनों में परमेश्वर का मार्गदर्शन स्वीकार करते हैं, हमारे पास सजोने और अपने मन में विचार करने के लिए उसके प्रेमी मार्गदर्शन की बहुत सी नयी बातें होती हैं l

अधिकता में या दुःख में

ऐन वोस्कईम्प की पुस्तक वन थाउजेंड गिफ्ट्स  पाठकों को प्रभु ने उनके लिए क्या किया है, प्रतिदिन खोजने के लिए उत्साहित करती है l उसमें, वह रोजाना बड़ी और छोटी दोनों उपहारों में परमेश्वर की प्रचुर उदारता, जिसमें बरतन धोने वाले सिंक में साधारण बुलबुलों से लेकर पापियों के (और बाकी हम सब!) के अतुलनीय उद्धार की बात करती है l ऐन का तर्क है कि धन्यवाद ही वह कुंजी है जो जीवन के सबसे अशांत क्षणों में भी परमेश्वर को देखती है l

अय्यूब ऐसे “अशांत क्षणों” के जीवन के लिए लोकप्रिय है l वास्तव में, उसकी हानि गहरी और बहुत थी l अपने सभी पशुओं को खोने के कुछ ही क्षण बाद, उसे उसी समय अपने दसों बच्चों की मृत्यु का समाचार मिलता है l अय्यूब का अत्यधिक दुःख उसके प्रतिउत्तर में दिखाई देता है : वह “बागा फाड़, सिर [मुड़वाता है]” (1:20) l उसके दर्द भरे शब्द मुझे सोचने पर मजबूर करते हैं कि अय्यूब कृतज्ञता के अभ्यास को जानता था, क्योंकि वह स्वीकार करता है कि परमेश्वर ने उसे वह सब कुछ दिया था जो वह खो चुका था (पद.21) l इस तरह के अपमानजनक दुःख के बीच में वह और किस प्रकार उपासना कर सकता था?

दैनिक कृतज्ञता का अभ्यास हानि के मौसम में महसूस किये जानेवाले दुःख के परिणाम को मिटा नहीं सकता है l जिस तरह पुस्तक वर्णन करता है अय्यूब अपने दुःख में होकर प्रश्न और  सामना करता रहा l किन्तु अपने लिए परमेश्वर की भलाइयाँ पहचानने पर - यहाँ तक कि छोटे तरीकों में भी – हम जीवन के अंधकारमय समयों में भी शक्तिशाली परमेश्वर के सामने उपासना में घुटना टेकने के लिए तैयार होते हैं  l

आशा हमारी रणनीति

मेरे यह लिखते समय मेरी पसंदीदा फुटबॉल टीम लगातार आठ मैच हार चुकी थी l हर एक हार के साथ, उनका इस मौसम में जीत पाने की आशा क्षीण होती दिखाई दे रही थी l कोच ने हर सप्ताह परिवर्तन किये किन्तु यह जीत में परिवर्तित नहीं हो सकी l अपने सहयोगियों के साथ बातचीत करते हुए मैंने मज़ाक किया कि केवल एक भिन्न परिणाम की आशा गारंटी नहीं है l “आशा एक रणनीति नहीं है,” मैंने ताना मारा l

यह फुटबॉल में सही है l लेकिन हमारे आत्मिक जीवनों में, यह बिलकुल विपरीत है l परमेश्वर में आशा उत्पन्न करना एक रणनीति ही नहीं है, किन्तु विश्वास और भरोसे में उससे लिपटे रहना ही एकमात्र रणनीति है l संसार अक्सर हमें निराश करता है, किन्तु परमेश्वर की सच्चाई में आशा हमारी लंगर और अशांत समय में सामर्थ्य है l

