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पर्याप्त

हम पति-पत्नी से हमारे घर में छोटे समूह की मेजबानी करने के आग्रह को मैंने अस्वीकार किया l बैठने के लिए अपर्याप्त स्थान और छोटा घर होने से मैंने  अयोग्यता महसूस की l हम यह भी नहीं जानते थे, हम इस चर्चा में मददगार होंगे या नहीं l मैं चिंतित थी कि मुझे भोजन पकाना होगा जिसके लिए मेरे पास उत्सुकता और धन कम था l मेरी समझ में हमारे पास “प्रयाप्त” साधन नहीं था, हमारे लिए करने को “पर्याप्त” नहीं था l किन्तु हम परमेश्वर और अपने समुदाय के लिए करना चाहते थे, इस कारण भय के बाद भी, हम तैयार हो गए l अगले पाँच वर्षों तक अपने बैठक में इस समूह की मेजबानी आनंददायक थी l

मैं परमेश्वर के सेवक, एलिशा के पास रोटी लानेवाले व्यक्ति के अन्दर भी समान अनिच्छा देखता हूँ l  एलिशा ने उसे लोगों को परोसने को कहा था, किन्तु वह व्यक्ति शंकित था  कि सौ लोगों के लिए वह अपर्याप्त होगा l वह अपनी मानवीय समझ में भोजन को अपर्याप्त मानकर परोसना नहीं चाहा l फिर भी वह पर्याप्त से अधिक था (2 राजा 4:44), क्योंकि परमेश्वर ने आज्ञाकारिता में दिए हुए उसके दान को, पर्याप्त बना दिया l

अयोग्य महसूस करने पर, अथवा अपने दान को अपर्याप्त समझने पर, याद रखे कि परमेश्वर चाहता है कि जो हमारे पास है उसे हम विश्वासयोग्य आज्ञाकारिता में दे दें l वह ही उसे “पर्याप्त” कर देगा l

कब तक?

विवाह के बाद मैंने सोचा कि मेरे शीघ्र बच्चे होंगे l ऐसा नहीं होने की पीड़ा के कारण मैं प्रार्थना करने लगी l मैंने अक्सर परमेश्वर को पुकारा, “कब तक?” मैं जानती थी कि परमेश्वर मेरी अवस्था को बदल सकता है l क्यों नहीं वह बदल रहा था?”

क्या आप परमेश्वर के लिए ठहरे हैं? क्या आप पूछ रहे हैं, कब तक, प्रभु, इससे पूर्व कि न्याय इस पृथ्वी पर आ जाए? कैंसर के इलाज से पूर्व? मेरे कर्ज से निकलने से पूर्व?

हबक्कूक नबी इन भावनाओं से परिचित था l ई.पू. सातवीं शताब्दी में, उसने प्रभु को पुकारा : “हे यहोवा, मैं कब तक तेरी दोहाई देता रहूँगा, और तू न सुनेगा? मैं कब तक तेरे सम्मुख ‘उपद्रव,’ उपद्रव’ चिल्लाता रहूँगा? क्या तू उद्धार नहीं करेगा? (हबक्कूक 1:2-3) l वह लम्बे समय तक प्रार्थना और संघर्ष करता रहा कि किस तरह एक सामर्थी परमेश्वर दुष्टता, अन्याय, और भ्रष्टाचार को यहूदा में जारी रहने दे सकता है l जहाँ तक हबक्कूक का ख्याल था, परमेश्वर को हस्तक्षेप कर देना चाहिए था l क्यों नहीं परमेश्वर कुछ कर रहा था?

ऐसे दिन होते हैं जब हम सोचते हैं जैसे परमेश्वर निष्क्रिय है l हबक्कूक की तरह, हमने लगातार परमेश्वर से पुछा है, “कब तक?”

फिर भी, हम अकेले नहीं हैं l हबक्कूक की तरह, परमेश्वर हमारी भी सुनता है l हम निरंतर उनको परमेश्वर पर डालें l परमेश्वर हमारी सुनता है, और अपने समय में उत्तर देगा l

यदि मुझे उस वक्त मालूम होता ...

