माँ का प्रेम
सु की युवावस्था में, उसके माता-पिता के तलाक के बाद उसकी परवरिश सम्बन्धी कानूनी लड़ाई और अन्य मामलों के परिणामस्वरूप उसे कुछ समय के लिए बाल-आश्रम में रहना पड़ा l बड़े बच्चों के परेशान करने के कारण, उसने खुद को अकेला और तिरस्कृत समझा l हर महीने उसकी माँ उससे मिलने एक बार आती थी, और वह अपने पिता से शायद ही मिलती थी l कई वर्षों के बाद, हालाँकि, उसकी माँ ने उसे बताया कि बाल-आश्रम के नियमों के कारण वह अक्सर उससे मिलने नहीं आ पाती थी, और ज्यादातर, वह प्रतिदिन बाड़े के निकट खड़ी होकर उसकी एक झलक पाने की आशा करती थी l कभी-कभी,” उसने कहा, “मैं तुम्हें गार्डन में खेलती हुई देखती थी, केवल यह जानने के लिए कि तुम ठीक होगी l”
जब सु ने यह कहानी बतायी, इससे मुझे परमेश्वर के प्रेम का एक झलक मिला l कभी-कभी हम अपने संघर्षों में त्यागे हुए और अकेला महसूस करेंगे l यह जानना कितना सुखकर है कि वास्तव में परमेश्वर हमेशा हमारी निगरानी कर रहा है (भजन 33:18) l यद्यपि हम उसे देख नहीं सकते, वह मौजूद है l एक प्रेमी अभिभावक की तरह, उसकी आँखें और उसका हृदय हमेशा और हर जगह हमारे ऊपर रहता है l फिर भी, सु की माँ के विपरीत, वह इस समय भी हमारे पक्ष में कार्य कर सकता है l
भजन 91 परमेश्वर का अपने बच्चों के छुटकारा, सुरक्षा और उन्हें थामे रहने का वर्णन करता है l वह शरणस्थान और आश्रय से बढ़ कर है l जब हम जीवन की अंधकारमय घाटियों में होकर जाते हैं, हम इस बोध में विश्राम पाते हैं कि सर्वशक्तिमान प्रभु हमेशा हमारी निगरानी करता है और हमारे जीवनों में क्रियाशील है l वह घोषणा करता है, “मैं [तुम्हारी] सुनूंगा, संकट में मैं [तुम्हारे] संग रहूँगा, मैं [तुम्हें बचाऊंगा]” (पद.15) l
जो हमारे पास है
मेरी सहेली अपने परिवार और मित्रों को अपने घर पर एक उत्सव अवकाश समारोह के लिए इकठ्ठा करने हेतु उत्सुक थी l संगति में प्रत्येक अतिथि इकठ्ठा होने को तैयार था और भोजन खर्च में योगदान करके खर्च कम करना चाहता था l कुछ लोग रोटी, दूसरे लोग सलाद या कोई और प्रकार का भोजन लाने वाले थे l हालाँकि, एक अतिथि आर्थिक रूप से अत्यधिक तंग थी l वह शाम को प्रिय लोगों की संगति में शामिल होने की इच्छा रखते हुए भी, कोई भी भोजन लाने में असमर्थ थी l इसलिए, इसके बदले, उसने अपने मेजबान के घर को साफ़ करने का प्रस्ताव रखकर अपना योगदान दिया l
उसका स्वागत खाली हाथ आने पर भी हुआ होता l फिर उसने जो उससे हो सकता था देने की इच्छा प्रगट की - उसका समय और कौशल - और पूरे मन से उस संगति में आयी l मेरे विचार से 2 कुरिन्थियों 8 में पौलुस के शब्दों के भाव यही थे l विश्वासी कुछ साथी मसीहियों की सहायता करने के लिए उत्सुक थे, और पौलुस ने उन प्रयासों का पालन करने का आग्रह किया l उसने उनकी अभिलाषा और उनकी इच्छा को यह कहते हुए सराहा, कि देने की उनकी प्रेरणा ही किसी भी माप के उपहार या राशि को स्वीकार्य बनाता है (पद.12) l
हम अक्सर अपने दान की तुलना दूसरों की दान से करने में जल्दबाजी करते हैं, विशेषकर उस समय जब हमारे संसाधन उस माप की बराबरी नहीं करते जो हम देने की इच्छा रखते हैं l किन्तु परमेश्वर हमारे देने को भिन्न दृष्टिकोण से देखता है : जो हमारे पास है उसे देने की हमारी इच्छा ही से वह प्रेम करता है l
