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यह अद्भुत है!

अपनी प्राकृतिक अवस्था में हम सभी उससे से रहित हैं। (रोमियो 3:23)

यीशु उस का प्रकाश था (इब्रानियों 1:3), और जो उन्हें जानते थे, उन्होंने उस की महिमा देखी (यूहन्ना 1:14)।

उस तेज ने तम्बू को भर दिया (निर्गमन 40:34–35), और इस्राएली उसकी अगुवाई में आगे बढ़ते थे।

और प्रतिज्ञा की गई है कि अंत समय में स्वर्ग उससे उज्जवलित होगा, ऐसा उजाला कि चान्द और सूरज के उजाले का प्रयोजन ना होगा (प्रकाशित वाक्य 21:23)।

उपर दिए सभी वाक्यों में "उस" शब्द क्या दिखता है? "उस" परमेश्वर की महिमा दिखता है। और वे अद्भुत हैं!

बाइबिल बताती है कि हम इस पृथ्वी पर, जिसे उन्होंने बनाया है, हमारे निवास करने के कारण हम परमेश्वर की भव्य महिमा की झलक पा सकते हैं। परमेश्वर की महिमा का वर्णन उनके अस्तित्व के बाहरी प्रदर्शन के रूप में किया गया है। अपनी उपस्थिति और कार्यों को वे  ब्रह्मांड के वैभव, हमारे उद्धार की विशालता और हमारे जीवन में पवित्र आत्मा की उपस्थिति में प्रकट करते हैं।  परमेश्वर की महानता के प्रमाण के लिए-उनकी महिमा की खोज करें। आप इसे प्रकृति की सुंदरता, एक शिशु की हंसी, और दूसरों के प्यार में देख सकेंगे। परमेश्वर उनकी महिमा से पृथ्वी को भरते हैं।

जीवन कैसे परिवर्तित करें

रॉक एंड रोल के सुप्रसिद्ध कलाकार ब्रूस स्प्रिंगस्टीन के कठिन बचपन में और डिप्रेशन से लगतार संघर्ष करने में सगींत कलाकारों के काम ने ही मदद की थी। अपने कार्य का अभिप्राय उन्हें उसी सत्य से मिला, जिसका अनुभव उन्होंने स्वयं किया था, “एक उचित गीत से आप किसी के जीवन को तीन मिनट में परिवर्तित कर सकते हैं”।

ध्यान से चुने हुए शब्द हमें आशा देते हैं, यहां तक कि जीवन बदल सकते हैं। जैसे किसी शिक्षक के शब्द जो संसार को देखने का हमारा नजरिया बदलते हैं, आत्मविश्वास बढ़ाने वाले उत्साह वर्धक शब्द, कठिन समय में मित्र के नम्र शब्द जो हमें सम्भालते हैं।

वचन की पुस्तक शब्दों को खज़ाना समझने और बुद्धिमानी से उनका उपयोग करने के हमारे उत्तरदायित्व पर बल देती है। हमारे शब्दों में मृत्यु और जीवन के परिणाम हो सकते हैं, (18:21 नीति)। शब्दों से हम किसी की आत्मा को दु:खित कर सकते हैं, या दूसरों के मनोबल को बढ़ा कर उन्हें मजबूत कर सकते हैं (15:4)।

प्रभावशाली संगीत बनाने की क्षमता हम सब में नहीं है। परन्तु अपनी बातों के माध्यम से दूसरों की सेवा करने के लिए हम परमेश्वर की बुद्धि मांग सकते हैं (भजन 141:3)। किसी के जीवन को कुछ शब्दों से बदलने के लिए परमेश्वर हमारा उपयोग कर सकते हैं।

अवसर की ओर कदम बढ़ाना

आम व्यक्तियों के समान, पर्याप्त व्यायाम के लिए मैं भी संघर्ष करता हूँ। हाल ही में मुझे  एक पेडोमीटर मिला जो कदमों को गिनता है। अब सोफे से उठना कुछ और कदम चलने का अवसर लगता है। ऐसे काम करना जैसे बच्चे को पानी ला देना आदि ऐसे अवसर होते हैं जो बड़े लक्ष्य की ओर बढ़ने में मेरी सहायता करते हैं। उस अर्थ में, मेरे पैडोमीटर ने मेरी धारणा और मेरी प्रेरणा बदल दिए हैं। अब जितना संभव हो मैं कुछ और कदम चलने के अवसर ढूंढता हूँ।

