शांति और भरोसा
छः वर्ष की उम्र में मैं पहली बार अपने बड़े भाई के साथ रोलर कोस्टर(टेढ़ा-मेढ़ा घुमावदार रेल पथ) का आनंद लिया l जैसे ही वह तीव्र गति से मुड़ा मैंने चिल्लाना शुरू किया : “इसे अभी रोक दो ! मैं उतरना चाहता हूँ!” रोलर कोस्टर नहीं रुका, और मुझे पूरे सैर में “अत्यधिक तनाव में” उसे पूरी ताकत से थामे रहना पड़ा l
कभी-कभी जीवन भी अनचाहे रोलर कोस्टर सैर के समान हो सकता है जिसमें सीधी “ढलान” और दोहरे मोड़ हैं जिनसे हम अज्ञान हैं l जब अनापेक्षित कठिनाइयां आती हैं, बाइबिल हमें याद दिलाती है कि हमारा परमेश्वर पर भरोसा करना ही हमारा सर्वोत्तम उपाय है l वह अशांत समय ही था जब आक्रमण द्वारा उसके देश को धमकी दिए जाने पर नबी यशायाह ने आत्मा से प्रेरित होकर परमेश्वर की ओर से इस प्रबल प्रतिज्ञा को पहचाना : “जिसका मन तुझ में धीरज धरे हुए है, उसकी तू पूर्ण शांति के साथ रक्षा करता है, क्योंकि वह तुझ पर भरोसा रखता है” (यशायाह 26:3) l
उद्धारकर्ता की ओर उन्मुख होने से प्राप्त शांति “समझ से परे है” (फ़िलि. 4:7) l मैं स्तन कैंसर पीड़ित महिला के शब्द भूल नहीं सकता हूँ l एक शाम हमारी कलीसिया के एक समूह द्वारा उसके लिए प्रार्थना करने के बाद, उसने कहा, “मैं नहीं जानती क्या होगा, किन्तु मैं जानती हूँ कि मैं ठीक हो जाउंगी, क्योंकि आज शाम प्रभु हमारे साथ था l”
जीवन के पास अपनी परेशानियाँ होंगी, किन्तु जीवन की अपेक्षा हमसे अधिक प्रेम करनेवाला हमारा प्रभु, उन सबसे महान है l
एक साल में बाइबिल
अपने विद्यार्थियों की खराब लेखन आदतों से परेशान, प्रसिद्ध लेखक और कॉलेज प्रोफेसर डेविड फ़ॉस्टर वालस ने उनके कौशल को सुधारने का विचार किया l उसी क्षण एक चौंकाने वाले प्रश्न से उसका सामना हुआ l प्रोफेसर ने खुद से पूछा कि क्यों एक विद्यार्थी उसके जैसा “आत्म संतुष्ट, संकुचित, पाखंडी, [और] दूसरों को नीचा दिखाने वाले” की सुने l वह जानता था कि वह अहंकारी था l
वह प्रोफेसर बदल सकता था और बदल भी गया किन्तु अपने किसी विद्यार्थी के समान नहीं बन सका l तथापि जब यीशु इस धरती पर आया, वह हममें से एक के समान बनकर हमें नम्रता दिखा दिया l सभी सीमाओं को लांघकर, यीशु सेवा, शिक्षा, और अपने पिता की इच्छा पूरा करते हुए हर स्थान को अपने घर जैसा बना दिया l
उसी प्रकार क्रूसित होते समय भी, यीशु ने अपने हत्यारों के लिए क्षमा मांगी (लूका 23:34) l हर एक तकलीफदेह श्वास लेने का प्रयास करते समय भी उसने अपने साथ मरते हुए एक अपराधी को अनंत जीवन प्रदान किया(पद. 42-43) l
यीशु ने ऐसा क्यों करना चाहा? क्यों उसने अपने जीवन के अंत में भी हमारे समान लोगों की सेवा की? प्रेरित यूहन्ना बताता है l प्रेम के कारण! वह लिखता है, “हम ने प्रेम इसी से जाना कि उसने हमारे लिए अपने प्राण दे दिए l” तब वह हमें इसे स्वीकार करने हेतु बाध्य करता है l “और हमें भी भाइयों के लिए प्राण देना चाहिए” (1 यूहन्ना 3:16) l
यीशु ने हमें दिखाया कि उसका प्रेम हमारे अहंकार को, हमारी आत्म-संतुष्टि को, दूसरों को नीचा दिखाने वाला हमारे स्वभाव को समाप्त कर देता है l
नोज़ोमी की आशा