एक गुप्त सेवा
एक बड़े शैक्षिक प्रोजेक्ट का बोझ मुझ पर था, और मैं उसे तय समय सीमा पर पूरा करने के विषय चिंतित थी l मेरी घबराहट में, उत्साहवर्धन कर रहे तीन सहेलियों के पत्र प्राप्त हुए l हर एक ने लिखा, "मेरी प्रार्थना में परमेश्वर ने मुझे तुम्हारी याद दिलाई l" मैं दीन और उत्साहित की गयी कि इन मित्रों ने मेरी स्थिति को जाने बगैर मुझसे संवाद किया, और मेरा विश्वास था परमेश्वर ने उनको प्रेम के संदेशवाहक के तौर पर उपयोग किया था l
कुरिन्थुस की कलीसिया के विश्वासियों को लिखते हुए प्रेरित पौलुस प्रार्थना की सामर्थ्य से परिचित था l उसने लिखा कि वह आशा करता था कि परमेश्वर उन्हें मृत्यु के संकट से बचाता रहेगा जब "तुम भी मिलकर प्रार्थना के द्वारा हमारी सहायता करोगे" (2 कुरिन्थियों 1:10-11) l और परमेश्वर द्वारा उनकी प्रार्थना का उत्तर देने के बाद, वह (परमेश्वर) महिमामंडित होगा जब "बहुत से लोगों की प्रार्थनाओं" (पद.11) के उत्तर के लिए लोग धन्यवाद देंगे l
मेरी सहेलियाँ और पौलुस मध्यस्थता की प्रार्थना में लगे हुए थे, जिसे ऑस्वाल्ड चैम्बर्स "एक गुप्त सेवा संबोधित करता है जिससे निकलनेवाला परिणाम पिता को महिमामंडित करता है l" यीशु की ओर अपना मन और हृदय केन्द्रित करते समय, हम उसे हमें आकार देते हुए पाते हैं, जिसमें हमारी प्रार्थना करने का तरीका भी है l वह हमें मित्रों, परिजनों, और अपरिचितों को सच्ची मध्यथता की प्रार्थना का इनाम देने में योग्य बनाता है l
क्या परमेश्वर ने आपके हृदय और मन में किसी को लाया है जिसके लिए आप प्रार्थना कर सकते हैं?
गलत पक्ष?
घाना, टेकिमैन को जानेवाला पुल बह गया, तानो नदी के उस पार न्यू क्रोबो के निवासी फंस गए l टेकिमैन में पास्टर शमूएल अप्पैयाह की कलीसिया की उपस्थिति घट गयी क्योंकि अधिकतर सदस्य न्यू क्रोबो में ही रहते थे - नदी के "गलत" तरफ l
संकट के मध्य, पास्टर सैम और भी अनाथों की देखभाल के लिए चर्च के वच्चों के होम को बढ़ा रहे थे l इसलिए उन्होंने प्रार्थना की l उसके बाद उनका चर्च न्यू क्रोबो में नदी के उस पार आउटडोर सभाओं को प्रायोजित किया l जल्द ही वे यीशु में नए विश्वासियों को बपतिस्मा दे रहे थे l एक नया चर्च स्थापित होने लगा l केवल यही नहीं, न्यू क्रोबो के चर्च के पास प्रतीक्षा कर रहे अनाथों की देखभाल करने के लिए स्थान भी था l परमेश्वर संकट के समय अपना दृढ़ करनेवाला कार्य बढ़ा रहा था l
जब पौलुस ने खुद को स्वतंत्रता के विपरीत "पक्ष" की ओर पाया, उसने अपनी स्थिति पर आँसू नहीं बहाए l फिलिप्पी के चर्च को एक सशक्त पत्री में, उसने लिखा, "हे भाइयों [और बहनों], कि तुम यह जान लो कि मुझ पर जो बीता है, उससे सुसमाचार ही की बढ़ती हुयी है" (फिलिप्पियों 1:12) l पौलुस ने ध्यान दिया कि किस प्रकार उसकी कैद से "राजभवन की सारी पलटन" मसीह के विषय जान पायी है (पद.13) l और दूसरों को यीशु का सुसमाचार सुनाने का ढाढ़स मिला है (पद.14) l
बाधाओं के बावजूद, पास्टर सैम और प्रेरित पौलुस ने परमेश्वर को उनके संकट में नए मार्ग दिखाते हुए पाया l आज हमारी चुनौतीपूर्ण स्थितियों में परमेश्वर क्या कर रहा है?