घर लौटते समय, मैं “Dear Younger Me,” गीत सुन रही थी जो खूबसूरती से पूछता है : यदि मैं अतीत में लौट पाती, जानते हुए जो मैं अभी जानती हूँ, आप अपने युवा व्यक्तित्व से क्या कहते? सुनते हुए, मैंने अपने कम बुद्धिमान युवा व्यक्तित्व को थोड़ी बुद्धि और चेतावनी देना चाही l हममें से बहुतों में जीवन के किसी मोड़ पर भिन्न तरीके से काम करने की इच्छा हुई होगी-काश हम सब कुछ दोहरा पाते l

किन्तु गीत बताता है कि यद्यपि हमारा अतीत हमें खेदित करे, हमारे समस्त अनुभवों ने हमें बनाया है l हम लौट नहीं सकते अथवा अपने चुनाव या पाप के परिणाम को बदल नहीं सकते l किन्तु परमेश्वर का धन्यवाद हो कि हमें अपने अतीत के भारी बोझ और गलतियों को उठाकर घूमने की ज़रूरत नहीं l यीशु के काम के कारण! “जिसने ... अपने बड़ी दया से हमें जीवित आशा के लिए नया जन्म दिया” (1 पतरस 1:3) l

विश्वास में उसकी ओर लौटकर अपने पापों के लिए खेदित होने पर, वह हमें क्षमा करेगा l हम उस दिन बिल्कुल नए बनाए जाएंगे और आत्मिक रूपांतरण की प्रक्रिया आरंभ करेंगे (2 कुरिं. 5:17) l हमने क्या किया था (अथवा नहीं किया था) इसका कोई औचित्य नहीं, क्योंकि उसके काम से हम क्षमा किये गए l हम आगे बढ़ते हुए, वर्तमान का पूरा लाभ उठाकर उसके साथ भविष्य की आशा कर सकते हैं l मसीह में, हम स्वतंत्र हैं!

हमारे ऊपर मंडराना

बेट्टी की बेटी विदेश दौरे से अस्वस्थ्य होकर घर लौटी l दर्द असहनीय होने पर बेट्टी और उसके पति उसे हॉस्पिटल के एमरजेंसी कमरे में ले गए l डॉक्टर्स और नर्सेज उसका इलाज करने लगे, फिर कुछ घंटे बाद एक नर्स ने बेट्टी से बोली, “वह ठीक हो जाएगी! हम उसकी अच्छी देखभाल करेंगे और वह स्वस्थ्य हो जाएगी l” उस क्षण बेट्टी ने शांति और प्रेम महसूस किया l उसने जाना कि जब वह अपनी बेटी के विषय चिंतित थी, प्रभु अपने बच्चों की देखरेख करनेवाला, कठिन समय में शांति देनेवाला सिद्ध पालक है l

व्यवस्थाविवरण की पुस्तक में, प्रभु ने अपने लोगों को याद दिलाया कि मरुभूमि में फिरते समय उसने पालक की तरह अपने बच्चों को संभालता रहा l उसने उनको नहीं छोड़ा, किन्तु उकाब की तरह, जो “अपने बच्चों के ऊपर ऊपर मंडलाता है, वैसे ही अपने पंख फैलाकर उनको अपने परों पर उठा लिया” (32:11) l वह चाहता था कि वे याद रखें कि उनके मरुभूमि में कठिनाई और संघर्ष के बावजूद, उसने उनको नहीं छोड़ा l

हम भी अनेक चुनौतियों का सामना करने के बावजूद इस बात से ढाढ़स प्राप्त कर सकते हैं कि हमारा परमेश्वर हमें नहीं छोड़ेगा l जब हम पराजय महसूस करें, प्रभु एक उकाब की तरह अपने पंख फैलाकर हमें उठा लेगा (पद.11) जब वह शांति लेकर आएगा l

दिव्य रुकावटें

विशेषज्ञ यह मानते हैं कि प्रतिदिन ख़ासा समय रुकावाटों में नष्ट हो जाता है l कार्य हो अथवा घर, एक फ़ोन कॉल अथवा किसी से अनपेक्षित मुलाकात हमें सरलता से हमारे मुख्य उद्देश्य से भटका देती हैं l

हममें से अनेक अपने जीवनों में रुकावटें पसंद नहीं करते, विशेषकर जब वे परेशानी उत्पन्न करते हैं अथवा हमारी योजनाओं को बदल देते हैं l किन्तु जो रुकावटें महसूस होती हैं उनके साथ यीशु भिन्न तरीके से पेश आया l बार-बार सुसमाचारों में, हम प्रभु को रूककर ज़रुरतमंदों की सहायता करते पाते हैं l