2011 में, टोकियो के उत्तरपूर्व क्षेत्र में 9 माप का भूकंप आया और परिणाम स्वरूप सुनामी ने लगभग 19,000 जानें ले लीं और 2,30,000 घर बर्बाद हो गए l उसके बाद, नोज़ोमी प्रोजेक्ट, जापानी शब्द “आशा” के लिए रखा गया नाम दीर्घकालिक आय, समुदाय, इज्ज़त, और प्रावधान करनेवाले परमेश्वर में आशा के लिए जन्म लिया l
नोज़ोमी स्त्रियाँ घरों के मलबे एवं साज़-सामानों में चीनी मिटटी के टुकड़े खोजकर और छानकर निकालती हैं और उन्हें रगड़कर ज़ेवर बनाने में लगाती हैं l ये ज़ेवर विश्व में बेचे जाते हैं, और स्त्रियों को जीविका देने के साथ-साथ मसीह में उनके विश्वास के प्रतीक भी लोगों में बांटे जाते हैं l
नए नियम के काल में, मिट्टी के साधारण अनिश्चित बरतनों में कीमती वस्तुओं को छिपाने का रिवाज़ था l पौलुस वर्णन करता है कि कैसे सुसमाचार का धन मसीह के अनुयायियों के मानवीय भंगुरता में रखा हुआ है : मिट्टी के बरतनों में (2 कुरिं. 4:7) l वह सलाह देता है कि वास्तव में हमारे जीवन रुपी तुच्छ और कभी-कभी टूट्रे हुए बर्तन भी - हमारी अपूर्णताओं की तुलना में परमेश्वर की सामर्थ्य को प्रगट कर सकते हैं l
जब परमेश्वर हमारे जीवनों के अपूर्ण और टूटे भागों में प्रवेश करता है, उसकी सामर्थ्य की आशा भरी चंगाई अक्सर दूसरों के सामने अधिक प्रत्यक्ष होती है l अवश्य ही, हमारे हृदयों में उसका सुधार कार्य अक्सर दरार के दाग़ छोड़ता है l किन्तु शायद हमारी सीख की ये रेखाएं हमारे व्यक्तित्वों में उकेरी हुई बातें ही हैं जो दूसरों में उसके चरित्र को और प्रगट करती हैं l
एक “नया मनुष्य”
मोंटेगो, जमाइका में किशोरों का एक समूह वृद्धाश्रम घूमने गया l एक युवती ने एक कमरे में एक अकेले व्यक्ति को देखा l उसके पास केवल एक खाट थी , जिस पर अशक्तता के कारण वह स्थिर था l
उस किशोरी ने सीधे उसको परमेश्वर के प्रेम की कहानी और बाइबिल के कुछ परिच्छेद पढ़कर सुनाया l बाद में वह याद करती, “उसके साथ संवाद करते समय, मैंने उसके अन्दर और सुनने की जिज्ञासा देखी l” प्रतिउत्तर में, उसने यीशु की बलिदानी मृत्यु का आश्चर्य बताया l उसने याद किया, “इस आशाहीन और परिवार रहित व्यक्ति के लिए समझना कठिन था कि कोई अपरिचित व्यक्ति उससे प्रेम करके उसके पापों के लिए क्रूस पर अपना प्राण दे l”
उसने उसे विश्वास करनेवालों के लिए स्वर्ग की प्रतिज्ञा(एक नया शरीर भी) के साथ यीशु के विषय और बताया l उसने उससे पुछा, “क्या तुम मेरे संग वहां नाचोगी?” उसने उसको अपने दुर्बल शरीर और अशक्त करनेवाली सीमाओं से स्वतंत्रता की कल्पना करते देखा l
यीशु को उद्धारकर्ता ग्रहण करने की इच्छा जताने पर, उसने उसे क्षमा और विश्वास की प्रार्थना में सहायता की l तस्वीर लेने के आग्रह पर, उस व्यक्ति ने कहा, “यदि तुम मुझे बैठने में मदद करोगी l मैं एक नया मनुष्य हूँ l”
जीवन-परिवर्तन, आशा-देनेवाले, सब के लिए यीशु मसीह के सुसमाचार हेतु परमेश्वर की स्तुति हो! हर एक विश्वास करनेवाले के लिए नया जीवन है (कुलु. 1:5, 23) l
सब पीढ़ीयाँ
1933 के महामंदी में मेरे माता-पिता ने शादी की l मेरी पत्नी और मैं द्वितीय विश्वयुद्ध पश्चात जन्म दर में नाटकीय वृद्धि के समय बच्चा जन्म दर वृद्धि काल में जन्में l 70 और 80 के दशक में जन्मीं हमारी चार बेटियाँ, पीढ़ी X और Y की हैं l इन भिन्न समयों में बढ़ने के कारण अनेक बातों में परस्पर मतभिन्नता चकित करनेवाली बात नहीं!