कठोर संवाद
मैं पचास मील गाड़ी चलाकर एक दूर के कार्यकर्ता से कठोर बातचीत करने गया l मुझे एक अन्य कर्मचारी से एक रिपोर्ट मिली थी जिसने यह सुझाया था कि वह हमारी कंपनी को गलत ढंग से पेश कर रहा था, और हमारे लोकमत के विषय मैं चिंतित था l मैं एक राय देने के लिए परेशान हुआ जो उसके चुनाव को बदल सकता था l
1 शमुएल 25 में, एक अविश्वसनीय व्यक्ति ने एक बड़ा व्यक्तिगत जोखिम उठाकर इस्राएल के भावी राजा का सामना किया जो एक विनाशकारी चुनाव करनेवाला था l अबीगैल का विवाह नाबाल से हुआ था, जिसका चरित्र उसके नाम के अर्थ के साथ मेल खाता था ("मूढ़") (पद.3, 25) l नाबाल ने दाऊद और उसकी सेना को उसके पशुओं की रक्षा के लिए प्रथागत मजदूरी का भुगतान करने से इनकार कर दिया था (पद.10-11) l यह सुनकर कि दाऊद ने उसके समस्त घराने से प्राणघाती बदला लेने की ठान ली है, और यह जानकार कि उसका मूर्ख पति कारण नहीं सुनेगा, अबीगैल ने शांति की पेशकश करके, दाऊद से मिलने गयी, और उसे पुनः विचार करने को राज़ी किया (पद.18-31) l
अबीगैल ने यह कैसे किया? दाऊद और उसके लोगों को संतुष्ट करने और ऋण चुकाने के लिए भोजन से लदे गधों को आगे भेजने के बाद, उसने दाऊद से सच बोला l उसने बुद्धिमानी से दाऊद को उसके जीवन की बुलाहट याद दिलाई l जब परमेशवर ने उसे राजा बनाया था, यदि वह बदला लेने की अपनी इच्छा को रोकता, तो उसे "इस कारण पछताना न [होता], या मेरे प्रभु का हृदय पीड़ित न होता कि तू ने अकारण खून किया" (पद.31) l
आप किसी को एक खतरनाक गलती के निकट जानते भी होंगे जिससे दूसरों को हानि पहुँच सकती है और परमेश्वर के लिए उसकी भावी प्रभावशीलता जोखिम में पड़ सकती है l अबीगैल की तरह, शायद परमेश्वर आपको एक कठोर संवाद के लिए बुला रहा होगा?