हमारा मसीही जीवन क्या कुछ ऐसा ही नहीं है। प्रत्येक दिन में लोगों की सेवा करने और उनसे बातचीत करने के अवसर होते हैं, जैसा पौलुस कुलुस्सियों 4:5 में समझाते हैं। परंतु क्या मैं साधारण प्रतीत होने वाली बातचीत में उत्साहजनक व्यक्ति होने के अवसर पर ध्यान देता हूँ? चाहे परिवार से, सहकर्मियों से या किराने की दुकान में काम करने वाले एक क्लर्क से हो, प्रत्येक बातचीत में परमेश्वर कार्य कर सकते हैं-भले ही वह “छोटी सी” प्रतीत होने वाली बात क्यों न हो, जैसे किसी रेस्तरां में वेटर से उसका हाल चाल पूछना।

जब हम उन अवसरों के प्रति सचेत होंगे जिन्हें वे हमारी ओर भेजते हैं, तो कौन जाने कि परमेश्वर उन क्षणों में कैसे काम करेंगे।

राष्ट्रीय खजाना

एक विज्ञापनदाता के दाऊद की माइकल एंजेलो द्वारा निर्मित प्रसिद्ध संगमरमर की मूर्ति के चित्र में परिवर्तन कर देने से इटली की सरकार और गैलरी के अधिकारियों ने आपत्ति की। एक अधिकारी ने कहा, कंधे पर गुलेल के स्थान पर राइफल के साथ दाऊद का चित्रण करना मूर्ति पर हथौड़ा मारने जैसा है या उससे भी बदतर।

यरूशलेम में, चरवाहा-गीतकार और सैनिक-राजा दाऊद से इजरायल की प्रियत्तम यादें और आशाएं जुड़ीं थी। भविष्यद्वक्ताओं के अनुसार दाऊद का वंशज इजरायल के दुश्मनों को हराएगा। सदियों बाद भीड़ ने यीशु का स्वागत दाऊद की सन्तान के रूप में (मत्ती 21:6-9), यह सोच के किया कि वह उनपर राज करने वाली रोमी सत्ता का नाश करेंगे। परन्तु यीशु ने तो अपने पिता के घर को प्रार्थनाघर के रूप में पुनर्स्थापित करने के लिए वहां लेन देन करने वालों की चौकियां उलट दीं। इज़राइल के अगुवे क्रोधित थे। यह वह मसीहा और दाऊद का पुत्र नहीं था, जिसे वे खोज रहे थे। इसलिए बिना जाने कि वे क्या कर हैं, उन्होंने रोमी शासकों से इज़राइल की सच्ची महिमा के हाथों और पैरों के लिए हथौड़ा मांग लिया। यीशु ने खुद को क्रूस पर उठाए जाने दिया और अपने शत्रुओं पर प्रेम से विजय पाई और सुसमाचार के प्रसार के लिए जाति-जाति की संतानों को नियुक्त किया।

बर्फ़ के समान सफेद

पिछले दिसंबर माह में, मेरा परिवार और मैं पहाड़ों पर गए थे। पहली बार हम सभी ने इतनी शानदार बर्फ़ को देखा। सफेद लबादे से ढके खेतों को ध्यान से देखते हुए, मेरे पति ने यशायाह से उद्धृत किया, "तुम्हारे पाप चाहे लाल रंग के हों तौभी हिम की नाईं उजले हो जाएंगे" (यशायाह 1:18)।