पीढ़ियाँ अपने जीवन अनुभवों और मान्यताओं में बेहद भिन्न होती हैं l और यह मसीह के अनुगामियों में सच है l किन्तु हमारी भिन्नताओं के बावजूद, हमारा आत्मिक संपर्क सुदृढ़ है l
परमेश्वर का स्तुति गीत, भजन 145, हमारा विश्वास बंध घोषित करता है l “तेरे कामों की प्रशंसा और तेरे पराक्रम के कामों का वर्णन, पीढ़ी पीढ़ी होता चला जाएगा ... लोग तेरी बड़ी भलाई [की] ... चर्चा करेंगे” (पद.4,7) l उम्र और अनुभव की बड़ी भिन्नता में, हम प्रभु का आदर करते हैं l वे तेरे राज्य की महिमा ... और तेरे पराक्रम के विषय में बातें करेंगे” (पद.11) l
जबकि भिन्नता और प्राथमिकताएँ हमें विभाजित करेंगी, यीशु मसीह में सहभाजी विश्वास हमें आपसी भरोसा, उत्साह, और प्रशंसा में एक करेगा l हमारी उम्र और दृष्टिकोण कुछ भी हो, हमें परस्पर ज़रूरत है l हम किसी भी पीढ़ी के हों, हम परस्पर सीखकर प्रभु का आदर करते हैं-“कि वे आदमियों पर तेरे पराक्रम के काम और तेरे राज्य के प्रताप की महिमा प्रगट करें” (पद.12) l
पहुँच का स्वभाग्य
प्रतिरूप होने के बावजूद, दक्षिणी इस्राएल में स्थापित मंदिर (मिलाप का तम्बू) विस्मयकारी था l निर्गमन 25-27 में वर्णित विवरण के अनुरूप मूल आकर में निर्मित (असली स्वर्ण और बबूल की लकड़ी को छोड़कर), वह दक्षिणी मरुभूमि में स्थित था l
जब हमारे पर्यटक समूह को “पवित्र स्थान” और “महापवित्र स्थान” में “संदूक” दिखाने के लिए ले जाया गया हममें से कुछ एक लोग हिचकिचाए l क्या यह वह महापवित्र स्थान नहीं था जिसमें केवल महायाजक ही प्रवेश कर सकता था? हम इसमें कैसे इतनी सरलता से प्रवेश कर सकते हैं?
मैं कल्पना करता हूँ कि इस्राएली हर बार अपने बलिदानों के साथ मिलाप वाले तम्बू में प्रवेश करते समय भयभीत होते होंगे, यह समझते हुए कि वे सर्वशक्तिमान परमेश्वर की उपस्थिति में आ रहे हैं l और जब-जब मूसा द्वारा उनको परमेश्वर का सन्देश मिलता होगा वे आश्चर्यचकित होते होंगे l
आज, आप और मैं यह जानते हुए कि यीशु के बलिदान ने परमेश्वर और हमारे बीच की दीवार तोड़ दी है हम भरोसे के साथ परमेश्वर के निकट आ सकते हैं (इब्रा. 12:22-23) l हर एक व्यक्ति परमेश्वर से कभी भी संवाद करके उसके वचन को पढ़कर उसकी सीधी सुन सकता है l हम सीधी पहुँच का आनंद लेते हैं जो इस्राएलियों की कल्पना थी l स्वर्गिक पिता की प्रिय संतान होकर प्रतिदिन उसकी विस्मयकारी उपस्थिति में जाकर उसको संजोने का महत्त्व समझें l
क्षमा!