निर्माण न रोकें
जब काम में एक नयी भूमिका निभाने का अवसर मिला, साइमन ने उसे परमेश्वर की ओर से माना l निर्णय पर प्रार्थना करके और सलाह लेकर, उसने महसूस किया कि परमेश्वर उसे और बड़ी जिम्मेदारी दे रहा है l सब कुछ ठीक था, और उसके बॉस ने उसके कदम को सराहा l तब बातें बिगड़ने लगीं l कुछ सहयोगियों ने उसकी पदोन्नति से अप्रसन्न होकर सहयोग बंद किया l वह यह जिम्मेदारी छोड़ने पर विचार करने लगा l
जब इस्राएली परमेश्वर का घर बनाने यरूशलेम लौटे, शत्रुओं ने उन्हें भयभीत और हतोत्साहित किया (एज्रा 4:4) l पहले तो इस्राएली ठहर गए, किन्तु परमेश्वर द्वारा हाग्गै और जकर्याह नबी के उत्साहवर्धन के बाद निर्माण जारी रहा (4:24-5:2) l
एक बार फिर, शत्रु उनको परेशान करने आए l किन्तु यह जानकार कि "परमेश्वर की दृष्टि उन पर [लगी हुयी है]" (5:5) वे लगे रहे l वे दृढ़ता से परमेश्वर के निर्देशों को थामे हुए और उसपर भरोसा करके हर एक विरोध के बीच निर्माण जारी रखा l निश्चित रूप से, परमेश्वर ने मंदिर निर्माण पूरा होने के लिए फारस के राजा का समर्थन उनकी ओर कर दिया (पद.13-14) l
उसी प्रकार, साइमन ने यह समझने के लिए परमेश्वर की बुद्धिमत्ता मांगी कि उसे वहाँ रहना चाहिए या नयी जगह खोजनी चाहिए l वहाँ रहने हेतु परमेश्वर की इच्छा को जानकार, उसने दृढ़ रहने के लिए परमेश्वर की सामर्थ्य पर भरोसा किया l समय के साथ, उसने धीरे-धीरे अपने सहयोगियों की स्वीकृति प्राप्त कर लिया l
जब हम परमेश्वर का अनुसरण करते हैं, जहाँ भी वह हमें रखता है, हम विरोध का सामना कर सकते हैं l उसी समय हमें उसका अनुसरण करना होगा l वह हमारा मार्गदर्शन करते हुए हमें लिए चलेगा l
स्पर्श करने की ताकत
भारत में बीसवीं सदी के अग्रणी चिकित्सा मिशनरी डॉ. पॉल ब्रैंड ने कुष्ठ रोग से जुड़े कलंक को देखा l एक मुलाकात के दौरान, उन्होंने मरीज को आश्वास्त करने के लिए छूआ कि इलाज संभव था l उस व्यक्ति के आँसू बहने लगे l एक परिचर ने यह कहते हुए डॉ. ब्रैंड को उस मरीज का आँसू समझाया, "आपने उसे छूआ और वर्षों से उसे किसी ने नहीं छूआ है l ये ख़ुशी के आँसू हैं l"
यीशु की आरंभिक सेवा में, एक कुष्ठ रोगी उसके पास आया l कुष्ठ सभी प्रकार के संक्रामक त्वचा रोगों के लिए प्राचीन सूचक था l पुराना नियम की व्यवस्था अनुसार इस व्यक्ति को अपने रोग के कारण अपने समाज से बाहर रहना अनिवार्य था l इत्तेफाक से रोगी का स्वस्थ्य व्यक्तियों के निकट संपर्क में आने पर उसे ऊँची आवाज़ में, "अशुद्ध! अशुद्ध!" पुकारना होता था जिससे लोग उससे दूर चले जाएँ (लैव्यव्यावस्था 13:45-46) l परिणामस्वरूप, उक्त व्यक्ति मानव संपर्क से महीनों या वर्षों तक दूर हो सकता था l
तरस से भरकर, यीशु ने हाथ बढ़ाकर उस व्यक्ति को छूआ l यीशु अपनी सामर्थ्य और अधिकार से मात्र एक शब्द बोलकर लोगों को चंगा कर सकता था (मरकुस 2:11-12) l लेकिन जब यीशु एक व्यक्ति से जो खुद को अपने शारीरिक बीमारी के कारण अकेला और तिरस्कृत महसूस करता था मुलाकात की, उसके स्पर्श ने उस व्यक्ति को निश्चित किया कि वह अकेला नहीं किन्तु स्वीकृत है l
जब परमेश्वर हमें अवसर देता है, हम सम्मान और महत्त्व के कोमल स्पर्श द्वारा करुणा और तरस दिखा सकते हैं l मानव स्पर्श की सरल, उपचार शक्ति, दुखित लोगों को हमारी देखभाल और चिंता लम्बे समय तक याद दिलाती है l