हमारी तीन साल की बेटी ने पूछा, "क्या रंग लाल बुरा होता है?" वह जानती है कि पाप उन बातों को कहते हैं जिन्हें परमेश्वर पसंद नहीं करते हैं, परन्तु यह पद रंगों के बारे में बात नहीं है। यहाँ चमकदार लाल रंग का वर्णन है जो एक छोटे से कीड़े के अंडे से निकलता है। कपड़े को इस लाली में दो बार रंगा जाता हैa जिससे रंग पक्का हो जाए। न तो बारिश से और न ही धोकर इसे हटाया जा सके। पाप इसी के समान होता है। कोई मानव प्रयास इसे दूर नहीं कर सकता है। इसकी जड़ मन में होती है।

पाप को दिल से केवल परमेश्वर निकाल सकते हैं। जब हम वचन का अनुसरण करते हैं "मन फिराओ...कि तुम्हारे पाप मिट जाएं" (प्रेरितों के काम 3:19), परमेश्वर हमें क्षमा कर एक नया जीवन देते हैं। केवल यीशु के बलिदान के माध्यम से-एक निष्पाप दिल पाते हैं। क्या ही अद्भुत उपहार है!

सामर्थी और सहज रूप से उपलब्ध

जब मुझे माँ के कैंसर का समाचार मिला तब मेरे पति ऑफिस में थे। एक मेसेज छोड़ कर मैं मित्रों और परिवार को फोन करने लगी। कोई भी उपलब्ध नहीं था। कांपते हाथों से चेहरे को ढक कर, मैं सिसकने लगी, "परमेश्वर मेरी मदद करें।" उन क्षणों में जब मैं पूरी तरह से अकेला महसूस कर रही थी तब एक आश्वासन ने, कि परमेश्वर मेरे साथ थे, मुझे शान्ति दी।

जब मेरे पति आ गए और मित्रों और परिवार से भी प्रोत्साहन मिलने लगा तो मैंने परमेश्वर को धन्यवाद दिया। फिर भी, अकेलेपन और दु:ख के उन कुछ घंटों में परमेश्वर की शांति देने वाली उपस्थिति ने मुझे यह आश्वासन दिया था कि परमेश्वर विश्वसनीय हैं और अति सहज से मिलने वाले सहायक हैं, मेरी हर ज़रूरत के समय में कभी भी, कहीं भी।

भजन 46 कहता हैं, परमेश्वर हमारा शरणस्थान...हमारा ऊँचा गढ़ है। परमेश्वर ने चेले बनाए ताकि वे प्रार्थनाएँ करते हुए एक-दूसरे को प्रोत्साहन और सहायता दें। लेकिन वे यह स्पष्ट भी करते हैं कि वह सामर्थी और सहज रूप से उपलब्ध रहते हैं। जब हम परमेश्वर को पुकारते हैं, तब हमारे लिए उनके उपाय के उनके वादे पर विश्वास कर सकते हैं। वह अपने लोगों के माध्यम से और साथ ही उनकी व्यक्तिगत उपस्थिति के माध्यम से हमें शांति देंगे।

एक बालक के समान

अपनी दो साल की बेटी के साथ शुभरात्रि की प्रार्थना के बाद, एक प्रश्न से मेरी पत्नी आश्चर्यचकित हो गई। "माँ, यीशु कहाँ हैं?"

लूएन ने जवाब दिया, "यीशु स्वर्ग में और वह हर जगह हैं, यहीं हमारे साथ। अगर तुम उन्हें आने का निमंत्रण दोगी तो वो तुम्हारे दिल में भी हो सकते हैं।"

"मैं चाहती हूँ कि यीशु मेरे दिल में आएं।"
"समय आने पर तुम उनसे कह सकती हो।"
"मैं अभी उन्हें मेरे दिल में आने के लिए कहना चाहती हूँ।"
तो हमारी नन्हीं बेटी ने कहा, "यीशु, कृपया मेरे दिल में आईए और मेरे साथ रहिए।" और इस प्रकार उनके साथ उसके विश्वास की यात्रा आरम्भ हो गई।

जब यीशु के चेलों ने पूछा, कि स्वर्ग के राज्य में बड़ा कौन है इस पर उन्होंने एक बालक को पास बुलाकर उनके बीच खड़ा किया। (मत्ती 18:1-2) “यदि तुम न फिरो और बालकों के समान न बनों...”। (3-5)