कार्य से घर लौटकर मेरा मित्र नॉर्म कुक कभी-कभी अपने परिवार को आश्चर्य देता था l वह घर में आकर चिल्लाता, “तुम क्षमा किये गए हो!” परिजनों ने उसकी हानि नहीं की थी इसलिए उनको उनकी क्षमा चाहिए थी l यह ताकीद थी कि बेशक दिन भर पाप करने पर भी, उन्हें परमेश्वर के अनुग्रह से पूर्णरूपेण क्षमा मिल गई थी l
प्रेरित यूहन्ना अनुग्रह के विषय कहता है : “यदि जैसा वह ज्योति में है, वैसे ही हम भी ज्योति में चलें, तो एक दूसरे से सहभागिता रखते हैं, और उसके पुत्र यीशु का लहू हमें सब पापों से शुद्ध करता है l यदि हम कहें कि हममें कुछ भी पाप नहीं [पाप के प्रति कोई झुकाव नहीं], तो अपने आप को धोखा देते हैं, और हम में सत्य नहीं l यदि हम अपने पापों को मान लें, तो वह ... हमें सब अधर्म से शुद्ध करने में विश्वासयोग्य और धर्मी है” (1 यूहन्ना 1:7-9) l
“ज्योति में चलें” यीशु के अनुसरण का एक अलंकार है l यूहन्ना अनुसार, आत्मा द्वारा यीशु का अनुकरण, विश्वास की संगति में प्रेरितों के साथ जुड़ जाने का संकेत है l हम असली मसीही हैं l किन्तु, वह आगे कहता है, हम धोखा न खाएं : हम कभी-कभी गलत चुनाव करेंगे l तथापि, अनुग्रह भरपूर है l हमें आवश्यकतानुसार क्षमा मिलेगी l
सिद्ध नहीं, केवल यीशु द्वारा क्षमा! आज के लिए यह अच्छा शब्द है l
मधुर संगति
नर्सिंग होम में वह वृद्ध महिला किसी से बातचीत नहीं करती थी अथवा किसी से कुछ नहीं मांगती थी l ऐसा लगता था मानों वह अपनी जर्जर पुरानी कुर्सी में झूलती हुई, महज जीवित थी l उससे मिलनेवाले कम ही थे, लिहाजा एक जवान नर्स अपने अवकाश के समय उसके कमरे में अक्सर जाती थी l उस महिला से बातचीत आरंभ न करने की इच्छा से प्रश्न न पूछकर, वह एक और कुर्सी खींचकर उसके साथ झूलने लगी l कुछ महीनों के बाद, उस वृद्ध महिला ने उससे कहा, “मेरे साथ झूलने के लिए धन्यवाद l” वह संगति के लिए धन्यवादी थी l
स्वर्ग जाने से पहले, यीशु ने अपने शिष्यों के साथ निरंतर रहनेवाला एक सहायक भेजने की प्रतिज्ञा की l उसने उनसे कहा कि वह उन्हें अकेले नहीं छोड़ेगा किन्तु उनके संग रहने के लिए पवित्र आत्मा भेजेगा (यूहन्ना 14:17) l वह प्रतिज्ञा आज भी यीशु के विश्वासियों के लिए सच है l यीशु ने कहा कि त्रियेक परमेश्वर हममें अपना “घर” बनाएगा (पद.23) l
हमारे सम्पूर्ण जीवन में प्रभु हमारा निकट और विश्वासयोग्य सहयोगी है l वह हमारे कठिनतम संघर्षों में मार्गदर्शन करेगा, हमारे पाप क्षमा करेगा, प्रत्येक शांत प्रार्थना सुनेगा, और उन बोझों को उठाएगा जो हमारे लिए उठाना कठिन है l
आज हम उसकी मधुर संगति का आनंद उठा सकते हैं l
गहराई में से
समस्या के संकेत की चेतावनी पर मैंने जल की बारीकी से जांच की l मैंने जीवन-रक्षक की छः घंटे की शिफ्ट ड्यूटी में, तरणताल के किनारे से तैरनेवालों की सुरक्षा पर ध्यान देता रहा l अपनी जगह छोड़ना, अथवा अपनी सावधानी में ढीला होना, तरणताल में तैरनेवालों के लिए भयानक परिणाम ला सकता था l किसी तैराक की चोट या कौशल की कमी के कारण उसके डूबने की आशंका में, उसे तरणताल के बाहर निकलना मेरी जिम्मेदारी थी l
पलिश्तियों के विरुद्ध युद्ध में परमेश्वर की सहायता अनुभव करने के बाद (2 शमूएल 21:15-22), दाऊद अपने बचाव की तुलना “गहरे जल” (22:17) में से खींचकर बाहर निकाले जाने से करता है l स्वयं दाऊद का-और उसके लोगों का जीवन-उसके शत्रुओं के गंभीर खतरे में थी l परमेश्वर ने मुसीबत में डूबते हुए दाऊद के जीवन को बाहर निकाल लिया l जबकि तैरनेवालों की सुरक्षा के लिए जीवन-रक्षकों को भुगतान किया जाता है, अपितु, परमेश्वर, दाऊद से प्रसन्न होकर उसे बचाया ([पद. 20) l मेरा हृदय यह जानकार अति आनंदित है कि परमेश्वर बाध्यता के कारण नहीं किन्तु अपनी इच्छा से मेरी सुरक्षा करता है l
जीवन की समस्याओं से अभिभूत होने पर, हम इस ज्ञान में विश्राम पा सकते हैं कि परमेश्वर हमारा जीवन-रक्षक है, हमारे संघर्ष को जानता है और, अपनी प्रसन्नता के कारण हमारी सुरक्षा करता है l