यीशु का यरूशलेम जाते समय जहाँ उसे क्रूसित होना था, सड़क किनारे बैठा एक अंधे व्यक्ति ने उसे पुकारा, “हे यीशु, दाऊद की संतान, मुझ पर दया कर!” (लूका 18:35-38) l भीड़ में से कुछ लोगों ने उसे शांत रहने को कहा, किन्तु वह यीशु को पुकारता रहा l यीशु ने रुककर उससे पूछा, “ ‘तू क्या चाहता है कि मैं तेरे लिए करूँ?’  ‘हे प्रभु, यह कि मैं देखने लगूँ,’ उसने कहा l यीशु ने उससे कहा, ‘देखने लग; तेरे विश्वास ने तुझे अच्छा कर दिया है’ “ (पद.41-42) l

जब एक असली ज़रूरतमंद द्वारा आपकी योजना बाधित होती है, हम उससे करुणा सहित व्यवहार करने के लिए प्रभु से बुद्धि मांगे l जिसे हम रूकावट कहते हैं वह उस दिन के लिए प्रभु की ओर से एक दिव्य सुअवसर हो सकता है l

संकट में कल्पना की गई

मार्क को वह क्षण याद है जब उसके पिता ने परिवार को बुलाया l कार ख़राब थी, महीने के अंत तक परिवार के पास पैसे नहीं होते l पिता ने प्रार्थना करके परिवार को परमेश्वर पर आशा रखने को कहा l  

आज मार्क को परमेश्वर की अद्भुत सहायता याद है l एक मित्र ने कार मरम्मत करवा दी; अनपेक्षित चेक आ गए; घर में भोजन पहुँच गया l परमेश्वर की स्तुति सरल थी l किन्तु परिवार की कृतज्ञता संकट की भट्टी में विकसित हुई थी l

आराधना गीतों को भजन 57 से अत्यधिक प्रेरणा मिली है l जब दाऊद ने कहा, “तू स्वर्ग के ऊपर महान है” (पद.11), हम उसे मध्य पूर्व के अद्भुत रात में आसमान की ओर टकटकी लगाए, अथवा मंदिर की आराधना में गाते हुए कल्पना कर सकते हैं l किन्तु वास्तव में भयभीत दाऊद एक गुफा में छिपा था l

“मेरा प्राण सिंहों के बीच में है,” दाऊद कहता है l ये “मनुष्य” हैं जिनके “दांत बर्छी और तीर” हैं (पद.4) l दाऊद की प्रशंसा संकट से निकली l यद्यपि वह उसकी मृत्यु चाहनेवाले शत्रुओं से घिरा था, दाऊद ने ये अद्भुत शब्द लिखे : “हे परमेश्वर, मेरा मन स्थिर है ... मैं गाऊंगा वरन् भजन कीर्तन करूँगा” (पद.7) l

आज हम हर संकट में, परमेश्वर से मदद प्राप्त कर सकते हैं l तब हम आशा से, उसकी अनंत देखभाल में उसकी बाट जोह सकते हैं l

सही प्रार्थना सहयोगी

आपसे प्रेम और आपके लिए प्रार्थना करनेवाले की आवाज़ सुनना मधुर है l किसी मित्र का आपके लिए करुणा और परमेश्वर द्वारा प्रदत्त अंतर्दृष्टि से प्रार्थना करते सुनना स्वर्ग का पृथ्वी को स्पर्श करने जैसा है l 

यह जानना कितना अच्छा है कि हमारे प्रति परमेश्वर की भलाई के कारण हमारी प्रार्थनाएँ स्वर्ग को भी स्पर्श कर सकती हैं l कभी-कभी प्रार्थना करते समय हम शब्दाभाव और अयोग्यता महसूस करते हैं, किन्तु यीशु ने अपने अनुगामियों को सिखाया कि हमें “ [सदा] प्रार्थना  करना [चाहिए] और हियाव न[हीं] छोड़ना चाहिए” (लूका 18:1) l परमेश्वर का वचन हमें दिखाता है कि ऐसा संभव है, क्योंकि “मसीह ... हमारे लिए निवेदन भी करता है” (रोमियों 8:34) l

हम कभी भी अकेले प्रार्थना नहीं करते, क्योंकि यीशु हमारे साथ प्रार्थना करता है l वह हमें प्रार्थना करते हुए सुनकर हमारे पक्ष में पिता से बातें करता है l हमें अपने वाक्पटुता की चिंता नहीं करनी चाहिए, क्योंकि यीशु की तरह हमें कोई नहीं समझता l वह हर प्रकार से हमारी मदद करके हमारी ज़रूरतें परमेश्वर के समक्ष प्रस्तुत करता है l वह सिद्ध बुद्धिमत्ता और प्रेम के साथ हमारे प्रत्येक निवेदन का सही उत्तर सही समय पर देना जानता है l