यीशु की दृष्टि से एक विश्वासी बालक को हम अपने विश्वास के प्रतीक के रूप में देख सकते हैं। हमें उन सभी को ग्रहण करने को कहा गया है जो अपने दिलों में उसे ग्रहण कर लेते हैं। "बालकों को मेरे पास आने दो,...स्वर्ग का राज्य ऐसों ही का है" (19:14)।

आनन्द

मैं जीबन की एक नई ऋतु की और बड रही हूँ-बुढ़ापे की "शीत"ऋतु-पर अभी वहां पहुंची नहीं हूँ। वर्ष गुज़रते जा रहे हैं और उनकी गति को धीमा करने का मन करता है, फिर भी मेरा आनन्द मुझे संभालता है। प्रति दिन एक नया दिन है जिसे प्रभु मुझे देते हैं। मैं कह सकती हूँ, "यहोवा का धन्यवाद करना भला है...। (भजन 92:1-2)

परमेश्वर मुझे सक्षम बनाते हैं कि भजनकार के साथ मिलकर "[उसके] हाथों के कामों के कारण आनन्द के गीत [गाऊँ]। (पद 4) इन आशीषों का: परिवार, मित्र, और संतोषजनक व्यवसाय। परमेश्वर की अद्भुत सृष्टि और उनके प्रेरित वचन का आनन्द। आनन्द क्योंकि यीशु ने हमसे इतना प्रेम किया कि हमारे पापों के लिए अपनी जान दे दी। आनन्द इसलिए क्योंकि उसने हमें पवित्र आत्मा दी जो सच्चे आनन्द का स्रोत है। (रोमियों 15:13) प्रभु पर विश्वास करने वाले "...पुराने होने पर भी फलते रहेंगे" (भजन 92:12-14)।

हमारी परिस्थितियां या जीवन की ऋतु कैसी भी हों, हम अपने जीवन जीने के तरीके और अपने शब्दों के माध्यम से उनके प्रेम का उदाहरण बन सकते हैं। प्रभु को जानने में और उनके लिए जीवन जीने में और उनके बारे में दूसरों को बताने में आनन्द मिलता है।

बात का अंतिम शब्द

फिलोसोफी की कक्षा के दौरान प्रोफेसर के विचारों के बारे किसी छात्र ने भड़काऊ टिप्णियाँ कीं। अन्य छात्र हैरान थे कि, शिक्षक ने उसका धन्यवाद किया और अगली टिपणी पर बढ़ गए।  पूछने पर कि उन्होंने उस छात्र को जवाब क्यों नहीं दिया वे कहने लगे, "मैं अन्त अपनी बात से ना करने के अनुशासन का अभ्यास कर रहा हूँ।"

यह शिक्षक परमेश्वर को प्रेम और आदर करते थे, और प्रेम दिखा कर वह विनम्र भावना का श्रेष्ठ उदाहरण बन गए। मुझे एक अन्य शिक्षक की याद आगई-सभोपदेशक की पुस्तक के लेखक। जिन्होंने कहा कि जब हम परमेश्वर के भवन में जाएं तब हमें सावधानी बरतनी चाहिए, हमें बातें करने और अपने मन में उतावली न करके "सुनने के लिए समीप जाना चाहिए"। ऐसा करके हम स्वीकार करते हैं कि परमेश्वर प्रभु हैं और हम उनकी रचना हैं। (सभोपदेशक 5:1-2)

आप परमेश्वर के भवन में कैसे आते हैं? यदि आपको कुछ सुधार की आवश्यकता है, तो क्यों ना कुछ समय प्रभु की महिमा और महानता पर विचार करने में बिताएं? उनके अंतहीन विवेक, सामर्थ, और उपस्थिति पर विचार करके, हमारे प्रति उनके उमड़ते प्रेम से हम आदर भाव का अनुभव कर सकते हैं। विनम्रता के इस भाव से, हमें भी अपनी बात से अन्त नहीं करना चाहिए।