परमेश्वर कौन है के लिए धन्यवाद
ग्रीटिंग कार्ड्स पर मुद्रित हजारों भावनाओं में से, शायद सबसे मर्मस्पर्शी यह सरल कथन है: "आप के व्यक्तित्व के लिए धन्यवाद l" अगर आपको वह कार्ड प्राप्त होता है, तो आप जानते
हैं कि कोई आपकी परवाह करता है इसलिए नहीं क्योंकि आपने उसके लिए कुछ असाधारण किया है, लेकिन इसलिए कि आपके गुण के लिए आपकी सराहना की जाती है l
मैं सोचता हूँ कि इस तरह की भावना हमें परमेश्वर को "धन्यवाद" कहने का सबसे अच्छा तरीका बता सकती है l निश्चित रूप से, ऐसा समय होता है जब परमेश्वर हमारे जीवन में स्पष्ट तरीके से हस्तक्षेप करता है, और हम कुछ इस तरह कहते हैं, "धन्यवाद, परमेश्वर, मुझे वह नौकरी मिली l" किन्तु अक्सर, हम केवल यह कह सकते हैं, "परमेश्वर, आप के व्यक्तित्व के लिए धन्यवाद l"
इसी तरह की भावनाएं प्रगट करते कुछ पद, 1 इतिहास 16:34 : "यहोवा का धन्यवाद करो, क्योंकि वह भला है; उसकी करुणा सदा की है l" परमेश्वर, आप जो हैं, भले और प्रेमी, उसके लिए धन्यवाद l और भजन 7:17 : "मैं यहोवा के धर्म(धार्मिकता) के अनुसार उसका धन्यवाद करूँगा l" परमेश्वर, आप जो हैं, पवित्र, उसके लिए धन्यवाद l "हम धन्यवाद करते हुए उसके सम्मुख आएँ, . . . क्योंकि यहोवा महान् ईश्वर है" (भजन 95:2-3) l परमेश्वर, आप जो हैं, संसार के सर्वशक्तिमान परमेश्वर, उसके लिए धन्यवाद l
परमेश्वर जो है l यह हमारे लिए ठहरकर उसकी स्तुति और धन्यवाद करने का पर्याप्त कारण है l परमेश्वर, आप जो है उसके लिए धन्यवाद!
खतरनाक विकर्षण
कलाकार सिग्सिमुंड गोएट्ज ने इंग्लैंड के विक्टोरियन-युग को "Despised and Rejected of Men" नामक एक पेंटिंग के साथ चौंका दिया l उसमें उसने पीड़ित, निन्दित यीशु को गोएट्ज़ के अपने युग के लोगों से घिरा हुआ दिखाया l वे अपने हितों से अत्यधिक बर्बाद हो रहे थे अर्थात् व्यापार, रोमांस, राजनीति - कि वे उद्धारकर्ता के बलिदान के प्रति अंजान थे l यीशु के क्रूस के नीचे की भीड़ की तरह, मसीह के प्रति उदासीन, आस-पास की भीड़, को बोध नहीं था कि उन्होंने क्या और किसे छोड़ दिया है l
हमारे युग में भी, सरलता से विश्वासी और अविश्वासी समान रूप से शाश्वत से विकर्षित हो जाते हैं l यीशु के अनुयायी परमेश्वर के महान प्रेम की सच्चाई के साथ इस धुंध से निकल सकते हैं? हम परमेश्वर के संगी बच्चे परस्पर प्रेम करके आरंभ कर सकते हैं l यीशु ने कहा, "यदि आपस में प्रेम रखोगे, तो इसी से सब जानेंगे कि तुम मेरे चेले हो" (यूहन्ना 13:35) l
किन्तु वास्तविक प्रेम वहाँ नहीं रुकता है l हम उद्धारकर्ता की ओर लोगों को आकर्षित करने की आशा से उस प्रेम को सुसमाचार द्वारा साझा करते हैं l जिस प्रकार पौलुस ने लिखा, "हम मसीह के राजदूत हैं" (2 कुरिन्थियों 5:20) l
इस तरह, मसीह की देह परमेश्वर के प्रेम को, जिसकी हमें नितांत आवश्यकता है, परस्पर और अपने संसार के सामने परावर्तित और प्रक्षेपित भी कर सकती है l काश पवित्र आत्मा की सामर्थ्य से, दोनों ही प्रयास, विकर्षणों से निकलने में सहायता करे, जो यीशु में परमेश्वर के प्रेम का आश्चर्य देखने में बाधित न कर सके l