यीशु सही प्रार्थना सहयोगी है-मित्र जो हमारे लिए असीमित दया के साथ विनती करता है l हमारे लिए उसकी प्रार्थना का हम ब्यान नहीं कर सकते, और इसलिए हम धन्यवादी होकर प्रार्थना करने का उत्साह प्राप्त करें l

बढ़ने में समय

अपने शिशु कक्षा में प्रथम दिन, छोटी चारलोट से खुद को बनाने को कहा गया l उसकी तस्वीर में शरीर के लिए एक सरल गोला, एक अंडाकार सिर, और आँखें दो गोले थे l फिर अंतिम दिन उससे अपनी तस्वीर बनाने को कहा गया l इसमें रंगीन वस्त्र, एक मुस्कराते चेहरे के साथ स्पष्ट मुखाकृति, सुन्दर लाल रंग के लहराते बाल थे l स्कूल ने एक सरल कार्य द्वारा दर्शा दिया कि समय परिपक्वता के  स्तर में अंतर लाता है l

जबकि हम स्वीकार करते हैं कि बच्चों के परिपक्वता में समय लगता है, हम खुद के साथ अथवा सह विश्वासियों के धीमी आत्मिक विकास से अधीर हो जाते हैं l हम “आत्मा के फल” (गला. 5:22-23), देखकर आनंदित होते हैं, किन्तु पापमय चुनाव देखकर दुखित होते हैं l इब्रानियों का लेखक कलीसिया को लिखते हुए यह बात प्रगट करता है : “समय के विचार से तो तुम्हें गुरु हो जाना चाहिए था, तौभी यह आवश्यक हो गया है कि कोई तुम्हें परमेश्वर के वचनों की आदि शिक्षा फिर से सिखाए” (इब्रा. 5:12) l

जब हम स्वयं यीशु के साथ निकटता में आगे बढ़ते हैं, हम परस्पर प्रार्थना करते हुए धीरज से परमेश्वर से प्रेम करनेवालों के साथ हो लें जो आत्मिक उन्नत्ति के लिए संघर्षरत हैं l “प्रेम में सच्चाई से चलते हुए,” हम परस्पर उत्साहित करें, ताकि हम साथ मिलकर “चलते हुए सब बातों में उसमें जो सिर है, अर्थात् मसीह में बढ़ते जाएँ (इफि.4:15) l

बिल्कुल नया

कुछ वर्ष पूर्व एक प्रकाशक ने गलती की l एक पुस्तक बहुत वर्षों से बिक रही थी, इसलिए उसमें बदलाव ज़रूरी था l लेखक ने पुस्तक को पुनः लिखकर उसे बिल्कुल नया करना चाहा l किन्तु नए संकरण के प्रकाशन बाद, समस्या खड़ी हो गई l प्रकाशक ने नये आवरण के साथ पुरानी पुस्तक को छाप दी l

बाहरी आवरण साफ़ और नया था, किन्तु भीतर पुराना और पुराना l यह “नया संस्करण” नया नहीं था l

कभी-कभी लोग मानते हैं कि जीवन में बदलाव ज़रूरी है l बातें गलत दिशा में जा रही हैं l इसलिए हृदय में ज़रूरी बदलाव किये बिना बाहरी आवरण बदल देते हैं l वे किसी बाहरी आचरण को बदल देते हैं किन्तु समझते नहीं कि केवल परमेश्वर ही अन्दर का बदलाव ला सकता है l

यूहन्ना 3 में, निकुदेमुस ने ऐसा महसूस किया क्योंकि यीशु “परमेश्वर की ओर से” था (पद.2) l उसने बिल्कुल भिन्न बात बताया l यीशु के कहने पर निकुदेमुस ने पहचाना कि यीशू नए जन्म से कम कुछ नहीं देता है (पद.4) : उसे बिल्कुल नया बनने के लिए “नए सिरे” से जन्म लेना था (पद.7) l

बदलाव केवल यीशु मसीह पर विश्वास करने से आता है l यह तब होता है जब “पुरानी बातें बीत” जाती हैं और “सब बातें नयी” हो जाती हैं (2 कुरिं. 5:17) l क्या आपको परिवर्तन चाहिए? यीशु में विश्वास करें l वही आपके हृदय को बदलकर सब कुछ बिल्कुल नया कर देता है l