मीका ने इस सच्चाई को समझ लिया था l इस्राएल के परमेश्वर से मुह मोड़ लेने के कारण मीका का हृदय टूट चुका था l “हाय मुझ पर ! . . . भक्त लोग पृथ्वी पर से नष्ट हो गए हैं, और मनुष्यों में एक भी सीधा जन नहीं रहा” (7:1-2) l लेकिन उसी समय वह सच्ची आशा पर अपना ध्यान केन्द्रित करता है : “परन्तु मैं यहोवा की ओर ताकता रहूँगा, मैं अपने उद्धारकर्ता परमेश्वर की बात जोहता रहूँगा; मेरा परमेश्वर मेरी सुनेगा” (पद.7) l

कठिन समय में आशा किस तरह स्थिर रखी जा सकती है? मीका हमें दिखाता है : बाट जोहकर l इंतज़ार करके l प्रार्थना करके l याद करके l अभिभूत करनेवाली हमारी परिस्थितियों में भी परमेश्वर सुनता है l इन क्षणों में, परमेश्वर में अपनी आशा में लिपटे रहना और उसके प्रतिउत्तर में काम करना ही हमारी रणनीति है, केवल एक रणनीति जो जीवन के तूफानों को शांत कर सकता है l

डरो मत!

लगभग हर वक्त जब बाइबल में एक स्वर्गदूत प्रगट होता है, उसके प्रथम शब्द होते हैं “डरो मत!” छोटा आश्चर्य l जब अलौकिक, ग्रह पृथ्वी से संपर्क करता है, देखनेवाले मानव भय के मारे अपने मुहं के बल होते हैं l किन्तु लूका परमेश्वर का प्रगटन इस रूप में बताता है जो भयभीत नहीं करता l यीशु में, जो पशुओं के बीच जन्म लिया और जिसे चरनी में लिटाया गया, परमेश्वर ऐसे प्रवेश करता है जहाँ हमें डरने की ज़रूरत नहीं है l क्या एक नवजात शिशु से कम भयभीत करनेवाला कोई हो सकता है?

पृथ्वी पर यीशु परमेश्वर और मनुष्य दोनों ही है l परमेश्वर होकर, वह आश्चर्यकर्म कर सकता है, पाप क्षमा कर सकता है, मृत्यु को पराजित कर सकता है, और भविष्य बता सकता है l किन्तु यहूदियों के लिए जो परमेश्वर को एक चमकीला बादल या एक अग्नि स्तम्भ की छवि के रूप में देखने के आदि थे, यीशु गड़बड़ी भी पैदा करता है l बैतलहम का एक शिशु, एक बढ़ई का बेटा, नासरत का एक मनुष्य परमेश्वर की ओर से एक उद्धारकर्ता कैसे हो सकता है?

परमेश्वर मानव रूप क्यों लिया? मंदिर में रब्बियों के साथ चर्चा करनेवाला बारह वर्ष का यीशु हमें एक सुराग देता है l “जितने उसके सुन रहे थे, वे सब उसकी समझ और उसके उत्तरों से चकित थे” लूका कहता है (2:47) l पहली बार, साधारण लोग प्रत्यक्ष रूप में परमेश्वर के साथ बातचीत कर पा रहे थे l

यीशु किसी से भी बताए बिना बातचीत कर सकता था-अपने मातापिता से, एक रब्बी से, एक निर्धन विधवा से l “डरो मत!” यीशु में परमेश्वर निकट आ गया l

अगुआ का अनुसरण

हमारे घर के ऊपर आसमान में तीन लड़ाकू जेट विमान शोर करते है – तीनों इतने निकट हैं कि एक दिखाई देते हैं l “वाह,” मैं अपने पति, डैन से बोली l वह मुझसे सहमत हुआ, “प्रभावशाली l” हम एक एयर फ़ोर्स बेस के निकट रहते हैं और ऐसे दृश्य सामान्य हैं l

हर समय जेट विमानों के उड़ने पर, हालाँकि, मेरे पास एक ही प्रश्न होता है : कैसे वे इतने निकट उड़ते हुए भी नियंत्रण में रहते हैं?  एक स्पष्ट कारण, दीनता है l इस बात पर भरोसा करके कि लीड पायलट सही गति और प्रक्षेपवक्र पर उड़ रहा रहा है, विंग पायलट निर्देशों को बदलने या अपने अगुआ के पथ पर सवाल करने की इच्छा को लीड पायलट की इच्छा के आधीन करते हैं l इसके बदले वे विन्यास में रहकर निकट से अनुसरण करते हैं l परिणाम? एक और शक्तिशाली टीम l

यीशु के अनुयायियों के लिए भिन्न बात नहीं है l वह कहता है, “यदि कोई मेरे पीछे आना चाहे, तो अपने आपे से इन्कार करे और प्रतिदिन अपना क्रूस उठाए हुए मेरे पीछे हो ले” (लूका 9:23) l

उसका मार्ग आत्म-समर्पण और पीड़ा उठाना था, जिसका अनुसरण करना कठिन हो सकता है l किन्तु उसके प्रभावशाली अनुयायी होने के लिए, हमें भी अपनी स्वार्थी इच्छाएँ अलग करने और प्रतिदिन आत्मिक बोझ उठाने के लिए नेवता दिया गया है अर्थात् खुद से अधिक दूसरों की सेवा, जैसे – जब हम निकटता से उसका अनुसरण करते हैं l

यह बहुत अच्छा दृश्य है , दीन होकर, परमेश्वर के साथ चलना है l उसके नेतृत्व में चलना, और निकट रहना, हम यीशु के साथ एक दिखाई दे सकते हैं l तब दूसरे हमें नहीं देख सकेंगे, वे उसे देखेंगे l इस प्रकार के दृश्य के लिए यह सरल शब्द है : “वाह!” 

आप किस ओर जा रहे हैं?

जीवन में हमारी दिशा कौन निर्धारित करता है? एकबार मैंने एक आश्चर्यजनक स्थान: मोटरसाईकिल प्रशिक्षण कोर्स, पर इस प्रश्न का उत्तर सुना। मेरे कुछ मित्र और मैं मोटरसाईकिल चलाना चाहते थे, इसलिए यह सीखने के लिए कि यह कैसे करते हैं हम ने एक क्लास ली। हमारे प्रशिक्षण के एक हिस्से को लक्ष्य निर्धारित करना कहते थे।  

“आखिरकार” हमारे निर्देशक ने कहा, “आप एक अनपेक्षित बाधा का सामना करोगे। यदि आप इसकी ओर देखते रहोगे-यदि तुम ने लक्ष्य निर्धारित किया है-तो तुम ठीक उसकी ओर जाओगे। परन्तु यदि आप ऊपर या इससे दूर देखोगे, जहाँ तुम्हें जाना है, तो तुम समान्यत: इससे बच सकते हो।” इसके बाद उसने कहा, “जिस दिशा की ओर आप देख रहे हो आप उसी ओर जाओगे।”

वह साधारण परन्तु प्रगाढ़ सिद्धांत हमारे आत्मिक जीवन पर भी लागू होता है। जब हम एक लक्ष्य को निर्धारित करते हैं-अपनी समस्याओं या संघर्षों पर केन्द्रित हो जाते हैं-तो हम अपने जीवनों को लगभग उन्हीं के चारों ओर घुमाते रहते हैं।

परन्तु पवित्रशास्त्र हमें अपनी कठिनाइयों से दूर उस व्यक्ति की ओर देखने के लिए प्रोत्साहित करता है, जो उनमें हमारी सहायता कर सकता है। भजन संहिता 121:1 में हम पढ़ते हैं, “मैं अपनी आँखें पर्वतों की ओर लगाऊंगा, मुझे सहायता कहाँ से मिलेगी?” फिर भजन संहिता उत्तर देती है: “मुझे सहायता यहोवा की ओर से मिलती है, जो आकाश और पृथ्वी का कर्ता है...यहोवा आने जाने में तेरी रक्षा अब से लेकर सदा तक करता रहेगा” (पद 2, 8)। 

कई बार हमारी बाधाएँ अजेय प्रतीत होती हैं। परन्तु परमेश्वर हमें हमारी कठिनाइयों को हमारे नजरिये पर अधिकार रखने के स्थान पर उनसे दूर देखने में हमारी सहायता करने के लिए आमन्त्रित करता है।